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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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११० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२३४-तस्य सम्भिव्याहारतो दोषः ॥ ८ ॥
(तस्य) उस दुष्ट भोजन के (सम्भिव्याहारतः) खाने खिलाने से (दोषः)
[हिंसा का] दोष लगता है ॥
यद्यपि दाता ने स्वयं हिंसा न की हो और प्रतिग्रहीता ने भी स्वयम्
हिंसा न की हो किन्तु जिस हिंसाजनित भोजन को उन्होंने खिलाया
और खाया है, उस के खाने खिलाने से भी खाने और खिलाने वाले को वेद
में दोष बताया गया है ॥ ८ ॥ परन्तु-
२३५-तददुष्टे न विद्यते ॥ ९ ॥
(तत्) वह दोष (अदुष्टे) निर्दोष भोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥
जो भोजन हिंसादिदोषरहित है, उस में खाने खिलाने वालों को वेद
में दोष नहीं बतलाया गया ॥ ९ ॥
२३६-पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १० ॥
(पुनः) फिर (विशिष्टे) उत्तम सात्त्विक भोजन में (प्रवृत्तिः) खाने
खिलाने की प्रवृत्ति करनी विहित है ॥
दुष्ट भोजन को त्यागकर श्रेष्ठ भोजन देना कहा है ॥ १० ॥
२३७-समे हीने वा प्रवृत्तिः ॥ ११ ॥
(वा) अथवा (समे) साधारण भोजन में (हीने) घृत दुग्धादि उत्तम गुण-
कारक द्रव्यों से रहित भोजन में भी (प्रवृत्तिः) दान की प्रवृत्ति [विहित] है॥११॥
२३८-एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः
परस्वादानं व्याख्यातम् ॥ १२ ॥
(एतेन) इस से (व्याख्यातम्) व्याख्यात समझना चाहिये कि (हीन,
सम, विशिष्ट धार्मिकेभ्यः) अधम, मध्यम और उत्तम धार्मिक पुरुषों से (पर-
स्वादानम्) परधन का ग्रहण करना विहित है ॥
अर्थात् हिंसादि दुष्ट कर्मों से रहित धार्मिक पुरुषों से प्रतिग्रह लेना
चाहिये, चाहे वे उत्तम, मध्यम, अधम किसी कक्षा के धार्मिक हों किन्तु हिंसक
पापी न हों ॥ १२ ॥ और-
२३९-तथा विरुद्धानां त्यागः ॥ १३ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.