वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
२२२-एतेन कर्माणि गुणाश्च व्याख्याताः ॥ २२ ॥
( एतेन ) इसी से ( कर्माणि ) कर्म ( च ) और ( गुणाः ) गुणों की
( व्याख्याताः ) व्याख्या की गयी ॥
अर्थात् जिस प्रकार दिशा काल और आकाश अमूर्त्त होने से निष्क्रिय
हैं और आत्मा भी निष्क्रिय है, इसी प्रकार कर्मों और गुणों का भी नि-
ष्क्रिय होना समझ लेना चाहिये क्योंकि कर्म और गुण भी अमूर्त्त हैं ॥२२॥
यदि कहो कि गुण और कर्म तौ मूर्त्तिमान् द्रव्यों में भी समवाय सम्बन्ध
से रहते हैं, फिर उन में क्रिया क्यों न मानी जाय, जब कि उन के आश्रय
द्रव्यों में क्रिया है ? उत्तर-
२२३-निष्क्रियाणां समवायः कर्मभ्यो निषिद्धः ॥ २३ ॥
( निष्क्रियाणाम् ) निष्क्रिय गुण कर्मों का ( समवायः ) समवाय सम्बन्ध
( कर्मभ्यः ) कर्मों से ( निषिद्धः ) निषिद्ध किया गया है ॥
अर्थात् क्रिया तौ संयोग से होती है न कि समवाय से । समवाय और
संयोग में भेद यह है कि एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अनादिकाल से
मिलाव=समवाय कहलाता है और भिन्न २ दो पदार्थों का एक दूसरे से नवीन
मिलाव=संयोग कहाता है ॥ २३ ॥
प्रश्न-यदि गुण और कर्म दोनों निष्क्रिय हैं तौ उन से कर्मों की उत्पत्ति
क्यों होती है ? उत्तर-
२२४-कारणं त्वऽसमवायिनो गुणाः ॥ २४ ॥
( गुणाः ) संयोगादि गुण, जो ( कारणम् ) कर्म का कारण होते हैं ( तु )
वे तो ( असमवायिनः ) समवायी गुण नहीं होते ॥ २४॥
अच्छा तौ गुण और कर्म निष्क्रिय सही, परन्तु दिशा और काल तौ
निष्क्रिय नहीं हो सकते क्योंकि उन में क्रिया देखी जाती है, जैसा कि पूर्व
दिशा में सूर्य उदय हो रहा है, पश्चिम में अस्त हो रहा है, दक्षिण में समुद्र
उमण्ड रहा है और उत्तर में झरने बह रहे हैं इत्यादि । क्या ये दिशाओं के
कर्म नहीं हुए ? इसी प्रकार-प्रातःकाल भ्रमण करता हूं, रात्रि में सोता हूं,
दिन में अनेक काम करता हूं, इत्यादि। क्या इस से काल में क्रिया नहीं सिद्ध
होती ? उत्तर-नहीं, क्योंकि-
२२५-गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २५ ॥