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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
शृणु राम प्रवक्ष्यामि निदानं श्रेयसः परम् ।
सद्भिः सङ्गः परं मूलं सर्वदुःखनिवर्हणम् ॥ ७ ॥
परमार्थफलप्राप्तौ बीजं सत्सङ्ग उच्यते ।
त्वं चापि तेन हि सता संवर्त्तेन महात्मना ॥ ८ ॥
सङ्गतः सन्निमां प्राप्तो दशां श्रेयःफलोदयाम् ।
सन्त एव हि संयाता दिशन्ति परमं सुखम् ॥ ९ ॥
विना सत्सङ्गतः केन प्राप्तं श्रेयः परं कदा ।
लोकेऽपि यादृशं सङ्गं यो यः प्राप्नोति मानवः ॥ १० ॥
तत्फलं स समाप्नोति सर्वथा न हि संशयः ।
अत्रेति कीर्त्तयिष्यामि शृणु राम कथामिमाम् ॥ ११ ॥
पुरा दशार्णाधिपतिर्मुक्ताचूड इतीरितः ।
तस्य पुत्रौ हेमचूडमणिचूडौ बभूवतुः ॥ १२ ॥
पद-पदपर ठुकराये जा रहे हैं, उन्हें इस साधनकी प्राप्ति क्यों नहीं
हुई ? कृपा करके यह मुझे बताइये ।” इस प्रकार पूछे जानेपर
दयानिधि दत्तात्रेयजी बड़े प्रसन्न हुए और पुनः कहने लगे ॥ ५-६ ॥
“परशुराम ! सुनो, मैं तुम्हें कल्याणका जो मूल कारण है वह
बताता हूँ । सत्पुरुषोंका संग ही इसका सबसे प्रधान कारण है, वही
सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति करनेवाला है ॥ ७ ॥
परमार्थरूप फलकी प्राप्तिमें सत्संग बीज कहा जाता है । तुमको
भी उन सन्तशिरोमणि महात्मा संवर्त्तका संग होनेपर ही यह श्रेयरूप
फलको प्राप्त करानेवाली दशा प्राप्त हुई । सन्तजन ही समागम होनेपर
परम सुख प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥
बिना सत्संगके भला कब किसीको परमश्रेयकी प्राप्ति हुई है ?
इसमें सन्देह नहीं कि लोकमें भी जिस-जिसका जैसा-जैसा संग प्राप्त
होता है उसे ठीक वैसा ही फल मिल जाता है । परशुराम ! सुनो,
इस प्रसंगमें मैं तुम्हें यह कथा सुनाता हूँ ॥ १०-११ ॥
प्राचीन समयमें मुक्तापीड नामसे प्रसिद्ध एक दशार्ण देशका राजा
था । उसके हेमचूड और मणिचूड नामके दो पुत्र थे ॥ १२ ॥

तृतीयोऽध्यायः । २६
सुरूपौ सुगुणौ चोभौ सर्वविद्याविशारदौ ।
कदाचिन्मृगयोत्साहात् सेनाभिः परिवारितौ ॥ १३ ॥
सह्याचलवनं भीमं सिंहव्याघ्रादिसङ्कुलम् ।
महाबलौ विविशतुर्धनुर्बाणधरौ किल ॥ १४ ॥
अथ तत्र मृगान् सिंहान् वराहान् महिषान् वृकान् ।
जघ्नतुर्निशितैर्बाणैर्लाघवात् कार्मुकच्युतैः ॥ १५ ॥
एवं विनिघ्नतोर्वन्थान् मृगान् राजकुमारयोः ।
चण्डवायुः प्रादुरासीच्छर्कराश्मप्रवर्षणः ॥ १६ ॥
पांशुभिर्नभ आक्रान्तमभूद्दर्शनिशोपमम् ।
न दृश्यते तत्र शिला वृक्षः पुरुष एव वा ॥ १७ ॥
कुतो नीचोच्चतां पश्येदेवं ध्वान्तावृत्तो गिरिः ।
निहता शर्करावर्षैः सेनात्यन्तं पलायिता ॥ १८ ॥
दोनों ही बड़े रूपवान्, गुणवान् और सब प्रकारकी विद्याओंमें
कुशल थे। कहते हैं, किसी समय आखेटकी इच्छा होनेपर ये महाबली
राजकुमार धनुष-बाण धारणकर बहुत-सी सेना साथ ले सह्यपर्वतके
भयङ्कर वनमें घुस गये, जो सिंह और व्याघ्रादि जन्तुओंसे भरा
हुआ था ॥ १३-१४ ॥
वहां उन्होंने अपने धनुषोंसे छूटे हुए तीखे बाणों द्वारा बड़ी
फुर्तीसे अनेकों हरिण, सिंह, सूअर, भैंसे और भेड़ियोंका वध कर
दिया ॥ १५ ॥
इस प्रकार जब वे राजकुमार अनेकों जंगली जीवोंका शिकारकर
रहे थे वहाँ बड़ी प्रचण्ड आँधी उठी। उससे रेती और कंकर-पत्थरोंकी
वर्षा होने लगी ॥ १६ ॥
सारा आकाश धूलिसे भर गया। इससे अमावास्याकी रात्रिका-
सा अन्धकार छा गया। फिर वहां शिला, वृक्ष, मनुष्य कुछ भी दिखाई
देना बन्द हो गया ॥ १७ ॥
उस पहाड़पर ऐसा अँधेरा छाया कि कहाँ नीचा है कहाँ ऊँचा है
यह भी दिखायी नहीं देता था। बालूकी वर्षासे पीड़ित होकर सेना भी
तितर-बितर होकर भाग गयी ॥ १८ ॥

३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
वृक्षान् केचिच्छिलाः केचिद् गुहाः केचिदुपासदुः ।
अश्वारूढौ राजपुत्रावपि दूरं पलायितौ ॥ १९ ॥
हेमचूडः क्वचित्तत्र प्रपेदे तापसाश्रमम् ।
कदलीखर्जूरवनैराक्रान्तमतिसुन्दरम् ॥ २० ॥
तत्रापश्यच्छुभां काञ्चित् कन्यामग्निशिखामिव ।
प्रद्योतमानां वपुषा तप्तहेमसुवर्चसाम् ॥ २१ ॥
तां दृष्ट्वा राजपुत्रोऽपि पद्मामिव सुरूपिणीम् ।
स्मयमान इवाऽपृच्छत् का त्वं पद्मानने वने ॥ २२ ॥
निर्जने भीतिजनने निर्भये वशमास्थिता ।
कस्य त्वमपि केनात्र निवस्येकला कथम् ॥ २३ ॥
पृष्टैव प्राह सा कन्या राजपुत्रमनिन्दिता ।
स्वागतन्ते राजपुत्र विष्टरं प्रतिपद्यताम् ॥ २४ ॥


सैनिकोंमेंसे किन्हींने वृक्षोंका, किन्हींने शिलाओंका और किन्हींने
गुफाओंका आश्रय लिया। दोनों राजकुमार भी घोड़ोंपर चढ़े हुए दूर
निकल गये ॥ १६ ॥
उनमेंसे हेमचूड किसी तपस्वियोंके आश्रममें पहुँच गया। वह
बड़ा ही रमणीक था और उसमें केले तथा खजूरके वृक्ष
लगे थे ॥ २० ॥
वहाँ उसने अग्निकी ज्वालाके समान तेजस्विनी एक सुन्दरी
कन्या देखी । उसका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान बड़ा
कान्तिमान् था ॥ २१ ॥
साक्षात् लक्ष्मीके समान रूपवती उस कन्याको देखकर राजपुत्रने
कुछ मुसकाते हुए पूछा, “कमलानने ! तुम कौन हो ? निर्भये ! इस
भयङ्कर निर्जन वनमें तुम विवश होकर किसलिये निवास कर रही हो ?
तुम किसकी पुत्री हो ? यहाँ किसके साथ रहती हो ? इस समय
अकेली क्यों हो ?” ॥ २२-२३ ॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उस निर्दोष बालाने राजपुत्रसे कहा,
“राजपुत्र ! आप, भले आये । आइये, आसनपर विराजिये ॥ २४ ॥

तृतीयाेऽध्यायः । ३१
तपस्विनामयं धर्मः पूजनं ह्यतिथेस्तु यत् ।
श्रान्तं त्वामभिपश्यामि व्यथितं चण्डवायुना ॥ २५ ॥
बद्ध्वा खर्जूरवृक्षेऽश्वमत्रासीनो गतश्रमः ।
मद्वृत्तमर्हसि श्रोतुमित्युक्तः स तथाकरोत् ॥ २६ ॥
फलानि भोजयामास पाययामास सद्रसम् ।
एवं तं विश्रमं प्राप्तं राजपुत्रमनिन्दिता ॥ २७ ॥
प्राह सा मधुसंस्रावपेशलाकारया गिरा ।
राजपुत्र व्याघ्रपादो मुनिः शिवपदाश्रयः ॥ २८ ॥
येन लोकाः पुण्यतमा जिताः स्वतपसो बलात् ।
परावरज्ञो ह्यनिशं पूजितो मुनिनायकैः ॥ २९ ॥
तस्याहं धर्मतः पुत्री हेमलेखेति विश्रुता ।
विद्युत्प्रभाख्या विद्याध्री सा सर्वाङ्गमनोहरा ॥ ३० ॥
इमां वेणामनुनदीं स्नातुमभ्याययौ क्वचित् ।
तदा तत्राजगामार्थान् सुषेणो वङ्गभूपतिः ॥ ३१ ॥
अतिथियाेंका सत्कार करना तो तपस्वियाेंका धर्म ही है । आप
मुझे बहुत थके हुए और प्रचण्ड पवनसे व्यथित जान पड़ते हैं ॥२५॥
घोड़ेको खजूरके पेड़से बाँधकर यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम
कीजिये । फिर आप मेरा सब वृत्तान्त सुन लेंगे ।” कन्याके इस प्रकार
कहनेपर हेमचूडने वैसा ही किया ॥ २६ ॥
उस बालाने उसे कुछ फल खिलाये और सुस्वादु जल पीनेके लिये
दिया । फिर उसे श्रमहीन देखकर वह मधु-सा बरसानेवाले मीठे
शब्दाेंमें कहने लगी, “राजपुत्र ! व्याघ्रपाद नामके एक मुनि थे ।
वे भगवान् शिवके चरणाश्रित थे ॥ २७–२८ ॥
अपने तपके प्रभावसे उन्होंने स्वर्गादि पुण्यलोकाेंका अधिकार
प्राप्त कर लिया था । वे ब्रह्मज्ञानसम्पन्न थे और बड़े-बड़े मुनिजन
रात-दिन उनकी सेवामें रहते थे ॥ २६ ॥
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और हेमलेखा नामसे प्रसिद्ध हूँ । एकबार
सर्वाङ्गसुन्दरी विद्युत्प्रभा नामकी विद्याधरी इस वेणा नदीमें स्नान करनेके
लिये आयी । संयोगवश उसी समय वहाँ वंगदेशके राजा सुषेण
भी आये ॥ ३०–३१ ॥

३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
स ददर्श विगाहन्तीं नदीं तां लोकसुन्दरीम् ।
क्लिन्नांशुकान्तरात्यन्तव्यक्तपीनकुचद्वयीम् ॥ ३२ ॥
कामवाणहतस्तत्र तां प्रार्थयदथापि सा ।
सौन्दर्यमोहिता तस्य तदुक्तिं सममंसत ॥ ३३ ॥
सङ्गम्याथ तया राजा ययौ स्वनगरं प्रति ।
दधार सापि विद्याधरी गर्भं राजर्षिवीर्यतः ॥ ३४ ॥
भीतापचारात् पत्युः सा गर्भं त्यक्त्वात्र संययौ ।
अमोघवीर्याद्राजर्षेर्जाताहं कन्यका ततः ॥ ३५ ॥
मां ददर्श व्याघ्रपादः सन्ध्योपास्त्यर्थमागतः ।
दयया मामुपादायापालयज्जननी यथा ॥ ३६ ॥
धर्मेण यः पालयिता प्रोच्यते हि पितैव सः ।
अहन्तस्य धर्मपुत्री पितृसेवापरायणा ॥ ३७ ॥
उन्होंने उस त्रिलोकसुन्दरी विद्याधरीको नदीमें स्नान करते देखा।
उसके जलमें भीगे झीने वस्त्रोंमेंसे दोनों पीन पयोधर दिखाई
दे रहे थे ॥ ३२ ॥
इससे राजा सुषेण कामबाणसे बिंधगये और उस विद्याधरीसे
उन्होंने प्रार्थना भी कर दी। राजाके सौन्दर्यसे मोहित होकर उसने
उनकी बात मान ली ॥ ३३ ॥
उसके साथ समागम करके राजा अपने नगरको चले गये। उस
विद्याधरीको राजाके वीर्यसे गर्भ रह गया ॥ ३४ ॥
किन्तु इस व्यभिचारके कारण पतिके डरसे वह गर्भको वहीं
छोड़कर चली गयी। तब राजाके उस अमोघ वीर्यसे मैं कन्या
उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥
जब सन्ध्योपासनके लिये वहाँ व्याघ्रपाद मुनि आये तो उन्होंने
मुझे देखा। वे दयावश मुझे उठा लाये और माताके समान मेरा
पालन करने लगे ॥ ३६ ॥
जो धर्मपूर्वक पालन करता है वह पिता ही कहा जाता है। अतः
मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और पिताजीकी सेवा करती रहती हूँ ॥ ३७ ॥

तृतीयोऽध्यायः । ३३
तस्य माहात्म्यतो मेऽत्र भयं नास्त्येव कुत्रचित् ।
नायं सुरासुरैर्वापि कदाचिद् दुष्टबुद्धिभिः ॥ ३८ ॥
प्रवेष्टुमाश्रमोऽर्हः स्यात् प्रविशन्नाशमाप्नुयात् ।
एतन्मेऽभिहितं वृत्तं तिष्ठ किञ्चिन्नृपात्मज ॥ ३९ ॥
आयास्यति स भगवान् पिता मे तं निशामय ।
प्रणम्य तं प्राप्य चेष्टं ततः कल्ये प्रयास्यसि ॥ ४० ॥
हेमलेखावचः श्रुत्वा तत्सौन्दर्येण मोहितः ।
भीतः किञ्चित् प्रवक्तुं तां विमना इव चाभवत् ॥ ४१ ॥
अथालक्ष्य राजपुत्रं कामस्य वशमागतम् ।
प्राह सा विदुषी भूयो राजपुत्र धृतिं भज ॥ ४२ ॥
आगच्छति पिता सद्यस्ततोऽभिलषितं भज ।
एवं वदन्त्यां तस्यां स व्याघ्रपादो महामुनिः ॥ ४३ ॥
आजगाम वनाद्यत्र पुष्पादेः कृतसञ्चयः ।
मुनिं समागतं दृष्ट्वा राजपुत्रः समुत्थितः ॥ ४४ ॥
उनके प्रभावसे मुझे यहाँ कहीं भी किसी प्रकारका भय नहीं है।
इस आश्रममें कोई देवता या असुर भी दूषित विचारसे प्रवेश नहीं
कर सकता। यदि करेगा तो नष्ट हो जायगा। यह मैंने अपना वृत्तान्त
सुनाया। राजपुत्र ! आप कुछ देर यहाँ ठहरिये ॥ ३८-३९ ॥
मेरे पिता भगवान् व्याघ्रपाद आने ही वाले हैं। उनके दर्शन करें
और उन्हें प्रणाम करके अपना मनोरथ पूरा कराकर कल प्रातःकाल
प्रस्थान करें” ॥ ४० ॥
हेमलेखाकी बात सुनकर उसके सौन्दर्यसे मोहित हो जानेके कारण
राजपुत्रने कुछ कहना चाहा, किन्तु बोलनेका साहस न होनेके कारण
वह कुछ अनमना-सा हो गया ॥ ४१ ॥
उसे कामके वशीभूत देख विदुषी हेमलेखाने उससे फिर कहा,
“राजपुत्र ! धैर्य धारण करो ॥ ४२ ॥
पिताजी शीघ्र ही आते होंगे। तब अपनी अभिलाषा पूरी कर
लेना।” उसके ऐसा कहते ही महामुनि व्याघ्रपाद वनसे पुष्पादि संग्रह
करके आ गये। उन्हें आये देखकर राजपुत्र खड़ा हो गया ॥ ४३-४४ ॥

३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्रणम्य नाम संश्राव्योपविष्टस्तेन देशितः ।
अथ दृष्ट्वा राजपुत्रं कामेन विकृताकृतिम् ॥ ४५ ॥
ज्ञात्वा योगदृशा सर्वं मत्वा युक्तञ्च तत्तदा ।
दारक्रियार्थं तस्मै तां हेमलेखां ददौ मुनिः ॥ ४६ ॥
तुष्टो राजकुमारोऽपि तामादाय पुरं ययौ ।
मुक्ताचूडोऽतिसन्तुष्टो महोत्सवविधानतः ॥ ४७ ॥
विवाहमकरोत्तस्य विधानेन क्षितीश्वरः ।
अथ राजकुमारोऽपि तया क्रीडापरः सदा ॥ ४८ ॥
सौधेषु वनराजिषु पुलिनादिषु संबभौ ।
हेमलेखां राजपुत्रो भोगेष्वनतिकामिनीम् ॥ ४९ ॥
उदासीनां सदा दृष्ट्वा पप्रच्छ रहसि कचित् ।
किं प्रिये नानुरक्तासि प्रिये मय्यनुरागिणि ॥ ५० ॥
उसने अपना नाम लेकर मुनिको प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
पाकर बैठ गया। मुनिने देखा कि कामके कारण राजपुत्रकी चेष्टा
विकृत-सी हो गयी है, तो योगबलसे उन्होंने सब हाल जान
लिया और उसे उचित ही समझा। अतः उन्होंने पत्नीरूपसे उसे
हेमलेखा दे दी ॥ ४५-४६ ॥
इससे राजकुमारको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह उसे लेकर नगरमें
लौट आया। राजा मुक्ताचूड भी बहुत सन्तुष्ट हुआ और उसने
बड़ा महोत्सव करके उनका विधिवत् विवाह संस्कार सम्पन्न कर
दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥
तब राजकुमार महलोंमें, उपवनोंमें और नदीतट आदि स्थानोंमें
उसके साथ निरन्तर विहार करने लगा ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥
किन्तु उसने देखाकि हेमलेखाको भोगोंकी विशेष कामना नहीं है
और वह सर्वदा उदासीन ही रहती है। तब एक दिन उसने एकान्तमें
उससे पूछा, "प्रिये ! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ तो भी तुम अपने प्रियतम
मुझसे प्रेम क्यों नहीं करतीं ? ॥ ४९ उ०-५० ॥

तृतीयोऽध्यायः । ३५
कुतो भोगेषु नात्यन्तमासक्तासि शुचिस्मिते ।
किं भोगास्ते मनोयोग्या न सन्त्यत्र कुतस्त्विदम् ॥ ५१ ॥
अत्युत्तमेषु भोगेषु नासक्तेव विभासि मे ।
त्वय्यासक्तिविहीनायां कथं मे सुखदा रतिः ॥ ५२ ॥
आसक्ते मयि चापि त्वं भास्यन्यगतमानसा ।
भाषितापि मया भूयो न शृणोष्येव किञ्चन ॥ ५३ ॥
आगतं कण्ठसंलग्नं चिरादपि विभाव्य च ।
कदा नाथागतं चेति पृच्छस्यविदिता यथा ॥ ५४ ॥
पेशलेषूपभोगेषु दुर्लभेष्ठु क्वचिन्न ते ।
मन आसज्जते कस्मान्न किञ्चिदनुमोदसि ॥ ५५ ॥
मया विरहितां त्वां वै निमील्य नयने स्थिताम् ।
यदा यदोपगच्छामि पश्यामि च तदा तदा ॥ ५६ ॥

तुम्हारी मुसकान बड़ी मनोहारिणी है, किन्तु भोगोंमें तुम्हारी
विशेष रुचि क्यों नहीं है। क्या यहाँ के भोग तुम्हारे मनके अनुकूल
नहीं हैं ? फिर यह उदासीनता क्यों ? ॥ ५१ ॥
अत्यन्त उत्तम भोगोंमें भी मुझे तुम अनासक्त-सी जान पड़ती हो।
यदि तुम्हारा इधर झुकाव नहीं होगा तो मुझे तुम्हारे साथ विहार
करनेसे सुख कैसे मिलेगा ॥ ५२ ॥
मेरी तो तुम्हारे प्रति आसक्ति रहती है, किन्तु ऐसा जान पड़ता है
कि तुम्हारा मन मानो कहीं अन्यत्र लगा हुआ है। मैं बार-बार बोलता
हूँ, पर तुम कुछ सुनती ही नहीं हो ॥ ५३ ॥
मैं बड़ी देरसे तुम्हारे पास आकर तुम्हें आलिंगन किये बैठा हूँ;
और तुम 'नाथ, कब आये' ऐसा प्रश्न करती हो, मानो तुम्हें कुछ पता
ही नहीं है ॥ ५४ ॥
तुम्हारे सामने बड़ी सुन्दर और दुर्लभ भोगसामग्रियाँ उपस्थित
की जाती हैं, तथापि तुम्हारा मन उनकी ओर क्यों नहीं जाता, तुम
क्यों उनमें अपनी रुचि प्रकट नहीं करती ? ॥ ५५ ॥
जब मैं पास नहीं होता तो तुम नेत्र मूँदे बैठी रहती हो। यह बात
मैं जब-जब तुम्हारे पास आता हूँ तब-तब ही देखता हूँ ॥ ५६ ॥

३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विमुख्यां त्वयि भोगेषु विषयेषु सुखं मम ।
कथं भवेद्दारुयोषासङ्गतस्येव तद्वत् ॥ ५७ ॥
न तवाभिमतं त्यक्त्वा किञ्चिन्मम समीहितम् ।
सर्वथा त्वामनुगतो ज्योत्स्नां कुमुद्वत् किल ॥ ५८ ॥
तदेवं ते कुतश्चित्तं ब्रूहि प्राणाधिकप्रिये ।
येन शुद्धयेत् तु मच्चित्तं शापितासि मया प्रिये ॥ ५९ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विचारमाहात्म्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥
जब तुम इस प्रकार भोगोंसे विमुख रहोगी तो बताओ काठकी
पुतलीके साथ रहनेवाले पुरुषके समान मुझे भी विषयोंसे क्या सुख
मिलेगा ? ॥ ५७ ॥
जो तुम्हें अच्छा लगता है उसे छोड़कर तो मुझे कुछ भी करनेकी
इच्छा नहीं होती। कुमुद् जिस प्रकार चन्द्रिका का अनुसरण करता
है उसी प्रकार मैं तो सब प्रकार तुम्हारा ही अनुगत हूँ ॥ ५८ ॥
तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। बताओ तो तुम्हारा चित्त
ऐसा विषयविमुख क्यों हो गया है। प्रिये ! तुम्हें मेरी सौगन्ध है।
बोलो, जिससे मेरे मनका समाधान हो” ॥ ५९ ॥
तृतीय अध्याय समाप्त ।

चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
प्रियस्य कण्ठासक्तस्य निशम्यैवं वचो हि सा ।
ईषत्स्मितानना प्राह राजपुत्रमनिन्दिता ॥ १ ॥
बुबोधयिषती राजपुत्रं युक्त्याऽब्रवीदिदम् ।
राजपुत्र शृणु वचो नाहं त्वयि विरागिणी ॥ २ ॥
किं स्यात् प्रियतमं लोके किंनु स्यादप्रियन्त्विति ।
विचारयन्त्या नित्यं नान्तमेत्यत्र मे मतिः ॥ ३ ॥
ध्यायाम्येतच्चिरान्नित्यं स्त्रीस्वभाववशादहम् ।
नैतज्जानामि तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ४ ॥
एवं प्रोक्तो हेमचूडः प्रहस्य प्राह तां प्रियाम् ।
नूनं स्त्रियो मूढधिय इति सत्यं न संशयः ॥ ५ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
हेमचूड-प्रबोध
गलेसे लगे प्रियतमका ऐसा भाषण सुनकर वह निर्दोष बाला कुछ
मुसकराहटके साथ राजकुमारसे कहने लगी ॥ १ ॥
वह राजपुत्रको तत्त्वका बोध कराना चाहती थी, इसलिये उसने
इस प्रकार युक्तिपूर्वक बोलना आरम्भ किया, “राजकुमार ! सुनिये,
मेरा आपके प्रति प्रेम न हो—ऐसी बात नहीं है ॥ २ ॥
किन्तु मैं हर समय इसी उधेड़-बुनमें रहती हूँ कि लोकमें सबसे
बढ़कर प्रिय कौन वस्तु है और अप्रिय क्या है। मेरी बुद्धि इसका कोई
निर्णय नहीं कर पाती है ॥ ३ ॥
मैं बहुत दिनोंसे बराबर यही सोच रही हूँ। किन्तु स्त्रीस्वभाव
होनेके कारण इस रहस्यको मैं समझ नहीं सकी। आप इसका ठीक-
ठीक विवेचन कर दीजिये” ॥ ४ ॥
हेमलेखाके इस प्रकार कहने पर हेमचूडने हँसकर अपनी प्रियासे
कहा, “सचमुच इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ मूढबुद्धि होती हैं ॥ ५ ॥

३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
प्रियाप्रिये हि जानन्ति पशुपक्षिसरीसृपाः ।
यतस्तेषां दृश्यते हि प्रियेष्वप्रियकेषु च ॥ ६ ॥
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च किमत्र बहु चिन्तनम् ।
सुखं यस्मात् तत् प्रियं स्याद् दुःखं यस्मात्तदप्रियम् ॥ ७ ॥
किमत्र मुग्धभावेन नित्यं चिन्तयसि प्रिये ।
श्रुत्वा प्रियवचः प्राह हेमलेखा पुनः प्रियम् ॥ ८ ॥
सत्यं स्त्रियो मुग्धभावा नास्त्यासां सद्विमर्शनम् ।
तथाप्यहं बोधनीया त्वया सम्यग्विमर्शिना ॥ ९ ॥
सुबोधिता त्वया चाहं चिन्तामेतां विसृज्य तु ।
त्वया भोगेषु सततं भवाम्यनुदिनं ततः ॥ १० ॥
राजन् सुखञ्च दुःखञ्च याभ्यां भवति ते ननु ।
प्रियाप्रिये विनिर्दिष्टे त्वया सूक्ष्मविमर्शिना ॥ ११ ॥
पिय और अप्रियकी पहचान तो पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़ोंको
भी होती है; क्यों कि उनकी भी अपने प्रियके प्रति प्रवृत्ति और अप्रिय-
की ओरसे निवृत्ति देखी जाती है। इसमें बहुत सोचनेकी क्या
बात है ? जिससे सुखदो वह प्रिय और जिससे दुःख हो वह अप्रिय
होता है ॥ ६-७ ॥
प्रिये ! तुम बड़ी भोली हो, भला, इस विषयमें तुम निरन्तर
क्या सोचती रहती हो ?” प्रियतमकी यह बात सुनकर हेमलेखाने
उससे फिर कहा—॥ ८ ॥
“स्त्रियाँ मूढ होती हैं—यह तो ठीक ही है, इनमें वास्तविक
वस्तुका विचार करनेकी योग्यता नहीं होती । परन्तु आप तो बड़े
विचारवान् हैं, अतः मुझे समझा दीजिये ॥ ९ ॥
आपके समझा देने पर मैं इस चिन्ताको छोड़कर फिर सर्वदा
आपके साथ भोगोंमें ही तत्पर रहूँगी ॥ १० ॥
राजन् ! आप बड़े सूक्ष्मदर्शी हैं। आपने बताया कि जिनसे सुख
और दुःख हो वे ही क्रमशः प्रिय और अप्रिय हैं ॥ ११ ॥

चतुर्थोऽध्यायः । ३६
एकमेव सुखं दुःखं कालदेशाकृतेर्भिदा ।
जनयेदत्र तत् कस्मात् प्रतिष्ठाध्यवसायिनी ॥ १२ ॥
यतो वह्निः कालभेदात् पृथगेव फलप्रदः ।
तथा देशविभेदेनाप्याकारस्य विभेदतः ॥ १३ ॥
शीतकाले प्रियो वह्निरुष्णे त्वप्रिय एव हि ।
हिमोष्णदेशभेदेन प्रियश्चाप्रिय एव च ॥ १४ ॥
शीतप्रकृतिजीवानां प्रियोऽन्येषां तथेतरः ।
अथाप्यधिकभावेनाल्पभावेनैवमीरितः ॥ १५ ॥
एवं शीतं धनं दाराः पुत्रा राज्यं तथेतरत् ।
अथाप्येवं महाराजो दारपुत्रधनैर्वृतः ॥ १६ ॥
शोचत्यनुदिनं कस्मान्न शोचन्तीतरे कुतः ।
योऽयं भोगः सुखार्थोऽस्ति सोऽप्यनन्तो भवेन्न तु ॥ १७ ॥
किन्तु जब एक ही वस्तु काल, देश और आकृतिका भेद होनेपर
सुख-दुःख दोनोंही देती हो तो उसकी एकरूपताका निश्चय कैसे हो
सकता है ? ॥ १२ ॥
जिस प्रकार अग्नि कालभेदसे अलग-अलग फल देनेवाली है उसी
प्रकार देश और आकृतिके भेदसे भी उसके विभिन्न फल होते हैं ॥ १३॥
अग्नि शीतकालमें तो प्रिय होती है किन्तु ग्रीष्ममें अप्रिय ही है ।
इसी तरह शीत और उष्ण देशोंके भेदसे भी वह प्रिय और अप्रिय
ही है ॥ १४ ॥
वह ठण्डी प्रकृतिवाले जीवोंको प्रिय है और दूसरे प्रकारकी प्रकृति-
वालोंको अन्य प्रकारकी है । इसी प्रकार अधिक या अल्प परिमाणमें
होने पर भी ऐसाही कहा जा सकता है ॥ १५ ॥
यही बात शीत, धन, स्त्री, पुत्र, राज्य तथा अन्य विषयोंके सम्बन्ध-
में भी है । आप महाराज मुक्ताचूड़को ही लीजिये । वे स्त्री, पुत्र, धन
सभीसे सम्पन्न हैं ॥ १६ ॥
फिर भी नित्य क्यों चिन्तातुर रहते हैं तथा दूसरे लोग [ जिनके
पास इतनी भोगसामग्री नहीं है ] क्यों चिन्ता नहीं करते । और यह
जो सुख देनेवाले भोग हैं वे भी अनन्त तो किसीके पास हो नहीं
सकते ॥ १७ ॥

५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
न केनचित्तदखिलं प्राप्तं यस्मात् सुखं भवेत् ।
यत्किञ्चिल्लाभतो यस्मात् सुखं तत्रापि संशृणु ॥ १८ ॥
न तत् सुखं भवेन्नाथ यतो दुःखविमिश्रितम् ।
दुःखन्तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमान्तरमित्यपि ॥ १९ ॥
बाह्यं शरीरसम्भूतं धातुदोषादिसम्भवम् ।
आन्तरं मानसं प्रोक्तं तच्च वाञ्छासमुद्भवम् ॥ २० ॥
महत्तरं मानसं स्याद्येन ग्रस्तमिदं जगत् ।
वाञ्छैव दुःखविटपिबीजं सुदृढशक्तिकम् ॥ २१ ॥
यया किङ्करतां प्राप्ताः कुर्वन्त्येव दिवानिशम् ।
इन्द्रादयोऽपि विबुधाः स्वनिवासाः सदोदिताः ॥ २२ ॥
सुखं वाञ्छावशेषेऽपि यदस्ति नृपसम्भव ।
तद्दुःखमेव जानीहि यत् कृमिष्वपि सम्भवेत् ॥ २३ ॥
वे पूरे तो किसीको भी प्राप्त नहीं हुए, जिससे कि उसे सुख मिल
जाता । [ यदि आप कहें कि ] थोड़े मिलनेसे भी सुखतो होता ही है,
तो इसपर आप मेरी बात सुनिये ॥ १८ ॥
हे नाथ ! वह तो सुख है ही नहीं, क्योंकि उसमें दुःख मिला हुआ
है । दुःख दो प्रकारका कहा गया है-बाह्य और आन्तर ॥ १९ ॥
धातुओंके दोषादिसे होनेवाला शरीरजनित दुःख बाह्य होता है
और मानस दुःख आन्तर कहलाता है । वह कामनाओंके कारण हुआ
करता है ॥ २० ॥
इनमें मानस दुःख अधिक बड़ा है, जिसने कि इस सारे
जगत्को ग्रस रखा है । दुःखरूपी वृक्षका बड़ा शक्तिशाली बीज कामना
ही तो है ॥ २१ ॥
इस कामनाकी दासता स्वीकार करनेसे ही स्वर्गमें रहनेवाले
बड़े वैभवशाली इन्द्रादि देवताभी रात-दिन कर्म करनेमें ही लगे
रहते हैं ॥ २२ ॥
राजकुमार ! कामनाके रहते हुए भी जो सुख होता है उसे
तो आप दुःख ही समझें। वह सुख तो कीड़े-मकोड़ोंमें भी संभव हो
सकता है ॥ २३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः । ४१
वरं तिर्यक्कीटकृमिप्रभृतीनां सुखन्तु यत् ।
स्वल्पवाञ्छासम्मिलितं नृणां किं स्यात् सुखं वद ॥ २४ ॥
वाञ्छाशतसमाविष्टो यदि किञ्चिदुपेत्य तु ।
सुखी भवेदिह तदा को हि न स्यात् सुखी वद ॥ २५ ॥
अखिलाङ्गे वह्निदग्धे सूक्ष्मपाटीरबिन्दुना ।
यदि शीललदेहः स्यात्तदा सोऽपि सुखी भवेत् ॥ २६ ॥
प्रियायाः सम्परिष्वङ्गात् सुखं प्राप्नोति वै नरः ।
तत्रैवाङ्गस्य विषमन्धाद् दुःखं भवेन्ननु ॥ २७ ॥
रत्यावेशात् परिश्रान्तिः सर्वेषां जायते किल ।
अनन्तरं भारवाहपशोरिव परिश्रमः ॥ २८ ॥
कथं पश्यसि तत् सौख्यं नाथैतन्मे समुच्यताम् ।
यावत् सुखं प्रियासङ्गे नाडीसंघट्टसम्भवम् ॥ २९ ॥
तदास्ति तावन्न किमु शुनामस्तीह तद्वद ।
कीड़े, मकोड़े और तिर्यक योनिके प्राणियोंका सुख तो थोड़ी ही
कामनाओंसे युक्त होता है, इसलिये वह तो अच्छा है। परन्तु बताइये,
मनुष्यको क्या सुख हो सकता है, क्योंकि उसके सुखके साथ तो
सैकड़ों इच्छाएँ लगी हुई हैं। यदि उनमेंसे कुछकी पूर्ति होनेसे ही वह
सुखी हो सकता है तब तो बताओ, ऐसा कौन है जो सुखी न हो ॥२४-२५॥
जिसका सारा शरीर अग्निसे जल रहाहो उसे यदि छोटी-सी चन्दन-
की बूँदसे शारीरिक शीतलताकी उपलब्धि हो सके तो वह (कामनाकुल)
पुरुषभी सुखी हो सकता है ॥ २६ ॥
कहते हैं कि प्रियतमाके आलिंगनसे पुरुषको सुख मिलता है।
परन्तु वहाँ भी शरीरके कसे जानेसे तो दुःख भी रहता ही है ॥ २७ ॥
कामक्रीडाके आवेशसे भी सबको थकान होती ही है। उसके
अन्तमें उसे भारवाही पशुके समान श्रम जान पड़ता है ॥ २८ ॥
नाथ ! मुझे बतलाइये तो, आपको उसमें सुख कैसे दिखायी देता
है। नाड़ियोंके घर्षणसे जितना सुख किसीको अपनी प्रियतमाके
सहवाससे मिलता है, बतलाइये, उतना ही क्या कुत्तेको कुत्तीके सहवास-
से नहीं मिलता ? ॥ २९-३० पू० ॥

४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यत्ततो ह्यतिरिक्तं ते दृष्टसौन्दर्यसम्भवम् ॥ ३० ॥
तत् केवलाभिमानोत्थं स्वाप्नस्त्रीसङ्गमे यथा ।
पुरा कश्चिद्राजसुतो मन्मथाधिकसुन्दरः ॥ ३१ ॥
काञ्चित् सुरूपिणीं प्राप्तः स्त्रियं सर्वमनोहराम् ।
अत्यन्तमनुरक्तः स तस्यां राजकुमारकः ॥ ३२ ॥
सा त्वन्यस्मिन् राजसुत भृत्ये संसक्तमानसा ।
स भृत्यो राजपुत्रं तं वञ्चयामास युक्तितः ॥ ३३ ॥
मदिरां मोहनार्थाय तस्मै दत्त्वातिमात्रकम् ।
ततो मदान्धाय चेटीं काञ्चित् प्रेष्य कुरूपिणीम् ॥ ३४ ॥
बुभुजे तां तस्य पत्नीं सर्वलोकैकसुन्दरीम् '
एवमेव चिरं तत्र मदान्धो नृपतेः सुतः ॥ ३५ ॥
प्रत्यहं चेटिकां गच्छन् स्वात्मानं सममंसत ।
धन्योऽहमीदृशीं लोकसुन्दरीं प्राणप्रेयसीम् ॥ ३६ ॥
उपगच्छाम्यहं नित्यं न मेऽस्ति सदृशः क्वचित् ।
यदि कहो कि प्रियतमाका सौन्दर्य देखनेसे उसकी अपेक्षा अधिक
सुख होता है तो वह स्वप्नके स्त्रीसङ्गमके समान केवल माना हुआ
ही है ॥ ३० उ०-३१ पू० ॥
प्राचीन समयकी बात है कोई राजकुमार कामदेवसे भी अधिक
सुन्दर था। उसे स्त्री भी अत्यन्त रूपवती और सब प्रकार मनको
हरनेवाली प्राप्त हुई थी। तथा उसका उसमें अनुराग भी बहुत
था ॥ ३१ उ०-३२ ॥
किन्तु उस स्त्रीका चित्त राजकुमारके एक सेवकमें लगा हुआ था।
वह सेवक राजकुमारको एक युक्तिद्वारा धोखा दिया करता था ॥ ३३ ॥
उसे मदोन्मत्त करनेके लिये वह बहुत-सी मदिरा पिला देता।
और जब वह नशेमें चूर हो जाता तो उसके पास एक कुरूपा दासीको
भेज देता तथा स्वयं उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी स्त्रीके
साथ सम्भोग करता ॥ ३४-३५ पू० ॥
इसी प्रकार वह मदोन्मत्त राजकुमार बहुत समयतक नित्यप्रति
उस दासीके साथ सहवास करते हुए यही समझता रहा कि मैं नित्य

चतुर्थोऽध्यायः। ४३
एवं वृत्ते चिरे काले कदाचिद्दैवयोगतः ॥ ३७ ॥
भृत्यो निधाय पानं स कार्ये चात्यन्तिके ययौ ।
अथ राजकुमारस्तत् पानं नात्यन्तिकं पपौ ॥ ३८ ॥
निमित्ततो ययौ शीघ्रं रत्युत्सुकितमानसः ।
शयनीयं मनः कान्तं सर्वभोगर्द्धिसंयुतम् ॥ ३९ ॥
शचीगृहं देवपतिरिव नन्दनसंस्थितम् ।
परार्द्धार्च्यपर्यङ्कगतां तां चेटीमुपसङ्गतः ॥ ४० ॥
कामवेगेन विवशो बुभुजेऽत्यन्तहर्षतः ।
उपलब्ध्याथ रत्यन्ते चेटीं तां विकृताकृतिम् ॥ ४१ ॥
शङ्कितोऽमर्षितश्चापि किमेतदिति चिन्तयन् ।
क्व सा मम प्रियतमेत्येवं तामन्वपृच्छत ॥ ४२ ॥
पृष्टैवं तेन सा चेटी विमदन्तं निशम्य तु ।
भीता न किञ्चितं ग्राह वेपमाना तदा ततः ॥ ४३ ॥
ऐसी त्रिलोकसुन्दरी प्राणप्रियाका उपभोग करता हूँ, इसलिये धन्य हूँ।
मेरे समान कहीं कोई नहीं है ॥ ३५ उ०-३७ पू० ॥
बहुत दिनों तक ऐसा ही होता रहा। तब किसी दिन कोई विशेष
कार्य होनेके कारण वह सेवक मदिरा रखकर चला गया। तथा राजकुमार
ने भी उस दिन किसी निमित्तसे अधिक मद्य नहीं पी तथा भोग-वासना
से आतुर हो शीघ्र ही वह अपने विलासभवनमें गया ॥ ३७ उ० ३९ पू० ॥
वह भवन बड़ा ही सुन्दर, मनको प्रिय लगनेवाला, सम्पूर्ण भोग-
सामग्रियोंसे सम्पन्न था। देवराज इन्द्र जिस प्रकार नन्दनवनमें स्थित
शचीके भवनमें जाते हैं उसीप्रकार वह उस भवनमें गया और वहाँ बहु-
मूल्य पलंगपर पौढ़ी हुई दासीके साथ समागम करने लगा ॥३९ उ०-४०॥
कामवेगसे व्यथित होनेके कारण वह बड़े हर्षसे उसके साथ
सम्भोग करता रहा। सम्भोगके अन्तमें उस कुरूपा दासीको देखकर उसे
शंका हुई और कुछ रोषके साथ यह सोचते हुए कि यह सब क्या हो
रहा है उसने उससे पूछा, “मेरी वह प्रियतमा कहाँ है ?”॥ ४१-४२ ॥
उसके इस प्रकार प्रश्न करने पर जब दासीने देखा कि आज तो
राजकुमार सचेत है तो वह डरकर काँपने लगी और चुप हो गई ॥ ४३ ॥

४४ त्रिपुरारहस्यं ज्ञानखण्डे
आलक्ष्य राजपुत्रोऽपि वैषम्यं चात्मवञ्चनम् ।
वामेन जग्राह कचे चेटीं क्रोधारुणेक्षणः ॥ ४४ ॥
कृपाणमाददे दक्षहस्तेन नृपसम्भवः ।
तर्जयंस्तां प्रत्युवाच वद वृत्तं यथातथम् ॥ ४५ ॥
नो चेन्न स्याज्जीवितं ते क्षणमात्रमपि द्रुतम् ।
सैवं निशम्य तद्वाक्यं भीता प्राणपरीप्सया ॥ ४६ ॥
जगौ यथावत्तत् सर्वं चिराद् वृत्तं समास्थितम् ।
प्रादर्शयच्चापि तस्मै तां भृत्येन सुसङ्गताम् ॥ ४७ ॥
क्वचिद्भूमौ कटे भृत्यं कृष्णं पिङ्गललोचनम् ।
प्रांशुं मलिनसर्वाङ्गं रूक्षवक्त्रं जुगुप्सितम् ॥ ४८ ॥
समाश्लिष्य रतिश्रान्तां सर्वाङ्गैः प्रेमभावतः ।
मृदुबाहुलतावृत्तग्रीवस्य वदने स्वकम् ॥ ४९ ॥
निवेश्य वक्त्रकमलं पद्भ्यामाश्लिष्य गाढतः ।
तयोरुयुग्मं तद्वक्षस्संसक्तगुरुसुस्तनीम् ॥ ५० ॥
राजकुमारने जब ऐसा विपरीत व्यवहार और अपनेको वञ्चित
होते देखा तो क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने अपने बायें
हाथसे दासी की चोटी पकड़ ली ॥ ४४ ॥
और दायें हाथमें तलवार ले ली। फिर उसे डपटते हुए पूछा,
“ठीक-ठीक बात बता, नहीं तो अब एक क्षण भी तेरा जीवन नहीं रह
सकता ॥ ४५-४६ पू० ॥
राजकुमारके ये वचन सुनकर वह डर गयी और अपने प्राण
बचानेके लिये बहुत दिनोंसे जो कुछ हो रहा था वह सब बता
दिया। तथा सेवकके साथ समागम करती उसकी पत्नी भी दिखा
दी ॥ ४६ उ०-४७ ॥
राजकुमारने देखा कि उसकी स्त्री भूमि पर बिछी एक चटाईपर
उस सेवकको अपने सब अंगोंसे आलिंगित किये पड़ी है, जिसका काला
रंग है, लाल आँखें हैं, लंबा शरीर है, सब अंग मलिन हैं, रूखा
चेहरा है और जो अत्यन्त घृणित है। रतिके श्रमसे वह कुछ श्रान्त
है, अपनी कोमल बाहुलताओंको उसके गलेमें डालकर उसने अपने

चतुर्थोऽध्यायः । ४५
वासन्तिकामिव लतां वृतां कुसुमकोरकैः ।
रोहिणीं राहुणोपेतामिवापश्यन्नृपात्मजः ॥ ५१ ॥
एवंविधां समालोक्य निद्रयापगतस्मृतिम् ।
मोमुह्यमानश्चात्यन्तं क्षणं पश्चाद्धृतिं भजन् ॥ ५२ ॥
यत् प्राह राजतनयस्तन्मत्तः श्रूयतां ननु ।
धिङ्मामणार्यमत्यन्तं मूढं मदविमोहितम् ॥ ५३ ॥
धिग्ये स्त्रीष्वभिसंग्रीता धिक् तांश्च पुरुषाधमान् ।
न कामिन्यः कस्यचित् स्युर्वृक्षस्येव च शारिकाः ॥ ५४ ॥
किमहं मां प्रवक्ष्यामि मुग्धं महिषपोतवत् ।
जानन्तमेनां प्राणेभ्यः प्रेष्ठां सुचिरकालतः ॥ ५५ ॥
न स्त्रियः कस्यचिद्वा स्युर्वेश्या इव विटस्य हि ।
यः स्त्रीषु विश्वब्धमनाः स एव वनगर्दभः ॥ ५६ ॥
मुखकमलको उसके मुँहसे सटा रखा है, चरणोंसे उसकी दोनों
टाँगोंको कसा हुआ है तथा उसके पीन पयोधर उसके हाथों से कसे
हुए हैं। [ उस समय वह ऐसी जान पड़ती थी ] मानों कुसुम-
कलिकाओंसे घिरी हुई वासन्तिका लता हो, अथवा राहुसे मिली हुई
रोहिणी हो ॥ ४८-५१ ॥
निद्रासे अचेत अपनी पत्नीको ऐसी स्थितिमें देखकर राजकुमार
कुछ देरके लिये अपनेको बिलकुल भूल गया, फिर धैर्य धारणकर उसने
जो कुछ कहा वह मुझसे सुनिये—॥ ५२-५३ पू० ॥
मदिराके नशेमें चूर मुझ अनार्य महामूढको धिक्कार है। इन
स्त्रियोंमें जिनकी अत्यन्त आसक्ति है उन नीच मनुष्योंको भी धिक्कार
है। [ जहाँ-तहाँ चारा चुगनेवाली ] सारिकाएँ (मैनाएँ) जैसे किसी
एक वृक्षकी नहीं हो सकतीं उसी प्रकार ये नारियाँ किसीकी भी नहीं
होतीं ॥ ५३ उ०-५४ ॥
मैं अपनेको ही क्या कहूँ? मैं तो इसमें भैंसके बछेके समान
मोहग्रस्त रहा, चिरकालसे इसे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय
समझता रहा ॥ ५५ ॥
वेश्या जैसे अपने प्रेमीकी नहीं होती इसी प्रकार स्त्रियाँ किसीकी भी
नहीं होतीं। जिसका स्त्रियोंमें विश्वास है वह तो जंगली गधा ही है॥५६॥

४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
या स्थितिः शारदाभ्रस्य क्षणिका ह्यनवस्थिता ।
ततोऽपि पेलवा स्त्रीणां स्थितिरत्यन्तचञ्चला ॥ ५७ ॥
नाहमद्यावधि ह्येवं स्त्रीस्वभावमहोऽविदम् ।
यन्मां सर्वात्मनासक्तं त्यक्त्वा भृत्यमनुव्रता ॥ ५८ ॥
अन्यासक्ता गूढभावा मयि छद्मानुरागिणी ।
प्रदर्शयन्ती भक्तिं स्वां नटीव विटमण्डले ॥ ५९ ॥
नाविदं लेशतोऽप्येनां मदिरामत्तमानसः ।
छायेव मां सङ्गतेति मत्वा विश्वब्धमानसः ॥ ६० ॥
अप्रेक्षणीयां चेटीं तां वञ्चितश्चिरसङ्गतः ।
नूनं मत्तो मूढतमः को भवेज्जगतीतले ॥ ६१ ॥
य एवं विस्रम्भपूर्वमनया चिरवञ्चितः ।
अहोऽयं भृत्यहतकः सर्वाङ्गविकृताकृतिः ॥ ६२ ॥
शरत्कालीन मेघकी स्थिति जो क्षणिक और अस्थायी होती है इन
स्त्रियोंकी स्थिति तो उससे भी अधिक अस्थायी और चंचल समझनी
चाहिये ॥ ५७ ॥
अहो ! आजतक भी मैंने इन स्त्रियोंके स्वभावको नहीं समझा। मैं
सब प्रकार इसमें आसक्त था, फिर भी इसने मुझे छोड़कर इस
सेवकका पल्ला पकड़ा ॥ ५८ ॥
यह दूसरेमें आसक्त थी, परन्तु इस भावको इसने खूब छिपाया।
नटी जैसे नटोंके बीच अपना अत्यन्त भक्तिभाव प्रदर्शित करती है
उसी प्रकार यह भी कपटपूर्वक मुझसे प्रेम दिखाती रही ॥ ५९ ॥
मेरा मन मदिरापानसे ऐसा उन्मत्तहो गया कि मैं इसे लेशमात्र भी
न पहचान सका। मेरे मनमें सदा यही विश्वास रहा कि यह तो
छायाके समान मेरी नित्यसंगिनी है ॥ ६० ॥
इनसे ठगा जाकर मैं चिरकालसे उस दासीके साथ ही समागम
करता रहा, जिसकी ओर देखनेसे भी दुःख होता है। सचमुच मुझसे
बढ़कर मूढ इस पृथ्वीतलमें और कौन हो सकता है, जिसे यह
विश्वास दिलाकर चिरकालसे इस प्रकार ठगती रही ॥ ६१-६२ पू० ॥
वाहरे ! यह निन्दनीय सेवक ! इसके तो सभी अंग भोंड़ी आकृति-

चतुर्थोऽध्यायः । ४७
किमस्मिन्ननया दृष्टं सौन्दर्यं सर्वतोऽधिकम् ।
यतो मां निजसौन्दर्याहृतलोकावलोकनम् ॥ ६३ ॥
अनुरक्तं सर्वथैव त्यक्त्वैनमुपसङ्गता ।
एवं प्रलप्य बहुधा निर्विण्णोऽतितरां तदा ॥ ६४ ॥
राजपुत्रो वनं प्रागात् सर्वसङ्गविवर्जितः ।
तस्माद्राजकुमारैतत् सौन्दर्यं मनसोत्थितम् ॥ ६५ ॥
यथा त्वं मयि चात्यन्तसौभगेक्षणपूर्वकम् ।
रतिं विन्दस्यतितरां तथा वा तद्विशेषतः ॥ ६६ ॥
विन्दन्ति रतिमत्यन्तं योषित्सु विकृतास्वपि ।
अत्र ते प्रत्ययं वक्ष्ये शृणु प्रिय समाहितः ॥ ६७ ॥
विलोक्यते या हि योषित् सा बहिःसुव्यवस्थिता ।
या च तत्प्रतिबिम्बात्मरूपिणी चित्तसंश्रया ॥ ६८ ॥
सङ्कल्परूपिणी तस्याः सौष्ठवं मनसोलिखन् ।
पौनःपुन्येन तदनु वाञ्छामुपसमागतः ॥ ६९ ॥
वाले हैं। इसमें इसे ऐसा सबसे बड़ा क्या सौन्दर्य 'दिखायी दिया जो
मुझे छोड़कर इसका सहवास स्वीकार कर बैठी ! मेरी सुन्दरताने तो
सभी लोगोंकी आँखोंको आकर्षित कर रखा है और इसके प्रति मेरा
अनुराग भी पूरा था ॥ ६२ उ०-६४ पू० ॥
इस प्रकार बहुत कुछ कहकर वह राजपुत्र अत्यन्त विरक्त हो गया
और सबकी आसक्ति छोड़कर वनको चला गया ॥ ६४ उ० -६५ पू० ॥
अतः राजकुमार ! यह सुन्दरता तो अपने मनकी ही उपज है।
जिस प्रकार अत्यन्त सुन्दरता देखकर आपको मुझसे रतिजनित सुख
मिलता है उससे भी अधिक सुख कुरूपा नारियोंसे भी प्राप्त हो जाता
है। प्रियवर ! इस विषयको मैं निश्चयात्मक रूपसे समझाती हूँ, आप
सावधान होकर सुनें ॥ ६५ उ०-६७ ॥
जो स्त्री दिखायी देती है वह तो बाहर रहती है किन्तु चित्त में
संकल्परूपसे रहनेवाली उसकी जो प्रतिबिम्बरूपिणी आकृति है, मनसे
उसमें सुन्दरताकी कल्पना हो जाती है। उसकी पुनः पुनः [स्मृति