त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः । ३५
कुतो भोगेषु नात्यन्तमासक्तासि शुचिस्मिते ।
किं भोगास्ते मनोयोग्या न सन्त्यत्र कुतस्त्विदम् ॥ ५१ ॥
अत्युत्तमेषु भोगेषु नासक्तेव विभासि मे ।
त्वय्यासक्तिविहीनायां कथं मे सुखदा रतिः ॥ ५२ ॥
आसक्ते मयि चापि त्वं भास्यन्यगतमानसा ।
भाषितापि मया भूयो न शृणोष्येव किञ्चन ॥ ५३ ॥
आगतं कण्ठसंलग्नं चिरादपि विभाव्य च ।
कदा नाथागतं चेति पृच्छस्यविदिता यथा ॥ ५४ ॥
पेशलेषूपभोगेषु दुर्लभेष्ठु क्वचिन्न ते ।
मन आसज्जते कस्मान्न किञ्चिदनुमोदसि ॥ ५५ ॥
मया विरहितां त्वां वै निमील्य नयने स्थिताम् ।
यदा यदोपगच्छामि पश्यामि च तदा तदा ॥ ५६ ॥
तुम्हारी मुसकान बड़ी मनोहारिणी है, किन्तु भोगोंमें तुम्हारी
विशेष रुचि क्यों नहीं है। क्या यहाँ के भोग तुम्हारे मनके अनुकूल
नहीं हैं ? फिर यह उदासीनता क्यों ? ॥ ५१ ॥
अत्यन्त उत्तम भोगोंमें भी मुझे तुम अनासक्त-सी जान पड़ती हो।
यदि तुम्हारा इधर झुकाव नहीं होगा तो मुझे तुम्हारे साथ विहार
करनेसे सुख कैसे मिलेगा ॥ ५२ ॥
मेरी तो तुम्हारे प्रति आसक्ति रहती है, किन्तु ऐसा जान पड़ता है
कि तुम्हारा मन मानो कहीं अन्यत्र लगा हुआ है। मैं बार-बार बोलता
हूँ, पर तुम कुछ सुनती ही नहीं हो ॥ ५३ ॥
मैं बड़ी देरसे तुम्हारे पास आकर तुम्हें आलिंगन किये बैठा हूँ;
और तुम 'नाथ, कब आये' ऐसा प्रश्न करती हो, मानो तुम्हें कुछ पता
ही नहीं है ॥ ५४ ॥
तुम्हारे सामने बड़ी सुन्दर और दुर्लभ भोगसामग्रियाँ उपस्थित
की जाती हैं, तथापि तुम्हारा मन उनकी ओर क्यों नहीं जाता, तुम
क्यों उनमें अपनी रुचि प्रकट नहीं करती ? ॥ ५५ ॥
जब मैं पास नहीं होता तो तुम नेत्र मूँदे बैठी रहती हो। यह बात
मैं जब-जब तुम्हारे पास आता हूँ तब-तब ही देखता हूँ ॥ ५६ ॥