उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
३४ उपदेशसाहस्री
एक अन्य प्रकार से भी इस श्लोक को लगाया जा सकता है—
हे बुद्धे ! 'असदीहितात्' स्वतः स्वरूपशून्य होने के कारण देह, इन्द्रिय आदि असत् विषयों (असत्
विषयों की सहायता) से अभिलषित (ईहित) दृष्ट अथवा अदृष्ट फल प्राप्त करना चाहती हो तो उससे भी शांत हो
जाओ, अर्थात् जाग्रत् अवस्था में भी उसके लिए कोई व्यापार (प्रयत्न) न करो। दृष्टादृष्ट फलप्राप्ति के लिये प्रयत्न
करना छोड़कर चुपचाप बैठी रहो। इतना ही नहीं, बल्कि तुम अपने स्वरूप (अविद्याजनित बुद्धिरूपकार्यता) का भी त्याग
करो। और 'मायां अय'-अपनी कारण रूप 'माया' के प्रति जाओ अर्थात् अपने कारण में लीन हो जाओ। अपने कारण
(माया) में जब स्थित हो जाओगी तब पुनः तुम्हें उत्पन्न होने का भय नहीं रहेगा, क्योंकि तदनन्तर 'इह' मेरे स्वरूप में
ही प्रविष्ट हो जाओ अर्थात् प्रतप्त लोहे पर पतित उदकबिन्दु की तरह अपनी कार्य-कारणरूपता का त्याग कर मेरे रूप
में ग्रस्त हो जाओ। 'अपने मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को एक कौर (ग्रास) बनाकर रखने वाली मैं (बुद्धि) जब तुम्हें
चलायमान कर दूँगी, तब मैं तुम्हारे द्वारा ग्रस्त कैसे हो पाऊँगी ?' यह शंका भी मत करना, क्योंकि तुम कभी भी
मुझे चलायमान नहीं कर सकती। मुझे चलायमान कर देने का तुम्हें केवल भ्रम है। क्योंकि मैं 'अयमात्मा ब्रह्म'—
(बृ० उ० २।५।२९) श्रुति के अनुसार सदा ही परं ब्रह्म हूँ। 'विमुक्तवत्' यह ब्रह्म का विशेषण है। यहां स्वार्थ में
तद्धित प्रत्यय है। तब अर्थ होगा कि 'मैं नित्य मुक्त ही हूँ' ॥ २ ॥
सदा च भूतेषु समोऽस्मि केवलो यथा च खं सर्वगमक्षरं शिवम् ।
निरन्तरं निष्कलमक्रियं परं ततो न मेऽस्तीह फलं तवेहितैः ॥३॥
सदेति—नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप मैं यच्चयावत् समस्त भूतों में सदा ही समान भाव से स्थित रहता
हूँ। तथा आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, अविनाशी, कल्याणस्वरूप, निरन्तर, निष्कल, निष्क्रिय और परब्रह्मस्वरूप
हूँ। अतः हे बुद्धे ! तेरी चेष्टाओं से मुझे कोई फल नहीं होना है ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
अजातवादिप्रतिपादक शास्त्र से यह बताया गया है कि परब्रह्म निर्विशेष (विशेषरहित) होने के कारण
नित्य मुक्त (सदा विमुक्त) है, किन्तु प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) तो देहादिकों में अन्वित होने से उसमें विशेषता प्रतीत
होती है, ब्रह्म की तरह उसमें निर्विशेषता नहीं है। अतः उस प्रत्यगात्मा में ब्रह्मरूपता का होना कैसे संभव हो सकता
है? निर्विशेष ब्रह्म की तरह यह सविशेष प्रत्यगात्मा नित्य मुक्त कैसे कहा जा सकता है? अतः ब्रह्म और आत्मा की
एकता का होना कभी संभव ही नहीं। किन्तु इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि मैं (प्रत्यगात्मा) तो 'केवल'
हूँ, अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप विशेषणों से रहित हूँ। समस्त भूतों में समभाव से (एक-सा) ही रहता हूँ,
अर्थात् उपाधिपरामर्श (उपाधिनिर्देश) किये बिना मुझमें विशेषता का उल्लेख नहीं किया जाता। उपाधि के द्वारा
ही मुझे सविशेष कहा जाता है, वास्तव में तो मैं निर्विशेष ही हूँ। अपनी निर्विशेषता में दृष्टान्त 'ख' (आकाश) का
दे रहे हैं। आकाश का असंगत्व आदि तो प्रसिद्ध ही है, उसमें किसी को भी सन्देह नहीं है। 'सर्वगम्' आदि का निर्देश
ब्रह्म और आकाश दोनों के लिये समान है। जब कि आकाश के समान मैं 'केवल' और समस्त भूतों में समभाव से हूँ,
अतः आकाश के स्वभाव से उपमित हुआ और सर्वगम् आदि विशेषणों वाला परब्रह्म ही मैं हूँ। इस प्रकार ब्रह्मात्मैक्य
का उपपादन करने का परिणाम यह है कि बुद्धि की चेष्टाओं का मुझपर कोई प्रभाव नहीं है ॥ ३ ॥
अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्याप्यहमस्म्यसङ्गतः ।
असङ्गरूपोऽहमतो न¹ मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्वयत्वतः ॥४॥
अहमिति—मैं एक हूँ, अपने से भिन्न कुछ भी मुझे इष्ट नहीं है, तथा असंग होने के कारण मैं किसी के भी
अधीन नहीं हूँ, मैं असङ्गरूप हूँ, अतः हे बुद्धे ! तेरे किये हुए व्यापारों से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है और तू भी तो अद्वय
ब्रह्मरूप ही है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बुद्धि कहने लगी कि हे आत्मन् ! तुम ब्रह्मरूप हो इसलिए मेरी चेष्टाओं का तुम्हें कोई उपयोग न होनेपर
भी, तुम्हारे प्रति गुणभूत (अंगभूत) या प्रधानभूत बने हुए किसी तुम्हारे संबंधी को ही मेरी चेष्टा से कदाचित्
१. तदन्य०—पाठान्तरम् ।
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
(कथञ्चित्) कोई उपयोग हो जाय ? इसप्रकार बुद्धि के कहनेपर प्रत्यगात्मा ने उत्तर दिया कि हे बुद्धे ! इस रीति से
भी तुम्हारी चेष्टाओं का उपयोग होना संभव नहीं है । क्योंकि मैं एकाकी ही हूँ, वास्तव में मुझ चित्स्वरूप का कोई
सजातीत, विजातीय, स्वगतभेद भी नहीं है । अतः न मेरा कोई गुणभूत (अंग) है और न ही कोई प्रधानभूत (अंशी)
है, जिसका मैं अंग बनूँ, अर्थात् न मेरा कोई अंग है और न मैं किसी का अंग हूँ। क्योंकि मैं असंगरूप हूँ, इसलिये
मुझे तेरी चेष्टाओं से कोई प्रयोजन नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि तुम स्वयं भी तो नहीं हो; जब स्वयं तुम ही
नहीं, तब तुम्हारी चेष्टाएँ और उनका फल तो दूर ही रहा। तुम तो मेरे स्वरूप (ब्रह्मात्मैक्य) के अज्ञान से कल्पित
हो। मेरा स्वरूप ही तो तुम्हारा अधिष्ठान है, उस अधिष्ठान से तुम अतिरिक्त नहीं हो। उपकार्योपकारक भाव
(अंगांगिभाव) तो भेद होनेपर (दो वस्तुओं में) होता है, अभेद में (एक वस्तु में) नहीं। इसलिये व्यर्थ की कल्पनाएं
मत करो, शान्त हो जाओ । मुझ प्रत्यगात्मा में तुम्हारा शान्त होना ही उचित है ॥ ४ ॥
फले च हेतौ च जनो विषक्तवान् इति प्रचिन्त्याहमतो विमोक्षणे ।
जनस्य संवादमिमं प्रक्लृप्तवान् स्वरूपतत्त्वार्थविबोधकारणम् ॥५॥
फलेचेति-सर्वसाधारण अज्ञानी लोग कार्य-कारण रूप (फल-हेतुरूप) संसार में विशेष (अधिक) आसक्त
हैं, यह सोचकर उन्हें इस आसक्ति से छुड़ाने के लिये मैंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाले 'आत्म-बुद्धि
संवाद' प्रकरण की रचना की है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पाठकों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि भगवत्पूज्यपाद आर्चायचरण तो स्वयं कृतार्थ हैं, तब
इस प्रकरणग्रन्थ के लिखने की उन्हें क्या आवश्यकता पड़ी ? उन्हें ख्याति (लोकैषणा) की अपेक्षा (इच्छा) तो थी
नहीं । इस जिज्ञासा के समाधानार्थ ही कहा जा रहा है कि स्वानुभवसिद्ध अर्थ के आविष्कारक इस प्रकरणग्रन्थ की
रचना में उनकी प्रवृत्ति होने का एकमात्र कारण 'दुखी लोगों को देखकर हृदय में उमड़नेवाली करुणा' ही है, ख्याति
(लोकप्रसिद्धि) प्राप्त करना नहीं¹ । यह अज्ञानीवर्ग हेतुफलात्मक संसार में अत्यधिक आसक्त है, यह सोचकर उस
अज्ञानीवर्ग को इस संसार (पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्) से मुक्त कराने के लिए 'मत्यात्मसंवाद' रूप ग्रन्थ का
प्रणयन (रचना) श्री आचार्यचरण ने किया है। इस संवाद के द्वारा आत्मा के नित्यचैतन्यस्वरूप की ब्रह्मता का
सुस्पष्ट बोध हो जाता है। पदार्थविवेक के द्वारा यह संवाद ही आत्मा के स्वरूप में ब्रह्मरूपता का ज्ञान कराने में
कारण है। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म दोनों का स्वरूप एक ही है। आत्मा और ब्रह्म भिन्न-भिन्न नहीं हैं ॥ ५ ॥
संवादमेतं यदि चिन्तयेन्नरो विमुच्यतेऽज्ञानमहाभयाद्गमात् ।
विमुक्तकामश्च तथा जनः सदा चरत्यशोकः सम आत्मवित्सुखी ॥६॥
संवादमिति-यदि मनुष्य इस संवाद का निरन्तर चिन्तन करता रहे तो वह अज्ञानरूप महान् भय की
प्राप्ति से मुक्त हो सकता है, और तब समस्त कामनाओं से मुक्त हुआ वह मनुष्य सदा शोकरहित, समदर्शी, आत्मज्ञ
और सुखी होकर अपने ब्रह्मस्वरूप में ही विचरता (रममाण) रहता है ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की ब्रह्मात्माधिगति में हेतुभूत यह संवाद है। अतः साध्य-साधनपर्यावर्तलक्षण संसार से मुक्ति की
इच्छा करने वाले को इस संवाद का चिन्तन बराबर करते रहना चाहिये, जिससे ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होगी, तब
वह जीवित रहता हुआ ही कृतकृत्य हो जायगा । संसाररूप महान् भय के हेतुभूत अज्ञान से छुटकारा पा सकेगा ।
जब अज्ञानरूप कारण की निवृत्ति हो जायगी तब कार्य की निवृत्ति होना अर्थात् ही सिद्ध है। तब वह बन्धप्रतिभास-
रहित होकर जीवित रहता हुआ भी अपने ब्रह्मस्वरूप में विचरण करता हुआ (रममाण रहता हुआ) कृतकृत्य हो जाता
है। अतः मुमुक्षु को इस संवाद का अनुसन्धान निरन्तर करते रहना चाहिए ॥ ६ ॥
॥ इति अष्टमम्मतिविलापनप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. नै. सि. १।६ ]
पद्यभाग ९: सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम्
सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम्
सूक्ष्मताव्यापिते ज्ञेये गन्धादेरुत्तरोत्तरम् ।
प्रत्यगात्मावसानेषु पूर्वपूर्वप्रहाणतः ॥१॥
सूक्ष्मतेति—गन्धादि से लेकर पूर्व-पूर्व कार्य का त्याग करते हुए प्रत्यगात्मा तक उत्तरोत्तर कारणतत्त्व
की सूक्ष्मता और व्यापकता समझनी चाहिये ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिस ब्रह्मरूप प्रत्यगात्मा की मुक्ति, वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति कराते हुए बताई गयी है, वह
सर्वान्तर (सबके भीतर) होने से उसकी निरतिशय सूक्ष्मता और व्यापिता इसी ग्रन्थ के अष्टम प्रकरण के तृतीय श्लोक
में 'यथा च खम्' आदि के द्वारा सूचित की गई है, उसी का उपपादन करने के लिए इस प्रकरण का आरंभ किया जा
रहा है। यहाँ 'गन्ध' का अर्थ पृथिवी है। गन्ध (पृथिवी) से लेकर प्रत्यगात्मा तक जितने पदार्थ हैं, उनमें से पूर्व-पूर्व का
त्याग करने से उत्तर-उत्तर भाग में सूक्ष्मता और व्यापिता होती है। एवं च सर्वान्तरभाग में स्थित प्रत्यगात्मा में
निरतिशय सूक्ष्मता सिद्ध होती है। कार्य में कारणस्वरूप के रहने पर भी वह कार्य के आकार से तिरोहित रहने से
स्वरूपतः उसका भान नहीं होता इसलिए उसे सूक्ष्म कहते हैं। कार्य के परिमाण से न्यूनपरिमाण होने के कारण 'सूक्ष्म'
नहीं कहा जाता। तथा समस्त स्वविकारों में जो अनुगत रहता है, उसी को उपादान कारण कहते हैं। एवं च कार्य की
अपेक्षा कारण अधिकदेशवृत्ति होने से उसे व्यापक कहा जाता है। और कार्य न्यूनदेशवृत्ति होने से उसे व्याप्य कहते
हैं। एवं च पृथिवी स्वकार्य की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। जल पृथिवी की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। तेज
जल की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु तेज की अपेक्षा सूक्ष्म और व्यापक है। वायु आकाश से ग्रस्त है, यह
प्रसिद्ध ही है। सत्ता और स्फूर्ति से व्याप्त हुए इन सब का अनुभव होता है, अतः सब का उपादान सच्चित् ही है।
उसका उपादान कोई नहीं है। अतः उसी की निरपेक्षव्यापकता और निरतिशयसूक्ष्मता है। यह समस्त दृश्यराशि
सच्चिन्मात्र से ग्रस्त रहने के कारण उससे पृथक् कोई भी वस्तु नहीं है। इसलिए उसी की परमसूक्ष्मता और व्यापिता
का निश्चय कर 'वह असङ्ग, कूटस्थ, अद्वय मैं हूँ' ऐसा चिन्तन सदा करते रहना चाहिए ॥ १ ॥
शारीरा पृथिवी तावद्यावद्वाह्या प्रमाणतः ।
१अम्ब्वादीनि च तत्त्वानि तावज्ज्ञेयानि कृत्स्नशः ॥२॥
शारीरेति—बाह्य पृथिवी का जितना प्रमाण है, उतना ही प्रमाण शरीरसम्बन्धिनी पृथिवी का भी है,
उसी प्रमाण में जलादि तत्त्वों को भी समझना चाहिये, अर्थात् वे भी बाह्य जलादि के अनुसार उत्तरोत्तर सूक्ष्मतर और
व्यापक हैं ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
उपर्निर्दिष्ट आत्मस्वरूप का ज्ञान ऊपर किये गये वर्णन के अनुसार होना कठिन है, क्योंकि अध्यात्म
और अधिदैवत में भिन्न-भिन्न पृथिवी है। जितना परिमाण (प्रमाण) बाह्य पृथिवी का है, उतना ही शारीरा
(अध्यात्म) पृथिवी का परिमाण समझना चाहिये। उसी तरह जल आदि चारों भूतों का भी उतना-उतना ही परिमाण
जानना चाहिये, जितना शारीरा और बाह्या पृथिवी का हो। निष्कर्ष यह है कि अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव रूप
में विभक्त हुए पृथिवी आदि सब एक ही अज्ञान से विजृम्भित (उत्पन्न) हैं। अतः सब का प्रविलापन एक ही प्रयत्न से
हो सकता है। सबमें प्रत्यक्तत्त्व एक-सा अनुगत है, अतः सबका प्रत्यगात्मा में विलीन होना ही उनका अध्यात्मादिरूप
है, उसी से वे सब व्याप्त हैं, उससे कोई पृथक् नहीं है, इस रीति से प्रत्यक्तत्त्व का अवधारण करने पर बाह्य, आध्या-
१. अनादी०—पाठान्तरम् ।
सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३७
त्मिक आदि भेद के स्फुरण के लिए कोई अवसर ही नहीं रहता, केवल प्रत्यगात्म-ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है। अतः पूर्व
कही गई आत्मतत्त्वज्ञान की सिद्धि अवश्य ही होती है॥ २॥
वाय्वादीनां यथोत्पत्तेः पूर्वं खं सर्वगं तथा।
अहमेकः सदा १शुद्धश्चिन्मात्रः सर्वगोऽद्वयः ॥३॥
वाय्वादीनामिति—जिस प्रकार वायु आदि की उत्पत्ति से पूर्व सर्वगत आकाश ही था, उसी प्रकार 'मैं'
(आत्मा) एक, सर्वदा, शुद्ध, या सर्वस्वरूप, चिन्मात्र, सर्वत्र व्याप्त एवं अद्वितीय हूँ ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में अध्यात्म-अधिदैवत ज्ञान की प्रत्यगात्मावसानता बताई किन्तु वह कैसे संभव हो सकेगी ?
क्योंकि पराचीन विकार (बाह्य पदार्थ) की अपेक्षा, प्रत्यक्त्व को रहती है। अर्थात् 'बाह्य और अन्तः' दोनों शब्द परस्पर-
साकांक्ष हैं। अतः परागर्थ (बाह्य पदार्थ) के अभाव में (न रहने पर) आत्मा से प्रत्यक्त्व (भीतरीपना) और सर्वगतत्व
का होना कैसे संभव होगा ? अर्थात् पराक् (बाह्य) पदार्थों की प्रत्यगात्मावसायिता कैसे कही जा रही है ? प्रत्यगादि
शब्द लक्षणा के द्वारा अपूर्वादिलक्षण चिन्मात्रस्वरूप को ही बताते हैं। लक्षणा करते समय आरोपित पराक् अर्थ की
अपेक्षा रहने पर भी चिन्मात्रस्वरूप को तो किसी की भी अपेक्षा नहीं रहती, अतः सबका प्रत्यगात्मा में अवसान
(पर्यवसान) होना जो बताया गया है, वह उचित ही है। इसी अभिप्राय को ग्रन्थकार ने वायु के दृष्टान्त से समझाया
है। एवंच अध्यात्मादि ज्ञान का प्रत्यगात्मा में अवसान होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥
ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता ये प्राणिनो मम पूः स्मृताः।
कामक्रोधादयो दोषा जायेरन्मे कुतोऽन्यतः ॥४॥
ब्रह्माद्या इति—ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक जितने भी प्राणी हैं, वे सब मेरे ही शरीर कहे गये हैं। ऐसी
स्थिति में किसी अन्य के द्वारा मुझमें काम-क्रोधादि दोष कैसे उत्पन्न हो सकेंगे ? ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जिज्ञासा यह होती है कि जब आकाश की तरह एक ही आत्मा है तब उसे सर्वात्मा कैसे कह सकते हैं ?
अर्थात् प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा के होने का सभी को अनुभव है, इसलिए 'आत्मा' को एक कहना उचित
नहीं है। अपितु ब्रह्मादि भेद से 'आत्मा' को अनेक कहना ही उचित प्रतीत होता है। उसी तरह 'तुम (आत्मा)
चिन्मात्र हो' यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों के संसर्ग की उपलब्धि होती है। इस जिज्ञासा का
समाधान यह है कि समस्त भुवनों के सम्पूर्ण प्राणी मुझ चिदात्मा के ही शरीर (पूः) हैं, यह निर्णय कर दिया गया है।
उसी तरह काम-क्रोधादि दोष मेरे (आत्मा के) स्वाभाविक नहीं हैं, क्योंकि व्यभिचार दिखाई देता है। परतः (किसी
दूसरे से) मुझ आत्मा में वे प्राप्त होते हों, यह कहना भी ठीक न होगा, क्योंकि मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा
है ही नहीं ॥ ४ ॥
भूतदोषैः सदाऽस्पृष्टं सर्वभूतस्थमीश्वरम् ।
नीलं व्योम यथा बालो दुष्टं मां वोक्षते जनः ॥५॥
भूतदोषैरिति—जो भूतों के दोषों से हमेशा अस्पृष्ट है, उस समस्त भूतों के अन्तर्यामी मुझ ईश्वर को लोग
उसी प्रकार दोषयुक्त देखते हैं—जैसे बालक आकाश को नीलवर्ण से युक्त देखते हैं ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
जबकि प्रत्यगात्मा में संसार के दोष प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं तब उसकी निर्दोषता कैसे कही जा सकती है ?
आकाश की कृष्णता का प्रत्यक्ष जैसे भ्रम है वैसे ही आत्मा में दोषदर्शन भी भ्रम है। समस्त भूतों में मैं स्थित हूँ,
१. सर्व०—पाठान्तरम् ।
३८ उपदेशसाहस्री
तथापि उनके दोषों का मुझे स्पर्श तक नहीं है, क्योंकि मैं ईश्वर हूँ। मूल में (सर्वभूतस्थमीश्वरम्) 'ईश्वर' शब्द का
विशेषण के रूप में प्रयोग किया है, इस विशेषण को हेत्वर्थक समझना चाहिए। अर्थात् यह (आत्मा) सबका ईशिता
(कारण) है, एवंच कार्य के धर्मों से कारण हमेशा अस्पृष्ट रहता है ॥ ५ ॥
मच्चैतन्यावभास्यत्वात्सर्वप्राणिधियां सदा।
वपुर्मम प्राणिनः सर्वे सर्वज्ञस्य विपाप्मनः ॥६॥
मच्चैतन्येति—समस्त प्राणियों की बुद्धियाँ मेरे चैतन्य भाव (चित्स्वरूप) से ही प्रकाशित होती हैं। अतः
सम्पूर्ण प्राणी मुझ पापरहित सर्वज्ञ के ही शरीर हैं ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा गया था कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक समस्त प्राणी एक आत्मा के ही शरीर हैं; परन्तु
आत्मा, जबकि समस्त दोषों से रहित है, तो उसे पुण्य-पापरहित कहना होगा, अर्थात् वह (आत्मा) तो सर्वावभासक
(सर्वज्ञ) है, अतएव वह दृश्य-दोषसंसर्गरहित (विपाप्मा) भी है। उस स्थिति में सब प्राणियों को उस आत्मा का
शरीर कैसे समझा जाय ?
उक्त शङ्का का समाधान श्रुति ने कर दिया है कि सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों का अन्तःसाक्षी होकर
प्रकाशमान जो चैतन्य (ज्योति) है, वही सम्पूर्ण प्राणियों की 'आत्मा' है१। उस (आत्मा) का निरूपण अनेक बुद्धियों
और उसमें स्थित आभासों के बिना हो नहीं सकता, क्योंकि आत्मा का स्वरूपतः भेद कहीं नहीं कहा गया है। जैसे
जलपात्र और तद्गत आभास के बिना सूर्य का निरूपण नहीं किया जा सकता। इससे यह निश्चित होता है कि ये संपूर्ण
भूत एक ही आत्मा के शरीर हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी उक्त अभिप्राय का समर्थन किया है२ ॥ ६ ॥
जनिमज्ज्ञानविज्ञेयं स्वप्नज्ञानवदिष्यते ।
नित्यं निर्विषयं ज्ञानं तस्माद्वैतं न विद्यते ॥७॥
जनिमदिति—जो वस्तु उत्पन्न होती है और ज्ञान का विषय बनती है, उसे स्वप्नज्ञान के तुल्य मिथ्या
जानना चाहिये, क्योंकि वास्तविक (पारमार्थिक) ज्ञान तो नित्य और निर्विषय होता है। अतः द्वैत नहीं है ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मचैतन्य से प्रकाशित होनेवाले प्राणी तथा उनकी बुद्धियों की सत्ता रहने के कारण 'आत्मा' का
अद्वितीयत्व (अद्वैत) कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् भास्य और भासक का भेद स्पष्ट प्रतीत होने से अद्वैत की सिद्धि नहीं
हो सकती। जो उत्पत्तिमान् और जो ज्ञान से जाना जाता है अर्थात् ज्ञान से विज्ञेय होता है, अर्थात् जो कार्य हो और
जड़ हो, वह मिथ्या होता है, जैसे स्वप्नज्ञान। वैसे ही जाग्रत वस्तु भी कार्य है और दृश्य भी है, इसलिए वह मिथ्या है।
क्योंकि द्वैत की वस्तुतः सत्ता नहीं है। जबकि द्वैत की वास्तविक सत्ता ही नहीं है, तब किसी ज्ञेय के न रहने से ज्ञान
ही नित्य है और सदा निर्विषय है अर्थात् वह (ज्ञान) विषय से निरूप्य नहीं होता। अध्यारोपित द्वैत से पारमार्थिक
अद्वैत का बाध नहीं होता है, जैसे आरोपित जल आदि से उसकी आधारभूत भूमि को सद्वितीय नहीं कहा
जाता ॥ ७ ॥
ज्ञातुर्ज्ञप्तिर्हि नित्योक्ता सुषुप्ते त्वन्यशून्यतः ।
जाग्रज्ज्ञप्तिस्त्वविद्यातस्तद्ग्राह्यं चासदिष्यताम् ॥८॥
ज्ञातुरिति—ज्ञाता (द्रष्टा आत्मा) का ज्ञान (दृष्टि) तो नित्य बताया गया है। क्योंकि सुषुप्ति में द्रष्टा (ज्ञाता)
से भिन्न दृश्य (ज्ञेय) का अभाव रहता है, किन्तु उस समय भी ज्ञाता (द्रष्टा) का अभाव नहीं होता। जाग्रत् अवस्था
का विषयविशिष्ट ज्ञान तो अविद्या के कारण है। अतः उसके विषयभूत पदार्थों को असत् समझो ॥ ८ ॥
१. 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—(बृ. उ. ४।३।७)
२. 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः'—(बृ. उ. ३।७।१५)
सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३९
हृदयस्पर्शिनी
स्वरूपज्ञान भी तो 'ज्ञान' ही है, अतः उसका 'ज्ञेय'सापेक्ष रहना स्वाभाविक है, तब उसे निर्विषय कैसे
कहा है ? स्वरूपज्ञान की निर्विषयता और नित्यता को श्रुति ने बताया है। अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में विविध करणों
का उपरम होने पर भी (किसी अन्य ज्ञेय के न रहने पर भी) तत्साक्षीभूत चैतन्य (ज्ञाता आत्मा) के विद्यमान
रहने से उसका (आत्मा का) स्वरूपभूत ज्ञान (ज्ञप्ति) तो रहता ही है, अतएव श्रुति ने भी उसे नित्य कहा है१।
तथापि पुनः शंका हो सकती है कि सुषुप्ति में विषय के न होने से ज्ञान यद्यपि निर्विषय है और स्वरूपतः उसका
नाश न होने के कारण वह नित्य भी है, तथापि सुषुप्ति के अतिरिक्त अन्य अवस्थाओं में ज्ञाता का ज्ञान सविषय
उपलब्ध होता है, अतः उसे अनित्य कहा जा सकता है। इस आशंका का समाधान ग्रन्थकार करते हैं कि जब
भगवती श्रुति स्वयं कह रही है कि 'ज्ञान' निर्विषय और नित्य है, तब कहना होगा कि जाग्रत्कालीन विषय-
दर्शनात्मक ज्ञान, अविद्या (भ्रान्ति) ही है, क्योंकि आत्मा, निर्विकार (विकार-रहित) है, अतः उसे ज्ञान का
कर्ता नहीं कह सकते, और 'अन्तःकरण' जड़ होने से वह ज्ञान का आश्रय नहीं बन सकता । अतः सविषय
ज्ञान को अध्यस्त ही मानना होगा, और उसके द्वारा ग्राह्य जितना भी विषय है, उसे भी असत् (अपरमार्थ)
ही मानना होगा। अर्थात् जागरित अवस्था में उत्पत्तिशील जो ज्ञान और ज्ञेय हैं (ज्ञान-ज्ञेय विभाग है),
वे दोनों ही अविद्या के कार्य होने से मिथ्या ही हैं। जागरितादि अवस्थाओं में भी बुद्धि की जो विषयाकार वृत्तियाँ
हुआ करती हैं, वे स्फुरण से अवगुण्ठित रहती हैं। समस्त वृत्तियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के साक्षी रूप में
किसी एक नित्य स्फुरण को भी अवश्य मानना ही होगा। अतः कहना होगा कि जाग्रत् अवस्था में भी आत्मचैतन्य
नित्य ही है। तथा विषयों का स्फुरण, वृत्तिसमकाल में ही होने से, प्रतीत होता है कि विषय का व्यभिचार (अभाव)
रहने पर भी स्फुरण का अव्यभिचार रहता है, अर्थात् उसका व्यभिचार (अभाव) नहीं होता, इसीलिए वह (स्फुरण)
विषय के द्वारा अनिरूप्य (निरूप्य नहीं) कहा जाता है। इस रीति से 'ज्ञान' की निर्विषयता स्पष्ट हो जाती है। तथा
सुषुप्ति में भी करणों (इन्द्रियों) की उपरति की तरह विषय का भी “न तु तद् द्वितीयमस्ति" कहकर श्रुति ने निषेध
किया है। अतः सुषुप्ति अवस्था में भी किसी भी विषय का ज्ञान न होने से केवल कूटस्थ ज्ञान ही एकमात्र सिद्ध
होता है ॥८॥
रूपवत्त्वाद्यसत्त्वाच्च दृष्ट्यादेः कर्मता यथा ।
एवं विज्ञानकर्मत्वं भूम्नो नास्तीति गम्यते ॥९॥
रूपवत्त्वादीति—भूमा (आत्मा) में रूप आदि नहीं हैं (आत्मा रूपवान् न होने से उसमें रूपवत्त्व नहीं है)।
रूप के न होने से वह नेत्र आदि का कर्म (विषय) नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह (आत्मा) ज्ञान (विज्ञान) का भी
कर्म नहीं हो सकता ॥९॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि कोई कहे कि आत्मा में श्रवण-मनन आदि की विषयता को तो श्रुति स्वयं कह रही है२। तब दर्शन-
श्रवण-मनन आदि क्रियाओं का कर्म होने से उसे दृश्य मानना होगा। ऐसी स्थिति में उसे रज्जु-सर्प या शुक्ति-रजत के
समान 'असत्' कहना होगा। किन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि उसे दर्शनादि क्रियाओं का कर्म मानने पर३
अन्य श्रुति से विरोध होगा। जो रूप आदि से हीन (रहित) होता है, वह दर्शन आदि का विषय नहीं हुआ करता।
'द्रष्टव्यः' इत्यादि में अहार्थिक 'तव्य' प्रत्यय है, अतएव भगवती श्रुति ने आत्मा में दर्शनादि की अर्हता (योग्यता) को
बताते हुए मनुष्य को उनकी अपनी अनात्मप्रवणता को त्यागने के लिए कहा है। द्रष्टव्यादि श्रुति का तात्पर्य आत्मा की
१. 'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्-
विभक्तं यत् पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३) ।
२. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'—(बृ. उ. २४।५ )
३. 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्'—(क. उ. ३।१५), तथा 'न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्त-
पसा कर्मणा वा'—(मुं. उ. ३।१।८)
४० उपदेशसाहस्री
ज्ञानकर्मता (ज्ञान का कर्म आत्मा है) बताने में नहीं है। तथापि 'यत्र नान्यत् पश्यति' इत्यादि श्रुति के द्वारा आत्मा के
लिए अन्य दर्शनादि का निषेध होने से 'द्रष्टव्यः' श्रुति, आत्मा को दर्शन आदि की अभ्यनुज्ञा दे रही है, यह प्रतीत
होता है। अतः आत्मा में दृश्यता प्राप्त होने से अन्य दृश्य विषयों के समान उसका असत्त्व ही क्यों न माना जाय ?
किन्तु यह शंका ठीक नहीं है। 'यत्र नान्यत् पश्यति' इस श्रुतिवाक्य का तात्पर्य चक्षुरादि के द्वारा भ्रम से होनेवाले
अन्यदर्शन आदि की निवृत्ति में है, आत्मा में दर्शनादि की कर्मता के बताने में नहीं है। एवं च 'द्रष्टव्यः' इस श्रुति से
जिस प्रकार ज्ञानकर्मता नहीं बन पाई, उसी प्रकार, 'यत्र नान्यत् पश्यति' श्रुति¹ का पूर्व उपन्यस्त श्रुति के साथ
विरोध होने के भय से तथा श्रुति का तात्पर्य आत्मदर्शन विधि में होने के कारण भूमा (ब्रह्म) में ज्ञान की कर्मता तो है
ही नहीं, यह निश्चय किया गया है। एवं च अविषय, नित्य, भूमा, प्रत्यगात्मा सर्वान्तर सिद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥
॥ इति नवमं सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. ३'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा'—( छां. उ. ७।२४।१ )
पद्यभाग १०: दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्
दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम् ।
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्त ॐ* ॥१॥
दृशीति—जो दृशिस्वरूप ( चेतनस्वरूप ); आकाश जैसा व्यापक है, इन्द्रियादि से परे है, नित्य प्रकाशमान
है, अजन्मा है, एक है, अविनाशी है, असंग है, सर्वगत और अद्वितीय है—वही 'मैं' हूँ । अतः सदा मुक्त हूँ, ॐ ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व प्रकरण में आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता को युक्ति से सिद्ध किया था, अब इस प्रकरण में उसी को
अनुभव के द्वारा प्रकट करते हुए अविषय प्रत्यगात्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) निर्विषय ही होता है, यह बताया जा रहा
है । एक बार में ही स्फुरित होनेवाला अर्थात् स्पष्टरूप से भासमान जो अक्षर ब्रह्म है, वही 'मैं' सदा से हूँ, अतः मैं
विमुक्त हूँ । गुरु के द्वारा शिष्य को बताया हुआ जो आत्मस्वरूप है, उसे 'मुमुक्षु शिष्य ने अच्छी तरह समझ लिया है'
यह ॐ कार के द्वारा सूचित किया है। एवंच 'ॐ' शब्द स्वीकृति का सूचक है । अथवा आत्मा का उक्त स्वरूप ॐ
कार द्वारा मुमुक्षुओं की बुद्धि में अभिव्यक्त होता है—यह बताने के लिए ॐ का निर्देश किया है ॥ १ ॥
दृशिस्तु शुद्धोऽहमविक्रियात्मको न मेऽस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः ।
पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः +सम्पूर्णभूमा त्वज आत्मनि स्थितः ॥२॥
दृशिस्त्विति—मैं तो ज्ञानस्वरूप ( दृशिः) हूँ, अतएव शुद्ध हूँ, निर्विकार हूँ, वस्तुतः मेरा कोई विषय नहीं
है। मैं आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सभी ओर परिपूर्ण व्यापक रूप हूँ । मैं अजन्मा हूँ, और अपने स्वरूप में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'दृशि' (ज्ञानस्वरूप चेतन) को आकाश के समान अलेपक कहा गया था, किन्तु वह संगत नहीं प्रतीत हो
रहा है, क्योंकि दृशि का दृश्य के साथ सम्बन्ध रहने से उसमें अशुद्धि और विक्रिया (विकार) होना निश्चित है। किन्तु
इस आशंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है कि 'दृशि' तो आत्मस्वरूप है, उसके नित्य शुद्धत्व आदि
का निश्चय श्रुति ने ही कर दिया है । भगवती श्रुति ने क्या बताया है, उसे बताते हैं—मैं तो दृशि अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ,
अतः वस्तुतः (परमार्थतः) शुद्ध हूँ, क्योंकि अशुद्धि तो अज्ञान से होती है अर्थात् वह तो अज्ञाननिबन्धन है, और अज्ञान,
आभासरूप है यह हमें' मन्त्रवर्ण से ज्ञात होता है। दूसरा कारण यह है कि वह (आत्मा) विक्रियात्मक (विकाररूप)
प्राणादिकों से अन्य (अतिरिक्त) है, अर्थात् अविक्रियात्मक है । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी कहा है२ । अतः इसकी
(आत्मा की) शुद्धता में कोई किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। परमार्थतः (स्वभावतः) आत्मा के साथ विषय का भी
सम्बन्ध (विषयसंसर्ग) नहीं है, इस कथन से यह ज्ञात होता है कि विकार के हेतुभूत विषयों के न होने से भी वह
(आत्मा) अविक्रिय (विकाररहित) है। श्रुति३ ने भी इसी अभिप्राय का समर्थन किया है। विषय के न होने से उस
आत्मा की अद्वयरूपता को छान्दोग्य के भूमवाक्यांश में इस प्रकार कहा है४—आत्मा का स्वरूपावस्थान किसी के
अधीन नहीं है अर्थात् स्वतंत्र है, ऐसा उपन्यास (आरंभ) करके उसी के उपपादनार्थ यह बताया कि पूर्वादि विभाग
- शिवगीता—१।७ से तुलना की जा सकती है ।
† सुपर्ण०—पाठः मुक्ति० उप० (२।७४)
१. 'शुद्धमपापविद्धम्'—( ई. उ. ८ )
२. 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः'—( मुं. उ. २।१।२ ), तथा 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्'—( बृ. उ. ३।८।८ )
३. 'न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन'—( छां उ. ७।२४।१ )
४. 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नि ।'—( छां. उ. ७।२५।२ )
६
४२ उपदेशसाहस्री
तथा अधरोत्तरादि भेद से जो भी उपलब्ध हो रहा है, वह सब 'भूमा' ही है। तब यह शंका हो सकती है कि देह से
लेकर बुद्धि तक जो भी अहंकारास्पद है, वह 'भूमा' (ब्रह्म) से भिन्न है। किन्तु इस शंका का समाधान बीच में ही
कर दिया कि अहंबुद्धिग्राह्य भी 'भूमा' ही है। इदम्-अनिदम् जो भी है, वह सब भूमा ही है, उसके अतिरिक्त कुछ
नहीं है। जब भूमा से अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, तब भेदक के न रहने से 'प्रत्यगात्मा' ही भूमा है, इस रीति से 'आत्मै-
वेदं सर्वम्'१ यहाँ तक के अंशद्वारा छान्दोग्य में सम्पूर्ण को भूमा ही बताया गया है। मैं अपनी महिमा में (आत्मा में)
ही स्थित रहता हूँ अर्थात् किसी अन्य के अधीन नहीं हूँ, अतः 'मैं' अज (आविर्भावरहित) हूँ ॥ २ ॥
अजोऽमरश्चैव तथाऽजरोऽमृतः स्वयंंप्रभः सर्वगतोऽहमद्वयः ।
न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥३॥
अज इति—मैं जन्म रहित ( अजन्मा ), अमर, अजर, अमृत, स्वयम्प्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय हूँ। मैं
किसी का कारण नहीं हूँ और किसी का कार्य भी नहीं हूँ, अपितु अत्यन्त निर्मल और सर्वदा एकमात्र निजानन्द से ही
तृप्त हूँ, अतः मैं मुक्त हूँ, ॐ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा को अज (जन्मरहित) बताया गया है, तथापि उसे जरा आदि अन्य विकार हो सकते हैं। इस
आशंका के समाधानार्थ अनेक श्रुतियों के सहारे ग्रन्थकार ने उसे कूटस्थ, अद्वयस्वरूप बताया है। अत एव उसमें
जन्म, जरा आदि कोई विकार नहीं हो पाते। उसकी अजता, अमरता, अजरता, अमृतता, स्वयम्प्रकाशता, सर्वगतता
और अद्वयता इन सबके मूल में श्रुतियां हैं२ । इन श्रुतियों के निर्मल, एकतृप्त और विमुक्त आदि अर्थ को ग्रन्थकार
ने श्लोक के३ उत्तरार्ध में ग्रथित कर दिया है। वह प्रत्यगात्मा सदा निर्मल है, सदा एकतृप्त है और सदा विमुक्त है।
आचार्य के द्वारा जो मेरा स्वरूप बताया गया, वह ठीक वैसा ही है, ऐसी स्वीकृति 'ॐ' कहकर शिष्य दे रहा है ॥ ३ ॥
सुषुप्तजाग्रत्स्वपतश्च दर्शनं न मेऽस्ति किञ्चित्तु मतेर्हि मोहनम् ।
स्वतश्च तेषां परतोऽप्यसत्वतस्तुरीय एवास्मि सदादृगद्वयः ॥४॥
सुषुप्तेति—सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न इन तीनों अवस्थाओं में रहते हुए भी मेरा अपना कोई व्यावहारिक दर्शन
नहीं है, अर्थात् तीनों ही अवस्थाओं में मैं किसी दृश्य को प्रकाशित नहीं करता। 'मैं दृश्य को प्रकाशित कर रहा हूँ'—
यह तो केवल मोहमात्र है, क्योंकि उन दृश्य पदार्थों की स्वतः या परतः किसी प्रकार की भी सत्ता नहीं है। अतः 'मैं'
सदा ही साक्षीस्वरूप अद्वितीय तुरीय ही हूँ ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह दृशित्वरूप आत्मा सुषुप्ति, जाग्रत्, स्वप्न तीनों अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से जब कि प्रतीत
होता रहता है, तब उसे विकाररहित कैसे कहा जा सकता है ? इस शंका का समाधान यह है कि तीनों अवस्थाओं के
१. 'आत्मैवेदं सर्वम्'—( छां. उ. ७।२५।२ )
२. 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः'—(कठ. उ. २।२८), 'स वा एष महानज आत्मा'—(बृ. उ. ४।४।२२), 'अजरोऽमरोऽमृतोऽभयो
ब्रह्म'—( बृ. उ. ४।४।२५ ), 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ ), 'तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः'—( मुं. उ.
१।१।६), 'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्'—( मुं. उ. २।२।९ ), 'एको देवः'—( श्वे. उ. ६।११ ), 'एकमेवाद्वितीयम्'—
( छां. उ. ६।२।१) 'तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्'—( बृ. उ. २।५।१९ )
३. 'न कारणं कार्यमतीव निर्मलः सदैकतृप्तश्च ततो विमुक्त ॐ ॥ ३ ॥
निर्मलः—'निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति'—( मु० उ० ३।१।३ )
एकतृप्तः—'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन'—( तै. उ. २।९ )
अमृत—'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति'—( मुं. उ. २।२।७ )
विमुक्त—'विमुक्तश्च विमुच्यते'—( कठ. उ. ५।१ )
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४३
साक्षी के रूप में रहने वाले मेरी ( मुझ आत्मा की ) अपनी-सी ( आत्मीय-सी ) या मेरे स्वरूप जैसी ( आत्मीयमिव
या स्वरूपभूतमिव ) व्यावहारिक वस्तु कोई भी नहीं दिखाई देती । फिर भी व्यवहार में ( जाग्रत् आदि अवस्था में )
जो वस्तु मेरी आत्मीय-सी या मत्स्वरूप-सी प्रतीत होती रहती है, वह सब अविद्या ( अविवेक या मोहन ) से आरोपित
( अध्यारोपित ) है । क्योंकि जाग्रदादि अवस्थारूप या जाग्रदादि अवस्थाओं में दिखाई देनेवाली वस्तुओं की सत्ता न
स्वतः है और न परतः ही है । अर्थात् उन वस्तुओं की सत्ता ( सत्त्व ) और उनका स्फुरण स्वयं हो नहीं सकता ( अन्य-
निरपेक्ष सत्त्व संभव नहीं ), वह तो आगमापायी ( उत्पाद-विनाशशील ) है, अतः रज्जु-सर्प की तरह उसे ( सत्ता-
स्फुरण को ) आरोपित ही समझना होगा । दृश्य वस्तुओं की सत्ता और स्फुरण को परतः भी नहीं कह सकते, क्योंकि
इन जड़ (दृश्य) वस्तुओं से 'पर' एकमात्र 'चैतन्य' को ही कहना होगा । तब उस चैतन्य के रूप में इन वस्तुओं की सत्ता
और स्फूर्ति तो हो नहीं सकती, क्योंकि दोनों के स्वभाव परस्परविरुद्ध हैं, अर्थात् 'चैतन्य' प्रत्यक् है और 'जड़ वस्तु'
पराक् है । इस प्रकार विरुद्ध स्वभाव वालों का तादात्म्य (एकाकार) होना कभी संभव ही नहीं है । उनका तादात्म्य
समझना केवल भ्रम ही है । सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में भासित होने वाले प्राज्ञ, तैजस और विश्व ये
मत्स्वरूपभूत (मेरे स्वरूप) नहीं हैं । मेरा स्वरूप तो 'तुरीय' है, क्योंकि विश्वादि तीनों की अपेक्षा परे (अतिरिक्त) हूँ,
इसीलिये मुझे 'तुरीय, (चतुर्थ) कहते हैं । विश्व आदि तो केवल अपनी-अपनी अवस्थाओं के द्रष्टा (दर्शक) हैं, और 'मैं'
सभी अवस्थाओं का द्रष्टा हूँ, इसलिये उनसे अतिरिक्त हूँ । स्थूल-सूक्ष्म के क्रम से विचारने पर विश्व आदि के तीनों
स्थानों को भी पार करके यह रहता है इसीलिये इसे 'तुरीय' शब्द से कहा गया है । वस्तुतः इसमें 'तुरीयत्व' नहीं है,
अर्थात् इसके अतिरिक्त तीन हैं, उनके अनन्तर होने से यह चौथा (तुरीय) है, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि इसे
'अद्वय' कहते हैं, अर्थात् यह 'आत्मा' सदा निर्विशेष ही है ॥ ४ ॥
शरीरबुद्धीन्द्रियदुःख१ सन्ततिर्न मे न चाहं मम निर्विकारतः ।
असत्वहेतोश्च तथैव सन्ततेरसत्त्वमस्याः स्वप्नतो हि दृश्यवत् ॥५॥
शरीरेति— शरीर, बुद्धि, इन्द्रिय और दुःखपरम्परा (दुःखसन्तति ) का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है, और न मैं
तत्स्वरूप हूँ, क्योंकि मैं विकाररहित (निर्विकार) हूँ । वह दुःखपरम्परा तो सोये हुए मनुष्य के स्वप्नजनित दृश्य के
समान है । जैसे स्वप्नजनित दृश्य की कोई सत्ता नहीं, वैसे ही शरीरादि दुःखपरम्परा की भी कोई सत्ता नहीं है । अतः
उसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में आत्मा की निर्विशेषता को 'अद्वय' शब्द से बताया गया था, किन्तु वह संगत नहीं हो पा
रहा है, क्योंकि उससे शरीर आदि का सम्बन्ध सबके प्रत्यक्ष है । इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा कर रहे
हैं । वास्तव में यह शरीरादि परंपरा (सन्तति) न मत्स्वरूप है और न मेरी ही है । अर्थात् ये सब न मुझ आत्मा के
धर्म हैं और न ये मत्स्वरूप (आत्मस्वरूप) ही हैं । क्योंकि मैं तो निर्विकार (विकार रहित) हूँ । अविक्रिय (विकाररहित)
वस्तु, आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) शरीरादि के रूप में परिणत या उससे सम्बद्ध नहीं हुआ करती, जिससे उन
जड़ वस्तुओं में तत्स्वरूपता (आत्मस्वरूपता) या तद्धर्मता (आत्मधर्मता) हो सके । इन जड़ वस्तुओं की पारमार्थिक
(वास्तविक) सत्ता न हो सकने में एक अन्य हेतु भी है—स्वप्नावस्था के दृश्य के समान यह शरीरादि परम्परा भी
दृश्य है । अतः स्वप्नदृश्य जैसे मिथ्या, वैसे ही यह शरीर-परम्परा भी मिथ्या समझनी चाहिये ॥ ५ ॥
इदं तु सत्यं मम नास्ति विक्रिया विकारहेतुर्न हि मेऽद्वयत्वतः ।
न पुण्यपापे न च मोक्षबन्धने न चास्ति वर्णाश्रमतोऽशरीरतः ॥६॥
इदमिति—यह तो सत्य ही है कि अद्वितीय होने के कारण मुझमें विकार नहीं है, न विकार का कारण ही
है, तथा शरीर-रहित होने के कारण मुझमें पुण्य-पाप, मोक्ष-बन्ध तथा वर्णाश्रमधर्म भी नहीं है ॥ ६ ॥
१. सन्ततेर्न ०— पाठांतरम् ।
४४ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
शरीरादि परम्परा दृश्य होने से यदि मिथ्या है, तो आत्मा की शुद्धता, अविक्रियता (निर्विशेषता) भी
दृश्य होने के कारण मिथ्या क्यों नहीं है? इसके उत्तर में यह कहा जा रहा है कि मुझमें न विकार (विक्रिया) है
और न विकारहेतु ही है, क्योंकि मुझे 'अद्वय' कहा गया है, अद्वय (द्वयाभाव) होने के कारण ही 'स्वतः या परतः
मुझमें विकार नहीं है' यह कहना यथार्थ ही है। तात्पर्य यह है, कि शंका करने वाले ने आत्मा के शुद्धत्व, अवि-
क्रियत्वादि को मिथ्या सिद्ध करने के लिये जो अनुमान¹ किया है, उसमें 'दृश्यत्व' हेतु ही 'असिद्धि' दोष से युक्त होने
से (वह) असद्धेतु है। उस असद्धेतु से आत्मा के शुद्धत्व, अविक्रियत्वादि में मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो सकती।
क्योंकि आत्मा के विक्रियाभावाद्युपलक्षित स्वरूप में ही अविक्रिय कहने का तात्पर्य है। अतः उसके शुद्धत्वादि में
मिथ्यात्व की आशंका करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता है। यदि कहें कि उसमें विकार न होने पर भी विकार-
हेतुभूत कर्म, उनके फल, उनका ध्वंस, और कर्मादि साधनों के रहने से उसकी अद्वयता कैसे हो सकती है? इस का
उत्तर यह है कि वह (आत्मा) अशरीरी (शरीररहित) होने से उसे पुण्य, पाप, मोक्ष, बन्ध, वर्ण-आश्रम के धर्म आदि
कुछ नहीं हैं। अतः उसमें जैसे विकार नहीं है, वैसे ही विकार के हेतु कर्मादि भी नहीं हैं, इसलिये उसके शुद्धत्व,
अद्वयत्व में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ॥ ६ ॥
अनादितो निर्गुणतो न कर्म मे फलं च तस्मात् परमोऽहमद्वयः ।
यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते तथा ह्यहं देहगतोऽपि सूक्ष्मतः ॥७॥
अनादित इति—मैं अनादि और निर्गुण हूँ, इस कारण मेरा कोई कर्म या कर्मफल भी नहीं है, इसलिये मैं
सर्वोत्कृष्ट और अद्वितीय हूँ। जैसे गगन (आकाश) सर्वव्यापक (सर्वगत विभु) होने पर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं
होता, वैसे ही अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं, देह (शरीर) में व्याप्त होने पर भी उससे लिप्त नहीं हूँ ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यद्यपि आत्मा शरीरोपादान और तद्धर्मक होने से शरीरवान् (शरीरी) नहीं है तथापि उसका शरीर
के साथ 'उपलक्ष्य-उपलम्भकभावरूप सम्बन्ध' तो है ही। तब उसे (आत्मा को) 'अशरीर' (शरीररहित) कैसे कह
सकते हैं ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, केवल सम्बन्ध को देखकर सशरीर मान लेने पर भी कर्म आदि से उसका
सम्बन्ध कहना ठीक नहीं है। इसी अभिप्राय को ध्यान में रखकर पूर्व श्लोक में कहे गये पुण्य-पापादि सम्बन्धराहित्य
को ही विस्तार से बता रहे हैं। जो कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) रहता है, वह सादि (आदिमान्) होता देखा गया है,
जैसे रथ, शरीर आदि। इस व्याप्ति (नियम) का परमाणु और मन में यदि व्यभिचार कहें तो ठीक नहीं है, क्योंकि
'मन' की उत्पत्ति श्रुत है। और परमाणु तो कतिपय लोगों के द्वारा कल्पित मात्र है, हम उन्हें नहीं मानते। तथा जो
कर्मसमवायी (कर्मसम्बन्धित) होता है, वह सगुण रहता देखा गया है, जैसे रथ, शरीर आदि। अर्थात् 'यत्र यत्र
क्रियावत्त्वं तत्र तत्र सगुणत्वं सादित्वं च' इस व्याप्ति के अनुसार 'क्रियावत्त्व' व्याप्य है और 'सगुणत्व,
सादित्व' व्यापक है। एवं च प्रत्यगात्मा से व्यावृत होने वाला व्यापक सगुणत्व, सादित्व अपने व्याप्य क्रियावत्त्व को
लेकर (व्याप्य क्रियावत्त्व के साथ) ही उस आत्मा से निवृत्त होता है। इस प्रकार आत्मा में क्रियावत्त्व के न होने से
तत्साध्य पुण्य-पापादि का होना भी असंभव है। अतः आत्मा पुण्य-पाप से रहित है। इसीलिये श्लोक में कहा गया
है कि मुझसे पुण्यादिरूप कर्म और तत्साध्य (उससे होनेवाले) सुखादि फल का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कारण मैं
संसारियों से विलक्षण, उत्तम (परम), अद्वय, निर्विशेष हूँ। क्रियावत्त्व न होने से तत्साध्य पुण्यादि का भी असंभव है,
यही अविद्याकल्पित अन्य संसारियों से मेरी विलक्षणता है। मैं देह में उपलभ्यमान रहने पर भी सूक्ष्म (अमूर्त) हूँ,
१. आत्मनः शुद्धत्वाविक्रियत्वादिकं मिथ्या दृश्यत्वात् शरीरादिसन्ततिवत् ।'
२. 'अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥-(भ. गी. १३।३१-३२)
दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४५
इस कारण मैं किसी से लिप्त नहीं हो पाता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि "मैं परमात्मा अनादि
तथा निर्गुण होने से 'अव्यय' हूँ । हे कौन्तेय ! मैं शरीरस्थ होता हुआ भी न कुछ करता हूँ और न किसी से लिप्त होता
हूँ । जैसे सर्वव्यापक आकाश सूक्ष्म होने से किसी से लिप्त नहीं हो पाता, उसी तरह यह आत्मा (परमात्मा) शरीर
में सर्वत्र रहता हुआ भी किसी से लिप्त नहीं हो पाता' ।।'' अर्थात् माया के द्वारा उपस्थित देहों में अनुप्रविष्ट रहने
पर भी मैं उनके दोषों से दूषित नहीं हो पाता ।। ७ ।।
सदा च भूतेषु समोऽहमीश्वरः क्षराक्षराभ्यां परमो ह्यथोत्तमः ।
परात्मतत्त्वं* च तथाऽद्वयोऽपि सन् विपर्ययेणाभि†मतस्त्वविद्यया ॥८॥
सदेति-मैं सम्पूर्ण भूतों में समान भाव से स्थित ईश्वर हूँ, मैं कार्य-कारण भाव से अलग (अतिरिक्त) हूँ।
तथा उसका अधिष्ठान रहने से उनकी अपेक्षा मैं उत्कृष्ट हूँ, तथा मैं परमात्मतत्त्व और अद्वितीय होनेपर भी अविद्या के
कारण विपरीत ( अन्यथा) रूप से समझा जाता हूँ ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मोपलब्धि के अधिष्ठानस्वरूप देहादिकों की विषमता सबके प्रत्यक्ष है, ऐसे विषम देहों में प्रविष्ट हुए
आत्मा की उपलब्धि होती है। अतः उस उपलभ्यमान आत्मा में भी देहादिकृत वैषम्य का होना संभव है, ऐसी स्थिति
में कैसे उसका परमात्मत्व और कैसी उसकी परिपूर्णता ? किन्तु तारतम्य (वैषम्य) का यह प्रतिभास अविद्या का
विलास मात्र है, वास्तविक नहीं है। देह में उसका अनुप्रवेश व्यवहार की दृष्टि में है, वस्तुतः नहीं है। 'आत्मा' को
ईश्वर कहा गया है, इससे यह सूचित होता है कि वह उपाधि के परवश ( परतन्त्र) नहीं है। अतः उसमें (आत्मा में)
देहादिकृत वैषम्य नहीं है। आत्मा को 'ईश्वर' (नियामक) कहनेपर उसे ईशितव्य (नियम्य) की अपेक्षा अवश्य
रहेगी, उसके बिना उसमें ईश्वरत्व (नियामकत्व) कैसे बन सकेगा ? अर्थात् उसे अद्वय कहना ठीक नहीं, वह तो
सद्वय है। किन्तु यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि वह तो क्षर-अक्षर (कार्य-कारण) से परम (व्यतिरिक्त) है इसी कारण
उसे 'उत्तम' (उत्कृष्ट) कहते हैं। अतः उसकी अद्वयता सुरक्षित है। और उसका ईश्वरत्व भी उचित है। 'क्षर' का
अर्थ कार्यवर्ग है क्योंकि 'क्षरति नश्यति इति क्षरः' यह 'क्षर' शब्द का निर्वचन है। और 'अक्षर' का अर्थ कारण है।
अर्थात् माया से युक्त (शबलित) चिद्वस्तु, उन दोनों से यह आत्मा परम (व्यतिरिक्त) है, अर्थात् कार्यकारणादि की
भेदकल्पना का यह अधिष्ठानस्वरूप है। इसीलिये इसे (आत्मा को) पुरुषोत्तम कहते हैं। अतः आत्मा का 'ईश्वरत्व'
भी समुचित है। उसके ईश्वरत्व में और अद्वयता में किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। वह 'उत्तम' है, उसी कारण
अन्य आत्माओं का स्वरूप (तत्त्व) भी यानी परमात्मतत्त्व भी वही है, अर्थात् 'मैं' ही सर्वात्मा हूँ, यह समझना
चाहिये। इस प्रकार वह सर्वात्मा होनेपर भी उसके स्वरूप का विपरीत भान (विपरीतस्वरूपप्रतिभास) जो हो रहा
है, वह विपर्यय (मिथ्याज्ञान) से अर्थात् तत्कारणीभूत अविद्या से अवच्छिन्न (युक्त) होने के कारण उसके वास्तविक
रूप का ज्ञान नहीं हो पाता। भगवदुक्ति से भी उपर्युक्त अभिप्राय का समर्थन हो जाता है-भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने
कहा है१ कि 'इस लोक में क्षर और अक्षर नामके दो ही पुरुष हैं, उनमें समस्त भूत 'क्षर' हैं, और कूटस्थ 'अक्षर' है।
इन दोनों से उपाधिरहित उत्तम पुरुष 'अन्य' ही है, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो अव्यय (अविनाशी) ईश्वर है,
१. "द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥" ( १५।१६-१८)
- तत्त्वञ्च०-पाठान्तरम् ।
† भिभूत०-पाठान्तरम् ।
४६ उपदेशसाहस्री
वही तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर उनका भरण (धारण) करता है। मैंने क्षर का (विनाशी मायामय संसार का)
अतिक्रमण किया है और अक्षर से (संसारबीज अव्यक्त से) मैं उत्तम हूँ, इस कारण मैं लोक और वेद में 'पुरुषोत्तम'
नाम से प्रसिद्ध हूँ॥ ८ ॥
अविद्यया भावनया च कर्मभिर्विविक्त आत्माऽव्यवधिः सुनिर्मलः।
दृगादि शक्ति प्रचितोऽहमद्वयः स्थितः स्वरूपे गगनं यथाऽचलम् ॥९॥
अविद्ययेति—अविद्या, भावना और कर्मों से असंग आत्मा का कोई व्यवधान नहीं है, इस कारण वह निर्मल
है। अविद्या से अध्यस्त हुए अन्तःकरण की परिणामरूप दृगादि शक्तियों के संबंध से ही उसमें द्रष्टृत्वादि व्यवहार किया
जाता है। वास्तव में तो मैं अद्वितीय हूँ, और आकाश के समान अचल (स्थिर) भाव से अपने स्वरूप में स्थित हूँ॥ ९॥
हृदयस्पर्शिनी
यदि अविद्यामूलक मिथ्या ज्ञान से आत्मा आवृत है, तो उसका अविद्या से सम्बन्ध अवश्य रहेगा। किन्तु
यह कहना उचित नहीं है। क्योंकि 'आत्मा' तो चित्प्रकाश है, यह बात श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण और तर्क से
भी सिद्ध है। अविद्या जड़ (अप्रकाशात्मिका) है। अतः दोनों का स्वभाव अत्यन्त परस्परविरुद्ध है। इस कारण दोनों
का सम्बन्ध परमार्थतः होना तो दुर्घट ही है। ऐसी स्थिति में अविद्या का आश्रय अनवच्छिन्न चैतन्य तो हो नहीं
सकता। यदि यह न माना जाय तो अणुमात्र का भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। किसी से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के भाग-
विशेष को अविद्या का आश्रय कहें तो अविद्या के अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है, जिसकी कल्पना की जाय, तथा प्रमाण
रहित कोई कल्पना नहीं की जाती। अतः अविद्या के अतिरिक्त अन्य किसी का व्यवधान न होने से दिवान्ध व्यक्ति
के द्वारा दिन में कल्पित अन्धकार के समान आत्मा में अविद्या की कल्पना की जाती है। अविद्या का अर्थ 'मूलाज्ञान'
है, तथा भावना का अर्थ अविद्याकृत देहाभिमान और अभिमान पूर्वक किये जाने वाले पुण्य-पापलक्षण (रूप) ही
कर्म हैं। इन अविद्या, भावना और कर्म के स्पर्श से रहित (विविक्त) यह आत्मा है, क्योंकि वह व्यवधानरहित
(अव्यवधि, आच्छादकरहित) है, इसी कारण वह 'सुनिर्मल' (समस्त आशंकित दोषों से रहित) है। ऐसे आत्मा में
द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा का व्यवहार कैसे किया जाता है ? यह व्यवहार तो अविद्या के द्वारा अध्यस्त अन्तःकरण-
परिमाणरूप दृगादि शक्ति के सम्बन्ध से ही होता है। अर्थात् वास्तव में न वह द्रष्टा, है, न मन्ता है, न श्रोता है,
न बोद्धा है, तथापि उसमें द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा होने-का-सा आभास होता है। क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा
उत्पन्न होनेवाली दर्शन-श्रवणादिशक्तिरूप बुद्धिवृत्तियों से उपचित (प्रचित) हुए की तरह मैं रहता हूँ, अतः उनसे
सम्बद्ध हुआ-सा प्रतीत होता हूँ, वस्तुतः वैसा नहीं हूँ॥ ९ ॥
अहं परं ब्रह्म विनिश्चयात्मदृङ् न जायते भूय इति श्रुतेर्वचः।
न चैव बीजेऽप्यसति* प्रजायते फलं न जन्मास्ति मतो ह्यमोहता ॥१०॥
अहमिति—'मैं परब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चयात्मक आत्मज्ञान जिसे हो जाता है, उसका पुनः जन्म नहीं होता,
ऐसा श्रुतिवचन है। बीज के न रहने पर फल उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार चूंकि अज्ञान नहीं रहा, इसलिये
जन्म भी नहीं होता ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकार प्रत्यगात्मतत्त्व का परिज्ञान होने पर पुनरावृत्तिरहित कैवल्यफल की प्राप्ति होती है, ऐसा
श्रुति वचन है¹। इसी श्रुतिसिद्ध बात को युक्ति से भी बताते हैं कि 'बीज के न रहने पर फल भी नहीं होता'। इसी
१. 'स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते'— ( कठ. उ. ३।८ )
'पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः'— ( कठ. उ. ३।११ )
'अथ सोऽभयं गतो भवति'— ( तै. उ. २।७ ), 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'— ( बृ. उ. ३।२।९ )
- जे त्वसति०—पाठान्तरम् ।
दृशिश्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४७
सामान्य नियम के अनुसार चूंकि ब्रह्मात्मज्ञान होने से मोहराहित्य (अमोहता अर्थात् मूलभूत मोह का अभाव) होता
है, उस कारण मोहमूलक जन्मादिलक्षणविचित्र संसार भी नहीं होता । क्योंकि जन्मादिविकार मोहपदवाच्य
अविद्यामूलक हैं। जब मूलभूत अविद्या ही नहीं रहेगी, तब तत्कार्यभूत जन्मादि विकार भी नहीं होगा ॥ १० ॥
ममेदमित्थं च तथेदमीदृशं तथाहमेवं न परो न वान्यथा ।
विमूढतैवँ न जनस्य कल्पना सदा समे ब्रह्मणि चाद्वये शिवे ॥११॥
ममेति—मेरा यह शरीर ऐसा ( सुन्दर या असुन्दर ) है, यह शरीर इस प्रकार का ( स्थूल या सूक्ष्म ) है,
मैं ऐसा (स्थूल या सूक्ष्म) हूँ, तथा अन्य पुरुष ऐसा (हृष्ट-पुष्ट) नहीं है, ऐसी कल्पना करते रहना लोगों की मूर्खता ही है,
क्योंकि सदा समानरूप से स्थित, अद्वितीय शिवस्वरूप ब्रह्म में इन कल्पनाओं के लिये स्थान नहीं है ॥ ११ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ब्रह्मात्मज्ञान होने पर मोहनिवृत्ति होती है, और मोहनिवृत्ति होने पर मोहकार्यरूप संसार की
निवृत्ति होती है, यह बता चुके । अब मोहकार्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पहिले तो दोनों देहों (सूक्ष्म-स्थूल) का
अहंकार, तदनन्तर बाह्य वस्तुओं (पदार्थों) की कल्पना, तदनन्तर शोभनादि का अध्यास, तदनन्तर यह मेरा, वह
ऐसा (इस प्रकार का) है, उसी प्रकार यह मेरा नहीं, इत्यादि कल्पना, उसी तरह दूसरा भी इसी प्रकार का है, या इस
प्रकार का नहीं है, अन्य प्रकार का है, या अन्य प्रकार का नहीं है, या यह मेरी या दूसरे की मूढ़ता है या सुज्ञता है—
ये सब, अनादि-अज्ञान ( अविद्या ) से तिरोहित आत्मस्वरूप वाले मनुष्य को जन्मादि का सम्बन्ध होने पर
जो कल्पनाएँ हुआ करती हैं, वे कल्पनाएँ सदा समान परमानन्दरूप शिव अद्वय ब्रह्म में कभी नहीं हुआ करतीं ।
एवंच यह विचित्र संसार अज्ञान का कार्य है ॥ ११ ॥
यदद्वयं ज्ञानमतीव निर्मलं महात्मनां तत्र न शोकमोहता ।
तयोरभावे न हि जन्म* कर्म वा भवेद्द्वयं वेदविदां विनिश्चयः ॥१२॥
यदिति—अत्यन्त निर्मल अद्वितीय ( अद्वय ) ज्ञान के उत्पन्न होनेपर महात्माओं ( महान् आत्माओं ) को
शोक-मोह नहीं हुआ करते, और शोक-मोह के न होनेपर कर्म या जन्म नहीं होते –यह वेदवेत्ताओं का निर्णय है ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मतत्त्व का ज्ञान होनेपर अज्ञान की निवृत्ति होती है। उससे इस विचित्र संसार की निवृत्ति हो जाती है,
इसीको और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। अद्वयात्माकार ( अद्वय ) तथा असंभावना-विपरीतभावनादिप्रतिबन्ध से शून्य
( अतीव निर्मल ) ज्ञान के उदित होनेपर ब्रह्मभूत महात्माओं को शोक-मोहता संसारित्व नहीं रहता१। उन शोक-मोह
के अभाव में ( न रहनेपर ) तदुपलक्षित ( उनके द्वारा सूचित ) उन शोक-मोह के कारणभूत अज्ञान की निवृत्ति होने-
पर 'बीजाभावे फलाभावः' नियम के अनुसार जन्म-मरण पुनः नहीं हो सकते, यह वेदार्थज्ञ विद्वानों का निश्चय है ।
यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है२ ॥ १२ ॥
सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं तु पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः ।
तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः ॥१३॥
सुषुप्तवदिति—आत्मा के अद्वितीयत्व का निश्चय हो जाने के कारण जो मनुष्य सुषुप्त ( सोये हुए ) पुरुष के
समान जाग्रत् अवस्था में भी द्वैत का अनुभव नहीं करता तथा जो सब कुछ करते हुए भी निष्क्रिय रहता है, वही आत्मज्ञ है,
अन्य कोई नहीं—यही वेदान्तशास्त्र का निर्णय ( निश्चय ) है ॥ १३ ॥
१. 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः'—( ई. उ. ७),
२. 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' ॥ ( मुं. उ. २।२।८ )
- कर्म जन्म०—पाठान्तरम् ।
४८ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि शास्त्र के अनुसार आत्मविद् (आत्मज्ञ) की मुक्ति बताई गई। अब
आत्मवित् के स्वरूप को बता रहे हैं—द्वैत का बाध हो जाने के कारण जाग्रत् अवस्था में अपने पूर्व संस्कार (वासना)
वश द्वैत प्रपञ्च को देखता हुआ भी (उल्लेख करता हुआ भी) विशेष रूप से (आसक्ति से) उसे नहीं देखता, किन्तु
सुषुप्त पुरुष की तरह विलीन प्रपञ्चवाले प्रत्यगात्मस्वरूप में ही उस द्वैत प्रपञ्च को देखता रहता है अर्थात् द्वैत की
सत्ता ही न रह जाने के कारण सर्वत्र अपने को ही वह देखता है। एवञ्च यथापूर्व (आत्मज्ञान होने के पूर्व) स्नान,
शौच, भिक्षाटन आदि कार्यों को करता हुआ भी अकर्तृभूत आत्मस्वरूप का आविर्भाव होने से वह निष्क्रिय है अर्थात्
निर्विकार है। इस प्रकार जो आत्मवित् होगा उसीको विक्षेपदशा में भी यथार्थ आत्मज्ञान (अप्रच्युतात्मयाथात्म्य-
दर्शन) होने के कारण ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ कहा गया है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई भले ही शास्त्रार्थज्ञ विद्वान् ही
क्यों न हो, किन्तु व्यवहारकाल में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि अभिमान उसमें भरा होने से आत्मज्ञ नहीं कहा जा सकता
यही वेदान्तशास्त्र का निश्चय है ।। १३ ।।
इतोदमुक्तं परमार्थदर्शनं मया हि वेदान्तविनिश्चितं परम् ।
विमुच्यतेऽस्मिन् यदि निश्चितो भवेन्न लिप्यते व्योम१ इवेह कर्मभिः ॥१४॥
इतीति—इस रीति से वेदान्तशास्त्रनिर्णीत उत्कृष्ट परमार्थदृष्टि का निरूपण मैंने किया। यदि इसमें किसी का
विश्वास (निष्ठा) हो जाय तो वह अवश्य ही मुक्त हो सकता है। तब वह आकाश के समान इस संसार में पुनः कर्मों से
लिप्त (बद्ध) नहीं होगा ॥ १४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
वेदान्त शास्त्र के विषय में शास्त्रनियम के अनुसार अपने अनुभव को बता चुके। अब बता रहे हैं कि
इस अद्वैत वेदान्तदर्शन में परिनिष्ठित हुआ विद्वान् कृतकृत्य होता है। अतः परानुग्रहार्थ ही इस प्रकरण के निर्माण में
मेरी प्रवृत्ति हुई है ।। १४ ।।
।। इति दशमं दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणं समाप्तम् ।।
१. व्योमवदेव०—पाठान्तरम् ।
पद्यभाग ११: ईक्षितृत्वप्रकरणम्
ईक्षितृत्वप्रकरणम्
ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं जन्तूनां च ततोऽन्यता ।
अज्ञानादित्यतोऽन्यत्वं सदसीति निवर्त्यते ॥१॥
ईक्षितृत्वमिति—समस्त जीवों का ईक्षितृत्व ( चित्स्वरूपत्व ) स्वभाव से ही सिद्ध है, और उनकी भिन्नता
अज्ञानजनित ( उपाधि के कारण ) है । अतः 'तू सत् ( ब्रह्म ) है' इस वाक्य से उनके भेद का निरसन किया गया है ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से मुक्ति होती है अर्थात् एकमात्र ब्रह्मात्मैक्यज्ञाननिष्ठ व्यक्ति मुक्त होता है, यह जो
कहा गया है, वह संगत नहीं हो सकता। क्योंकि ब्रह्म और आत्मा परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं, अतः उन दोनों की
एकता होना संभव ही नहीं। मुक्ति तो कर्म से या कर्मसहित ज्ञान से ही हो सकती है। उसी तरह वेदान्त वाक्यों से
ही सुनिश्चित (यथार्थ-सम्यक्) ज्ञान हो सकता है—यह कथन भी सन्दिग्ध है, वह ज्ञान तो अनुमानादि प्रमाण से भी
हो सकेगा—यदि कोई ऐसी आशंका करे तो उस आशंका के परिहारार्थ इस प्रकरण का आरंभ किया जा
रहा है, और इसके द्वारा 'ज्ञानादेव मुक्तिः' ज्ञान से ही मुक्ति होती है, यह बताया जायगा, और वह ज्ञान,
वेदान्त-महावाक्य से ही हो सकेगा, अनुमानादि प्रमाणों से नहीं—यह भी बताया जायेगा । 'त्वं सत् असि' तुम सच्छब्द-
लक्षित ब्रह्म ही हो, संसारी नहीं हो—इस वाक्योपदेश से ही सच्छब्दार्थ ब्रह्म और जीव का भेद निवृत्त हो जाता है ।
तथापि संसारी अशुद्ध जीव में उससे नितान्त विपरीत ब्रह्मत्व की संभावना कैसे कर सकते हैं ? यह आशंका हो सकती
है। उस आशंका का निवारण इस प्रकार कर सकते हैं कि समस्त प्राणियों का चिद्रूपत्व ही ईक्षितृत्व है, और वह स्वतः-
सिद्ध (स्वाभाविक) है। चिद्रूपत्व की तरह कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि को भी स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अन्यथा
स्वरूप में व्यभिचार होगा। क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि चिद्रूप से अन्य ( भिन्न ) है, जो अज्ञानजनित है। एवंच
अन्यत्व ( अन्यता ) अज्ञाननिबन्धन ( अज्ञानकारणक ) है, वास्तविक ( पारमार्थिक ) नहीं है; कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि में
अज्ञानकल्पितत्व तथा ब्रह्मविपरीतत्व है, और मोक्ष स्वतश्चिन्मात्रस्वभाव ( स्वरूप ) तथा अज्ञान-निवृत्तिलक्षण
( स्वरूप ) है। मोक्ष में केवल तत्त्वज्ञान मात्र की अपेक्षा रहती है, अर्थात् तत्त्वज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः
'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि की भी निवृत्ति हो जाती है। एवञ्च
ज्ञान से ही अन्यत्वनिवृत्तिरूप मुक्ति होती है। उसके लिये अन्य साधन खोजने की आवश्यकता नहीं है ॥ १ ॥
एतावद्धचमृतत्वं न किंचिदन्यत्सहायकम् ।
ज्ञानस्येति ब्रुवच्छास्त्रं सलिङ्गं कर्म बाधते ॥२॥
एतावदिति—यह आत्मज्ञान ही अमृतत्व ( मोक्षप्राप्ति का साधन ) है । इस आत्मज्ञान का कोई और सहायक
नहीं है। इस प्रकार कहता हुआ शास्त्र¹ आश्रमोचित यज्ञोपवीतादि लिङ्गों के सहित कर्म का बाध करता है ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व कथन के अनुसार यद्यपि ज्ञान से मोक्ष होता है, तथापि वह ज्ञान, कर्मसापेक्ष होकर ही मोक्ष का
साधन हो सकता है, कर्मनिरपेक्ष होकर नहीं—ऐसा कुछ लोगों का कहना है, किन्तु वह श्रुति तथा युक्ति के विरुद्ध
होने के कारण उचित नहीं है। अतः कर्म को ज्ञान का सहायक मानकर उसे मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता।
अद्वैत आत्मज्ञान के होनेपर कर्म के हेतुभूत जात्यादि के अभिमान के अभाव में कर्म की स्थिति ही कहाँ, जो मोक्षफल
की प्राप्ति कराने में ज्ञान का सहायक बन सके ? एवंच ज्ञान-कर्मसमुच्चय मोक्षप्राप्ति में कारण नहीं है ॥ २ ॥
१. 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्'—( बृ. उ. ४।५।१५ ) अमृतत्व का साधन आत्मज्ञान ही है—इन शब्दों से निश्चयपूर्वक कहनेवाली
श्रुति को शास्त्र कहते हैं ।
७
५० उपदेशसाहस्री
सर्वैषां मनसो वृत्तमविशेषेण पश्यतः ।
तस्य मे निर्विकारस्य विशेषः स्यात्कथंचन ॥३॥
सर्वेषामिति—सबके अन्तःकरणों की वृत्तियों को सामान्यभाव से देखने वाले उस मुझ निर्विकार आत्मा
का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकरण के प्रथम श्लोक के द्वारा प्रतिपादित स्वाभाविक चिद्रूपत्व को बताते हुए ज्ञानी के लिये कर्म
का होना संगत नहीं हो सकता, यह प्रस्तुत श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है। क्योंकि समस्त प्राणियों की मनोवृत्तियों
के साक्षी उस आत्मा को जाति आदि का कोई अभिमान नहीं होता है। श्लोक में आये 'विशेष' शब्द का अर्थ कर्तृत्व,
भोक्तृत्व आदि तथा शास्त्रविहित कर्म के साधनभूत जात्याद्यभिमान है। 'कथञ्चन' का अर्थ आक्षेप है। अर्थात् किसी
प्रकार भी मुझमें विकार नहीं हो सकता, क्योंकि अभिमानशून्य होकर केवल साक्षी बनकर मैं देखता रहता हूँ ॥ ३ ॥
मनोवृत्तं मनश्चैव स्वप्नवज्जाग्रतीक्षितुः ।
संप्रसादे द्वयासत्त्वाच्चिन्मात्रः सर्वगोऽव्ययः ॥४॥
मन इति—स्वप्न के समान जाग्रत् अवस्था में भी मन और मन की वृत्तियों के साक्षी (ईक्षिता) आत्मा
का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इन दोनों का अभाव होने से सर्वगत, अविनाशी आत्मा
चेतनमात्र रह जाता है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह आत्मा सबकी मनोवृत्तियों को समान भाव से (अविशेषेण) किस प्रकार देखता है, यह जिज्ञासा
होनेपर दृष्टान्त के साथ उसका उपपादन करते हुए आत्मा की चिदेकरसता को बता रहे हैं। स्वप्नावस्था में बाह्य
विषय (पदार्थ) न होने से आत्मा जैसे सवृत्तिक (वृत्तिसहित) मन को ही देखता रहता है, ठीक उसी तरह जाग्रत्
अवस्था में भी मनोवृत्ति (मनःप्रचार—मनोवृत्त) और उस वृत्ति के आश्रयभूत मन को आत्मा देखता है, तब उसमें
कौनसी विशेषता (विकार) उपलब्ध हो रही है ? अर्थात् कोई नहीं। क्योंकि स्वप्न में जैसे वृत्तिसहित मन के अतिरिक्त
आत्मा को कुछ उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् अवस्था में भी उसे विषयाकारवृत्तिविशिष्ट मन के अतिरिक्त
कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है। यदि कहें कि इस प्रकार का मनोदर्शन ही उस (आत्मा) में स्वाभाविक विशेष
(विकार) है, तो यह कथन भी ठीक न होगा, क्योंकि सुषुप्तिदशा में (सम्प्रसाद में) वृत्ति और मन दोनों ही नहीं
रहते१, अतः उनका दर्शन भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एवंच आत्मा चिन्मात्र है, सर्वत्र व्याप्त है, अव्यय
और अद्वितीय सिद्ध होता है ॥ ४ ॥
स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधाद्देहात्मत्वं तथैव च ।
प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं जाग्रत्स्यादाऽऽत्मवेदनात् ॥५॥
स्वप्न इति—जिस प्रकार जागने तक स्वप्न की सत्यता प्रतीत होती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होने तक
ही जाग्रत् अवस्था में देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य समझा जाता है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—पूर्वप्रतिपादन यदि अकाट्य हो तो बाह्याभ्यन्तर द्वैत का अभाव स्वीकार करना ही होगा,
किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ विरोध होने से तथा लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहारों का लोपप्रसंग प्राप्त होने से
पूर्वप्रतिपादन उचित नहीं प्रतीत होता।
समा०—जैसे जागने तक स्वप्न सत्य अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहार के योग्य प्रतीत होता है, उसी तरह
जाग्रत् अवस्था में भी देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य सम्पूर्ण व्यवहारों का अंग (साधन-उपाय) माना
१. 'न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५१
जाता है। परन्तु उसकी भी एक अवधि है, जो “आत्मवेदनात्” शब्द से बताई गई है, अर्थात् 'आ-आत्मवेदनात्' तक
ही उसकी अवधि है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार के पूर्व तक ही समस्त व्यवहार की सत्ता है, आत्मतत्त्वसाक्षात्कार होनेपर
सब व्यवहार समाप्त (अभाव) हो जाते हैं। अर्थात् जाग्रदवस्था में देहादि में मिथ्या आत्माभिमान रहता है, उस
समय प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण माना जाता है, इसलिये इस अविद्यावस्था में व्यवहार चलते रहते हैं, व्यवहारलोप
का प्रसंग नहीं आता। एवंच यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आत्मज्ञान के पूर्व तक ही लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहार
और उनके लिये प्रमाणों की आवश्यकता होती है, आत्मज्ञान होनेपर 'एक चिन्मात्र आत्मा' के सिवाय कुछ नहीं ॥५॥
व्योमवत्सर्वभूतस्थो भूतदोषैर्विवर्जितः ।
साक्षी चेताऽगुणः शुद्धो ब्रह्मैवास्मि* स केवलः ॥६॥
व्योमवदिति—मैं आकाश के समान सम्पूर्ण प्राणिवर्गों में स्थित हूँ, तथापि उनके दोषों से रहित हूँ, सबका
साक्षी१, चिद्रूप, निर्गुण, शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म ही हूँ ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस श्लोक के द्वारा उसके अव्यवहार्य स्वरूप को बता रहे हैं—विद्यावस्था (आत्मज्ञान की अवस्था)
में व्यवहार का अभाव तो अभीष्ट ही है। आत्मा 'चेता' है अर्थात् अपने प्रकाश के द्वारा (आत्मा स्वप्रकाश यानी
प्रकाशरूप है) अज्ञान और उसके कार्यों का प्रकाशक (अवभासक) है, इस कारण उसे चेता (चिद्रूप) कहा जाता है।
प्राणियों में स्थित रहनेपर भी उनके दोषों से वह संस्पृष्ट नहीं होता, क्योंकि वह केवल साक्षी होकर स्थित रहता है।
'व्योमवत् सर्वभूतस्थः' आकाश के समान समस्त प्राणियों में स्थित है, यह कहने से उसका 'असंगत्व' ज्ञात होता है।
आकाश सर्वत्र रहते हुए भी जैसे असंग, उसी तरह आत्मा भी असंग है। आत्मा को सर्वभूतस्थ कहने का तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण प्राणियों (भूतों) में 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति की अभिव्यक्ति, उसके बिना रहे नहीं हो सकती२। अज्ञानरहित
होने से उसे 'शुद्ध' कहते हैं। 'केवल' कहने से वह तीनों अवस्थाओं से रहित है। एवंच मैं ब्रह्म (पूर्ण) ही हूँ ॥ ६ ॥
नामरूपक्रियाभ्योऽन्यो नित्यमुक्तस्वरूपवान् ।
अहमात्मा परं ब्रह्म चिन्मात्रोऽहं सदाऽद्वयः ॥७॥
नामेति—मैं नाम, रूप और क्रिया से अन्य (भिन्न) और नित्यमुक्तस्वरूप हूँ, तथा मैं आत्मा ही नित्य
[ सदा ] अद्वितीय [ अद्वय ] चिन्मात्र परब्रह्म हूँ ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस श्लोक के द्वारा आत्मा के 'केवलत्व' को बताया गया है। अर्थात् वाच्य-वाचक और तद्व्यापारात्मक
प्रपञ्च से शून्य (रहित) आत्मा है ॥ ७ ॥
अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः ।
ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः ॥८॥
अहमिति—'मैं ब्रह्म हूँ तथा कर्ता भोक्ता भी हूँ' ऐसा जो लोग मानते हैं, वे ज्ञान और कर्म दोनों से ही
भ्रष्ट [ पतित ] हैं, और वे नास्तिक ही हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी के भेदाभेदमत के अनुसार यह शंका हो रही है कि आत्मा की अद्वयता
(अद्वयत्व) कैसे संगत हो सकती है ? क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' के समान 'अहं कर्ताऽस्मि' यह अनुभव भी प्रामाणिक रूप
से होता है।
१. श्वे. उ. ६।११
२. 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च'—(बृ. उ. १।४।१०) इसका तात्पर्य सर्वात्मत्वाभिनय में है।
- स्मीति के०—पाठान्तरम् ।
५२ उपदेशसाहस्री
समा०—शास्त्र कभी विरुद्धार्थ का प्रतिपादन नहीं करता । शास्त्र के अर्थ को जो विरुद्ध समझते हैं, वे
वस्तुतः कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड से बहिर्मुख ही हैं, इसलिए उन्हें नास्तिक ही समझना चाहिए । वे सभी पुरुषार्थों
के अयोग्य हैं ॥ ८ ॥
धर्माधर्मफलैर्योग इष्टोऽदृष्टो यथाऽऽत्मनः ।
शास्त्राद्ब्रह्मत्वमप्यस्य मोक्षो ज्ञानात्तथेष्यताम् ॥९॥
धर्मेति—किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध न होनेपर भी मीमांसा शास्त्र के आधार पर ही आत्मा का धर्माधर्म-
रूप फलों [ पुण्य-पाप रूप फलों ] से सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है, वैसे ही शास्त्र-प्रमाण [ वेदान्त शास्त्र के आधार
पर ] से आत्मा का ब्रह्मत्व और ज्ञान से उसका मोक्ष भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—दूसरों को नास्तिक कह देने मात्र से अद्वैत का सिद्धांत स्थिर नहीं किया जा सकता । अद्वैत की
सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है, अतः ‘ब्रह्मैवास्मि’ यह ज्ञान नहीं हो सकता । अद्वैत को सिद्ध करने के लिए जो तादात्म्य-
श्रुतियाँ उपस्थित की जाती हैं, वे सब अन्यपरक होने से उपपन्न हो जाती हैं ।
समा०—शास्त्र के तत्त्वार्थ को जाननेवाले विद्वान् किन्हीं अन्यान्य प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों) से
सिद्ध (प्रमित) न होते हुए भी जैसे केवल एकमात्र शास्त्रप्रमाण¹ के आधार पर ही आत्मा का सुख-दुःखादिरूप धर्मा-
धर्मफलों के साथ सम्बन्ध मान लेते हैं, उसी तरह वे विद्वान् वेदान्तशास्त्र² के आधार पर आत्मा में ब्रह्मत्व (आत्मा को
ब्रह्म) और उसका ज्ञान से ही मोक्ष स्वीकार कर लें । क्योंकि शास्त्रत्वेन दोनों समान रूप से प्रमाण हैं । एवं च भेद और
कर्म दोनों निन्दित होने से उन दोनों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । अतः शास्त्र का अनुसरण करनेवाले विद्वान्
यथाशास्त्र ही अर्थ समझने का प्रयास करें । अतः ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से आत्मा को ब्रह्म, अर्थात् आत्मा में ब्रह्मत्व के
ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति, उससे ब्रह्मरूप में ही उसकी स्थिति और मोक्ष (कैवल्य) समझना चाहिये ॥ ९ ॥
या माहार्जनाद्यास्ता वासनाः स्वप्नदर्शिभिः ।
अनुभूयन्त एवेह ततोऽन्यः केवलो दृशिः ॥१०॥
या इति—हरिद्रा [ हल्दी ] से रंगे हुए वस्त्रादि के समान जाग्रत् दशा की वासनाएँ होती हैं, उन्हीं का
स्वप्न देखने वाले पुरुष उनका अनुभव करते रहते हैं, वास्तव में उनकी सत्ता नहीं रहती । उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में
भी शुद्ध साक्षीमात्र आत्मा उस विषयदर्शी जीव से सर्वदा भिन्न रहता है ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
समुच्चयवादी कह सकता है कि हमारे शास्त्र ने आत्मा के साथ जो धर्माधर्म का सम्बन्ध माना है, वह
किसी प्रमाणान्तर से विरुद्ध न होने के कारण उचित ही है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व आदि उसके प्रत्यक्ष
प्रतीत होनेवाले कर्तृत्व-भोक्तृत्व से विरुद्ध हैं, इस कारण वेदान्तियों का कहना ठीक नहीं है । अतः शास्त्र और अनुभव
का समन्वय (अविरोध) करने के लिये हमें भेदाभेदवाद का स्वीकार कर लेना चाहिये । किन्तु उसका यह कथन ठीक
नहीं है, क्योंकि आत्मा में कर्तृत्व आदि का जो प्रतिभास होता है, वह वास्तविक न होकर केवल अध्यास मात्र है ।
अतः श्रुत्युक्त अद्वैत का प्रतिपक्षी कोई न होने से निर्विरोध अद्वैत सिद्ध हो जाता है । स्वप्नावस्था में लिङ्ग के
आश्रित रहनेवाली³ श्रुतिसिद्ध वासनाएँ ही स्वप्नदर्शियों के द्वारा देखी जाती हैं । महारजन (हरिद्रा) से
रञ्जित वस्त्रादि को ‘माहारजन’ कहते हैं । स्वप्नावस्था में वात-पित्त-श्लेष्म से दूषित हुए रस से परिपूर्ण
हुईं नाड़ियों में अनुगत (प्रविष्ट) हुए जाग्रद्वासनावासित मन की अनेक वासनाएँ अदृष्टादि के द्वारा उद्बुद्ध
(जागरित) होती हैं, उस कारण जाग्रत् अवस्था में दृष्ट अर्थ (पदार्थ) के आकार में परिणत हुआ वह
१. ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन’— (बृ. उ. ३।२।१३)
२. ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’—( मुं. उ. ३।२।९ ), ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’—( श्वे. उ. ३।८, ६।१५)
३. ‘तस्यहैतस्य पुरुषस्य रूपं । यथा माहारजनं वासः’ इत्यारभ्य ‘यथाऽसकृद्विद्युत्तम्’ इत्यन्तेन श्रुत्युक्ता वासनाः । (बृ. उ. २।३।६)
ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५३
मन हरिद्रारञ्जित पटादि के रूप के समान भासित होने लगता है और स्वप्नद्रष्टा के द्वारा उसकी उपलब्धि द्रष्टा,
दृश्य, दर्शन एवं तत्करणादि के रूप में नित्य हुआ करती है। अतः स्वप्न में दिखाई पड़नेवाली माहारजन (पीतवस्त्र)
आदि के समान लिङ्गात्मा (मन-बुद्धि) के सहित वासनाओं की अपेक्षा दृशिस्वरूप द्रष्टा आत्मा विलक्षण ही प्रतीत
होता है। उसी तरह जाग्रत् अवस्था में कर्तृत्ववादि भी दृश्य होने के कारण अनात्मधर्म ही हैं, यह निश्चित होता है। अतः
कर्तृत्वादि धर्मवाले लिङ्ग (मन-बुद्धि) से दृशिस्वरूप केवल शुद्ध आत्मा कोई अन्य ही है ॥ १० ॥
कोशादिव विनिष्कृष्टः कार्यकारणवर्जितः ।
यथाऽसिर्दृश्यते स्वप्ने तद्वद्बोद्धा स्वयंप्रभः ॥११॥
कोशादिति—जिस प्रकार कोश से निकाला खड्ग् उस कोश से पृथक् [ भिन्न ] दिखलाई देता है, उसी प्रकार
स्वप्नावस्था में स्वयंप्रकाश बोद्धा भी कार्य-कारणाकार मन से पृथक् ही रहता है ॥ ११ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की स्वप्नावस्था में दृश्य की अपेक्षा विलक्षण (पृथक्) प्रतीति होती है। जैसे खड्ग (असि) कोश
(म्यान) से अलग करने पर (निकालनेपर) अपने स्वरूप में दिखाई देता है, उसी तरह कार्य-कारणवर्जित अर्थात् कार्य-
कारणाकार लिङ्गात्मक मन से पृथक् बोद्धा आत्मा स्वप्न में यथावत् दिखाई देता है। 'दृश्यते' दिखाई देता है—कहने
से उसे (आत्मा को) दृश्य विषयों के समान मिथ्या नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह स्वयंप्रभ है। वह अपनी महिमा
से ही प्रकाशित रहता है, विषय की तरह प्रकाशित किया नहीं जाता। अथवा¹ श्रुति के द्वारा निर्णीत होने से कार्य-
कारणवर्जित आत्मा का स्वप्न में ज्ञान होता है। एवं च कोशनिष्कृष्ट असि की तरह आत्मा भी स्वप्नसंस्काराश्रय सूक्ष्म
देह से विलक्षण दिखाई देता है। उपाधि से पृथक् अपने स्वरूप में ही उसका अवभास होता है, इसी अभिप्राय को
प्रदर्शित करने में 'असि' का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ११ ॥
आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ज्ञस्य स्वाभाविकं पदम् ।
उक्तं नेत्यादिवाक्येन कल्पितस्यापनेतृणा ॥१२॥
आपेषादिति—कल्पित प्रपञ्च का बाध करने वाले 'नेति नेति' आदि वाक्य ने हाथ दबाने से जगे हुए चेतन
आत्मा का स्वाभाविक रूप बताया है ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका— आत्मा को जो स्वयंप्रकाश कहा गया है, वह कैसे संभव हो सकता है, क्योंकि वह तो ब्रह्म से
विलक्षण (भिन्न) है।
समा०— श्रुतिविरोध होने के कारण ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। आत्मा में कर्तृत्वादि की जो प्रतीति
होती है, वह स्वप्नप्रतीति की तरह मिथ्या होने से आत्मा शुद्ध ही है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह शास्त्र बता रहा है, अतः
निर्विरोध यह जाना जा सकता है। एवं च भेदाऽभेद की कल्पना कर अपने मन को कलुषित करना उचित नहीं है।
²श्रुति कहती है कि प्राण के अनेक नाम पुकारने पर भी वह आत्मा प्रबुद्ध नहीं हो पाया किन्तु हाथ से दबाते ही वह
जाग उठा, इससे स्पष्ट होता है कि प्राण-इन्द्रियस्वरूप लिङ्गसमुदाय से विलक्षण (भिन्न) और स्थूल संघात (समुदाय)
से भी विलक्षण (भिन्न) ही आत्मा है। अतएव अर्थात् समस्त जड़ पदार्थों से विलक्षण होने के कारण ही वह (आत्मा)
ज्ञानस्वभाव (स्वरूप) है। पाणि (कर—हाथ) स्पर्श से प्रतिबुद्ध हुए त्वंपदार्थ 'ज्ञ' का परब्रह्मरूप स्वाभाविक पद, कल्पित
(अध्यस्त) मूर्त-अमूर्त-तद्वासनाश्रयरूप के निषेधक 'नेति' वाक्य से³ कहा गया है। 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) के
द्वारा यह बताया गया है कि समस्त कारण-कार्यात्मक उपाधि का प्रतिषेध कर 'अखण्ड ब्रह्म' में 'नेति' वाक्य का तात्पर्य
है। एवं च श्रुतिविरोध होने से आत्मा को ब्रह्म से विलक्षण समझना ठीक नहीं है ॥ १२ ॥
१. 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ )
२. 'तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ' इत्यारभ्य 'स होत्तस्थौ' 'बृहत्पाण्डरवासः सोम राजन्'……( बृ. उ. २।१।१५ )
३. 'अथात आदेशो नेति नेति' इत्यारभ्य 'सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्'—इत्यन्तेन वाक्येन ।—(बृ. उ. २।३।६)