तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ें”जो आज्ञा महाराज!“ तेनाली राम ने विनम्रतापूर्वक कहा और एक भरपूर -ष्टि सभासदों
पर डाली।
सभा में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा-सा छा गया। फिर खुसुर-फुसुर की आवाजें उभरने
लगीं। तेनाली राम सभा में अपने आसन के पास खड़ा था। माथे पर रेशमी साफा बाँधे
आभिजात्य परिधान में सजे तेनाली राम को देखकर सभासदों की फुसफुसाहटें तेज हो रही
थीं। उनमें से कुछ सभासद खीं-खीं करके हँस भी रहे थे।
महाराज ने भी सभासदों की फुसफुसाहटों और दबी-दबी-सी हँसी को सुना और वे समझ
गए कि सभासद तेनाली राम के वस्त्रा आदि को लक्ष्य करके हँस रहे हैं।
”महाराज!“ तेनाली राम ने गम्भीर स्वरों में कहना आरम्भ किया, “परिवेश और
परिस्थिति के अनुकूल परिधान पहनना नीति अनुकूल है। समाज में उचित स्थान प्राप्त
करने के लिए उचित परिधान का उपयोग करना व्यवहारशास्त्रा का प्रारम्भिक उपदेश है।
व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का ज्ञान तो तब होता है जब उसे बोलने का अवसर प्राप्त हो किन्तु
वस्त्रा तो दूर से ही बतला देता है कि उसे धारण करनेवाला व्यक्ति किस उचित आसन का
अधिकारी है।”
“...तो तुम कहना चाहते हो कि व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की अपेक्षा उसका बाह्य
परिधान अधिक महत्त्वपूर्ण है?” महाराज ने प्रश्न किया और सभासद ही-ही करते हुए हँसने
लगे।
हँसनेवाले सभासद इस बात पर प्रसन्न थे कि महाराज कृष्णदेव राय के प्रश्न में तेनाली
राम के विचारों से असहमति के संकेत थे।
तेनाली राम उसी सहजता से बोल पड़ा, “नहीं, महाराज! मैं तो यह कह रहा हूँ कि
परिधान के अभाव में व्यक्ति के आन्तरिक गुणों की पहचान नहीं हो पाती और व्यक्ति को
उपेक्षित होना पड़ता है।”
महाराज ने विस्मय-भरी -ष्टि से तेनाली राम को देखा। सभासदों ने शोर करते हुए
तेनाली राम की टिप्पणी से असहमति जताई। महाराज ने थोड़ी देर तक चुप्पी साधे रखी
फिर धीरे से पूछा, “तेनाली राम! सारे सभासद, लगता है, तुम्हारी राय से सहमत नहीं हैं।
क्या अब भी तुम अपनी टिप्पणी पर -ढ़ हो?”
“जी हाँ, महाराज! मैंने जो भी कहा, उसमें मेरा कुछ भी नहीं, यह आर्ष वचन है और
शाश्वत है, चिरन्तन है। यह हर युग में ऐसा ही था, है और रहेगा।” तेनाली राम ने कहा।
“तुम इसे प्रमाणित कर सकते हो?” महाराज ने पूछा।