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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 404 में से

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पृष्ठ 51

चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
प्रियस्य कण्ठासक्तस्य निशम्यैवं वचो हि सा ।
ईषत्स्मितानना प्राह राजपुत्रमनिन्दिता ॥ १ ॥
बुबोधयिषती राजपुत्रं युक्त्याऽब्रवीदिदम् ।
राजपुत्र शृणु वचो नाहं त्वयि विरागिणी ॥ २ ॥
किं स्यात् प्रियतमं लोके किंनु स्यादप्रियन्त्विति ।
विचारयन्त्या नित्यं नान्तमेत्यत्र मे मतिः ॥ ३ ॥
ध्यायाम्येतच्चिरान्नित्यं स्त्रीस्वभाववशादहम् ।
नैतज्जानामि तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ४ ॥
एवं प्रोक्तो हेमचूडः प्रहस्य प्राह तां प्रियाम् ।
नूनं स्त्रियो मूढधिय इति सत्यं न संशयः ॥ ५ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
हेमचूड-प्रबोध
गलेसे लगे प्रियतमका ऐसा भाषण सुनकर वह निर्दोष बाला कुछ
मुसकराहटके साथ राजकुमारसे कहने लगी ॥ १ ॥
वह राजपुत्रको तत्त्वका बोध कराना चाहती थी, इसलिये उसने
इस प्रकार युक्तिपूर्वक बोलना आरम्भ किया, “राजकुमार ! सुनिये,
मेरा आपके प्रति प्रेम न हो—ऐसी बात नहीं है ॥ २ ॥
किन्तु मैं हर समय इसी उधेड़-बुनमें रहती हूँ कि लोकमें सबसे
बढ़कर प्रिय कौन वस्तु है और अप्रिय क्या है। मेरी बुद्धि इसका कोई
निर्णय नहीं कर पाती है ॥ ३ ॥
मैं बहुत दिनोंसे बराबर यही सोच रही हूँ। किन्तु स्त्रीस्वभाव
होनेके कारण इस रहस्यको मैं समझ नहीं सकी। आप इसका ठीक-
ठीक विवेचन कर दीजिये” ॥ ४ ॥
हेमलेखाके इस प्रकार कहने पर हेमचूडने हँसकर अपनी प्रियासे
कहा, “सचमुच इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ मूढबुद्धि होती हैं ॥ ५ ॥