तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेते हो?”
व्यवस्थापक ने हँसते हुए कहा, “गधा मत कहो! उसका एक गधा दो आदमी के बराबर है
हमारे लिए। सौदागर एक कमरे में रहता है मगर ग्यारह कमरों का किराया चुकाता है।”
तेनाली राम की उत्सुकता और बढ़ गई। वह महाराज के साथ सौदागर के कमरे की ओर
चल पड़ा।
महाराज की भी दिलचस्पी उस सौदागर के प्रति हो आई थी।
तेनाली राम ने कन्धारवाले सौदागर के कमरे के सामने पहुँचकर द्वार खटखटाया। वैसे
कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और सौदागर अपने गधों को सहला रहा था। उसने
दरवाजे की तरफ देखा तो दो सौदागरों को दरवाजे पर खड़ा पाया। किन्तु बिना कोई
प्रतिक्रिया जताए वह फिर अपने गधों को सहलाने लगा।
तेनाली राम और महाराज चकित रह गए कि इस सौदागर ने उन्हें कुछ कहा नहीं। फिर
तेनाली राम ने ही पहल की और पूछा, ”आ जाऊँ?”
”तुम्हारी मर्जी।” सौदागर गधे को सहलाते हुए बोला। उसकी आँखें गधे पर इस तरह
टिकी थीं मानो वह गधा न हो, दुनिया की कोई नायाब वस्तु हो!
तेनाली राम और महाराज दोनों कमरे में प्रवेश कर गए लेकिन उसने उन्हें बैठने को नहीं
कहा और गधे को उसी तरह सहलाता रहा मानो वह संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण काम कर
रहा हो।
तेनाली राम और महाराज पास की दीवार के सहारे कमरे में बिछी चटाई पर बैठ गए।
सौदागर ने अपने पाँच गधों में से दो गधों को कमरे में लगी दो खूँटियों से बाँध दिया।
उसके तीन गधे खुले रहे।
पहली बार सौदागर ने उन दोनों की ओर बहुत प्रेम से देखा। लगभग उसी -ष्टि से जिस -
ष्टि से वह अपने गधों को देख रहा था। फिर उन्हें मुस्कुराता हुआ देखता रहा। कुछ बोला
नहीं।
महाराज ने फिर चुप्पी तोड़ी, “सुना, कन्धार से आते हो?”
सौदागर ने उनके प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया और महाराज के सामने हाथ फैला दिया।
बोला, “मैं उत्तर देने के पैसे लेता हूँ। निकालो पाँच स्वर्णमुद्राएँ फिर बात करो। यदि
तुम्हारा साथी भी कुछ जानना चाहे तो उसके भी पाँच स्वर्णमुद्राएँ?”