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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

ॐ
अथ सप्तमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
द्रव्यों और कर्मों की परीक्षा हो चुकी तथा बीच में श्रौतधर्मों की भी
परीक्षा की गई । अब क्रमानुसार सप्तमाध्याय में गुणों की परीक्षा करेंगे,
इस लिये गुण जो प्रथमाध्याय प्रथम आह्निक के छठे सूत्र में कहे थे, वह
प्रकरण अब बहुत दूर हो गया है, इस लिये आचार्य उस दूरस्थ प्रकरण को
स्मरण कराते हैं कि-
२६०-उक्ता गुणाः ॥ १ ॥
( गुणाः ) गुण ( उक्ताः ) १।६ में कहे गये थे ॥ १ ॥
२६१-पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शाः
द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च ॥ २ ॥
( पृथिव्यादि-स्पर्शाः ) पृथिवी आदि द्रव्यों के रूप, रस, गन्ध और
स्पर्श, गुण ( द्रव्यानित्यत्वात् ) द्रव्य की अनित्यता से ( अनित्याः ) अनित्य
( च ) भी हैं ॥
अर्थात् अनित्य पृथिवी का गुण गन्धादिक भी अनित्य है, इसी प्रकार
अनित्य अग्नि का गुण रूप भी अनित्य है । अनित्य जल का गुण रस भी
अनित्य है । अनित्य वायु का गुण स्पर्श भी अनित्य है ॥ २ ॥
पृथिवी आदि द्रव्य कार्य कारण भेद से अनित्य और नित्य भी होते
हैं । उन में से अनित्य द्रव्यों के गुणों को इस सूत्र में अनित्य कहा गया ।
आगे नित्य द्रव्यों के गुणों को नित्य समझना चाहिये सो कहते हैं:-
२६२-एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ ३ ॥
( एतेन ) पूर्वोक्त कथन से ही ( नित्येषु ) नित्य द्रव्यों में (नित्यत्वम्)
गुणों की भी नित्यता ( उक्तम् ) कही गई ॥ ३ ॥
२६३-अप्सु तेजसि वायौ च नित्या द्रव्यनित्यत्वात् ॥ ४ ॥

११६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(द्रव्यनित्यत्वात्) द्रव्य के नित्य होने से (अप्सु) जल के परमाणुओं
में (तेजसि) अग्नि के परमाणुओं में (च) और (वायौ) वायु के परमाणुओं
में (नित्याः) गुण भी नित्य हैं ॥
जल के परमाणुओं में रस, रूप और स्पर्श; अग्नि के परमाणुओं में
रूप और स्पर्श, वायु के परमाणुओं में स्पर्श गुण नित्य हैं, ऐसा शङ्कर
मिश्रादि व्याख्यान करते हैं परन्तु परमाणु रूप नित्यद्रव्यों में अनित्यद्रव्यों
के गुण संभव नहीं, इस लिये हमारे मत में सूत्र का यही अभिप्राय है कि
जलपरमाणुओं में रस, अग्निपरमाणुओं में रूप और वायुपरमाणुओं में
स्पर्श; केवल यही नित्य गुण हैं ॥
इस सूत्र में पृथिवी के परमाणुओं का गन्ध गुण नित्य कहने से न
जाने क्यों छोड़ दिया गया, इस विषय पर प्रायः सभी टीकाकार बिना
किसी तर्क के चुपचाप इस शङ्का की ओर ध्यान नहीं लाये ॥ ४ ॥
२६४-अनित्येष्वनित्या द्रव्याऽनित्यत्वात् ॥ ५ ॥
(द्रव्यानित्यत्वात्) द्रव्यों के अनित्य होने से (अनित्येषु) अनित्य
कार्य द्रव्यों में (अनित्याः) गुण भी अनित्य हैं ॥ ५ ॥
२६५-कारणगुणपूर्वकाः पृथिव्यां पाकजाः ॥ ६ ॥
(पृथिव्यां) कार्य रूप पृथिवी में (पाकजाः) अन्य द्रव्यों के साथ
पकने से उत्पन्न हुए रस रूप और स्पर्श गुण (कारणगुणपूर्वकाः) अपने २
कारणों के गुणों से आये हुए होते हैं ॥
पृथिवी में केवल गन्ध गुण तो अपना है और रूपादि गुण अग्नि आदि
अन्य द्रव्यों के साथ पकने से उत्पन्न होजाते हैं ॥ ६ ॥ क्योंकि-
२६६-एकद्रव्यत्वात् ॥ ७ ॥
प्रत्येक गुण का केवल एक ही द्रव्य होने से ॥ ७ ॥
२६७-अणोर्महतश्चोपलब्ध्यनुप-
लब्धी नित्ये व्याख्याते ॥ ८ ॥
(अणोः) अणु की (च) और (महतः) महत् की (उपलब्ध्यनुपलब्धी)
अनुपलब्धि और उपलब्धि (नित्ये) नित्य (व्याख्याते) कहीं समझनी चाहिये॥

प्रत्येक अणु अर्थात सूक्ष्मपदार्थ की उपलब्धि नहीं होती और महत्
पदार्थ की उपलब्धि होती है, यह उपलब्ध और अनुपलब्ध होना सार्व-
कालिक नित्य है ॥ ८ ॥
२६८—कारणबहुत्वाच्च ॥ ६ ॥
(कारणबहुत्वात्) बहुत कारणों के होने से (च) भी महत् पदार्थ
में महत्त्व=बड़ापन होजाता है ॥ ९ ॥
२६९—अतोविपरीतमणु ॥ १० ॥
(अतः) इस से (विपरीतम्) विरुद्ध (अणु) परमाणु रूप लघुपदार्थ
में महत्त्व=बड़ा पन नहीं होता ॥ १० ॥
२७०—अणु महदिति तस्मिन् विशेष-
भावाद्विशेषाऽभावाच्च ॥ ११ ॥
(अणु) छोटा (महत्) बड़ा (इति) यह व्यवहार (तस्मिन्) उस
पदार्थ में (विशेषभावात्) विशेष होने से (च) और (विशेषाऽभावात्)
विशेष न होने से भी होता है ॥
एक ही पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा से छोटा कहसकते हैं और
उसी को तीसरे पदार्थ की अपेक्षा से बड़ा भी कह सकते हैं। जैसे—एक ही
आंवला (आमलकीफल) बिल्व से छोटा और गेहूँ से बड़ा कहाता है ॥११॥
२७१—एककालत्वात् ॥ १२ ॥
(एककालत्वात्) एक काल में होने से ॥
जिस काल में हम आंवले को बिल्व से छोटा कहते हैं,उसी एक काल
में उसी आंवले को गेहूँ से बड़ा भी कहते हैं ॥ १२ ॥
२७२—दृष्टान्ताच्च ॥ १३ ॥
(च) और (दृष्टान्तात्) दृष्टान्त से भी सिद्ध है ॥
जैसा एक दृष्टान्त आंवले का पूर्व सूत्रों में दिया गया, ऐसे ही अन्य
अनेक दृष्टान्त सर्वत्र देखे जाते हैं। जैसे गौ हाथी से छोटी और बकरी से
बड़ी होती है, इत्यादि ॥ १३ ॥
प्रश्न—तो क्या छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का बड़ापन भी होता
है ? उत्तर—नहीं, क्योंकि—

११८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२७३—अणुत्वमहत्त्वयोरणुत्वमहत्त्वा-
ऽभावः कर्मगुणैर्व्याख्यातः ॥ १४ ॥
(अणुत्वमहत्त्वयोः) छोटेपन और बड़ेपन का (अणुत्वमहत्त्वाभावः)
अन्य छोटापन और बड़ापन नहीं होता, यह बात (कर्मगुणैः) कर्म और
गुणों के व्याख्यान से (व्याख्यातः) कही गई ॥
कर्मों और गुणों के व्याख्यान में कह चुके हैं (देखो सूत्र १६ और १७
अध्याय १ आह्निक १) कि कर्म का कर्म और गुण का गुण नहीं होता,
इसी प्रकार समझना चाहिये कि छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का
बड़ापन भी अन्य नहीं होता ॥ १४ ॥
इसी बात को अगले सूत्र में भिन्न-२ करके समझाते हैं कि:-
२७४-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा व्याख्याताः ॥ १५ ॥
(कर्मभिः) उत्क्षेपणादि विशिष्ट कर्मों से (कर्माणि) कर्म (च) और
(गुणैः) रूपादि विशिष्ट गुणों से (गुणाः) गुण (व्याख्याताः) व्याख्यात
हो चुके ॥ १५ ॥ तथा:-
२७५-अणुत्वमहत्त्वाभ्यां कर्मगुणाश्च ॥ १६ ॥
(अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व के व्याख्यान से (कर्मगुणाः)
कर्म और गुण (च) भी व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व नहीं होता और जैसे महत्त्व का महत्त्व
नहीं होता, इसी प्रकार कर्मों का अणुत्व और महत्त्व तथा गुणों का अणुत्व
और महत्त्व भी नहीं बनता ॥ १६ ॥ और-
२७६-एतेन दीर्घत्वह्रस्वत्वे व्याख्याते ॥ १७ ॥
(एतेन) इस से (दीर्घत्वह्रस्वत्वे) दीर्घता और ह्रस्वता (व्याख्याते)
व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का महत्त्व नहीं बनता,
इसी प्रकार दीर्घत्व का दीर्घत्व और ह्रस्वत्व का ह्रस्वत्व भी नहीं बनता ॥ १७ ॥
प्रश्न-१-अणुत्व, २-महत्त्व, ३-दीर्घत्व, ४-ह्रस्वत्व, ये चारों परिमाण
नित्य हैं वा अनित्य ? उत्तर-.

७ अध्याय १ आह्निक १९९

७ अध्याय १ आह्निक १९९
२७७–अनित्येऽनित्यम् ॥ १८ ॥
(अनित्ये) अनित्य द्रव्य में (अनित्यम्) यह चारों परिमाण अनित्य
होते हैं ॥ १८ ॥ और–
२७८–नित्ये नित्यम् ॥ १९ ॥
(नित्ये) नित्य द्रव्य में (नित्यम्) परिमाण भी नित्य होते हैं ॥ १९॥
उदाहरण–
२७९–नित्यं परिमण्डलम् ॥ २० ॥
(परिमण्डलम्) परमाणु का परिमाण (नित्यम्) नित्य है ॥
जैसे परमाणु द्रव्य नित्य है, वैसे उस का परिमाण भी नित्य है ॥ २०॥
प्रश्न–इस का कैसे निश्चय हो कि परमाणु में भी परिमाण है ? उत्तर–
२८०--अविद्या च विद्यालिङ्गम् ॥ २१ ॥
(अविद्या) अविद्या (च) भी (विद्यालिङ्गम्) विद्या की पहचान है ॥
अविद्या से विद्या पहचानी जाती है क्योंकि अविद्या में विद्या का
निषेध है। इसी प्रकार स्थूल पदार्थों के महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण से
परमाणु का अणुत्व और ह्रस्वत्व भी पहिचाना जाता है ॥ २१ ॥
परमाणु का नित्य परिमाण उदाहरण में दिया गया, अब आगे पर-
मात्मा और आकाश का महत्त्व परिमाण नित्य है, यह दूसरा उदाहरण देते हैं–
२८१–विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा ॥ २२ ॥
(विभवात्) व्यापक होने से (आकाशः) आकाश (च) और (आत्मा)
परमात्मा (महान्) महत्त्वपरिमाणयुक्त हैं ॥
व्यापक होने से नित्य द्रव्य आकाश और परमात्मा का महत्त्व परिमाण
भी नित्य है ॥ २२ ॥
२८२–तदभावादणु मनः ॥ २३ ॥
(तदभावात्) सर्वव्यापक न होने से (मनः) मन वाला आत्मा–
जीवात्मा (अणु) अणुत्व परिमाण वाला है ॥
शङ्कर मिश्रादि टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि "व्यापक
न होने से मन अणु है"। यह कथन सर्वशास्त्रविरुद्ध है क्योंकि मन लिङ्ग
शरीर का एक अवयव है, जैसा कि “सप्तदशैकं लिङ्गम् । सांख्य ३। ९” इस

१२७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
सूत्र में १७ वा १८ तत्त्वों का लिङ्ग शरीर, कहा है और वे सभी तत्त्व उत्पत्ति-
मान् हैं और कोई उत्पत्ति-वाला पदार्थ न अणु हो सकता, न महान् हो
सकता किन्तु परमाणु और जीवात्मा अणु हैं और परमात्मा महान् है, ये
ही पदार्थ अजन्मा हैं । शेष सब जन्म हुए होने से मध्यमपरिमाण हैं ।
छान्दोग्य ६।५।४ में लिखा है कि "अन्नमयं हि सोम्य मनः" अर्थात्
मन अन्न से बनता है, तब वह अणु कैसे हो सकता है ? मुण्डक २।१।३
में भी लिखा है कि "एतस्मात् प्रजायन्ते मनः सर्वेन्द्रियाणि च" । इस में भी
मन की उत्पत्ति लिखी है और उत्पत्ति वाला कोई पदार्थ न अणु हो सकता,
न नित्य हो सकता । इस लिये इस सूत्र में 'मनः' शब्द से मन का सहचारी
जीवात्मा ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥
२८३—गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २४ ॥
(गुणैः) गुणों के साथ (दिक्) दिशा (व्याख्याता) व्याख्यात हो चुकी ॥
परत्व अपरत्व आदि गुणों के समान दिशा का भी व्याख्यान समझना
चाहिये ॥ २४ ॥
२८४—कारणेन कालः ॥ २५ ॥
(कारणेन) कारण से (कालः) काल का व्याख्यान होगया ॥
जितने पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं सब की उत्पत्ति में काल निमित्त कारण
है, इस लिये समझना चाहिये कि काल सामान्य विभु पदार्थ है ॥ २५ ॥
इस प्रथम आह्निक में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, चार प्रकार का परिमाण,
गुणों का स्मरण कराकर परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥
इति सप्तमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम्
—:०*०:—
अथ द्वितीयमाह्निकम्
परिमाण की परीक्षा कर चुके, अब संख्या की परीक्षा करना चाहते हैं ।
इस लिये प्रथम संख्या को रूपादि गुणों से भिन्नवस्तुता सिद्ध करते हैं कि-
२८५—रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकादर्थान्तरमेकत्वम् ॥ १ ॥
(रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकात्) रूप, रस, गन्ध और स्पर्शादि से अति-
रिक्त होने से (एकत्वम्) एकत्व आदि संख्या (अर्थान्तरम्) अन्य वस्तु है ॥

सप्तमाऽध्याय २.आह्निक १२१

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सप्तमाऽध्याय २.आह्निक १२१
रूपादिक उपलक्षणमात्र हैं, उन से अन्य गुणों का भी ग्रहण करना
चाहिये । एकत्व भी उपलक्षणमात्र है, उस से द्वित्व त्रित्व आदि का भी
ग्रहण करना चाहिये । एक घट, दो मठ, तीन वस्त्र, चार पुस्तक, पांच तत्त्व,
छः ऋतु, सात छन्द, जिस प्रकार संख्यावान् हैं, इसी प्रकार एक ब्रह्म, एक
आकाश, चार दिशा, बहुत जीव, इत्यादि प्रकार से निर्गुण पदार्थों में भी
संख्या रहती है, इसी लिये संख्या एक भिन्न गुण हैं, जो रूपादि गुणों के अन्त-
र्गत नहीं हो सकती ॥१॥ और भी-
२८६-तथा पृथक्त्वम् ॥२॥
( तथा ) इसी प्रकार ( पृथक्त्वम् ) पृथक्त्व गुण भी रूपादि से भिन्न है ॥
जैसे एक घट दूसरे घट से पृथक् है तब घट का एक होना और दूसरे
घट से पृथक् होना रूपादि गुणों के अन्तर्गत नहीं हो सकता ॥ २ ॥
२८७-एकत्वैकपृथक्त्वयोरेकत्वैकपृथक्त्वा-
भावोऽणुत्वमहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ३ ॥
( एकत्वैकपृथक्त्वयोः ) एकत्व और एकपृथक्त्व में ( एकत्वैकपृथक्त्वाभावः )
दूसरे एकत्व और दूसरे एकपृथक्त्व का अभाव है, जो ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् )
अणुत्व और महत्त्व के साथ व्याख्यातः) वर्णन किया गया-एकत्व में दूसरा एकत्व
और पृथक्त्व में दूसरा पृथक्त्व नहीं होता। जैसे अणुत्व में दूसरा अणुत्व और महत्त्व
में दूसरा महत्त्व नहीं होता, जिस का व्याख्यान ७।१।१४ में हो चुका है ॥३॥
यदि कहो कि उत्क्षेपणादि कर्मों और रूपादि गुणों में द्वित्वादि संख्या
न सही परन्तु सब को मिलाकर एकत्व तो है ? तो उत्तर-
२८८-निःसंख्यत्वात्कर्मगुणानां सर्वैकत्वं न विद्यते ॥ ४ ॥
( कर्मगुणानाम् ) कर्मों और गुणों के (निःसंख्यत्वात् ) संख्यारहित
होने से (सर्वैकत्वम् ) सब का एक होना ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥
कर्म और गुणों को मिलाकर सब को एकत्व संख्या में भी अन्तर्गत
नहीं कर सकते क्योंकि कर्म और गुण संख्या से भिन्न पदार्थ हैं ॥ ४॥
यदि कहो कि कर्मों और गुणों में संख्या का व्यवहार तो पाया जाता
है, जैसा कि एक काम तुम करो, दूसरा मैं करता हूं, एक रूप को तुम देखो,
दूसरे को मैं देखता हूं, इत्यादि ? तो उत्तर-
१६
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection

१२२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२८९-भ्रान्तं तत्॥ ५ ॥
(तत्) वह (भ्रान्तम्) भ्रान्तियुक्त है ॥
कर्म और गुण में रहने वाली संख्या को कर्मरूप वा गुणरूप समझना
भ्रान्ति है किन्तु वास्तव में जैसे द्रव्यों में रहने पर भी गुण स्वयं द्रव्यरूप
नहीं किन्तु भिन्न पदार्थ हैं, ऐसे ही संख्या को भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥
२९०-एकत्वाभावाद्भक्तिस्तु न विद्यते ॥ ६ ॥
(एकत्वाभावात्) एकत्व न होने से (तु) तो (भक्तिः) समान धर्म
(न) नहीं हो सकता ॥
अर्थात् यदि संख्या को सर्वत्र भ्रान्त मानकर केवल भाक्त जानें तो भी
ठीक नहीं क्योंकि यदि संख्या कोई मुख्य पदार्थ न हो तो उस का भाक्त=
गौण प्रयोग भी न होसके परन्तु होता है, इस लिये संख्या रूपादि से भिन्न
एक गुण है ॥ ६ ॥
२९१-कार्यकारणयोरेकत्वैकपृथक्त्वाभावा-
देकत्वैकपृथक्त्वं न विद्यते ॥ ७ ॥
(कार्यकारणयोः) कार्य और कारण में (एकत्वैकपृथक्त्वाभावात्)
एकत्व और एकपृथक्त्व न होने से (एकत्वैकपृथक्त्वम्) एकत्व और एकपृथक्त्व
(न) नहीं (विद्यते) है ॥
अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि कार्य में एकत्व संख्या हो तो कारण
में भी एकत्व हो तथा यह भी आवश्यक नहीं कि कार्य में एकपृथक्त्व हो
तो कारण में भी एकपृथक्त्व ही हो क्योंकि कार्य और कारण में एकत्व और
एकपृथक्त्व नियत नहीं ॥
हो सकता है कि कारणों में बहुत्व हो और कार्य में एकत्व हो तथा
यह भी हो सकता है कि कारण में एकत्व हो और कार्यों में बहुत्व हो।
जैसे एक मृत्तिकारूप कारण से अनेक घटरूप कार्य होते हैं तथा अनेक धागे
रूप कारणों से एक वस्त्ररूप कार्य भी होता है। इसी प्रकार एकपृथक्त्व भी
समझो ॥ ७ ॥ तथा-
२९२-एतदनित्ययोर्व्याख्यातम् ॥ ८ ॥

सप्तमाध्याय. २ आन्हिक १२५
( एतद् ) यही नियम ( अनित्ययोः) अनित्य एकत्व और एकपृथक्त्व
में ( व्याख्यातम् ) व्याख्यात समझो ॥
नित्य द्रव्य में एकत्व और एकपृथक्त्व भी नित्य होते हैं और अनित्य
द्रव्य में अनित्य होते हैं ॥ ८ ॥
२६३-अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः ॥ ९ ॥
अब संयोग की परीक्षा करते हैं जो क्रमप्राप्त है-( अन्यतरकर्मजः )
दो में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( उभयकर्मजः ) दोनों
के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( च ) और ( संयोगजः) संयोग से उत्पन्न होने
वाला ( संयोगः ) संयोग होता है ॥
भिन्न २ दो पदार्थोंका परस्पर मिलजाना=संयोग कहाता है। वह संयोग
तीन प्रकार का होता है। जैसे:-
१-दो पदार्थों में से एक में क्रिया होने तो एक की क्रिया से दूसरे के
साथ संयोग हो जायगा ॥
२-दोनों पदार्थों में क्रिया होने से दोनों का आपस में संयोग हो जायगा॥
३-संयोग से भी संयोग उत्पन्न होता है। जैसे वृक्ष और अङ्गुली के
संयोग में अङ्गुली की क्रिया कारण है, परन्तु साथ ही अङ्गुली और हाथ का
संयोग भी वृक्ष और हाथ के संयोग का कारण है ॥ ९ ॥
२६४-एतेन विभागोव्याख्यातः ॥ १० ॥
( एतेन ) इस संयोग के व्याख्यान से ( विभागः ) विभाग का भी
( व्याख्यातः ) व्याख्यान होगया ॥
अर्थात् जैसे संयोग तीन प्रकार का है, ऐसे ही विभाग भी तीन प्रकार
का समझो ॥
१-संयुक्त दो पदार्थों में से किसी एक की क्रिया से विभाग हो जाता है॥
२-कभी दोनों की क्रिया से विभाग हो जाता है ॥
३-और कभी विभाग से भी विभाग हो जाता है ॥ १० ॥
२६५-संयोगविभागयोः संयोगविभागाभावो
ऽणुत्व महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ११ ॥

१२४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(संयोगविभागयोः) संयोग और विभाग के (संयोगविभागाभावः)
संयोग और विभाग का अभाव (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व
के साथ (व्याख्यातः) व्याख्यात होचुका ॥
अर्थात् जैसे अणुत्व में अणुत्व और महत्त्व में महत्त्व न होना कहागया
था, ऐसे ही संयोग में संयोग और विभाग में विभाग नहीं होता समझो ॥११॥
१८६-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा
अणुत्वमहत्त्वाभ्यामिति ॥ १२ ॥
(इति) ऐसा पूर्व कहा गया है कि (कर्मभिः कर्माणि) कर्मों के साथ
कर्म (च) और (गुणैःगुणाः) गुणों के साथ गुण (अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्)
अणुत्व और महत्त्व से व्याख्यात समझो ॥
अध्याय ७ आन्हिक १ सूत्र १४ से १६ तक तीन सूत्रों में जिन का विस्तार से
व्याख्यान करचुके हैं, उस बात को सूत्रकार इस सूत्र में स्मरण कराते हैं ॥१२॥
२८७-युतसिद्धयभावात्कार्यकारणयोः
संयोगविभागौ न विद्येते ॥ १३ ॥
(युतसिद्धयभावात्) जुड़ा हुआ होना सिद्ध न होने से (कार्यकारणयोः)
कार्य और कारण में (संयोगविभागौ) संयोग और विभाग (न) नहीं
(विद्येते) होते ॥
कारण मृत्तिका में कार्य घट जुड़ा हुआ सिद्ध नहीं होसकता । इस
लिये घट और मृत्तिका में जो कि कार्य और कारण हैं, संयोग और विभाग
नहीं मान सकते ॥ १३ ॥
२८८-गुणत्वात् ॥ १४ ॥
(गुणत्वात्) गुण होने से [द्रव्य और गुण में संयोग और विभाग नहीं
मान सकते] ॥ १४ ॥
२८६-गुणोऽपि विभाव्यते ॥ १५ ॥
(गुणः) गुण (अपि) भी (विभाव्यते) [शब्द से] प्रतिपादन किया
जाता है ॥
जिस प्रकार घट पट आदि शब्दों से उन के अर्थों का ग्रहण होता है,
जो द्रव्य हैं, इसी प्रकार गुणवाचक शब्दों से गुणों का भी ग्रहण होता है।

जैसे रूप, रस, गन्ध आदि शब्दों से रूप रस आदि गुणों का ग्रहण किया जाता
है। इस कारण शब्द और अर्थ में भी संयोग सम्बन्ध नहीं है ॥१५॥ क्योंकि-
३००-निष्क्रियत्वात् ॥ १६ ॥
(निष्क्रियत्वात्) क्रियारहित होने से [शब्द का अर्थ के साथ संयोग
संबन्ध नहीं है, क्योंकि संयोग तो क्रिया से उत्पन्न होता है] ॥ १६ ॥ और-
३०१-असति नास्तीति च प्रयोगात् ॥ १७ ॥
(असति) असत् पदार्थ में (च) भी (न अस्ति) "नहीं है" (इति)
ऐसा (प्रयोगात्) प्रयोग होने से ॥
जो पदार्थ अब नहीं है परन्तु आगे होगा, उस वर्त्तमान में असत् और
भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का बोध भी शब्द से किया जाता है। यदि शब्द
का अर्थ के साथ संयोग सम्बन्ध होता तो भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का
वर्त्तमान शब्द से बोध न होता क्योंकि दोनों भिन्नकालीन हैं। जैसे जो
घड़ा कल बनाया जायगा और आज वह घड़ा नहीं है तो भी कल को बनने
वाले घड़े का बोध आज के उच्चारण किये हुए घट शब्द से होता है। कल
को होने वाले घट द्रव्य का बोध न होता, यदि शब्द और अर्थ में संयोग
सम्बन्ध होता ॥ १७ ॥ इस से सिद्ध हुवा कि-
३०२-शब्दार्थावसम्बन्धौ ॥ १८ ॥
(शब्दार्थौ) शब्द और अर्थ (असम्बन्धौ) परस्पर संयोग सम्बन्ध-
रहित हैं ॥ १८ ॥
यदि कहो कि शब्द और अर्थ में संयोग सम्बन्ध न सही किन्तु समवाय
सम्बन्ध तो मान सकते हैं ? तो उत्तर-
३०३-संयोगिनोदण्डात्, समवायिनोविशेषाच्च ॥ १९ ॥
(संयोगिनः) संयोगी पुरुष का (दण्डात्) दण्ड से (च) और (सम-
वायिनः) समवाय सम्बन्ध वाले का (विशेषात्) विशेष अवयव से [जैसे
ग्रहण होता है वैसे अर्थ का ग्रहण शब्द से नहीं होता] ॥
यदि अर्थ के साथ शब्द का संयोगसम्बन्ध अथवा समवायसम्बन्ध होता
तो अर्थ के साथ शब्द भी प्रतीत हुवा करता। परन्तु ऐसा नहीं होता। इस
से जाना जाता है कि शब्द का अर्थ के साथ सम्बन्ध नहीं है। जैसे हाथी

३२६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
का सूंड़ के साथ अवयव विशेष से सम्बन्ध है और दण्डी पुरुष का दण्ड को
साथ संयोग सम्बन्ध है, तब दण्डी पुरुष के साथ २ दण्ड का और हाथी के
साथ २ उस की सूंड़ का ग्रहण होता है, परन्तु घटदर्शन के साथ २ घट
शब्द का दर्शन नहीं होता। इस लिये शब्द और अर्थ में न तो संयोग सम्बन्ध
है, न समवाय सम्बन्ध है ॥ १९ ॥
प्रश्न-यदि शब्द और अर्थ में दोनों प्रकार का सम्बन्ध नहीं तो शब्द
से अर्थ का बोध क्यों होता है ? उत्तर-
३०४-सामयिकः शब्दार्थप्रत्ययः ॥ २० ॥
( शब्दात् ) शब्द से ( अर्थप्रत्ययः ) अर्थ की प्रतीति ( सामयिकः )
सांकेतिक है ॥
अर्थात् आप्त पुरुषों ने जिस शब्द से जिस अर्थ का ग्रहण करना नियत
कर दिया, उसी शब्द से उस अर्थ का ग्रहण होने लगा है। जैसे फ़ारस देश
के लोग माहताब शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और अङ्गरेज़ लोग मून
शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और आर्य लोग शशी, चन्द्र, कला-
निधि, मृगाङ्क, चन्द्रमा इत्यादि शब्दों से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं।
अतः जब एक भाषा बोलने वाले अथवा अनेक भाषा बोलने वाले एक शब्द
से अनेक अर्थों का और अनेक शब्दों से एक अर्थ का ग्रहण कर लेते हैं तब
किसी शब्द का किसी अर्थ के साथ संयोग वा समवाय सम्बन्ध तो नहीं
रहा किन्तु केवल सांकेतिक सम्बन्ध है ॥ २० ॥
३०५-एकदिक्काभ्यामेककालाभ्यां सन्निकृष्ट
विप्रकृष्टाभ्यां परमपरञ्च ॥ २१ ॥
( एकदिक्काभ्याम् ) एक ही दिशा में रहने वाले ( एककालाभ्याम् )
एक ही काल में रहने वाले ( सन्निकृष्टविप्रकृष्टाभ्याम् ) समीप और दूर से
( परम् ) परत्व ( च ) और ( अपरत्वम् ) अपरत्व होता है ॥
यहां से क्रमागत परत्व और अपरत्व की परीक्षा करते हैं-किसी एक
दिशा में समीप पदार्थ को पर कहते हैं और उस की अपेक्षा उसी दिशा में
दूरस्थ पदार्थ को अपर कहते हैं। यह देशकृत परत्वापरत्व हुआ। दूसरा
कालकृत परत्वापरत्व वह है, जो समयके समीप और दूर होने से होता है॥२१॥

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सप्तमाध्याय २ आह्विक १२१
३०६-कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच्च ॥ २२ ॥
( कारणपरत्वात् ) कारण के समीप होने से परत्व (च) और (कारण-
ऽपरत्वात्) कारण के दूर होने से अपरत्व होता है ॥
अर्थात् देश और काल की समीपता परत्व का कारण है तथा उन की
दूरी दूरस्थता अपरत्व का कारण है ॥ २२ ॥
३०७-परत्वापरत्वयोः परत्वापरत्वाभावोऽणुत्व
महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ २३ ॥
( परत्वापरत्वयोः ) परत्व और अपरत्व का ( परत्वापरत्वाभावः )
दूसरा परत्व और अपरत्व न होना ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) अणुत्व और
महत्त्व के साथ ( व्याख्यातः ) व्याख्यात किया गया समझना चाहिये ॥
२१३ वें सूत्र में कह चुके हैं कि अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का
महत्त्व नहीं होता। इसी प्रकार समझना चाहिये कि परत्व का परत्व और
अपरत्व का अपरत्व भी नहीं होता ॥ २३ ॥
३०८-कर्मभिः कर्माणि गुणैर्गुणाः ॥ २४ ॥
( कर्मभिः ) कर्मों से ( कर्माणि ) कर्म, ( गुणैः ) गुणों से ( गुणाः ) गुण
[कहे जा चुके हैं] ॥
अर्थात् २१४ और २१५ वें सूत्रों के अनुसार कर्मों से कर्म और गुणों से
गुण की व्याख्या हो चुकी है ॥ २४ ॥
प्रश्न-समवाय क्या पदार्थ है ? उत्तर-
३०९-इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः स समवायः ॥ २५ ॥
( यतः ) जिस से ( कार्यकारणयोः ) कार्य और कारण में ( इति ) यह
व्यवहार होता है कि ( इह-इदम् ) इस में यह है ( सः ) वह ( समवायः )
समवाय कहाता है ॥
जैसे मृत्तिकारूप कारण में घटरूप कार्य अथवा घटरूप कार्य में मृत्तिका
रूप कारण जिस सम्बन्ध से वर्त्तमान हैं, उस सम्बन्ध को समवाय कहते हैं ॥२५॥
प्रश्न-तो समवाय को भिन्न पदार्थ क्यों माना जावे ? द्रव्य और गुण में
ही किसी एक को समवाय क्यों न समझ लें ? उत्तर-
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१९८ | वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

३१०-द्रव्यत्वगुणत्वप्रतिषेधोभावेन व्याख्यातः ॥ २६ ॥
(द्रव्यत्वगुणत्वप्रतिषेधः) द्रव्यत्व और गुणत्व का प्रतिषेध (भावेन)
भाव के साथ (व्याख्यातः) व्याख्यात हो चुका ॥
अर्थात् ३९ और ४० वें सूत्रों में जिस प्रकार सत्ता को गुण और कर्म से
भिन्न सिद्ध कर आये हैं, इसी प्रकार यहां भी समवाय को द्रव्य और गुण से
भिन्न समझना चाहिये ॥ २६ ॥
प्रश्न-तो क्या समवाय में केवल द्रव्यत्व और गुणत्व का निषेध ही सत्ता
के साथ कहा गया ? अन्य कुछ नहीं ? उत्तर-
३११-तत्त्वञ्च ॥ २७ ॥
(तत्त्वम्) एकत्व और नित्यत्व (च) भी [कहा गया है] ॥
अर्थात् जिस प्रकार सत्ता एक और नित्य है, इसी प्रकार समवाय भी एक
और नित्य है ॥ २७ ॥
इस आह्निक में संख्यादि ५ गुणों और समवाय सम्बन्ध की तथा शब्द
और अर्थ में क्या सम्बन्ध है, इस की परीक्षा की गयी ॥
इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम्
॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे
गुणसमवायाध्यायः सप्तमः ॥ ७ ॥

ओ३म्
अथाष्टमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
परत्व और अपरत्व की परीक्षा हो चुकी, आगे क्रमानुसार बुद्धि की
परीक्षा करनी है। प्रत्यक्षादि भेद से बुद्धियें बहुत हैं, ज्ञान भी बुद्धि ही का
नाम है, इस लिये प्रथम प्रत्यक्ष ज्ञान की परीक्षा का उपक्रम करते हैं—
३१२-द्रव्येषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १ ॥
(द्रव्येषु) पृथिव्यादि द्रव्यों के विषय में (ज्ञानम्) ज्ञान की (व्याख्यातम्)
व्याख्या होचुकी ॥
अध्याय ४ आह्निक १ सूत्र ६ में कहचुके हैं कि “महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्
रूपाच्चोपलब्धिः” इस सूत्र में द्रव्यविषयक प्रत्यक्ष ज्ञान की व्याख्या की गई
थी, जिस को वहीं १६३ में देख लीजिये ॥ १ ॥ परन्तु-
३१३-तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे ॥ २ ॥
(तत्र) उन पृथिव्यादि द्रव्यों में (आत्मा) जीवात्मा और परमात्मा
(च) और (मनः) मन (अप्रत्यक्षे) प्रत्यक्ष नहीं हैं ॥
प्रायः सभी टीकाकार इस सूत्र के (च) शब्द से वायु, आकाश, काल,
दिशा और परमाणुओं का ग्रहण करते हैं। तब इस सूत्र का यह अर्थ होता
है कि “उन में से आत्मा, मन, वायु, आकाश, काल, दिशा और परमाणु
प्रत्यक्ष नहीं हैं”, शेष पृथिवी जल अग्नि प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥
प्रश्न-प्रत्यक्ष ज्ञान की विधि बतलाओ ? उत्तर-
३१४-ज्ञाननिर्देशे ज्ञाननिष्पत्तिविधिरुक्तः ॥ ३ ॥
(ज्ञाननिर्देशे) जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां (ज्ञाननिष्पत्तिविधिः)
ज्ञान प्राप्त होने की रीति (उक्तः) बतलाई जा चुकी है ॥
१३५ में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष ज्ञान की उत्पत्ति कह चुके हैं, वहीं
देख लीजिये ॥ ३ ॥
१७

१३० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
प्रश्न-जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां सामान्य से ज्ञानप्राप्ति की
रीति कही गई थी, कृपा करके सविशेष वर्णन कीजिये ? उत्तर-
३१५-गुणकर्मसु सन्निकृष्टेषु ज्ञाननिष्पत्तेर्द्रव्यं कारणम् ॥४॥
( सन्निकृष्टेषु ) इन्द्रियों के समीप आये हुये ( गुणकर्मसु ) गुणों और
कर्मों में ( ज्ञाननिष्पत्तेः ) ज्ञान सिद्ध होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ( कारणम् )
ज्ञान का कारण है ॥
यह रूप है, इत्यादि गुणों के प्रत्यक्ष में और यह उछलना है, इत्यादि
कर्मों के प्रत्यक्ष में द्रव्य ही कारण है, क्योंकि द्रव्यों के आश्रय में ही रूपादि
गुण और उछलना आदि कर्म प्रत्यक्ष होते हैं ॥ ४ ॥ और-
३१६-सामान्यविशेषेषु सामान्यविशेषा-
ऽभावात्ततएव ज्ञानम् ॥ ५ ॥
( सामान्यविशेषेषु ) सामान्य और विशेषों में ( सामान्यविशेषाभावात् )
दूसरा सामान्य और दूसरा विशेष न होने से ( ततः ) उन से ( एव ) ही
( ज्ञानम् ) ज्ञान होता है ॥
सामान्य सत्ता (होना) और उन के विशेष-द्रव्य होना, गुण होना, कर्म
होना, पृथिवी होना, रूप होना, उछाल होना; इत्यादिकों में उन के प्रत्यक्ष
का कारण वे स्वयंम् ही हैं अर्थात् उन की सत्ता का ज्ञान साक्षात् उन्हीं से
होता है ॥ ५ ॥
प्रश्न-किस की अपेक्षा से द्रव्यगुणकर्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ? उत्तर-
३१७-सामान्यविशेषापेक्षं द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ६ ॥
(द्रव्यगुणकर्मसु द्रव्यों, गुणों और कर्मों के विषय में ( सामान्यविशेषापेक्षम् )
सामान्य विशेष की अपेक्षा से [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥
अर्थात् यह अमुक द्रव्य है, यह अमुक गुण है और यह अमुक कर्म है,
ऐसा विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥ उस में भी-
३१८-द्रव्ये द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ॥ ७ ॥
( द्रव्ये ) द्रव्य विषय में ( द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ) द्रव्य गुण और कर्म की
अपेक्षा वाला [ ज्ञान उत्पन्न होता है ] ॥ ७ ॥ परन्तु-

षष्ठसाऽध्याय १ आन्हिक १२१
३१९-गुणकर्मसु गुणकर्माभावाद्गुणकर्मापेक्षं न विद्यते ॥८॥
( गुणकर्मसु ) गुणों और कर्मों में ( गुणकर्माभावात् ) दूसरे गुण कर्म
न होने से ( गुणकर्मापेक्षम् ) गुणों और कर्मों की अपेक्षा वाला [ ज्ञान ]
( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥ ८ ॥ उदाहरण—
३२०-समवायिनः श्वैत्याच्छ्रैत्यबुद्धेश्च श्वेते
बुद्धिः, ते एते कार्यकारणभूते ॥ ९ ॥
( समवायिनः ) समवायी द्रव्य के ( श्वैत्यात् ) श्वेत होने से ( च ) और
( श्वैत्यबुद्धेः ) श्वेतत्व के ज्ञान से ( श्वेते ) श्वेत द्रव्य में ( बुद्धिः ) ज्ञान
उत्पन्न होता है, ( ते ) वे दोनों ( एते ) ये ( कार्यकारणभूते ) कार्यरूप और
कारणरूप ज्ञान हैं ॥
अर्थात् चांदी वा शङ्ख आदि द्रव्य जो श्वेतता गुण से समवाय संबन्ध
रखते हैं, द्रव्यों के श्वेत होने से और श्वेतता के ज्ञान से उन श्वेत द्रव्यों
में यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि, यह श्वेत चांदी है अथवा यह श्वेत शङ्ख
है। सो ये दोनों ज्ञान १-श्वेतता का ज्ञान और २-श्वेत चांदी आदि का
ज्ञान कार्यरूप और कारणरूप हैं अर्थात श्वेतता ( सफेदी ) कारणज्ञान है
और श्वेतशङ्खादि का ज्ञान कार्यज्ञान है ॥ ९ ॥ परन्तु—
३२१-द्रव्येष्वनितरेतरकारणाः ॥ १० ॥
( द्रव्येषु ) अनेक द्रव्यों में [ जो अनेक ज्ञान उत्पन्न होते हैं वे ]
( अनितरेतरकारणाः ) एक दूसरे के कारण नहीं होते ॥ १० ॥ क्योंकि—
३२२-कारणाऽयौगपद्यात्कारणक्रमाच्च
घटपटादिबुद्धीनां क्रमो, न हेतुफलभावात् ॥११॥
( कारणाऽयौगपद्यात् ) ज्ञान के कारण एक साथ उत्पन्न न होने से ( च )
और ( कारणक्रमात् ) कारणों के क्रम से ( घटपटादिबुद्धीनाम् ) घट पट
आदि ज्ञानों में ( क्रमः ) आगापीछा है। ( न ) न कि ( हेतुफलभावात् )
कारण का फल होने से ॥
अर्थात् यदि हम को प्रथम घट का ज्ञान हो, पश्चात् पट का ज्ञान हो,
तो ये दोनों ज्ञान एक दूसरे के कार्यकारण नहीं हैं, किन्तु ज्ञान के कारण ही

१३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
भिन्न २ एक दूसरे के पश्चात् होते हैं, इस लिये ज्ञान भी एक दूसरे के पश्चात्
होते हैं, न कि एक कारण और दूसरा उस का कार्य होने से ॥ १९ ॥
इस आह्निक में द्रव्य गुण कर्म और सामान्य में जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता
है, वह परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥
इत्यष्टमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम्
॥ १ ॥
अथ द्वितीयाह्निकम्
अब ज्ञान के प्रकार का उदाहरण देते हैं-
३२३-अयमेश त्वया कृतं भोजयैनमिति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ १ ॥
(अयम्) यह है, (एषः) वह है, (त्वया कृतम्) तूने कर्म किया,
(एनं भोजय) इन को भोजन कराओ (इति) इस प्रकार का ज्ञान (बुद्ध्यपेक्षम्)
भिन्न २ बुद्धियों से होता है ॥ १ ॥
प्रश्न-यह है, तूने कर्म किया, इस को भोजन कराओ, इत्यादि समक्ष-
वर्त्ती पदार्थों में तो प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है परन्तु "वह वहां है" इत्यादि
परोक्षवर्त्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे हो सकता है ? उत्तर-
३२४-दृष्टेषु भावाददृष्टेष्वभावात् ॥ २ ॥
(दृष्टेषु) जाने हुए विषयों में [भावात्) होने से (अदृष्टेषु) बिना
जाने विषयों में (अभावात्) न होने से ॥
अर्थात् हम जिन परोक्ष विषयों का निर्देश करते हैं कि वह वहां है,
इत्यादि । सो पहिले देखे, जाने, विषयों में निर्देश करते हैं, इस लिये परोक्ष
विषयों में भी "वह वहां है" इत्यादि निर्देश प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही समझना
चाहिये, क्योंकि अदृष्ट अर्थात् जिन के साथ हमारी ज्ञानेन्द्रियों का सम्बन्ध
नहीं हुवा, उन को हम यह, वह, इत्यादि प्रकार से व्यवहार नहीं करते ॥ २ ॥
प्रश्न-तुम "अर्थ" शब्द से किस का ग्रहण करते हो ? उत्तर-
३२५-अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ३ ॥
(द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में (अर्थः) "अर्थ" (इति)
ऐसा व्यवहार करते हैं ॥ ३ ॥
३२६-द्रव्येषु पञ्चात्मकत्वम् ॥ ४ ॥

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अष्टमाऽध्याय २ आन्हिक १३३
(द्रव्येषु) कार्य द्रव्यों में (पञ्चात्मकत्वम्) पञ्चात्त्वात्मक होना [कहा
गया है] ॥
यद्यपि १३२ और १३४ में पञ्चात्मक और द्व्यात्मक का निषेध कर चुके
हैं परन्तु १३५ में कह चुके हैं कि "अणुसंयोग का निषेध नहीं है" इस लिये
यहां पञ्चात्मकता कहना पूर्व्वापर विरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥ जैसे-
३२७-भूयस्त्वाद् गन्धवत्त्वाच्च पृथिवी गन्धज्ञाने प्रकृतिः ॥५॥
(भूयस्त्वात्) बहुत होने से (च) और (गन्धवत्त्वात्) गन्धवर्मी होने
से (पृथिवी) पृथिवीतत्त्व (गन्धज्ञाने) गन्ध के ज्ञान कराने वाले नासिका
इन्द्रिय में (प्रकृतिः) उपादान कारण है ॥ ५ ॥ तथा-
३२८-तथापस्तेजोवायुश्च रसरूपस्पर्शज्ञानेऽविशेषात् ॥६॥
(तथा) इसी प्रकार (अविशेषात्) समान होने से (रस, रूप, स्पर्श,
ज्ञाने) रस, रूप, और स्पर्श के ज्ञान कराने वाले रसना, चक्षु और त्वचा
इन्द्रियों में [क्रम से] (आपः) जलतत्त्व, (तेजः) अग्नितत्त्व (च) और
(वायुः) वायुतत्त्व [उपादान कारण हैं] ॥
जिस प्रकार नासिका इन्द्रिय में पृथिवी उपादान कारण है, इसी प्रकार
रसना इन्द्रिय में जल, चक्षु इन्द्रिय में अग्नि और त्वचा इन्द्रिय में वायु
उपादान कारण हैं ॥ ६ ॥
इस द्वितीय आन्हिक में ज्ञान, ज्ञान का प्रकार; इन्द्रियों के कारण और
"अर्थ" शब्द का अर्थ वर्णन किया गया ॥
इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम्
॥ २ ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते,
वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे ज्ञानाऽध्यायोऽष्टमः
॥ ८ ॥

CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

ओ३म्
अथ नवमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
प्रश्न-ये पृथिवी आदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व सत् थे वा असत् ? उत्तर-
३२९-क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागसत् ॥ १ ॥
( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुण का व्यवहार न पाया
जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ॥
यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और
कोई गुण उस का पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागभाव
मानना ठीक है ॥ १ ॥
प्रश्न-यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व सत् नहीं था तो कारण की क्रिया
से उत्पन्न कैसे हो सकेगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिलों में तेल है, इस
लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उस से
उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर-
३३०-सदसत् ॥ २ ॥
( सत् ) कारणरूप से भाव और ( असत् ) कार्यरूप से अभाव [उत्पत्ति
के पूर्व ] होता है ॥ २ ॥
प्रश्न-यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से पूर्व कारणरूप में वर्त्तमान था तो
उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर-
३३१--असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् ॥ ३ ॥
( असतः ) असत् के ( क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ) क्रिया और गुणों का
व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥
अर्थात् सत् असत् एक नहीं होसक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया
वा कोई गुण नहीं कहा देखा माना जाता और सत्कार्य में क्रिया और गुण