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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पंडित का आशिष
महाराज कृष्णदेव राय धर्म में आस्था रखते थे और समय-समय पर तीर्थस्थलों का भ्रमण
कर वहाँ के देवालयों में पूजा-अर्चना करते थे।
एक बार महाराज द्रविड़ राज्य के तीर्थस्थलों का भ्रमण करने गए। वहाँ एक देवालय में
उन्हें एक तेजस्वी पुजारी के दर्शन हुए। वह पुजारी प्रकांड पंडित थे। समस्त शास्त्रों के
ज्ञाता। महाराज उनसे बात कर बहुत सन्तुष्ट हुए। उनके मन के अनेक संशयों का निवारण
भी इस बातचीत में हो गया। महाराज पुजारी के पास से संशय मुक्त होकर उठे और बहुत
विनम्र भाव से पुजारी को कभी विजयनगर आने का न्योता दिया।
पुजारी राजा कृष्णदेव राय के व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुए और महाराज को आश्वस्त
किया कि जब कभी भी उचित अवसर आएगा, वह विजयनगर अवश्य आएँगे।
इस घटना के कुछ वर्ष बाद एक दिन महाराज अपने दरबार में बैठे थे। सभा की कार्रवाई
चल रही थी। तभी महाराज के सामने द्वारपाल उपस्थित हुआ और बोला, “महाराज!
द्रविड़ राज्य से एक त्रिपुंड्रधारी ब्राह्मण आया हुआ है और आपसे मिलने की अनुमति
चाहता है।”
महाराज को अपनी द्रविड़-यात्रा का स्मरण हो आया। उन्हें स्मरण हो गया कि वहाँ एक
पुजारी से उन्होंने विजयनगर आने का आग्रह किया था। स्मृति में यह बात कौंधते ही
महाराज अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और अपने आसन के पास एक और आसन लगाए
जाने का निर्देश देते हुए तत्पर हो गए। उन्होंने द्वारपाल को उस ब्राह्मण को आदरसहित
राजदरबार में लाने का निर्देश दिया।
पुजारी जब राजसभा में आए तब सभी सभासदों ने अपने आसन से उठकर उनका
स्वागत किया। महाराज ने पुजारी के चरण छुए और उन्हें अपने आसन के समीप रखे गए
आसन पर बैठाया। महाराज के आग्रह पर पुजारी ने सभासदों को सफलता के सूत्र बताए।
पुजारी की बातें सुनकर सभासद भी आह्लादित हुए। अपना उपदेश समाप्त कर पुजारी ने
महाराज से कहा, “राजन्, अब मुझे चलना चाहिए। मैं देवालयों में देव दर्शन के लिए
निकला हूँ। मुझे स्मरण था कि मैंने आपको आश्वासन दिया था कि उचित अवसर पर मैं
विजयनगर आऊँगा। इसलिए आपके पास आया और अपना वचन पूरा किया।”
महाराज कृष्णदेव राय ने विनयपूर्वक त्रिपुंड्रधारी पुजारी को रोक लिया। महाराज ने
पुजारी से कहा कि विजयनगर में भी अनेक प्रसिद्ध मन्दिर हैं, वहाँ भी पुजारी चाहें तो देव

दर्शन कर सकते हैं।
महाराज के अनुरोध पर पुजारी एक सप्ताह तक विजयनगर में अतिथि के रूप में रहे।
महाराज ने उनकी सेवा में अपना दो घोड़ोंवाला रथ और सारथी प्रस्तुत कर दिया था
जिसके कारण पुजारी ने महाराज कृष्णदेव राय के राज्य के सभी मन्दिरों का दर्शन किया
और अन्त में राजमहल के परिसर में बने मन्दिर में देव दर्शन के लिए पधारे।
मन्दिर का निर्माण बहुमूल्य श्वेत प्रस्तरों से कराया गया था किन्तु पुजारी ने उसमें
वास्तुदोष देखा तथा अपने निर्देशन में उस वास्तुदोष को यथाशीघ्र दूर कराने का प्रस्ताव
दिया। महाराज पहले से ही पुजारी से प्रभावित थे इसलिए जब मन्दिर का वास्तुदोष दूर
कराने की बात उठी तब उन्होंने सहजता से उसे स्वीकार कर लिया। अन्ततः वह दिन भी
आ गया जब पुजारी जी को विदा होना था। विदाई से पूर्व महाराज ने राजभवन में
त्रिपुंड्रधारी पुजारी के अभिनन्दन का कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें तेनाली राम सहित
सभी सभासदों को उपस्थित रहने का विशेष निर्देश महाराज ने दिया था।
त्रिपुंड्रधारी पुजारी के प्रति उपकृत भाव में महाराज ने सभासदों को सम्बोधित किया
और अपने अभिनन्दन के बाद त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने भी सभासदों को अपना कार्य
एकाग्रचित्त और समर्पित भाव से करने का उपदेश दिया।
महाराज ने राजकोष से त्रिपुंड्रधारी पुजारी को पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणा के रूप में
अर्पित कीं।
इस आदर-अनुष्ठान के बाद विदा होते समय पुजारी ने बहुत प्रसन्न होकर महाराज को
आशीष दिया, “महाराज, आपके पाँव में खुजली होती रहे और आपके सभासद लगातार
चिन्तातुर रहें।”
पुजारी का यह आशीर्वाद सुनकर महाराज कृष्णदेव राय मानो आसमान से गिरे। सभी
सभासद भौचक्के रह गए। पुजारी मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए राजभवन से बाहर जाने लगे।
उन्हें स्वर्णमुद्राओं के साथ इस तरह बाहर जाता देखकर एक सभासद उग्र हो उठा और
राजभवन की मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए चीख उठा, “अबे ओ ढोंगी! तू हमें और
हमारे महाराज को अभिशंस कर इस तरह नहीं जा सकता। ठहर!”
उसकी कर्कश चीख से महाराज की तन्द्रा भंग हुई। वे यह नहीं समझ पाए थे कि इतनी
आवभगत और भरपूर दक्षिणा के बाद भी त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने उन्हें शाप क्यों दिया? वे
चूँकि उन पुजारी में आस्था रखते थे इसलिए उग्र नहीं हुए किन्तु वे उनके साथ अपने
व्यवहार की मन-ही-मन मीमांसा करते रहे कि त्रिपुंड्रधारी ने उन्हें क्या कहा और क्यों
कहा।

तभी त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने मुस्कुराते हुए कोमल स्वरों में कहा, “महाराज, आपने पहली
भेंट में बताया था कि आपके दरबार में ज्ञानी और विभिन्न विधाओं में पारंगत सभासद हैं।
इसलिए मैंने यह आशीर्वाद दिया है। संशय में न रहो और मुझे जाने दो।”
त्रिपुंड्रधारी पुजारी की राह रोकने के लिए उद्यत सभासद को तभी तेनाली राम ने कहा,
“पुजारी जी के मार्ग में कोई अवरोध उत्पन्न न करो। उनके आशीष को समझो और उन्हें
जाने दो!”
तेनाली राम के ऐसा कहने पर सभासद पुजारी की राह से हट गया और पुजारी
राजभवन से विदा हो गए।
पुजारी जी की बात सुनकर महाराज खिन्न हो चुके थे इसलिए वे भी बिना कोई
औपचारिकता निभाए राजभवन से बाहर चले गए। सभा विसर्जित हो गई।
राजभवन से सबके चले जाने के बाद तेनाली राम भी भारी कदमों से अपने घर की ओर
चल पड़ा। आज त्रिपुंड्रधारी पुजारी के बचाव के लिए आगे आने के कारण सभी सभासदों
की दृष्टि में उसने अपने लिए आक्रोश देखा था। महाराज ने भी राजभवन से जाते समय उसे
उपेक्षा-भरी आँखों से देखा था। तेनाली राम समझ चुका था कि पुजारी जी का बचाव करने
के कारण सभी उस पर कुपित हैं। मन-ही-मन पूरे घटनाक्रम पर विचार करता हुआ तेनाली
राम अपने घर पहुँचा और अनमने ढंग से हाथ-पाँव धोकर अपनी घरेलू दिनचर्या में लग
गया। सुबह तक वह मानसिक रूप से राजभवन में अपने ऊपर सभासदों के सम्भावित
प्रहारों और महाराज के कोप-निवारण के लिए तैयार हो चुका था।
आम दिनों की तरह ही तेनाली राम प्रफुल्लित भाव से अपने आसन पर बैठा। महाराज के
आने पर सभा की कार्रवाई शुरू हुई। एक सभासद ने कल राजदरबार में त्रिपुंड्रधारी
पुजारी के आशीष की पंक्तियाँ सुनाते हुए कहा, “महाराज! मैं विनयपूर्वक आग्रह कर रहा
हूँ कि माननीय सभासद तेनाली राम कृपापूर्वक स्पष्ट करें कि इन शापभरी पंक्तियों को
उन्होंने आशीष की संज्ञा देकर उस त्रिपुंड्रधारी ढोंगी का बचाव क्यों किया?”
महाराज ने भी तत्काल कहा, “हाँ, तेनाली राम! स्पष्ट करो कि पुजारी जी की बातों का
तुमने क्या सार निकाला था कि सबको शाप लगनेवाली बातें तुम्हें आशीष लगीं!”
महाराज गम्भीर थे। उन्होंने कहा, “वैसे वह पुजारी जी बहुत विज्ञपुरुष हैं-हो सकता है,
उनकी बातों का कोई गूढ़ार्थ हो!”
महाराज का आदेश मिलते ही तेनाली राम ने कहा, “महाराज! पुजारी जी की बातों का
कोई गूढार्थ नहीं है। उन्होंने एक सभासद के विरोध पर यह कहा था कि आपने उनसे कहा
था कि आपकी सभा में विज्ञ सभासद हैं। उन्होंने जाते-जाते सभासदों को यह बात सुनाकर
उन्हें मानसिक रूप से सजग होने को कहा। पंडित जी ने अपने आशीर्वचन में यही तो कहा

था कि महाराज, आपके पाँव में खुजली होती रहे। इससे उनका तात्पर्य यह था कि आप
लगातार घूम-घूमकर अपनी प्रजा का सुख-दुख जानते रहें। उनके आशीष के अन्तिम अंश
का यह भाव है कि आपके सभासद लगातार चिन्तातुर रहें। इसका अर्थ भी साफ है। जिस
राज्य का राजा स्वयं प्रजा के सम्पर्क में रहेगा, इससे उसके राज्य में कहीं भी कोई कदाचार
या अनाचार की घटना घटेगी तो उसका ज्ञान सीधे महाराज को होगा। इससे हर क्षेत्र के
सभासद हमेशा डरे रहेंगे कि कहीं भी कोई गलत बात होगी तो उसका पता महाराज को
हो जाएगा। वे महाराज की सक्रियता के कारण डरे भी रहेंगे और चिन्तातुर भी। उन्हें
हमेशा यह चिन्ता सताती रहेगी कि कैसे उनका कार्य निर्दोष हो। इस तरह चिन्तातुर
सभासदों और सक्रिय महाराज के कारण विजयनगर की प्रगति होगी। यही उस पुजारी जी
के आशीष का आशय है, महाराज!”
पुजारी जी के आशीष की यह व्याख्या सुनकर महाराज सन्तुष्ट हो गए। सभासदों ने
तेनाली राम की मीमांसा का करतल ध्वनि से स्वागत किया और उस सभासद का मुँह
लटक गया जिसने महाराज का कृपाभाजन बनने के लिए पुजारी जी की राह रोकी थी।

बहुभाषाविद् और तेनाली राम
महाराज कृष्णदेव राय विद्वत्ता-प्रेमी थे। स्वयं स्वाध्याय करते और स्वाध्यायियों की
सराहना भी करते। उनके दरबार में प्रायः विभिन्न राज्यों के विद्वान आते और अपनी
विद्वत्ता का प्रदर्शन कर उनसे उपहार आदि प्राप्त करते। विद्वानों को समा-त करते समय
महाराज को आन्तरिक प्रसन्नता होती।
एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक ऐसा भाषाविद् पहुँचा जो भाषा के
विकास पर विशेष अध्ययन कर चुका था तथा स्वयं छः-सात भाषाएँ मातृभाषा की तरह
बोल सकता था।
उसने महाराज के सम्मुख उपस्थित होकर कहा, “महाराज! मैं इस देश में बोली
जानेवाली प्रायः समस्त बोलियों और भाषाओं का ज्ञाता हूँ और अनेक भाषाओं पर मेरा
मातृभाषा की तरह अधिकार है। आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाए, इसके लिए
आपके सामने मैं यही बातें विभिन्न भाषाओं में दोहराता हूँ। पहले तमिल में!” और वह
फर्राटेदार तमिल में वही बातें बोलने लगा।
सभी सभासद चमत्कृत से उसे देखने लगे।
“अब तेलगू”!...और तेलगू में भी वह बड़ी सहजता से बोल गया वही बातें!
सभासदों को उसके इस भाषा-ज्ञान पर घोर विस्मय हुआ। महाराज भी उस विद्वान के
भाषा-ज्ञान पर चकित थे और वह बोले जा रहा था।
कभी कन्नड़, कभी उड़िया, कभी मराठी तो कभी गुजराती। महाराज ने स्वीकार कर
लिया कि इस विद्वान के पास अद्भुत सामर्थ्य है। सभासद उसकी सराहना के लिए तालियाँ
बजाने लगे।
इसके बाद उस विद्वान ने महाराज से कहा, “महाराज! अब आपके सभासद इस देश के
किसी भी क्षेत्र में बोली जानेवाली किसी भी बोली में, किसी भी भाषा में बात कर सकते
हैं। मैं उनकी बातों का जवाब उनके द्वारा बोली गई भाषा में ही दूँगा।”
महाराज ने सभासदों को विद्वान से बातें करने का संकेत कर दिया। इसके बाद तो सभा
में रह-रहकर विभिन्न बोलियों में उस विद्वान से बातें होती रहीं और वह सभासदों द्वारा
बोली जानेवाली भाषा में ही जवाब देता। महाराज, तेनाली राम और सभासद सभी उस
विद्वान के इस गुण की सराहना कर रहे थे। सभा भवन में एक भिन्न किस्म का माहौल था।

इसी सराहना और उल्लास के स्वरों के बीच उस विद्वान ने सभासदों की ओर देखते हुए
महाराज से कहा, “महाराज! अब मेरी एक चुनौती है- सभाभवन में उपस्थित किसी भी
सभासद को या सभी सभासदों को कि इनमें से कोई भी यदि मेरी मातृभाषा बता दे तब मैं
उसको एक भी स्वर्णमुद्राएँ दूँूँगा। यदि कोई भी ऐसा न कर सके तब आप मुझे एक भी
स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा करेंगे!”
सभासदों के बीच सन्नाटा छा गया।
महाराज भी मुश्किल में थे। वे भी नहीं समझ पाए कि यह विद्वान आखिर कहाँ का
रहनेवाला हो सकता है और कौन-सी भाषा इसकी मातृभाषा हो सकती है।
उन्होंने तेनाली राम की ओर देखा।
तेनाली राम भी शान्त था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
उस विद्वान ने सभी के ऊपर भरपूर -ष्टि डाली और बोला, “महाराज! मैं सभी की सुविधा
के लिए बारी-बारी से विभिन्न भाषाओं में बोल रहा हूँू ताकि यह अनुमान लगाना आसान
हो जाए कि मेरी मूल मातृभाषा कौन-सी है।”
उस विद्वान के बोल लेने के बाद सभाभवन में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मानो वहाँ कोई
हो ही नहीं।
महाराज ने फिर तेनाली राम की ओर देखा।
तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मैं इस विद्वान की मातृभाषा बता दूँूँगा
मगर इन्हें एक दिन के लिए,...नहीं! एक रात के लिए मेरा अतिथि बनकर रहना होगा।”
महाराज ने कहा, “क्यों, तेनाली राम, अभी ही क्यों नहीं बताते?”
“बस, यूँू ही महाराज! मेरी इच्छा है कि माँ सरस्वती के इस वरद-पुत्र की सेवा का
अवसर मुझे प्राप्त हो।” तेनाली राम ने कहा।
विद्वान व्यक्ति सम्मान का भूखा होता है। सम्मान मिलने से उसके अहंकार को सन्तुष्टि
मिलती है। इस विद्वान को तेनाली राम का प्रस्ताव पसन्द आया। उसने महाराज से कहा,
“महाराज! मैं यह आतिथ्य ग्रहण करने के लिए तत्पर हूँ। लेकिन शर्त है कि यदि ये मेरी
मातृभाषा नहीं बता पाए तो इन्हें एक भी स्वर्णमुद्राएँ मुझे इन सभी सभासदों के समक्ष ही
देनी पड़ेगी।”
तेनाली राम ने कहा, “महाराज! मुझे इन जैसे विद्वान के साहचर्य और सान्निध्य के लिए

इनकी यह शर्त स्वीकार है।”
फिर तेनाली राम उस विद्वान के साथ अपने घर आ गया। उस दिन की सभा विसर्जित हो
गई।
तेनाली राम के घर पर उत्सव जैसा माहौल था। उसके सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सभी
बुलाए गए थे। शाम ढल चुकी थी। तेनाली राम के द्वार पर कई मशाल जलाकर प्रकाश
किया गया था। तेनाली राम ने अपने पड़ोसियों को भी सूचित किया था कि उसके घर एक
ऐसा विद्वान आया हुआ है जिससे वे चाहे जिस बोली या भाषा में बात करें, वह उन्हें उसी
बोली में उत्तर देगा। देर रात तक तेनाली राम के दरवाजे पर लोगों का मजमा लगा रहा।
विद्वान जब थककर चूर हो चुका तब तेनाली राम ने लोगों को विदा किया। उसने विद्वान
को खूब मीठे पकवान खिलाए जिसके कारण विद्वान को नींद आने लगी। तेनाली राम ने
उसके सोने की व्यवस्था अलग कमरे में कराई। जब विद्वान सो गया तब तेनाली राम ने एक
सेवक को एक बर्तन में गरम पानी दिया और कहा, “तुम जाओ और जाकर उस सोए हुए
अतिथि के एक पाँव पर यह गरम पानी उड़ेल आओ। इसके बाद जो कुछ भी होगा, उससे मैं
निपट लूँगा।”
सेवक डरता हुआ विद्वान वाले कमरे में गया। थोड़ी ही देर में विद्वान की चीख और कन्नड़
में उसके बोलने की आवाज सुनकर तेनाली राम उसके कमरे में पहुँचकर विद्वान से पूछा,
”क्या हुआ?”
विद्वान उस समय घबराया हुआ था। विद्वान ने तेनाली राम से कहा, “तुम्हारे सेवक ने
मेरे उ$पर गरम पानी डाल दिया।”
यह सुनकर तेनाली राम ने चीखकर अपने सेवक को आवाज लगाई, “रामलिंगम्, इधर
आओ! सुनो, हमारे माननीय अतिथि क्या कह रहे हैं!”
रामलिंगम् ने कहा, “स्वामी, मैं आपकी दवा के लिए गरम पानी लेकर आ रहा था। हाथ
में गरम पानी लेकर जब मैं दवा लेने के लिए इस कमरे में आया तो मेरा पाँव पलंग के पाये
से टकरा गया और कटोरे से थोड़ा पानी छलककर इनके पाँव पर गिर गया जिसके कारण
ये जग गए और मैं इनके क्रोध से बचने के लिए डरकर बाहर भाग गया।”
तेनाली राम ने हाथ जोड़कर अतिथि से क्षमा-याचना की और उसके पाँव को ठंडे पानी से
धोकर उस पर आलू के गूदे का लेप लगाया जिससे अतिथि की जलन शान्त हो गई और वह
शान्ति से सो गया।
दूसरे दिन तेनाली राम अपने विद्वान अतिथि के साथ महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में

उपस्थित हुआ।
महाराज और सभी सभासद मानो उनकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। तेनाली राम और
विद्वान अतिथि द्वारा आसन ग्रहण कर लेने के बाद महाराज ने सभा की कार्रवाई शुरू
कराई।
विद्वान ने उठकर कहा, “महाराज! मैंने तेनाली राम की शर्त पूरी कर दी है। अब आप
तेनाली राम को कहें कि शर्त के अनुसार वे मेरी मातृभाषा बताएँ या मुझे एक भी
स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा करें।”
महाराज ने तेनाली राम से पूछा, “क्यों तेनाली राम, तुम अब बताओगे कि अतिथि की
मातृभाषा क्या है?”
“जी हाँ, महाराज! हमारे अतिथि की मातृभाषा ‘कन्नड़’ है।”
यह सुनना था कि वह विद्वान अपने आसन से उठकर आश्चर्य से तेनाली राम को देखने
लगा फिर उसने हाथ जोड़कर स्वीकार कर लिया, ”मेरी मातृभाषा कन्नड़ ही है।“ उसने
यह भी कहा, “महाराज! मैंने आपके दरबार की प्रशंसा तेनाली राम के कारण ही सुनी थी।
मुझे एक भी स्वर्णमुद्राएँ इन जैसे प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति को भेंट करते हुए हार्दिक प्रसन्नता
होगी।” यह कहते हुए उसने तेनाली राम को एक भी स्वर्णमुद्राएँ सौंपने की तत्परता
दिखाई।
सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा किन्तु तेनाली राम ने यह कहते हुए यह
धन लेने से मना कर दिया कि विद्वान उनका अतिथि है। अतिथि का सम्मान करना हमारी
परम्परा है। अतिथि से कुछ प्राप्त करने की लालसा हमें नहीं होती!
सभाकक्ष में बैठे सभी व्यक्ति तेनाली राम के इस इनकार से हतप्रभ रह गए। वह विद्वान
तेनाली राम से इतना प्रभावित हुआ कि अपने ज्ञाता होने के अहंकार से मुक्त होकर तेनाली
राम के चरण छू लिये तथा कहने लगा, “तेनाली राम! आप जैसे व्यक्ति से मिलकर मेरा
जीवन धन्य हो गया। मैं जीवनपर्यन्त आपकी प्रतिभा और अतिथि-सम्मान की भावना को
नहीं भूल पाऊँगा।” ऐसा कहकर विद्वान महाराज कृष्णदेव राय के दरबार से बाहर आ
गया।
उसके जाने के बाद महाराज ने तेनाली राम से यह जानना चाहा कि उसने कैसे जाना कि
उस विद्वान की मातृभाषा कन्नड़ ही है?
तेनाली राम ने हँसते हुए महाराज को रात की घटना सुना दी तथा कहा, ”महाराज!
आदमी चाहे जितनी भी भाषाओं का ज्ञाता हो, वह अचानक मिली पीड़ा की उत्प्रेरणा से

अपनी मातृभाषा में ही चीखेगा। मैंने इसी सूत्र के सहारे यह जान लिया कि विद्वान की
मातृभाषा कन्नड़ है।“

पाँच गधोंवाला सौदागर
एक बार महाराज कृष्णदेव राय और तेनाली राम साथ-साथ पड़ोसी राज्य के एक शहर
सौरभ नगर भ्रमण करने के लिए गए। दोनों सौदागर के वेश में थे। उन दिनों यह आम
प्रचलन था कि राजा-महाराजा जीवन और जगत में हो रहे परिवर्तनों को जानने के लिए
समय-समय पर ऐसे ही वेश बदलकर घूमने के लिए निकल जाया करते थे।
सौरभ नगर में ये दोनों एक धर्मशाला में ठहरे। इस धर्मशाला में और बहुत से सौदागर
ठहरे हुए थे। महाराज उत्सुकता से उन सौदागरों को अपने कमरे से निहार रहे थे।
तेनाली राम ने उन्हें इस तरह उत्सुक देखा तो पूछा, “क्या बात है महाराज, इस तरह
आप हर आने-जानेवालों को क्यों देख रहे हैं? यह तो धर्मशाला है। यहाँ इसी तरह लोग
आते-जाते रहेंगे। इनमें कोई अच्छा सौदागर होगा तो कोई बुरा। कोई बेशकीमती चीजें
बेचनेवाला होगा तो कोई बात बेचकर पैसे कमाता होगा।”
महाराज कृष्णदेव राय ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं तेनाली राम! मैं हर आने-जानेवाले
को नहीं देख रहा। मैं तो सामने के कमरे में ठहरे उस अजीबो-गरीब परिधानवाले सौदागर
को देख रहा हूँ जो अपने साथ पाँच गधों को भी अपने कमरे में रखे हुए है और उन्हें प्यार
से सहला रहा है। मैंने अब से पहले कमरे में पालतू कुत्ते, बिल्लियाँ, खरगोश, तोते, कबूतर
आदि तो देखे थे मगर किसी को अपने कमरे में गधा रखते नहीं देखा था। इस कारण ही मुझे
उत्सुकता हो रही है कि अपने साथ कमरे में गधों को रखनेवाला यह सौदागर कौन है तथा
किस चीज के सौदे के लिए यहाँ ठहरा है...।”
“तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है महाराज! हम लोग बाहर निकलेंगे तो यह बात आसानी
से पता लग जाएगी।”
महाराज और तेनाली राम दोनों ही थोड़ी देर के बाद बाजार जाने के लिए अपने-अपने
कमरों से बाहर निकले। दोनों जब धर्मशाला के मुख्य द्वार के पास पहुँचे तो तेनाली राम
ने महाराज से कहा, “महाराज! तनिक ठहरिए।”
महाराज ने तेनाली राम की ओर प्रश्नसूचक-दृष्टि से देखा तो तेनाली राम ने कहा, “आइए
महाराज, धर्मशाला के व्यवस्थापक का कक्ष मुख्य द्वार के पास ही है। जरा चलिए, उस
सौदागर के बारे में पता चल जाएगा कि वह कौन है, कहाँ से आया है और किस चीज का
सौदा करता है!”

“धर्मशाला के रोजनामचे में ये सूचनाएँ गलत भी तो दर्ज हो सकती हैं, जैसे मेरे और
तुम्हारे बारे में यह सूचना दर्ज है कि हम दोनों जवाहरातों की खरीद के लिए सौरभ नगर
आए हैं।” महाराज ने पूछा।
“जी हाँ, महाराज! पर इसकी सम्भावना बहुत क्षीण है।” तेनाली राम ने उत्तर दिया।
“वह कैसे?” महाराज ने पूछा।
“वह ऐसे महाराज कि आसपास, मेरा मतलब है कि सौरभ नगर के आसपास दूसरा
राज्य केवल विजयनगर ही है। इस तरह छद्मवेश में किसी दूरस्थ राज्य का राजा यहाँ
आए, उसका कारण भी तो होना चाहिए। सम्प्रति इस तरह का कोई कारण नहीं दिखता।
सौरभ नगर की शासन प्रणाली ने मुक्त व्यापार की नीति अपनाई है। इस राज्य का अपना
कोई अर्थ-स्रोत ही नहीं है। पर्यटन के लिए बाहर से जो लोग यहाँ आते हैं, उनसे ही यहाँ
का राजस्व चलता है।...दूसरे राज्यों से लोग यहाँ आते रहें इसलिए ही इस राज्य में ‘मुक्त
व्यापार प्रणाली’ अपनाई गई है। यही कारण है कि यहाँ विभिन्न राज्यों के सौदागर बिना
किसी रोक-टोक के आते हैं।”
महाराज ने तेनाली राम की ओर प्रशंसा-भरी -ष्टि से देखते हुए सोचा कि तेनाली राम
इसीलिए तो महत्त्वपूर्ण है कि वह हर बात को सूक्ष्मता से समझता है। महाराज तेनाली
राम के साथ धर्मशाला के व्यवस्थापक के कक्ष में गए। तेनाली राम ने व्यवस्थापक की ओर
देखते हुए पूछा, ”वह गधेवाला सौदागर?“
“कौन...वह जो कन्धार से आता है?” व्यवस्थापक ने पूछा।
असल में तेनाली राम के पूछने का ढंग ही ऐसा था कि व्यवस्थापक को महसूस हुआ कि
उसका उस सौदागर से पूर्व का सम्बन्ध है। व्यवस्थापक ने तेनाली राम से कहा, “आप
सामने के गलियारे से सीधे चले जाएँ। अन्तिम दाईं तरफ के कमरे में वह मिल जाएगा।“
“इस बार वह क्या लाया है?”
तेनाली राम की ओर व्यवस्थापक ने आश्चर्य से देखा, फिर कहा, “वही पाँच गधे! अरे
भाई, बात बेचनेवाला और क्या लाएगा?”
तेनाली राम ने जब यह सुना तब महाराज से कहा, ”चलें, उससे मिल ही लें।”
असल मे व्यवस्थापक की बातें सुनकर तेनाली राम की उत्सुकता उस गधेवाले सौदागर के
प्रति बढ़ गई थी।
चलते-चलते तेनाली राम ने व्यवस्थापक से पूछा, “आप उसके गधों को भी कमरे में रहने

देते हो?”
व्यवस्थापक ने हँसते हुए कहा, “गधा मत कहो! उसका एक गधा दो आदमी के बराबर है
हमारे लिए। सौदागर एक कमरे में रहता है मगर ग्यारह कमरों का किराया चुकाता है।”
तेनाली राम की उत्सुकता और बढ़ गई। वह महाराज के साथ सौदागर के कमरे की ओर
चल पड़ा।
महाराज की भी दिलचस्पी उस सौदागर के प्रति हो आई थी।
तेनाली राम ने कन्धारवाले सौदागर के कमरे के सामने पहुँचकर द्वार खटखटाया। वैसे
कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और सौदागर अपने गधों को सहला रहा था। उसने
दरवाजे की तरफ देखा तो दो सौदागरों को दरवाजे पर खड़ा पाया। किन्तु बिना कोई
प्रतिक्रिया जताए वह फिर अपने गधों को सहलाने लगा।
तेनाली राम और महाराज चकित रह गए कि इस सौदागर ने उन्हें कुछ कहा नहीं। फिर
तेनाली राम ने ही पहल की और पूछा, ”आ जाऊँ?”
”तुम्हारी मर्जी।” सौदागर गधे को सहलाते हुए बोला। उसकी आँखें गधे पर इस तरह
टिकी थीं मानो वह गधा न हो, दुनिया की कोई नायाब वस्तु हो!
तेनाली राम और महाराज दोनों कमरे में प्रवेश कर गए लेकिन उसने उन्हें बैठने को नहीं
कहा और गधे को उसी तरह सहलाता रहा मानो वह संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण काम कर
रहा हो।
तेनाली राम और महाराज पास की दीवार के सहारे कमरे में बिछी चटाई पर बैठ गए।
सौदागर ने अपने पाँच गधों में से दो गधों को कमरे में लगी दो खूँटियों से बाँध दिया।
उसके तीन गधे खुले रहे।
पहली बार सौदागर ने उन दोनों की ओर बहुत प्रेम से देखा। लगभग उसी -ष्टि से जिस -
ष्टि से वह अपने गधों को देख रहा था। फिर उन्हें मुस्कुराता हुआ देखता रहा। कुछ बोला
नहीं।
महाराज ने फिर चुप्पी तोड़ी, “सुना, कन्धार से आते हो?”
सौदागर ने उनके प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया और महाराज के सामने हाथ फैला दिया।
बोला, “मैं उत्तर देने के पैसे लेता हूँ। निकालो पाँच स्वर्णमुद्राएँ फिर बात करो। यदि
तुम्हारा साथी भी कुछ जानना चाहे तो उसके भी पाँच स्वर्णमुद्राएँ?”

“तुम क्या बताओगे?”
वह सौदागर उसी तरह मुस्कुराता हुआ उन दोनों को मौन देखता रहा। उसके चेहरे पर
निश्चिन्तता थी और हाथ उसी तरह स्वर्णमुद्राएँ लेने के लिए बढ़े हुए थे।
महाराज ने अपनी जेब से स्वर्णमुद्राओं की थैली निकाली और उसमें से दस के स्थान पर
ग्यारह स्वर्णमुद्राएँ गिनकर सौदागर के हाथ में रख दी।
सौदागर ने एक स्वर्णमुद्रा अपनी हथेली से निकालकर तल्खी के साथ महाराज के हाथ
पर धर दी, “सुल्तान बख्शीश नहीं लेता, देता है, ध्यान रखना! मैं मन का बादशाह हूँ।”
पहली बार महाराज को अपने जीवन में ऐसा व्यक्ति मिला था जिसकी आवाज में ऐसा
प्रभाव था कि उनका व्यक्तित्व उससे आच्छादित हो गया। उन्होंने मन-ही-मन सोचा-तो
इसका नाम सुल्तान है! फिर मन में शंका हुई, कहीं यह कन्धार का सुल्तान तो नहीं?...नहीं,
नहीं, अगर ऐसा होता तो यह स्वयं को ‘मन का बादशाह’ नहीं कहता। चाहे जो हो,
आदमी है दिलचस्प।
“सुना, बातें बेचते हो?” महाराज ने पूछा।
सौदागर ने फिर अपनी हथेली आगे बढ़ाई और कहा, “प्रति प्रश्न एक स्वर्णमुद्रा! एक
व्यक्ति पाँच प्रश्न केवल!”
महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा उसकी हथेली पर रख दी। सुल्तान फिर मुस्कुराया। महाराज
कृष्णदेव राय इस अजीब सौदागर के अन्दाज के कायल तथा उसके व्यक्तित्व और व्यवहार
से सम्मोहित से हो गए। तेनाली राम चुपचाप उस व्यक्ति को देखता रहा।
“सुना, तुम कन्धार से आए हो। हम लोग तुम्हारे सामनेवाले कमरे में ठहरे हैं। तुम्हारे
कमरे में गधों को देखकर तुमसे मिलने की इच्छा हुई। हम लोग कुछ दिन और रुकेंगे। तुम
कब तक रुकोगे?”
सुल्तान ने अपनी हथेली फिर बढ़ा दी और महाराज को देखते हुए मुस्कुराता रहा।
महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा उसकी हथेली पर फिर से रख दी।
“जब तक तुम दोनों की तरह तीन और उत्सुक सौदागर न आ जाएँ तब तक!”
महाराज ने उसकी हथेली पर एक स्वर्णमुद्रा रखते हुए पूछा, “तुमने अपने साथ इन गधों
को क्यों रखा है?”

सुल्तान मुस्कुराया, “यही मेरे अन्नदाता हैं!”
महाराज ने पूछा, “कैसे?” और एक स्वर्णमुद्रा सुल्तान की हथेली पर रख दी।
“जो आता है वह इन गधों के बारे में ही बातें करता है।” सुल्तान ने मुस्कुराते हुए कहा।
महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा और उसकी हथेली पर रखी और पूछा, “इन गधों में ऐसी क्या
विशेषता है?”
“आज का इनसान जिन सूक्ष्म तरंगों को व्यवहार में लाता है वह सब कुछ!”
“जैसे?” पूछते हुए महाराज ने एक स्वर्णमुद्रा बढ़ाई मगर सुल्तान ने अपना हाथ वापस
खींच लिया और महाराज के सामने पाँच स्वर्णमुद्राएँ गिनकर अपनी जेब में रख लीं।
महाराज समझ गए, अब सौदागर सुल्तान बातें नहीं करेगा। तब उन्होंने तेनाली राम की
ओर देखा।
तेनाली राम ने सौदागर की हथेली पर पहली स्वर्णमुद्रा रखते हुए कहा, “पहले गधे पर
क्या लदा है?”
“राजा-महाराजा के उपयोग में आनेवाला अत्याचार!” सुल्तान ने उत्तर दिया।
“दूसरे गधे पर?” तेनाली राम ने सुल्तान की हथेली पर एक स्वर्णमुद्रा और रखी।
“पंडितों और विद्वानों के काम आनेवाला अहंकार!” सुल्तान ने उत्तर में कहा।
तीसरी स्वर्णमुद्रा हथेली पर रखते हुए तेनाली राम ने पूछा, “और तीसरे गधे पर?”
सुल्तान ने उत्तर दिया, “धनवानों के काम आनेवाला ईर्ष्या भाव!”
चौथी मुद्रा सुल्तान की ओर बढ़ाते हुए तेनाली राम ने पूछा, “चौथे पर?”
“अधिकांश के उपयोग में आनेवाली बेईमानी।”
तेनाली राम मुस्कुराया और एक स्वर्णमुद्रा पुनः सुल्तान की हथेली पर रखते हुए कहा,
“और पाँचवें गधे पर?”
“औरतों के काम आनेवाला छल, कपट और प्रपंच।”

तेनाली राम और महाराज उठकर उस सौदागर के कमरे से बाहर निकल आए। दोनों
एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराए।
महाराज ने कहा, “मूर्ख बन गए।”
तेनाली राम ने कहा, “अरे नहीं महाराज! वास्तव में यह सौदागर बातों का धनी है और
खड़ी बातें करता है। उसने अपने व्यवहार से समझा दिया था कि वह अपने ग्राहकों को
गधा समझता है। उसने दो गधों को खूँटे से बाँधकर बता दिया कि हम दोनों उसके
सम्मोहन में बँध चुके हैं। गधों को अन्नदाता बताकर उसने बात और साफ कर दी। उसने
यह भी ठीक कहा कि जो भी आता है, गधों से जुड़े प्रश्न ही करता है। युग की प्रवृत्तियों को
उसने सूक्ष्म तरंग बताया। उसकी बातें साफ थीं और सच्ची थीं। कन्धार से यहाँ आने के बाद
वह केवल पाँच जिज्ञासुओं से बातें कर लौट जाता है और इन पाँचों से उसे इतनी
स्वर्णमुद्राएँ प्राप्त हो जाती हैं कि उसका गुजारा चल जाता है।”
“...लेकिन यह तो ठगी है!” महाराज ने कहा।
“ठगी क्या महाराज? छद्मवेश में घूमना ठगी से कम है क्या?” तेनाली राम ने मुस्कुराते
हुए पूछा और फिर कहा, “मुझे तो इस व्यक्ति से मिलकर प्रसन्नता हुई, जो बातें बेच रहा है
और मुझ जैसों को और सजग होने के लिए प्रेरित कर रहा है।”
महाराज चुप हो गए।
तेनाली राम मुस्कुराते हुए सोचने लगा-इस दुनिया में बुद्धि का उपयोग करनेवाले निराले
लोग भी हैं।

व्यक्ति, परिवेश और परिधान

विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय सिंहासन पर विराजमान थे। सभा में तर्क-वितर्क चल
रहा था। सभासद अपनी-अपनी बुद्धि और वाक्पटुता से यह प्रमाणित करने में लगे थे कि
व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह सृष्टि की विशिष्ट रचना है। प्रकृति में एक से बढ़कर एक
जन्तु हैं। कोई बहुत छोटा तो कोई बहुत विशाल। कोई अकेला विचरण करता है तो कोई
समूह में। कोई इतना शक्तिशाली है कि बड़ा पेड़ उखाड़ डालता है। किसी को पेट भरने के
लिए सरसों का एक दाना काफी है और किसी को अपना पेट भरने के लिए किसी बड़े
जानवर का शिकार करना पड़ता है। इतनी विचित्रतापूर्ण सृष्टि में एक मनुष्य ही है जिसने
अपनी बुद्धि से इन सहस्त्रो कोटि के जीवों की प्रकृति को समझा है और उनसे लाभ लेने की
कला में पारंगत हुआ है। हिंस्र जानवर शेर को भी उसने अपनी मेधा के बूते पालतू बना
लिया है। वह हाथी जैसे विशालकाय जीव पर सवारी करता है।

बात व्यक्ति की क्षमता से होते हुए उसके आचार-व्यवहार पर उतर आई। तर्क-वितर्क का
दौर जारी रहा। महाराज कृष्णदेव राय अपने आसन पर बैठे अपने सभासदों की वाक्पटुता
और उनके ज्ञान का आनन्द उठा रहे थे। महाराज का एक सभासद अपने आसन पर निर्लिप्त
भाव मंे बैठा था। उसे देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वह सभा में चल रही चर्चा के दौर
में कोई रुचि रखता हो। महाराज कृष्णदेव राय उसकी ओर कई बार देख चुके थे। उसकी
निर्लिप्तता बनी हुई थी। महाराज ने सोचा-शायद वह किसी अन्य विषय पर विचार कर
रहा है। उन्होंने उसे टोका नहीं। सभा में अब सभासद कुछ और बुलन्दी से बोलने लगे थे।

एक सभासद ने कहा, “कुछ लोग भ्रम में जीते हैं कि अच्छा वस्त्रा पहन लेने से ही उन्हें
सम्मान मिलने लगेगा। सच तो यह है कि व्यक्ति को सम्मान उसके बाह्य आवरण के कारण
नहीं, अपितु आन्तरिक गुणों के कारण मिलता है।”

बोलनेवाले सभासद के होंठों पर ऐसा कहते समय व्यंग्य-भरी मुस्कान तैर गई और उसने
वक्र--ष्टि से सभा में बैठे उस सभासद की ओर देखा जो निर्लिप्त भाव में सभा में बैठा था
और अब तक कुछ बोला नहीं था।

तभी एक दूसरे सभासद ने पूर्ववक्ता की हाँ में हाँ मिलाई और कहने लगा, “ठीक कहते हो
भाई! इन दिनों यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है कि कुछ लोग ललाट पर चन्दन लगाकर
पंडित या ज्ञानी होने का स्वाँग करते हैं। उनका स्वाँग भले ही कुछ लोगों को भ्रमित कर दे
लेकिन ज्ञान की परख रखनेवालों की -ष्टि से उनकी वास्तविकता छुपी नहीं रह सकती।
ज्ञानी जानते हैं कि तिलक लगा लेने मात्रा से कोई पंडित नहीं हो जाता। पांडित्य के लिए
तिलक की आवश्यकता ही क्या है? पांडित्य तो अध्ययन और मनन की स्वाभाविक

परिणति है।” उसने भी उस सभासद की ओर कटाक्ष भरी -ष्टि से देखा।
उसे ऐसा करते महाराज कृष्ण चन्द्र राय ने देख लिया और वे भाँप गए कि सभा में इस
समय जो विमर्श हो रहा है उसके केन्द्र में उनका वह सभासद है जो अब तक मौन बैठा है-
निर्लिप्त और निस्पन्द-सा, मानो इन बातों में कोई सार ही न हो! महाराज अपने इस
सभासद की योग्यता के कायल थे। वे जानते थे कि अध्ययन और योग्यता की उसमें कोई
कमी नहीं है। उन्हें अपने इस सभासद का मौन खल रहा था। वे चाहते थे कि वह बोले और
व्यक्ति के बाह्य आवरण और आन्तरिक गुणों पर अपने विचार व्यक्त करे। मगर वह सभासद
था कि किसी भी कटाक्ष पर ध्यान नहीं दे रहा था और न किसी के तर्क पर अपनी कोई
प्रतिक्रिया ही प्रकट होने दे रहा था।
महाराज से रहा नहीं गया। उन्होंने अपने उस सभासद की ओर देखा और उसे टोका, तुम
मौन क्यों हो? तुम भी अपने विचार व्यक्त करो। सभा में इतनी देर से चर्चा का दौर चल
रहा है-तुम भी तो बताओ कि वस्त्रा तो केवल तन ढँकने के लिए अपेक्षित है, फिर क्यों कुछ
लोग बाह्य सज्जा पर अनाप-शनाप व्यय करते हैं? असली सौन्दर्य तो मन का सौन्दर्य है,
फिर क्यों वस्त्रा-आभूषण-अलंकरण पर इतना ध्यान दिया जाता है?“
उस सभासद ने अपने आसन से उठकर महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये। यह सभासद
कोई और नहीं, गुंटूर जिले के गलीपाडु ग्राम से विजयनगर आया कृष्ण स्वामी तेनाली राम
मुदलियार था जिसे हाल में ही महाराज ने अपना सभासद बनाया था।
महाराज को अभिवादन करने के बाद तेनाली राम ने कहा, “महाराज, मुझे क्षमा करें! मैं
इस सभा मं े चल रहे विचार-विमर्श को गम्भीर नहीं मानता। मैं विश्वासपूर्वक कह सकता
हूँ िक इन बातों का न तो कोई अर्थ है और न ही ये बातें किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकती
हैं। मेरी इस धारणा के प्रति आम सहमति भी नहीं हो सकती क्योंकि प्रायः सभी सभासदों
की राय है कि वस्त्रा का प्रयोजन मात्रा तन ढँकना होना चाहिए...जबकि मैं ऐसा नहीं
मानता। सभा में अभी जो भी बातें हो रही हैं, उसका प्रयोजन, मुझे नहीं लगता कि किसी
निष्कर्ष पर पहुँचने का है। मुझे तो लगता है कि ये बातें केवल बातों के लिए हो रही हैं
जिससे सभा का समय कट जाए। मुझे इस तरह की बातों में कोई रुचि नहीं है, महाराज!
जिसके कारण मैं मौन हूँ।”
महाराज को तेनाली राम से इस तरह के उत्तर की प्रत्याशा नहीं थी जिसके कारण वे
विस्मित हो गए मगर उन्हें लगा कि उसने जो कुछ भी कहा है वह सच है, फिर भी उनकी
उत्सुकता बनी रही कि आखिर इस विषय में तेनाली राम स्वयं क्या सोचता है। इसलिए
उन्होंने तेनाली राम से कहा, “नहीं, तेनाली राम, यूँ प्रश्न टालने से काम नहीं चलेगा।
तुम्हें अपनी राय व्यक्त करनी ही चाहिए। इतने लोगों ने इस प्रसंग में सभा के समक्ष अपनी
राय रखी और तुमसे सबकी यही अपेक्षा होनी चाहिए कि तुम भी अपनी सोच से सभा को
अवगत कराओगे।”

”जो आज्ञा महाराज!“ तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा और एक भरपूर -ष्टि सभासदों
पर डाली।
सभा में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा-सा छा गया। फिर खुसुर-फुसुर की आवाजें उभरने
लगीं। तेनाली राम सभा में अपने आसन के पास खड़ा था। माथे पर रेशमी साफा बाँधे
आभिजात्य परिधान में सजे तेनाली राम को देखकर सभासदों की फुसफुसाहटें तेज हो रही
थीं। उनमें से कुछ सभासद खीं-खीं करके हँस भी रहे थे।
महाराज ने भी सभासदों की फुसफुसाहटों और दबी-दबी-सी हँसी को सुना और वे समझ
गए कि सभासद तेनाली राम के वस्त्रा आदि को लक्ष्य करके हँस रहे हैं।
”महाराज!“ तेनाली राम ने गम्भीर स्वरों में कहना आरम्भ किया, “परिवेश और
परिस्थिति के अनुकूल परिधान पहनना नीति अनुकूल है। समाज में उचित स्थान प्राप्त
करने के लिए उचित परिधान का उपयोग करना व्यवहारशास्त्रा का प्रारम्भिक उपदेश है।
व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का ज्ञान तो तब होता है जब उसे बोलने का अवसर प्राप्त हो किन्तु
वस्त्रा तो दूर से ही बतला देता है कि उसे धारण करनेवाला व्यक्ति किस उचित आसन का
अधिकारी है।”
“...तो तुम कहना चाहते हो कि व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की अपेक्षा उसका बाह्य
परिधान अधिक महत्त्वपूर्ण है?” महाराज ने प्रश्न किया और सभासद ही-ही करते हुए हँसने
लगे।
हँसनेवाले सभासद इस बात पर प्रसन्न थे कि महाराज कृष्णदेव राय के प्रश्न में तेनाली
राम के विचारों से असहमति के संकेत थे।
तेनाली राम उसी सहजता से बोल पड़ा, “नहीं, महाराज! मैं तो यह कह रहा हूँ कि
परिधान के अभाव में व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की पहचान नहीं हो पाती और व्यक्ति को
उपेक्षित होना पड़ता है।”
महाराज ने विस्मय-भरी -ष्टि से तेनाली राम को देखा। सभासदों ने शोर करते हुए
तेनाली राम की टिप्पणी से असहमति जताई। महाराज ने थोड़ी देर तक चुप्पी साधे रखी
फिर धीरे से पूछा, “तेनाली राम! सारे सभासद, लगता है, तुम्हारी राय से सहमत नहीं हैं।
क्या अब भी तुम अपनी टिप्पणी पर -ढ़ हो?”
“जी हाँ, महाराज! मैंने जो भी कहा, उसमें मेरा कुछ भी नहीं, यह आर्ष वचन है और
शाश्वत है, चिरन्तन है। यह हर युग में ऐसा ही था, है और रहेगा।” तेनाली राम ने कहा।
“तुम इसे प्रमाणित कर सकते हो?” महाराज ने पूछा।

“उचित अवसर पर।” तेनाली राम ने उत्तर दिया।
उस दिन सभा उसी समय विसर्जित हो गई। सभासदों में एक विशेष प्रकार की खुशी थी।
उन्हें विश्वास हो गया था कि महाराज तेनाली राम के उत्तर से सहमत नहीं हैं। ये सभासद
तेनाली राम के प्रति ईर्ष्या का भाव रखते थे क्योंकि वह प्रायः बहुमूल्य परिधान पहनकर
सभा में आया करता था। विद्वान तो वह था ही। सभा में उसकी टिप्पणियाँ सबसे भिन्न और
सटीक हुआ करती थीं जिसकी प्रायः महाराज सराहना करते थे। यही कारण था कि
सभासदों में तेनाली राम के प्रति ईर्ष्या का भाव था।
इस घटना के कुछ दिन बाद विजयनगर में एक समारोह का आयोजन हो रहा था।
महाराज कृष्णदेव राय के पिता के जन्मदिवस पर प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला यह
समारोह इस बार विशेष उल्लास के साथ मनाया जा रहा था क्योंकि यह वर्ष महाराज
कृष्णदेव राय के पिता की शतवार्षिकी जन्मोत्सव का वर्ष था। महाराज स्वयं समारोह की
तैयारियों पर -ष्टि रख रहे थे। राजभवन को इस अवसर पर विशेष रूप से सजाया गया
था। आमोद-प्रमोद के लिए विविध कार्यक्रम चल रहे थे। विजयनगर के संभ्रान्त परिवारों
को महाराज ने भोजन का आमंत्रण दिया था। कुछ पड़ोसी राजाओं को भी राजनयिक
सम्बन्ध -ढ़ करने के उद्देश्य से महाराज ने निमंत्रण भेजा था।
तेनाली राम सहित सभी सभासदों को महाराज कृष्णदेव राय ने स्वलिखित आमंत्राण-
पत्र भेजकर जन्मोत्सव समारोह के बाद अपने साथ रात्रि का भोजन करने का न्योता दिया
था। सभासदों को राजभवन के द्वार पर पुष्पमाला पहनाकर ससम्मान भोजन कक्ष तक
पहुँचाने की विशेष व्यवस्था की गई थी। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-धजी परिचारिकाएँ
इधर-उधर मँडरा रही थीं। शाम ढल चुकी थी। शरद पूर्णिमा की चाँदनी का उजास फैला
हुआ था। राजभवन की बगिया में लगी रजनीगन्धा की भीनी-भीनी सुगन्ध से वातावरण
मह-मह कर रहा था। तभी राजभवन के द्वार पर एक विचित्रा-सा शोर उभरने लगा। प्रहरी
एक भिखमंगे को राजभवन के द्वार से धक्का देकर दूर भगाने में लगे थे और वह भिखमंगा
स-श व्यक्ति चीख-चीखकर बोल रहा था, “मुझे मत भगाओ। मुझे राजभवन के भोजन कक्ष
तक पहुँचा दो। मैं भिखमंगा नहीं हूँ। मैं महाराज का आमंत्रित अतिथि हूँ। मुझे निरा-त
मत करो। मैं पंडित हूँ। काव्यशास्त्रा का ज्ञाता हूँ। मेरे साथ उचित व्यवहार करो।”
शोर सुनकर महाराज स्वयं राजभवन से बाहर आए और उचटती-सी -ष्टि उस व्यक्ति पर
डाली तथा प्रहरियों से कहा, “इस आदमी को थोड़ा भोजन देकर यहाँ से दूर भगाओ।
अतिथियों के आने का समय हो रहा है।”
शोर करनेवाले व्यक्ति ने महाराज की ओर देखा और मुस्कुराया। चाँदनी के उजास में
महाराज को उसकी मुस्कान पहचानी-सी लगी। मगर महाराज आयोजन की हड़बड़ी में थे
इसलिए उस व्यक्ति पर अधिक ध्यान नहीं दिया और राजभवन में चले गए। प्रहरी उस
व्यक्ति को भगाते, उससे पहले ही वह व्यक्ति बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया। थोड़ी ही

देर में महाराज के आमंत्रित अतिथियों का आगमन होने लगा। एक से बढ़कर एक परिधान
में सजे-धजे लोगों के आने का क्रम थोड़ी देर तक जारी रहा फिर थम सा गया। राजभवन के
भोजन-कक्ष मंे लोगों की सज-धज देखकर ऐसा लगता था मानो कुबेर के कक्ष में देवताओं
की जमघट लगी हो!
महाराज स्वयं अतिथियों को आसन ग्रहण करने के लिए उनके लिए निर्धारित आसनों की
ओर इंगित कर रहे थे। सभी आसन भर चुके थे, मात्रा तेनाली राम का आसन रिक्त था।
महाराज बार-बार उस रिक्त आसन की ओर देखते और फिर प्रवेश द्वार की ओर उनकी -ष्टि
जाती। मन-ही-मन महाराज को तेनाली राम की अनुपस्थिति उत्तेजित कर रही थी। वे
सोच रहे थे-कितना ढीठ है यह तेनाली राम! उसे यह ज्ञान है कि भोजन किसके सान्निध्य में
करना है फिर भी वह निर्धारित समय पर नहीं आया। लेकिन मन में उठते आक्रोश को पी
जाने के अलावा महाराज कर भी क्या सकते थे। वहाँ उपस्थित सभासदों को तेनाली राम
की अनुपस्थिति से उसके विरुद्ध आग उगलने का अवसर मिल गया। वे आपस में तेनाली
राम की अनुपस्थिति का मजाक उड़ाने लगे। कोई कहता-तेनाली राम अपनी पगड़ी की तहें
सजाने में लगा होगा, तो कोई कहता-अरे भाई, तेनाली राम अपनी रेशमी धोती का फेंटा
कसने में लगा होगा। फेंटा कस ले, तो आएगा...और इस तरह की बातें खत्म भी नहीं हो
पातीं कि सभी ही-ही, ही-ही करने लग जाते।
अन्ततः तेनाली राम ने भोजन-कक्ष में प्रवेश किया। सचमुच, बहुत आकर्षक परिधान में
सजा-धजा था तेनाली राम। महाराज ने उसकी ओर आग्नेय -ष्टि से देखा मगर कुछ कहा
नहीं। -ष्टिमात्रा से ही उन्होंने तेनाली राम के प्रति अपना आक्रोश अभिव्यक्त कर दिया। बड़े
और सामर्थ्यवान लोग परिस्थिति विशेष में अपनी आंगिक भंगिमाओं से ही अपने
मनोभावांे को व्यक्त करते हैं। महाराज के मनोभावों को समझते हुए तेनाली राम ने
महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये और कहा, “महाराज! क्षमा करें। यहाँ समय पर
उपस्थित नहीं हो पाया।”
महाराज आक्रोश में तो थे ही, तेनाली राम का अनुनय सुनकर उनकी उत्तेजना शान्त न
रह सकी और व्यंग्योक्ति में प्रकट हुई, “हाँ, देख रहा हूँू, आपका कुर्ता बहुत चमक रहा
है।”
महाराज की व्यंग्योक्ति सुनकर सारे अतिथि-सभासद ठठाकर हँस पड़े। तेनाली राम ने
इसी ठहाके के बीच अपना आसन ग्रहण किया। तेनाली राम की ओर महाराज ने देखा तो
उसे अतिशय गम्भीर पाया। महाराज सोचने लगे कि तेनाली राम के प्रति उन्हें
व्यंग्योक्तियों का व्यवहार नहीं करना चाहिए था। क्या पता, किस परिस्थिति में था वह!
बिना जाने-समझे इस तरह का व्यवहार किसी राजा के लिए कदापि शोभनीय नहीं है। यह
तो उच्छृंखलता है। हो सकता है कि तेनाली राम किसी संकट में पड़ गया हो जिसके कारण
वह समय पर नहीं पहँुच पाया।