सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 118 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

इसी सराहना और उल्लास के स्वरों के बीच उस विद्वान ने सभासदों की ओर देखते हुए
महाराज से कहा, “महाराज! अब मेरी एक चुनौती है- सभाभवन में उपस्थित किसी भी
सभासद को या सभी सभासदों को कि इनमें से कोई भी यदि मेरी मातृभाषा बता दे तब मैं
उसको एक भी स्वर्णमुद्राएँ दूँूँगा। यदि कोई भी ऐसा न कर सके तब आप मुझे एक भी
स्वर्णमुद्राएँ देकर विदा करेंगे!”
सभासदों के बीच सन्नाटा छा गया।
महाराज भी मुश्किल में थे। वे भी नहीं समझ पाए कि यह विद्वान आखिर कहाँ का
रहनेवाला हो सकता है और कौन-सी भाषा इसकी मातृभाषा हो सकती है।
उन्होंने तेनाली राम की ओर देखा।
तेनाली राम भी शान्त था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
उस विद्वान ने सभी के ऊपर भरपूर -ष्टि डाली और बोला, “महाराज! मैं सभी की सुविधा
के लिए बारी-बारी से विभिन्न भाषाओं में बोल रहा हूँू ताकि यह अनुमान लगाना आसान
हो जाए कि मेरी मूल मातृभाषा कौन-सी है।”
उस विद्वान के बोल लेने के बाद सभाभवन में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मानो वहाँ कोई
हो ही नहीं।
महाराज ने फिर तेनाली राम की ओर देखा।
तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मैं इस विद्वान की मातृभाषा बता दूँूँगा
मगर इन्हें एक दिन के लिए,...नहीं! एक रात के लिए मेरा अतिथि बनकर रहना होगा।”
महाराज ने कहा, “क्यों, तेनाली राम, अभी ही क्यों नहीं बताते?”
“बस, यूँू ही महाराज! मेरी इच्छा है कि माँ सरस्वती के इस वरद-पुत्र की सेवा का
अवसर मुझे प्राप्त हो।” तेनाली राम ने कहा।
विद्वान व्यक्ति सम्मान का भूखा होता है। सम्मान मिलने से उसके अहंकार को सन्तुष्टि
मिलती है। इस विद्वान को तेनाली राम का प्रस्ताव पसन्द आया। उसने महाराज से कहा,
“महाराज! मैं यह आतिथ्य ग्रहण करने के लिए तत्पर हूँ। लेकिन शर्त है कि यदि ये मेरी
मातृभाषा नहीं बता पाए तो इन्हें एक भी स्वर्णमुद्राएँ मुझे इन सभी सभासदों के समक्ष ही
देनी पड़ेगी।”
तेनाली राम ने कहा, “महाराज! मुझे इन जैसे विद्वान के साहचर्य और सान्निध्य के लिए