वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
[ तब ] ( शरीरस्य ) शरीर को ( दुःखाभावः ) दुःख नहीं रहता ( सः ) वह
( योगः ) योग कहाता है ॥
अर्थात् योग उस अवस्था का नाम है जब कि मन अपने आपे में ही ठहर
जावे और इन्द्रियों को प्रेरणा न करे और इन्द्रियां मन की सहायता न पाकर
विषयों को न छुवें तब आत्मा को दुःख नहीं पहुंच सकता । यद्यपि योगदशा
में जैसे इन्द्रियों और विषयों का स्पर्श होने से आत्मा को विषयों का दुःख नहीं
पहुंच सकता, इसी प्रकार विषयों का सुख भी तौ नहीं पहुंच सकता ? तौ भी
सूत्रकार ने केवल दुःख का अभाव कहा है, सुख का अभाव नहीं कहा, सो क्यों ?
उत्तर-सुख का अभाव इस लिये नहीं कहा कि साधारण पुरुषों को दूसरे
शब्दों में लौकिक पुरुषों को जिन रूपादि विषयों से सुख की प्रतीति होती
है, उन्हीं विषयों से योगी को दुःख की प्रतीति होती है क्योंकि योगी का
आत्मा योगसाधन की क्रिया करते २ ऐसा सुकुमार=नाजुक हो जाता है कि
जो स्थूल विषय अन्यों को सुखदायक प्रतीत होते हैं वे ही विषय योगी को
दुःखदायक प्रतीत होते हैं । इस में दृष्टान्त यह है कि जैसे मकड़ी का जाला
जो रेशम से भी नरम होता है, अङ्गुली से छूने में कैसा सुखदायक प्रतीत होता
है क्योंकि अङ्गुली का चमड़ा बड़ा मोटा और गंवार है । परन्तु वही मकड़ी का
जाला यदि आंख से छू जावे तो आंख को सुखदायक होने के बदले दुःखदायक
प्रतीत होता है क्योंकि आंख अङ्गुली के चमड़े की नाईं गंवार नहीं है
किन्तु नगरनिवासियों के समान सुकुमार है । बस ऐसे ही योगी की दृष्टि
में सब विषयों के सुख भी अपनी सुकुमारता के कारण दुःखों ही की गिनती
में हैं। इस लिये सूत्रकार ने स्थिरचित्त योगी को केवल दुःख का अभाव कहा,
सुख का अभाव नहीं कहा ॥ १६ ॥
अब मन की अन्य क्रियाओं को वर्णित करते हैं जो अदृष्ट=न देखे हुए
प्रारब्धकर्मसंस्कार से होती हैं-
२१७-अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः
कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि ॥ १७ ॥
( अपसर्पणम् ) बाहर निकलजाना ( उपसर्पणम् ) समीप चलाजाना
( अशितपीतसंयोगाः ) खाये पिये के संयोग (च) और (कर्मान्तरसंयोगाः)
अन्य कर्मों के साथ अनेक संयोग; [ ये सब ] ( अदृष्टकारितानि ) बिना
देखे पूर्व जन्मकृत पाप पुण्यों से बने प्रारब्ध संस्कार से कराये हुए होते हैं।
पञ्चमोऽध्याय २ आन्हिक १०५
अर्थात् मन का एक देह से निकलना, दूसरे देह में जाना, खाये पिये से
मन का नवीन नवीन उत्पन्न होना, बढ़ना घटना और अन्य कार्यों में मन का
लगन; ये सब फल प्रारब्ध कर्मानुसार होते हैं, जो अदृष्ट है ॥ १७ ॥
और जब ऐसा नहीं होता तब-
२१८-तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः ॥ १८ ॥
( तदभावे ) उस कर्माऽरम्भ के अभाव में (संयोगाभावः) आत्मा का मन
आदि के साथ संयोग नहीं होता (च) और (अप्रादुर्भावः) जन्म नहीं
होता (मोक्षः) वही मोक्ष है ॥ १८ ॥
२१९-द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यादभावस्तमः ॥ १६ ॥
(द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यात् ) पृथिव्यादि द्रव्यों, रूपादि गुणों और
उत्क्षेपण आदि कर्मों की सिद्धि से विरुद्ध धर्म होने से (अभावः) प्रकाश
का न होना (तमः) अन्धकार होता है ॥
अर्थात् प्रकाश कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है किन्तु प्रकाश का अभाव ही
अन्धकार कहाता है और प्रकाश के अभाव का कारण द्रव्यों, गुणों और
कर्मों की सिद्धि का विपरीत होना है। तैल, बत्ती आदि द्रव्यों के वैधर्म्य से
दीपशलाका के न रगड़ने रूप कर्म से प्रकाश गुण का न होना ही अन्धकार
है; अन्धकार कोई भाव पदार्थ नहीं ॥ १९ ॥
२२०-तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥
(तेजसः) तेज के (द्रव्यान्तरेणावरणात्) अन्य द्रव्य का आवरण होजाने
से (च) भी [प्रकाश का अभाव = अन्धकार होता है] ॥ २० ॥
२२१-दिक्कालाबाकाशं च क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियाणि ॥२१॥
(दिक्कालौ) दिशा और काल (च) और (आकाशम्) आकाश (नि-
ष्क्रियाणि) क्रियारहित पदार्थ हैं क्योंकि (क्रियावद्वैधर्म्यात् ) क्रिया वाले
पदार्थों से विरुद्धधर्मी हैं ॥
जो पदार्थ मूर्त्तिमान् होते हैं, उन में क्रिया होती है, इस के विरुद्ध
दिशा काल और आकाश अमूर्त्त हैं, इस वैधर्म्य से वे निष्क्रिय हैं। इस सूत्र
में चकार से शङ्कर मिश्रादि टीकाकार आत्मा का ग्रहण करते हैं, आत्मा भी
अमूर्त होने से निष्क्रिय है, यह दूसरी बात है कि आत्मा के सामीप्य से
मन और इन्द्रियों में क्रिया उत्पन्न होती है ॥ २१ ॥
१४
१०६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२२२-एतेन कर्माणि गुणाश्च व्याख्याताः ॥ २२ ॥
( एतेन ) इसी से ( कर्माणि ) कर्म ( च ) और ( गुणाः ) गुणों की
( व्याख्याताः ) व्याख्या की गयी ॥
अर्थात् जिस प्रकार दिशा काल और आकाश अमूर्त्त होने से निष्क्रिय
हैं और आत्मा भी निष्क्रिय है, इसी प्रकार कर्मों और गुणों का भी नि-
ष्क्रिय होना समझ लेना चाहिये क्योंकि कर्म और गुण भी अमूर्त्त हैं ॥२२॥
यदि कहो कि गुण और कर्म तौ मूर्त्तिमान् द्रव्यों में भी समवाय सम्बन्ध
से रहते हैं, फिर उन में क्रिया क्यों न मानी जाय, जब कि उन के आश्रय
द्रव्यों में क्रिया है ? उत्तर-
२२३-निष्क्रियाणां समवायः कर्मभ्यो निषिद्धः ॥ २३ ॥
( निष्क्रियाणाम् ) निष्क्रिय गुण कर्मों का ( समवायः ) समवाय सम्बन्ध
( कर्मभ्यः ) कर्मों से ( निषिद्धः ) निषिद्ध किया गया है ॥
अर्थात् क्रिया तौ संयोग से होती है न कि समवाय से । समवाय और
संयोग में भेद यह है कि एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अनादिकाल से
मिलाव=समवाय कहलाता है और भिन्न २ दो पदार्थों का एक दूसरे से नवीन
मिलाव=संयोग कहाता है ॥ २३ ॥
प्रश्न-यदि गुण और कर्म दोनों निष्क्रिय हैं तौ उन से कर्मों की उत्पत्ति
क्यों होती है ? उत्तर-
२२४-कारणं त्वऽसमवायिनो गुणाः ॥ २४ ॥
( गुणाः ) संयोगादि गुण, जो ( कारणम् ) कर्म का कारण होते हैं ( तु )
वे तो ( असमवायिनः ) समवायी गुण नहीं होते ॥ २४॥
अच्छा तौ गुण और कर्म निष्क्रिय सही, परन्तु दिशा और काल तौ
निष्क्रिय नहीं हो सकते क्योंकि उन में क्रिया देखी जाती है, जैसा कि पूर्व
दिशा में सूर्य उदय हो रहा है, पश्चिम में अस्त हो रहा है, दक्षिण में समुद्र
उमण्ड रहा है और उत्तर में झरने बह रहे हैं इत्यादि । क्या ये दिशाओं के
कर्म नहीं हुए ? इसी प्रकार-प्रातःकाल भ्रमण करता हूं, रात्रि में सोता हूं,
दिन में अनेक काम करता हूं, इत्यादि। क्या इस से काल में क्रिया नहीं सिद्ध
होती ? उत्तर-नहीं, क्योंकि-
२२५-गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २५ ॥
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पञ्चमाऽध्याय २ आन्हिक १०७
(गुणैः) गुणों से (दिक् ) दिशा का (व्याख्याता) व्याख्यान हो चुका ॥
जिस प्रकार अमूर्त्त होने से कर्मों का समवायी कारण गुण नहीं होते,
इसी प्रकार अमूर्त्त होने से पूर्वादि दिशाऐं भी सूर्योदयादि क्रियाओं का
समवायी कारण नहीं हैं किन्तु क्रियाओं का आधार होने से उपचार की
रीति पर उन में क्रिया कही जाती है, वास्तव में नहीं । जैसे 'चटाई पर
भोजन करता हूं' इस कथन में यद्यपि चटाई भोजन क्रिया का आधार है,
परन्तु समवायी कारण नहीं ॥ २५ ॥ तथा-
२२६-कारणेन कालः ॥ २६ ॥
(कारणेन) निमित्त कारण होने से (कालः) काल का व्याख्यान भी
हो चुका ॥
अर्थात जिस प्रकार वस्त्र की उत्पत्ति में सूत के डोरे तो समवायी कारण
हैं परन्तु तुरी वेमादि अथवा तन्तुवाय=जुलाहा समवायी कारण नहीं किन्तु
निमित्त कारण है, इसी प्रकार काल भी किसी क्रिया का समवायी कारण
नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इस लिये उस को सक्रिय नहीं कह सकते ॥२६॥
पञ्चमाध्याय के इस द्वितीय आन्हिक में पृथिवी आदि के कर्म और
प्रसङ्गवश अन्यद्वार का वर्णन किया गया ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
पञ्चमः कर्माध्यायश्च समाप्तः
॥ ५ ॥
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ओ३म्
अथ षष्ठोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
इस वैशेषिकदर्शन में प्रथमाध्याय के तृतीय सूत्र में कहा गया था कि
'धर्म का प्रतिपादक होने से वेद को प्रामाणिकता है' इस लिये कर्म की
परीक्षा के पश्चात् वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये कहते हैं कि-
२२७-बुद्धिपूर्वा* वाक्यकृतिर्वेदे ॥ १ ॥
(वेदे) वेद में (वाक्यकृतिः) वाक्यरचना (बुद्धिपूर्वा) बुद्धिपूर्वक
है अर्थात् वेदों में कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जो बुद्धि के विपरीत हो, जैसा
कि मनुष्यों की वाक्यरचना में कभी २ हो जाता है ॥ १ ॥
२२८-ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ॥ २ ॥
(ब्राह्मणे) ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थ में (संज्ञाकर्म) संज्ञापूर्वक
कर्मानुष्ठान (सिद्धिलिङ्गम्) प्रथम सूत्रोक्त विषय की सिद्धि का चिन्ह है।
अर्थात् ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थों में वेदोक्त पदार्थों की संज्ञा जानकर जो
कर्मानुष्ठान बताया है वह कर्मानुष्ठान और उस का ठीक २ फल इस बात की
सिद्धि में पहचान है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है ॥ २ ॥ और भी-
२२९-बुद्धिपूर्वो ददातिः ॥ ३ ॥
(ददातिः) दानक्रिया (बुद्धिपूर्वः) बुद्धिपूर्वक पाई जाती है ॥
वेदों में जिस प्रकार दान का वर्णन है, उस से पाया जाता है कि वेदों
की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है। वेद के प्रकाशक ईश्वर ने उस को बुद्धिपूर्वक
प्रकाशित किया है। जैसेः-
दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धि-
रण्यम्। दक्षिणाऽन्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते
विजानन् ॥ ऋ० । १० । १०७ । ७ ॥
- किसी २ पुस्तक में वाक्प्रकृति और किसी २ में वाक्कृति पाठ पाया
जाता है, परन्तु अर्थ सब का एक है ॥
छष्ठाऽध्याय १ आन्हिक १८५
इस में वर्णन किया गया है कि दान करने से घोड़ा, गौ, आदि पशु,
चांदी सोना आदि रत्न और अन्न जिस से हमारा जीवन है, मिलता है।
इस लिये बुद्धिमान् मनुष्य दान=दक्षिणा को अपनी रक्षा के लिये कवचरूप
से धारण करता है ॥
यह समस्त सूक्त दान के माहात्म्य में कथन किया गया है, जिस के
पढ़ने से वेदों के प्रकाशक ईश्वर की चमत्कारिणी बुद्धिपूर्वक रचना का पता
लगता है ॥ ३ ॥ और-
२३०-तथा प्रतिग्रहः ॥ ४ ॥
(तथा) इसी प्रकार (प्रतिग्रहः) किये हुए दान को ग्रहण करने [का
वर्णन भी बुद्धिपूर्वक है ] ॥ ४ ॥
२३१-आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५ ॥
(आत्मान्तरगुणानाम्) अन्य आत्मा के गुणों को (आत्मान्तरे) अन्य
आत्मा में (अकारणत्वात्) कारण न होने से ॥
वेद में दान का फल दाता को और प्रतिग्रह का फल लेने वाले को
बतलाया गया है और यही बुद्धिपूर्वक है क्योंकि एक आत्मा के अनुष्ठान
किये हुये कर्म का फल दूसरे आत्मा को नहीं मिलना चाहिये किन्तु दाता
को दान का फल और प्रतिग्रहीता को ग्रहण का फल मिलना चाहिये क्योंकि
दाता दान क्रिया का कर्त्ता है और ग्रहीता ग्रहण क्रिया का कर्त्ता है ॥ ५ ॥
२३२-तद् दुष्टभोजने न विद्यते ॥ ६ ॥
(तत्) वह फल (दुष्टभोजने) दुष्टभोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥
यदि दाता दुष्टभोजन का दान करे और प्रतिग्रह लेने वाला दुष्ट अन्न
का भोजन करे तो वेद कहता है कि उन दोनों को शास्त्र में बताया फल
नहीं होगा ॥ ६ ॥ प्रश्न-दुष्टभोजन किसे कहते हैं ? उत्तर-
२३३-दुष्टं हिंसायाम् ॥ ७ ॥
(हिंसायाम्) हिंसा में (दुष्टम्) भोजन दुष्ट होता है ॥
किसी प्राणी को दुःख देकर वा मारकर जो भोजन सिद्ध किया जावे वा
जो भोजन दिया जावे वे दोनों भोजन दुष्ट हैं । चोरी से वा अन्याय से अथवा
सब से बड़े अन्याय=प्राण लेकर जो दाता दान करता है और जो प्रतिग्रहीता
उस दान को लेता है वे दोनों ही वेदोक्त फल नहीं पाते ॥ ७ ॥
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११० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२३४-तस्य सम्भिव्याहारतो दोषः ॥ ८ ॥
(तस्य) उस दुष्ट भोजन के (सम्भिव्याहारतः) खाने खिलाने से (दोषः)
[हिंसा का] दोष लगता है ॥
यद्यपि दाता ने स्वयं हिंसा न की हो और प्रतिग्रहीता ने भी स्वयम्
हिंसा न की हो किन्तु जिस हिंसाजनित भोजन को उन्होंने खिलाया
और खाया है, उस के खाने खिलाने से भी खाने और खिलाने वाले को वेद
में दोष बताया गया है ॥ ८ ॥ परन्तु-
२३५-तददुष्टे न विद्यते ॥ ९ ॥
(तत्) वह दोष (अदुष्टे) निर्दोष भोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥
जो भोजन हिंसादिदोषरहित है, उस में खाने खिलाने वालों को वेद
में दोष नहीं बतलाया गया ॥ ९ ॥
२३६-पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १० ॥
(पुनः) फिर (विशिष्टे) उत्तम सात्त्विक भोजन में (प्रवृत्तिः) खाने
खिलाने की प्रवृत्ति करनी विहित है ॥
दुष्ट भोजन को त्यागकर श्रेष्ठ भोजन देना कहा है ॥ १० ॥
२३७-समे हीने वा प्रवृत्तिः ॥ ११ ॥
(वा) अथवा (समे) साधारण भोजन में (हीने) घृत दुग्धादि उत्तम गुण-
कारक द्रव्यों से रहित भोजन में भी (प्रवृत्तिः) दान की प्रवृत्ति [विहित] है॥११॥
२३८-एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः
परस्वादानं व्याख्यातम् ॥ १२ ॥
(एतेन) इस से (व्याख्यातम्) व्याख्यात समझना चाहिये कि (हीन,
सम, विशिष्ट धार्मिकेभ्यः) अधम, मध्यम और उत्तम धार्मिक पुरुषों से (पर-
स्वादानम्) परधन का ग्रहण करना विहित है ॥
अर्थात् हिंसादि दुष्ट कर्मों से रहित धार्मिक पुरुषों से प्रतिग्रह लेना
चाहिये, चाहे वे उत्तम, मध्यम, अधम किसी कक्षा के धार्मिक हों किन्तु हिंसक
पापी न हों ॥ १२ ॥ और-
२३९-तथा विरुद्धानां त्यागः ॥ १३ ॥
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षष्ठाऽध्याय. १ .आह्निक १११
षष्ठाऽध्याय. १ .आह्निक १११
(तथा) उसी प्रकार (विरुद्धानाम्) धर्मविरो धियों का (त्यागः)
प्रतिग्रह त्याग देना कहा है ॥ १३ ॥
२४०--हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥
(परे) यदि दाता (हीने) धर्मानुष्ठान में अधम हो तो (त्यागः) दान
लेना त्याग दे ॥ १४ ॥
२४१-समे आत्मत्यागः परत्यागो वा ॥ १५ ॥
(समे) यदि दाता मध्यम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः) चाहे प्रति-
ग्रहीता अपने ग्राह्य पदार्थ का त्याग कर दे (वा) अथवा (परत्यागः) दाता
त्याग कर देवे ॥ १५ ॥ और-
२४२-विशिष्टे आत्मत्याग इति* ॥ १६ ॥
(विशिष्टे) यदि दाता अपने से उत्तम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः)
प्रतिग्रहीता अपने आप त्याग देवे ॥
हम को बड़ा आश्चर्य होता है कि शङ्कर मिश्रादि टीकाकारों ने और
उन की देखा देखी वर्तमान काल के संस्कृत और भाषा के टीकाकारों ने
१४ से १६ तक सूत्रों के अर्थ में दान और प्रतिग्रह के प्रकरण से विरुद्ध शत्रु
के मारने और न मारने का अर्थ अकारण क्यों उपजा लिया ? ॥ १६ ॥
इति षष्ठाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥
─:*:─
अथ द्वितीयमाह्निकम्
२४३-दृष्टादृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोजनमभ्युदयाय ॥१॥
(दृष्टादृष्टप्रयोजनानाम्) दृष्ट और अदृष्ट प्रयोजन वाले कर्मों में (दृष्टाभावे)
दृष्ट के अभाव में (प्रयोजनम्) प्रयोग = अनुष्ठान (अभ्युदयाय) परलोक के
सुख के लिये है ॥
अर्थात् वेद में दो प्रकार के कर्मानुष्ठान हैं। कुछ कर्मों का फल दृष्ट है,
जो इस ही जन्म में होता देखा जाता है और दूसरे कर्मों का फल अदृष्ट है,
जो जन्मान्तर में मिलता है, उसी के लिये ऐहिकफल के अभाव में अनुष्ठान
बतलाये गये हैं ॥ १ ॥ जैसेः-
- कितनी ही पुस्तकों में 'इति' शब्द नहीं है, परन्तु यह शब्द आह्निक
की समाप्ति में और अर्थ की समाप्ति में होने से सार्थक जान पड़ता है ॥
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११२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद
२४४-अभिषेचनोपवास, ब्रह्मचर्य, गुरुकुलवास,
वानप्रस्थ, यज्ञ, दान, प्रोक्षण, दिक्, नक्षत्र,
मन्त्र, काल, नियमाश्चादृष्टाय ॥ २ ॥
(अभि०-नियमाः) मन्त्रपूर्वक सिर पर जल छिड़कना=अभिषेचन, भोजन
न करना=उपवास, भूमिशयनादि ब्रह्मचारी के नियमों का पालन=ब्रह्मचर्य,
साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ने के लिये गुरु के समीप रहना=गुरुकुलवास, गृहस्थ को
त्यागकर वन में रहकर वेदोक्त कर्म करना=वानप्रस्थ, अग्निहोत्रादि कर्म=
यज्ञ, गौ आदि पदार्थों का सत्पात्रों को देना=दान, यज्ञ के स्रुवादि पदार्थों
को जल से शुद्ध करना=प्रोक्षण, पूर्वादि दिशाओं में नियतरूप से यजमानादि
का बैठना=दिक्, पुष्य आदि विहित नक्षत्रों में संस्कारादि कर्म करना=
नक्षत्र, "ओं भूर्भुवः स्वः द्यौरिव भूम्ना०" इत्यादि मन्त्र पढ़कर अग्न्याधानादिकर्म
करना=मन्त्र, उत्तरायण आदि समय विशेष में कर्म करना=काल, ये नियम
(अदृष्टाय) अदृष्ट फल के लिये (च) और दृष्ट फल के लिये हैं॥ २॥ तथा-
२४५-चातुराश्रम्यमुपधा अनुपधाश्च ॥ ३ ॥
(चातुराश्रम्यम्) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चार
आश्रमों में विहित कर्म का अनुष्ठान (उपधाः) उपधायें (च) और (अनु-
पधाः) अनुपधायें भी विहित हैं॥
उपधा और अनुपधा का अर्थ अगले सूत्र में आचार्य ने स्वयम् कहा है
॥ ३॥ यथा-
२४६-भावदोष उपधाऽदोषोऽनुपधा ॥ ४ ॥
(भावदोषः) श्रद्धा का दोष (उपधा) उपधा कहाता है (अदोषः)
श्रद्धा में दोष न होना (अनुपधा) अनुपधा कहाता है ॥ ४ ॥
२४७-यदिष्टरूपरसगन्धस्पर्शं प्रोक्षितमभ्युक्षितञ्च तच्छुचि ॥५॥
(यत्) जो पदार्थ (इष्टरूपरसगन्धस्पर्शम्) मनभावने रूप, रस, गन्ध
और स्पर्श वाला, (प्रोक्षितम्) मन्त्रपूर्वक जल से शुद्ध किया हुआ (च) और
(अभ्युक्षितम्) विना मन्त्र के धोया हुआ है (तत्) वह (शुचि) शुद्ध है ॥५॥और-
२४८-अशुचीति शुचिप्रतिषेधः ॥ ६ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
षष्ठाध्याय २ आह्निक । १९३
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षष्ठाध्याय २ आह्निक । १९३
( शुचि प्रतिषेधः ) जो शुद्ध न हो, उस को ( अशुचि ) अशुद्ध ( इति )
ऐसा कहते हैं ॥ ६ ॥ और—
२४६-अर्थान्तरञ्च ॥ ७ ॥
( अर्थान्तरम् ) विधान किये हुए पदार्थ से भिन्न दूसरा पदार्थ ( च )
भी अशुद्ध है ॥
जैसे जिस वर्ण को जिस सूत का यज्ञोपवीत धारण करना कहा है, उसी
के लिये वह शुद्ध है किन्तु एक के लिये दूसरे का अशुद्ध है ॥ ७ ॥
प्रश्न-तो क्या शुचिभोजन सब किसी से लेकर भोज्य है ?
उत्तर-नहीं, क्योंकि—
२५०-अयतस्य शुचिभोजनादभ्युदयो
न विद्यते नियमाभावात् ॥ ८ ॥
( नियमाभावात् ) नियम के न रखने से ( अयतस्य ) अहिंसादि यमों
के पालन न करने वाले का (शुचिभोजनात्) शुद्ध भोजन करने से (अभ्युदयः)
लोक परलोक का कल्याण ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥
जो पुरुष अहिंसादि व्रतों का पालन नहीं करता उस म्लेच्छादि का दिया
हुवा शुद्ध भोजन भी संसर्गदोष से दूषित है, इस लिये कल्याणकारी नहीं ॥ ८ ॥
२५१—विद्यते वार्थान्तरत्वाद् यमस्य ॥ ९ ॥
( वा ) अथवा ( यमस्य ) अहिंसादि यम का ( अर्थान्तरत्वात् ) अन्य
अर्थ होने से (विद्यते ) शुचिभोजन से लोक परलोक का कल्याण होता भी है ॥
पूर्व सूत्र में अहिंसादि नियमों से रहित म्लेच्छादि के दिये सब प्रकार
के संसर्ग का शुद्धभोजन में भी बचाव कहा था, इस सूत्र में दूसरा पक्ष करते
हैं कि अथवा यदि यह विचार किया जाय कि यम=अहिंसादि का पालन
दूसरी बात है और शुचि भोजन दूसरी बात है, इस लिये जब हिंसकादि
का दिया भी शुचिभोजन हिंसादिदोषदूषित न हो तो लोक परलोक के
अभ्युदय का बाधक नहीं है ॥ ९ ॥ और भी एक कारण है किः—
२५२--असति चाभावात् ॥ १० ॥
(असति) शुद्ध भोजन में हिंसादि दोष के न होने पर (च) और (अभावात्)
हिंसादि दोष न होने से लोक परलोक के कल्याण में बाधा नहीं ॥ १० ॥
कर्म की परीक्षा हो चुकी । अब दोष की परीक्षा का आरम्भ करते हैंः—
१५
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
११४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२५३--सुखाद्रागः ॥ ११ ॥
( सुखात् ) सुख से ( रागः ) आसक्ति वा फंसना होता है ॥
इसी से यह भी समझना चाहिये कि दुःख से द्वेष होता है ॥ ११ ॥
२५४--तन्मयत्वाच्च ॥ १२ ॥
( तन्मयत्वात् ) तन्मय हो जाने से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥
निरन्तर सुख ही सुख का ध्यान करते रहने से मन सुखिया होजाता है
तब उस को सुख में राग होजाता है, इसी प्रकार निरन्तर दुःख ही दुःख का
ध्यान करते रहने से मन दुखिया होजाता है तब उस से द्वेष होता है ॥ १२ ॥
२५५--अदृष्टाच्च ॥ १३ ॥
( अदृष्टात् ) पूर्व जन्म के प्रारब्ध कर्मों से ( च ) भी राग और द्वेष
होते हैं ॥ १३ ॥
२५६-जातिविशेषाच्च ॥ १४ ॥
( जातिविशेषात् ) विशेष जाति से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं ॥
जैसे मनुष्य जाति का दुग्ध, फल, पुष्पादि से राग तथा नकुल का सर्प से
और घोड़े का भैंसे से जातिकृत द्वेष होता है ॥ १४ ॥
२५७-इच्छाद्वेषपूर्विका धर्माधर्मप्रवृत्तिः ॥ १५ ॥
( धर्माधर्मप्रवृत्तिः ) धर्म और अधर्म में प्रवृत्ति ( इच्छाद्वेषपूर्विका ) राग
पूर्वक और द्वेषपूर्वक होती है ॥ १५ ॥
२५८-तत्सयोगो विभागः ॥ १६ ॥
(ततः) उस धर्माधर्म प्रवृत्ति से (संयोगः) जन्म (विभागः) और मृत्यु होते हैं ॥ १६ ॥
२५९-आत्मर्म्मसु मोक्षो व्याख्यातः ॥ १७ ॥
(आत्मकर्मसु) आध्यात्मिककर्मों के करने पर (मोक्षः) मोक्ष ( व्याख्यातः )
वेद में कहा गया है ॥ १७ ॥
इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥
इति श्री तुलसीरामस्वामीकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे
श्रौतधर्माध्यायः षष्ठः समाप्तः
॥ ६ ॥
ॐ
अथ सप्तमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
द्रव्यों और कर्मों की परीक्षा हो चुकी तथा बीच में श्रौतधर्मों की भी
परीक्षा की गई । अब क्रमानुसार सप्तमाध्याय में गुणों की परीक्षा करेंगे,
इस लिये गुण जो प्रथमाध्याय प्रथम आह्निक के छठे सूत्र में कहे थे, वह
प्रकरण अब बहुत दूर हो गया है, इस लिये आचार्य उस दूरस्थ प्रकरण को
स्मरण कराते हैं कि-
२६०-उक्ता गुणाः ॥ १ ॥
( गुणाः ) गुण ( उक्ताः ) १।६ में कहे गये थे ॥ १ ॥
२६१-पृथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शाः
द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च ॥ २ ॥
( पृथिव्यादि-स्पर्शाः ) पृथिवी आदि द्रव्यों के रूप, रस, गन्ध और
स्पर्श, गुण ( द्रव्यानित्यत्वात् ) द्रव्य की अनित्यता से ( अनित्याः ) अनित्य
( च ) भी हैं ॥
अर्थात् अनित्य पृथिवी का गुण गन्धादिक भी अनित्य है, इसी प्रकार
अनित्य अग्नि का गुण रूप भी अनित्य है । अनित्य जल का गुण रस भी
अनित्य है । अनित्य वायु का गुण स्पर्श भी अनित्य है ॥ २ ॥
पृथिवी आदि द्रव्य कार्य कारण भेद से अनित्य और नित्य भी होते
हैं । उन में से अनित्य द्रव्यों के गुणों को इस सूत्र में अनित्य कहा गया ।
आगे नित्य द्रव्यों के गुणों को नित्य समझना चाहिये सो कहते हैं:-
२६२-एतेन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ ३ ॥
( एतेन ) पूर्वोक्त कथन से ही ( नित्येषु ) नित्य द्रव्यों में (नित्यत्वम्)
गुणों की भी नित्यता ( उक्तम् ) कही गई ॥ ३ ॥
२६३-अप्सु तेजसि वायौ च नित्या द्रव्यनित्यत्वात् ॥ ४ ॥
११६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(द्रव्यनित्यत्वात्) द्रव्य के नित्य होने से (अप्सु) जल के परमाणुओं
में (तेजसि) अग्नि के परमाणुओं में (च) और (वायौ) वायु के परमाणुओं
में (नित्याः) गुण भी नित्य हैं ॥
जल के परमाणुओं में रस, रूप और स्पर्श; अग्नि के परमाणुओं में
रूप और स्पर्श, वायु के परमाणुओं में स्पर्श गुण नित्य हैं, ऐसा शङ्कर
मिश्रादि व्याख्यान करते हैं परन्तु परमाणु रूप नित्यद्रव्यों में अनित्यद्रव्यों
के गुण संभव नहीं, इस लिये हमारे मत में सूत्र का यही अभिप्राय है कि
जलपरमाणुओं में रस, अग्निपरमाणुओं में रूप और वायुपरमाणुओं में
स्पर्श; केवल यही नित्य गुण हैं ॥
इस सूत्र में पृथिवी के परमाणुओं का गन्ध गुण नित्य कहने से न
जाने क्यों छोड़ दिया गया, इस विषय पर प्रायः सभी टीकाकार बिना
किसी तर्क के चुपचाप इस शङ्का की ओर ध्यान नहीं लाये ॥ ४ ॥
२६४-अनित्येष्वनित्या द्रव्याऽनित्यत्वात् ॥ ५ ॥
(द्रव्यानित्यत्वात्) द्रव्यों के अनित्य होने से (अनित्येषु) अनित्य
कार्य द्रव्यों में (अनित्याः) गुण भी अनित्य हैं ॥ ५ ॥
२६५-कारणगुणपूर्वकाः पृथिव्यां पाकजाः ॥ ६ ॥
(पृथिव्यां) कार्य रूप पृथिवी में (पाकजाः) अन्य द्रव्यों के साथ
पकने से उत्पन्न हुए रस रूप और स्पर्श गुण (कारणगुणपूर्वकाः) अपने २
कारणों के गुणों से आये हुए होते हैं ॥
पृथिवी में केवल गन्ध गुण तो अपना है और रूपादि गुण अग्नि आदि
अन्य द्रव्यों के साथ पकने से उत्पन्न होजाते हैं ॥ ६ ॥ क्योंकि-
२६६-एकद्रव्यत्वात् ॥ ७ ॥
प्रत्येक गुण का केवल एक ही द्रव्य होने से ॥ ७ ॥
२६७-अणोर्महतश्चोपलब्ध्यनुप-
लब्धी नित्ये व्याख्याते ॥ ८ ॥
(अणोः) अणु की (च) और (महतः) महत् की (उपलब्ध्यनुपलब्धी)
अनुपलब्धि और उपलब्धि (नित्ये) नित्य (व्याख्याते) कहीं समझनी चाहिये॥
प्रत्येक अणु अर्थात सूक्ष्मपदार्थ की उपलब्धि नहीं होती और महत्
पदार्थ की उपलब्धि होती है, यह उपलब्ध और अनुपलब्ध होना सार्व-
कालिक नित्य है ॥ ८ ॥
२६८—कारणबहुत्वाच्च ॥ ६ ॥
(कारणबहुत्वात्) बहुत कारणों के होने से (च) भी महत् पदार्थ
में महत्त्व=बड़ापन होजाता है ॥ ९ ॥
२६९—अतोविपरीतमणु ॥ १० ॥
(अतः) इस से (विपरीतम्) विरुद्ध (अणु) परमाणु रूप लघुपदार्थ
में महत्त्व=बड़ा पन नहीं होता ॥ १० ॥
२७०—अणु महदिति तस्मिन् विशेष-
भावाद्विशेषाऽभावाच्च ॥ ११ ॥
(अणु) छोटा (महत्) बड़ा (इति) यह व्यवहार (तस्मिन्) उस
पदार्थ में (विशेषभावात्) विशेष होने से (च) और (विशेषाऽभावात्)
विशेष न होने से भी होता है ॥
एक ही पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा से छोटा कहसकते हैं और
उसी को तीसरे पदार्थ की अपेक्षा से बड़ा भी कह सकते हैं। जैसे—एक ही
आंवला (आमलकीफल) बिल्व से छोटा और गेहूँ से बड़ा कहाता है ॥११॥
२७१—एककालत्वात् ॥ १२ ॥
(एककालत्वात्) एक काल में होने से ॥
जिस काल में हम आंवले को बिल्व से छोटा कहते हैं,उसी एक काल
में उसी आंवले को गेहूँ से बड़ा भी कहते हैं ॥ १२ ॥
२७२—दृष्टान्ताच्च ॥ १३ ॥
(च) और (दृष्टान्तात्) दृष्टान्त से भी सिद्ध है ॥
जैसा एक दृष्टान्त आंवले का पूर्व सूत्रों में दिया गया, ऐसे ही अन्य
अनेक दृष्टान्त सर्वत्र देखे जाते हैं। जैसे गौ हाथी से छोटी और बकरी से
बड़ी होती है, इत्यादि ॥ १३ ॥
प्रश्न—तो क्या छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का बड़ापन भी होता
है ? उत्तर—नहीं, क्योंकि—
११८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२७३—अणुत्वमहत्त्वयोरणुत्वमहत्त्वा-
ऽभावः कर्मगुणैर्व्याख्यातः ॥ १४ ॥
(अणुत्वमहत्त्वयोः) छोटेपन और बड़ेपन का (अणुत्वमहत्त्वाभावः)
अन्य छोटापन और बड़ापन नहीं होता, यह बात (कर्मगुणैः) कर्म और
गुणों के व्याख्यान से (व्याख्यातः) कही गई ॥
कर्मों और गुणों के व्याख्यान में कह चुके हैं (देखो सूत्र १६ और १७
अध्याय १ आह्निक १) कि कर्म का कर्म और गुण का गुण नहीं होता,
इसी प्रकार समझना चाहिये कि छोटेपन का छोटापन और बड़ेपन का
बड़ापन भी अन्य नहीं होता ॥ १४ ॥
इसी बात को अगले सूत्र में भिन्न-२ करके समझाते हैं कि:-
२७४-कर्मभिः कर्माणि गुणैश्च गुणा व्याख्याताः ॥ १५ ॥
(कर्मभिः) उत्क्षेपणादि विशिष्ट कर्मों से (कर्माणि) कर्म (च) और
(गुणैः) रूपादि विशिष्ट गुणों से (गुणाः) गुण (व्याख्याताः) व्याख्यात
हो चुके ॥ १५ ॥ तथा:-
२७५-अणुत्वमहत्त्वाभ्यां कर्मगुणाश्च ॥ १६ ॥
(अणुत्वमहत्त्वाभ्याम्) अणुत्व और महत्त्व के व्याख्यान से (कर्मगुणाः)
कर्म और गुण (च) भी व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व नहीं होता और जैसे महत्त्व का महत्त्व
नहीं होता, इसी प्रकार कर्मों का अणुत्व और महत्त्व तथा गुणों का अणुत्व
और महत्त्व भी नहीं बनता ॥ १६ ॥ और-
२७६-एतेन दीर्घत्वह्रस्वत्वे व्याख्याते ॥ १७ ॥
(एतेन) इस से (दीर्घत्वह्रस्वत्वे) दीर्घता और ह्रस्वता (व्याख्याते)
व्याख्यात समझो ॥
जिस प्रकार अणुत्व का अणुत्व और महत्त्व का महत्त्व नहीं बनता,
इसी प्रकार दीर्घत्व का दीर्घत्व और ह्रस्वत्व का ह्रस्वत्व भी नहीं बनता ॥ १७ ॥
प्रश्न-१-अणुत्व, २-महत्त्व, ३-दीर्घत्व, ४-ह्रस्वत्व, ये चारों परिमाण
नित्य हैं वा अनित्य ? उत्तर-.
७ अध्याय १ आह्निक १९९
७ अध्याय १ आह्निक १९९
२७७–अनित्येऽनित्यम् ॥ १८ ॥
(अनित्ये) अनित्य द्रव्य में (अनित्यम्) यह चारों परिमाण अनित्य
होते हैं ॥ १८ ॥ और–
२७८–नित्ये नित्यम् ॥ १९ ॥
(नित्ये) नित्य द्रव्य में (नित्यम्) परिमाण भी नित्य होते हैं ॥ १९॥
उदाहरण–
२७९–नित्यं परिमण्डलम् ॥ २० ॥
(परिमण्डलम्) परमाणु का परिमाण (नित्यम्) नित्य है ॥
जैसे परमाणु द्रव्य नित्य है, वैसे उस का परिमाण भी नित्य है ॥ २०॥
प्रश्न–इस का कैसे निश्चय हो कि परमाणु में भी परिमाण है ? उत्तर–
२८०--अविद्या च विद्यालिङ्गम् ॥ २१ ॥
(अविद्या) अविद्या (च) भी (विद्यालिङ्गम्) विद्या की पहचान है ॥
अविद्या से विद्या पहचानी जाती है क्योंकि अविद्या में विद्या का
निषेध है। इसी प्रकार स्थूल पदार्थों के महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण से
परमाणु का अणुत्व और ह्रस्वत्व भी पहिचाना जाता है ॥ २१ ॥
परमाणु का नित्य परिमाण उदाहरण में दिया गया, अब आगे पर-
मात्मा और आकाश का महत्त्व परिमाण नित्य है, यह दूसरा उदाहरण देते हैं–
२८१–विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा ॥ २२ ॥
(विभवात्) व्यापक होने से (आकाशः) आकाश (च) और (आत्मा)
परमात्मा (महान्) महत्त्वपरिमाणयुक्त हैं ॥
व्यापक होने से नित्य द्रव्य आकाश और परमात्मा का महत्त्व परिमाण
भी नित्य है ॥ २२ ॥
२८२–तदभावादणु मनः ॥ २३ ॥
(तदभावात्) सर्वव्यापक न होने से (मनः) मन वाला आत्मा–
जीवात्मा (अणु) अणुत्व परिमाण वाला है ॥
शङ्कर मिश्रादि टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि "व्यापक
न होने से मन अणु है"। यह कथन सर्वशास्त्रविरुद्ध है क्योंकि मन लिङ्ग
शरीर का एक अवयव है, जैसा कि “सप्तदशैकं लिङ्गम् । सांख्य ३। ९” इस
१२७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
सूत्र में १७ वा १८ तत्त्वों का लिङ्ग शरीर, कहा है और वे सभी तत्त्व उत्पत्ति-
मान् हैं और कोई उत्पत्ति-वाला पदार्थ न अणु हो सकता, न महान् हो
सकता किन्तु परमाणु और जीवात्मा अणु हैं और परमात्मा महान् है, ये
ही पदार्थ अजन्मा हैं । शेष सब जन्म हुए होने से मध्यमपरिमाण हैं ।
छान्दोग्य ६।५।४ में लिखा है कि "अन्नमयं हि सोम्य मनः" अर्थात्
मन अन्न से बनता है, तब वह अणु कैसे हो सकता है ? मुण्डक २।१।३
में भी लिखा है कि "एतस्मात् प्रजायन्ते मनः सर्वेन्द्रियाणि च" । इस में भी
मन की उत्पत्ति लिखी है और उत्पत्ति वाला कोई पदार्थ न अणु हो सकता,
न नित्य हो सकता । इस लिये इस सूत्र में 'मनः' शब्द से मन का सहचारी
जीवात्मा ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥
२८३—गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २४ ॥
(गुणैः) गुणों के साथ (दिक्) दिशा (व्याख्याता) व्याख्यात हो चुकी ॥
परत्व अपरत्व आदि गुणों के समान दिशा का भी व्याख्यान समझना
चाहिये ॥ २४ ॥
२८४—कारणेन कालः ॥ २५ ॥
(कारणेन) कारण से (कालः) काल का व्याख्यान होगया ॥
जितने पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं सब की उत्पत्ति में काल निमित्त कारण
है, इस लिये समझना चाहिये कि काल सामान्य विभु पदार्थ है ॥ २५ ॥
इस प्रथम आह्निक में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, चार प्रकार का परिमाण,
गुणों का स्मरण कराकर परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥
इति सप्तमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम्
—:०*०:—
अथ द्वितीयमाह्निकम्
परिमाण की परीक्षा कर चुके, अब संख्या की परीक्षा करना चाहते हैं ।
इस लिये प्रथम संख्या को रूपादि गुणों से भिन्नवस्तुता सिद्ध करते हैं कि-
२८५—रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकादर्थान्तरमेकत्वम् ॥ १ ॥
(रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकात्) रूप, रस, गन्ध और स्पर्शादि से अति-
रिक्त होने से (एकत्वम्) एकत्व आदि संख्या (अर्थान्तरम्) अन्य वस्तु है ॥
सप्तमाऽध्याय २.आह्निक १२१
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सप्तमाऽध्याय २.आह्निक १२१
रूपादिक उपलक्षणमात्र हैं, उन से अन्य गुणों का भी ग्रहण करना
चाहिये । एकत्व भी उपलक्षणमात्र है, उस से द्वित्व त्रित्व आदि का भी
ग्रहण करना चाहिये । एक घट, दो मठ, तीन वस्त्र, चार पुस्तक, पांच तत्त्व,
छः ऋतु, सात छन्द, जिस प्रकार संख्यावान् हैं, इसी प्रकार एक ब्रह्म, एक
आकाश, चार दिशा, बहुत जीव, इत्यादि प्रकार से निर्गुण पदार्थों में भी
संख्या रहती है, इसी लिये संख्या एक भिन्न गुण हैं, जो रूपादि गुणों के अन्त-
र्गत नहीं हो सकती ॥१॥ और भी-
२८६-तथा पृथक्त्वम् ॥२॥
( तथा ) इसी प्रकार ( पृथक्त्वम् ) पृथक्त्व गुण भी रूपादि से भिन्न है ॥
जैसे एक घट दूसरे घट से पृथक् है तब घट का एक होना और दूसरे
घट से पृथक् होना रूपादि गुणों के अन्तर्गत नहीं हो सकता ॥ २ ॥
२८७-एकत्वैकपृथक्त्वयोरेकत्वैकपृथक्त्वा-
भावोऽणुत्वमहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ३ ॥
( एकत्वैकपृथक्त्वयोः ) एकत्व और एकपृथक्त्व में ( एकत्वैकपृथक्त्वाभावः )
दूसरे एकत्व और दूसरे एकपृथक्त्व का अभाव है, जो ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् )
अणुत्व और महत्त्व के साथ व्याख्यातः) वर्णन किया गया-एकत्व में दूसरा एकत्व
और पृथक्त्व में दूसरा पृथक्त्व नहीं होता। जैसे अणुत्व में दूसरा अणुत्व और महत्त्व
में दूसरा महत्त्व नहीं होता, जिस का व्याख्यान ७।१।१४ में हो चुका है ॥३॥
यदि कहो कि उत्क्षेपणादि कर्मों और रूपादि गुणों में द्वित्वादि संख्या
न सही परन्तु सब को मिलाकर एकत्व तो है ? तो उत्तर-
२८८-निःसंख्यत्वात्कर्मगुणानां सर्वैकत्वं न विद्यते ॥ ४ ॥
( कर्मगुणानाम् ) कर्मों और गुणों के (निःसंख्यत्वात् ) संख्यारहित
होने से (सर्वैकत्वम् ) सब का एक होना ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता ॥
कर्म और गुणों को मिलाकर सब को एकत्व संख्या में भी अन्तर्गत
नहीं कर सकते क्योंकि कर्म और गुण संख्या से भिन्न पदार्थ हैं ॥ ४॥
यदि कहो कि कर्मों और गुणों में संख्या का व्यवहार तो पाया जाता
है, जैसा कि एक काम तुम करो, दूसरा मैं करता हूं, एक रूप को तुम देखो,
दूसरे को मैं देखता हूं, इत्यादि ? तो उत्तर-
१६
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection
१२२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२८९-भ्रान्तं तत्॥ ५ ॥
(तत्) वह (भ्रान्तम्) भ्रान्तियुक्त है ॥
कर्म और गुण में रहने वाली संख्या को कर्मरूप वा गुणरूप समझना
भ्रान्ति है किन्तु वास्तव में जैसे द्रव्यों में रहने पर भी गुण स्वयं द्रव्यरूप
नहीं किन्तु भिन्न पदार्थ हैं, ऐसे ही संख्या को भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥
२९०-एकत्वाभावाद्भक्तिस्तु न विद्यते ॥ ६ ॥
(एकत्वाभावात्) एकत्व न होने से (तु) तो (भक्तिः) समान धर्म
(न) नहीं हो सकता ॥
अर्थात् यदि संख्या को सर्वत्र भ्रान्त मानकर केवल भाक्त जानें तो भी
ठीक नहीं क्योंकि यदि संख्या कोई मुख्य पदार्थ न हो तो उस का भाक्त=
गौण प्रयोग भी न होसके परन्तु होता है, इस लिये संख्या रूपादि से भिन्न
एक गुण है ॥ ६ ॥
२९१-कार्यकारणयोरेकत्वैकपृथक्त्वाभावा-
देकत्वैकपृथक्त्वं न विद्यते ॥ ७ ॥
(कार्यकारणयोः) कार्य और कारण में (एकत्वैकपृथक्त्वाभावात्)
एकत्व और एकपृथक्त्व न होने से (एकत्वैकपृथक्त्वम्) एकत्व और एकपृथक्त्व
(न) नहीं (विद्यते) है ॥
अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि कार्य में एकत्व संख्या हो तो कारण
में भी एकत्व हो तथा यह भी आवश्यक नहीं कि कार्य में एकपृथक्त्व हो
तो कारण में भी एकपृथक्त्व ही हो क्योंकि कार्य और कारण में एकत्व और
एकपृथक्त्व नियत नहीं ॥
हो सकता है कि कारणों में बहुत्व हो और कार्य में एकत्व हो तथा
यह भी हो सकता है कि कारण में एकत्व हो और कार्यों में बहुत्व हो।
जैसे एक मृत्तिकारूप कारण से अनेक घटरूप कार्य होते हैं तथा अनेक धागे
रूप कारणों से एक वस्त्ररूप कार्य भी होता है। इसी प्रकार एकपृथक्त्व भी
समझो ॥ ७ ॥ तथा-
२९२-एतदनित्ययोर्व्याख्यातम् ॥ ८ ॥
सप्तमाध्याय. २ आन्हिक १२५
( एतद् ) यही नियम ( अनित्ययोः) अनित्य एकत्व और एकपृथक्त्व
में ( व्याख्यातम् ) व्याख्यात समझो ॥
नित्य द्रव्य में एकत्व और एकपृथक्त्व भी नित्य होते हैं और अनित्य
द्रव्य में अनित्य होते हैं ॥ ८ ॥
२६३-अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः ॥ ९ ॥
अब संयोग की परीक्षा करते हैं जो क्रमप्राप्त है-( अन्यतरकर्मजः )
दो में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( उभयकर्मजः ) दोनों
के कर्म से उत्पन्न होने वाला ( च ) और ( संयोगजः) संयोग से उत्पन्न होने
वाला ( संयोगः ) संयोग होता है ॥
भिन्न २ दो पदार्थोंका परस्पर मिलजाना=संयोग कहाता है। वह संयोग
तीन प्रकार का होता है। जैसे:-
१-दो पदार्थों में से एक में क्रिया होने तो एक की क्रिया से दूसरे के
साथ संयोग हो जायगा ॥
२-दोनों पदार्थों में क्रिया होने से दोनों का आपस में संयोग हो जायगा॥
३-संयोग से भी संयोग उत्पन्न होता है। जैसे वृक्ष और अङ्गुली के
संयोग में अङ्गुली की क्रिया कारण है, परन्तु साथ ही अङ्गुली और हाथ का
संयोग भी वृक्ष और हाथ के संयोग का कारण है ॥ ९ ॥
२६४-एतेन विभागोव्याख्यातः ॥ १० ॥
( एतेन ) इस संयोग के व्याख्यान से ( विभागः ) विभाग का भी
( व्याख्यातः ) व्याख्यान होगया ॥
अर्थात् जैसे संयोग तीन प्रकार का है, ऐसे ही विभाग भी तीन प्रकार
का समझो ॥
१-संयुक्त दो पदार्थों में से किसी एक की क्रिया से विभाग हो जाता है॥
२-कभी दोनों की क्रिया से विभाग हो जाता है ॥
३-और कभी विभाग से भी विभाग हो जाता है ॥ १० ॥
२६५-संयोगविभागयोः संयोगविभागाभावो
ऽणुत्व महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ११ ॥