तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 118 में से
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महाराज के अनुरोध पर पुजारी एक सप्ताह तक विजयनगर में अतिथि के रूप में रहे।
महाराज ने उनकी सेवा में अपना दो घोड़ोंवाला रथ और सारथी प्रस्तुत कर दिया था
जिसके कारण पुजारी ने महाराज कृष्णदेव राय के राज्य के सभी मन्दिरों का दर्शन किया
और अन्त में राजमहल के परिसर में बने मन्दिर में देव दर्शन के लिए पधारे।
मन्दिर का निर्माण बहुमूल्य श्वेत प्रस्तरों से कराया गया था किन्तु पुजारी ने उसमें
वास्तुदोष देखा तथा अपने निर्देशन में उस वास्तुदोष को यथाशीघ्र दूर कराने का प्रस्ताव
दिया। महाराज पहले से ही पुजारी से प्रभावित थे इसलिए जब मन्दिर का वास्तुदोष दूर
कराने की बात उठी तब उन्होंने सहजता से उसे स्वीकार कर लिया। अन्ततः वह दिन भी
आ गया जब पुजारी जी को विदा होना था। विदाई से पूर्व महाराज ने राजभवन में
त्रिपुंड्रधारी पुजारी के अभिनन्दन का कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें तेनाली राम सहित
सभी सभासदों को उपस्थित रहने का विशेष निर्देश महाराज ने दिया था।
त्रिपुंड्रधारी पुजारी के प्रति उपकृत भाव में महाराज ने सभासदों को सम्बोधित किया
और अपने अभिनन्दन के बाद त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने भी सभासदों को अपना कार्य
एकाग्रचित्त और समर्पित भाव से करने का उपदेश दिया।
महाराज ने राजकोष से त्रिपुंड्रधारी पुजारी को पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणा के रूप में
अर्पित कीं।
इस आदर-अनुष्ठान के बाद विदा होते समय पुजारी ने बहुत प्रसन्न होकर महाराज को
आशीष दिया, “महाराज, आपके पाँव में खुजली होती रहे और आपके सभासद लगातार
चिन्तातुर रहें।”
पुजारी का यह आशीर्वाद सुनकर महाराज कृष्णदेव राय मानो आसमान से गिरे। सभी
सभासद भौचक्के रह गए। पुजारी मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए राजभवन से बाहर जाने लगे।
उन्हें स्वर्णमुद्राओं के साथ इस तरह बाहर जाता देखकर एक सभासद उग्र हो उठा और
राजभवन की मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए चीख उठा, “अबे ओ ढोंगी! तू हमें और
हमारे महाराज को अभिशंस कर इस तरह नहीं जा सकता। ठहर!”
उसकी कर्कश चीख से महाराज की तन्द्रा भंग हुई। वे यह नहीं समझ पाए थे कि इतनी
आवभगत और भरपूर दक्षिणा के बाद भी त्रिपुंड्रधारी पुजारी ने उन्हें शाप क्यों दिया? वे
चूँकि उन पुजारी में आस्था रखते थे इसलिए उग्र नहीं हुए किन्तु वे उनके साथ अपने
व्यवहार की मन-ही-मन मीमांसा करते रहे कि त्रिपुंड्रधारी ने उन्हें क्या कहा और क्यों
कहा।