सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम्
दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम् ।
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्त ॐ* ॥१॥
दृशीति—जो दृशिस्वरूप ( चेतनस्वरूप ); आकाश जैसा व्यापक है, इन्द्रियादि से परे है, नित्य प्रकाशमान
है, अजन्मा है, एक है, अविनाशी है, असंग है, सर्वगत और अद्वितीय है—वही 'मैं' हूँ । अतः सदा मुक्त हूँ, ॐ ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व प्रकरण में आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता को युक्ति से सिद्ध किया था, अब इस प्रकरण में उसी को
अनुभव के द्वारा प्रकट करते हुए अविषय प्रत्यगात्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) निर्विषय ही होता है, यह बताया जा रहा
है । एक बार में ही स्फुरित होनेवाला अर्थात् स्पष्टरूप से भासमान जो अक्षर ब्रह्म है, वही 'मैं' सदा से हूँ, अतः मैं
विमुक्त हूँ । गुरु के द्वारा शिष्य को बताया हुआ जो आत्मस्वरूप है, उसे 'मुमुक्षु शिष्य ने अच्छी तरह समझ लिया है'
यह ॐ कार के द्वारा सूचित किया है। एवंच 'ॐ' शब्द स्वीकृति का सूचक है । अथवा आत्मा का उक्त स्वरूप ॐ
कार द्वारा मुमुक्षुओं की बुद्धि में अभिव्यक्त होता है—यह बताने के लिए ॐ का निर्देश किया है ॥ १ ॥
दृशिस्तु शुद्धोऽहमविक्रियात्मको न मेऽस्ति कश्चिद्विषयः स्वभावतः ।
पुरस्तिरश्चोर्ध्वमधश्च सर्वतः +सम्पूर्णभूमा त्वज आत्मनि स्थितः ॥२॥
दृशिस्त्विति—मैं तो ज्ञानस्वरूप ( दृशिः) हूँ, अतएव शुद्ध हूँ, निर्विकार हूँ, वस्तुतः मेरा कोई विषय नहीं
है। मैं आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सभी ओर परिपूर्ण व्यापक रूप हूँ । मैं अजन्मा हूँ, और अपने स्वरूप में ही स्थित हूँ ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'दृशि' (ज्ञानस्वरूप चेतन) को आकाश के समान अलेपक कहा गया था, किन्तु वह संगत नहीं प्रतीत हो
रहा है, क्योंकि दृशि का दृश्य के साथ सम्बन्ध रहने से उसमें अशुद्धि और विक्रिया (विकार) होना निश्चित है। किन्तु
इस आशंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा किया जा रहा है कि 'दृशि' तो आत्मस्वरूप है, उसके नित्य शुद्धत्व आदि
का निश्चय श्रुति ने ही कर दिया है । भगवती श्रुति ने क्या बताया है, उसे बताते हैं—मैं तो दृशि अर्थात् ज्ञानस्वरूप हूँ,
अतः वस्तुतः (परमार्थतः) शुद्ध हूँ, क्योंकि अशुद्धि तो अज्ञान से होती है अर्थात् वह तो अज्ञाननिबन्धन है, और अज्ञान,
आभासरूप है यह हमें' मन्त्रवर्ण से ज्ञात होता है। दूसरा कारण यह है कि वह (आत्मा) विक्रियात्मक (विकाररूप)
प्राणादिकों से अन्य (अतिरिक्त) है, अर्थात् अविक्रियात्मक है । इसी अभिप्राय को श्रुति ने भी कहा है२ । अतः इसकी
(आत्मा की) शुद्धता में कोई किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। परमार्थतः (स्वभावतः) आत्मा के साथ विषय का भी
सम्बन्ध (विषयसंसर्ग) नहीं है, इस कथन से यह ज्ञात होता है कि विकार के हेतुभूत विषयों के न होने से भी वह
(आत्मा) अविक्रिय (विकाररहित) है। श्रुति३ ने भी इसी अभिप्राय का समर्थन किया है। विषय के न होने से उस
आत्मा की अद्वयरूपता को छान्दोग्य के भूमवाक्यांश में इस प्रकार कहा है४—आत्मा का स्वरूपावस्थान किसी के
अधीन नहीं है अर्थात् स्वतंत्र है, ऐसा उपन्यास (आरंभ) करके उसी के उपपादनार्थ यह बताया कि पूर्वादि विभाग

  • शिवगीता—१।७ से तुलना की जा सकती है ।
    † सुपर्ण०—पाठः मुक्ति० उप० (२।७४)
    १. 'शुद्धमपापविद्धम्'—( ई. उ. ८ )
    २. 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः'—( मुं. उ. २।१।२ ), तथा 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्'—( बृ. उ. ३।८।८ )
    ३. 'न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन'—( छां उ. ७।२४।१ )
    ४. 'स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नि ।'—( छां. उ. ७।२५।२ )
    ६