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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 118 में से

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परिणति है।” उसने भी उस सभासद की ओर कटाक्ष भरी -ष्टि से देखा।
उसे ऐसा करते महाराज कृष्ण चन्द्र राय ने देख लिया और वे भाँप गए कि सभा में इस
समय जो विमर्श हो रहा है उसके केन्द्र में उनका वह सभासद है जो अब तक मौन बैठा है-
निर्लिप्त और निस्पन्द-सा, मानो इन बातों में कोई सार ही न हो! महाराज अपने इस
सभासद की योग्यता के कायल थे। वे जानते थे कि अध्ययन और योग्यता की उसमें कोई
कमी नहीं है। उन्हें अपने इस सभासद का मौन खल रहा था। वे चाहते थे कि वह बोले और
व्यक्ति के बाह्य आवरण और आन्तरिक गुणों पर अपने विचार व्यक्त करे। मगर वह सभासद
था कि किसी भी कटाक्ष पर ध्यान नहीं दे रहा था और न किसी के तर्क पर अपनी कोई
प्रतिक्रिया ही प्रकट होने दे रहा था।
महाराज से रहा नहीं गया। उन्होंने अपने उस सभासद की ओर देखा और उसे टोका, तुम
मौन क्यों हो? तुम भी अपने विचार व्यक्त करो। सभा में इतनी देर से चर्चा का दौर चल
रहा है-तुम भी तो बताओ कि वस्त्रा तो केवल तन ढँकने के लिए अपेक्षित है, फिर क्यों कुछ
लोग बाह्य सज्जा पर अनाप-शनाप व्यय करते हैं? असली सौन्दर्य तो मन का सौन्दर्य है,
फिर क्यों वस्त्रा-आभूषण-अलंकरण पर इतना ध्यान दिया जाता है?“
उस सभासद ने अपने आसन से उठकर महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये। यह सभासद
कोई और नहीं, गुंटूर जिले के गलीपाडु ग्राम से विजयनगर आया कृष्ण स्वामी तेनाली राम
मुदलियार था जिसे हाल में ही महाराज ने अपना सभासद बनाया था।
महाराज को अभिवादन करने के बाद तेनाली राम ने कहा, “महाराज, मुझे क्षमा करें! मैं
इस सभा मं े चल रहे विचार-विमर्श को गम्भीर नहीं मानता। मैं विश्वासपूर्वक कह सकता
हूँ िक इन बातों का न तो कोई अर्थ है और न ही ये बातें किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकती
हैं। मेरी इस धारणा के प्रति आम सहमति भी नहीं हो सकती क्योंकि प्रायः सभी सभासदों
की राय है कि वस्त्रा का प्रयोजन मात्रा तन ढँकना होना चाहिए...जबकि मैं ऐसा नहीं
मानता। सभा में अभी जो भी बातें हो रही हैं, उसका प्रयोजन, मुझे नहीं लगता कि किसी
निष्कर्ष पर पहुँचने का है। मुझे तो लगता है कि ये बातें केवल बातों के लिए हो रही हैं
जिससे सभा का समय कट जाए। मुझे इस तरह की बातों में कोई रुचि नहीं है, महाराज!
जिसके कारण मैं मौन हूँ।”
महाराज को तेनाली राम से इस तरह के उत्तर की प्रत्याशा नहीं थी जिसके कारण वे
विस्मित हो गए मगर उन्हें लगा कि उसने जो कुछ भी कहा है वह सच है, फिर भी उनकी
उत्सुकता बनी रही कि आखिर इस विषय में तेनाली राम स्वयं क्या सोचता है। इसलिए
उन्होंने तेनाली राम से कहा, “नहीं, तेनाली राम, यूँ प्रश्न टालने से काम नहीं चलेगा।
तुम्हें अपनी राय व्यक्त करनी ही चाहिए। इतने लोगों ने इस प्रसंग में सभा के समक्ष अपनी
राय रखी और तुमसे सबकी यही अपेक्षा होनी चाहिए कि तुम भी अपनी सोच से सभा को
अवगत कराओगे।”