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सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 364 में से

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पृष्ठ 64

३८ उपदेशसाहस्री
तथापि उनके दोषों का मुझे स्पर्श तक नहीं है, क्योंकि मैं ईश्वर हूँ। मूल में (सर्वभूतस्थमीश्वरम्) 'ईश्वर' शब्द का
विशेषण के रूप में प्रयोग किया है, इस विशेषण को हेत्वर्थक समझना चाहिए। अर्थात् यह (आत्मा) सबका ईशिता
(कारण) है, एवंच कार्य के धर्मों से कारण हमेशा अस्पृष्ट रहता है ॥ ५ ॥
मच्चैतन्यावभास्यत्वात्सर्वप्राणिधियां सदा।
वपुर्मम प्राणिनः सर्वे सर्वज्ञस्य विपाप्मनः ॥६॥
मच्चैतन्येति—समस्त प्राणियों की बुद्धियाँ मेरे चैतन्य भाव (चित्स्वरूप) से ही प्रकाशित होती हैं। अतः
सम्पूर्ण प्राणी मुझ पापरहित सर्वज्ञ के ही शरीर हैं ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह जो कहा गया था कि ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक समस्त प्राणी एक आत्मा के ही शरीर हैं; परन्तु
आत्मा, जबकि समस्त दोषों से रहित है, तो उसे पुण्य-पापरहित कहना होगा, अर्थात् वह (आत्मा) तो सर्वावभासक
(सर्वज्ञ) है, अतएव वह दृश्य-दोषसंसर्गरहित (विपाप्मा) भी है। उस स्थिति में सब प्राणियों को उस आत्मा का
शरीर कैसे समझा जाय ?
उक्त शङ्का का समाधान श्रुति ने कर दिया है कि सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों का अन्तःसाक्षी होकर
प्रकाशमान जो चैतन्य (ज्योति) है, वही सम्पूर्ण प्राणियों की 'आत्मा' है१। उस (आत्मा) का निरूपण अनेक बुद्धियों
और उसमें स्थित आभासों के बिना हो नहीं सकता, क्योंकि आत्मा का स्वरूपतः भेद कहीं नहीं कहा गया है। जैसे
जलपात्र और तद्गत आभास के बिना सूर्य का निरूपण नहीं किया जा सकता। इससे यह निश्चित होता है कि ये संपूर्ण
भूत एक ही आत्मा के शरीर हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी उक्त अभिप्राय का समर्थन किया है२ ॥ ६ ॥
जनिमज्ज्ञानविज्ञेयं स्वप्नज्ञानवदिष्यते ।
नित्यं निर्विषयं ज्ञानं तस्माद्वैतं न विद्यते ॥७॥
जनिमदिति—जो वस्तु उत्पन्न होती है और ज्ञान का विषय बनती है, उसे स्वप्नज्ञान के तुल्य मिथ्या
जानना चाहिये, क्योंकि वास्तविक (पारमार्थिक) ज्ञान तो नित्य और निर्विषय होता है। अतः द्वैत नहीं है ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मचैतन्य से प्रकाशित होनेवाले प्राणी तथा उनकी बुद्धियों की सत्ता रहने के कारण 'आत्मा' का
अद्वितीयत्व (अद्वैत) कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् भास्य और भासक का भेद स्पष्ट प्रतीत होने से अद्वैत की सिद्धि नहीं
हो सकती। जो उत्पत्तिमान् और जो ज्ञान से जाना जाता है अर्थात् ज्ञान से विज्ञेय होता है, अर्थात् जो कार्य हो और
जड़ हो, वह मिथ्या होता है, जैसे स्वप्नज्ञान। वैसे ही जाग्रत वस्तु भी कार्य है और दृश्य भी है, इसलिए वह मिथ्या है।
क्योंकि द्वैत की वस्तुतः सत्ता नहीं है। जबकि द्वैत की वास्तविक सत्ता ही नहीं है, तब किसी ज्ञेय के न रहने से ज्ञान
ही नित्य है और सदा निर्विषय है अर्थात् वह (ज्ञान) विषय से निरूप्य नहीं होता। अध्यारोपित द्वैत से पारमार्थिक
अद्वैत का बाध नहीं होता है, जैसे आरोपित जल आदि से उसकी आधारभूत भूमि को सद्वितीय नहीं कहा
जाता ॥ ७ ॥
ज्ञातुर्ज्ञप्तिर्हि नित्योक्ता सुषुप्ते त्वन्यशून्यतः ।
जाग्रज्ज्ञप्तिस्त्वविद्यातस्तद्ग्राह्यं चासदिष्यताम् ॥८॥
ज्ञातुरिति—ज्ञाता (द्रष्टा आत्मा) का ज्ञान (दृष्टि) तो नित्य बताया गया है। क्योंकि सुषुप्ति में द्रष्टा (ज्ञाता)
से भिन्न दृश्य (ज्ञेय) का अभाव रहता है, किन्तु उस समय भी ज्ञाता (द्रष्टा) का अभाव नहीं होता। जाग्रत् अवस्था
का विषयविशिष्ट ज्ञान तो अविद्या के कारण है। अतः उसके विषयभूत पदार्थों को असत् समझो ॥ ८ ॥
१. 'योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'—(बृ. उ. ४।३।७)
२. 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः'—(बृ. उ. ३।७।१५)