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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

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मीमांसक परिशिष्ट ( ङ )
( श्लोक ११ और १२ )
मीमांसकोंके आचार विचार
मीमांसक दर्शनको जैमिनीय दर्शन भी कहते हैं। मीमांसक लोग उपनिषदोंसे पूर्ववर्ती वेदोंको ही
प्रमाण मानते हैं, इसलिये ये पूर्वमीमांसक कहे जाते हैं। मीमांसक धूममार्गके अनुयायी होते हैं। ये यज्ञ-यागके
द्वारा देवताओंको प्रसन्न करके स्वर्गकी प्राप्ति ही अपना मुख्य धर्म समझते हैं। १ मीमांसक वैदिक हिंसाको
हिंसा नहीं मानते, पितरोंको तृप्त करनेके लिये श्राद्ध करते हैं, देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये मांसकी आहुति
देते हैं, तथा अतिथियोंका मधुपर्क आदिसे सत्कार करते हैं। पूर्वमीमांसावादियोंको कर्ममीमांसक भी कहते
हैं। "मीमांसक साधु कुकर्मसे रहित होते हैं, यजन आदि छह् कर्मोंमें रत रहते हैं, ब्रह्मसूत्र रखते हैं, और
गृहस्थाश्रममें रहते हैं। ये लोग सांख्य साधुओंकी तरह एकदण्डी अथवा त्रिदंडी होते हैं। ये गेरुआ रंगके
वस्त्र पहिनते हैं, मृगचर्मके ऊपर बैठते हैं; कमण्डलु रखते हैं और सिर मुं

३४० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रतिपादक होनेसे ज्ञानके साधन हैं, तथा अपौरुषेय होनेके कारण स्वतः प्रमाण हैं ।१ वेदवाक्योंका
अनुमान प्रमाणसे खण्डन नहीं हो सकता, क्योंकि अनुमान प्रमाण वेद प्रमाणसे बहुत निम्न कोटिका
है। वेदके अपौरुषेय होनेपर भी अव्यच्छिन्न अनादि सम्प्रदायसे वेद वाक्योंके अर्थका ज्ञान होता है ।
वेदवाक्य लौकिक वाक्योंसे भिन्न होते हैं जैसे 'अग्निमीळे पुरोहितम्', 'ईषे त्वोर्जे त्वा', 'अग्न आयाहि
वोतये' आदि। वेद दो प्रकारका होता है—मंत्र रूप और ब्राह्मण रूप। यह मंत्र और ब्राह्मण रूप
वेद विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध और अर्थवादके भेदसे पाँच प्रकारका है। २ विधिसे धर्म संबंधी नियमोंका
ज्ञान होता है जैसे—'स्वर्गके इच्छुकको यज्ञ करना चाहिये' यह विधि है। अपूर्व, नियम, परिसंख्या, उत्पत्ति,
विनियोग, प्रयोग, अधिकरण आदिके भेदसे विधिके अनेक भेद होते हैं। मंत्रसे याज्ञिकको यज्ञ सम्बन्धी देव-
ताओं आदिका ज्ञान होता है। नामधेयसे यज्ञसे मिलनेवाले फलका ज्ञान होता है। निषेध विधिका ही दूसरा
प्रकार है। निन्दा, प्रशंसा, परकृति और पुराकल्पके भेदसे अर्थवाद चार प्रकारका होता है।
२. शब्दकी नित्यता—मीमांसक वेदको नित्य और अपौरुषेय मानते हैं, इसलिये इनके मतमें
शब्दको भी नित्य और सर्वव्यापक स्वीकार किया गया है ३ । मीमांसकोंका कहना है कि हमें एक स्थानपर
प्रयुक्त गकार आदि वर्णोंका, सूर्यकी तरह, प्रत्यभिज्ञानके द्वारा सब जगह ज्ञान होता है, इसलिये शब्दको
नित्य मानना चाहिये । तथा, एक शब्दका एक बार संकेत ग्रहण कर लेनेपर कालान्तरमें भी उस संकेतसे
वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् ।
वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ।।
इत्यनुमानं प्रतिसाधनं प्रगल्भत इति चेत् । तदपि न प्रमाणकोटिं प्रवेष्टुमीष्टे ।
भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकं ।
भारताध्ययनत्वेन सांप्रताध्ययनं यथा ।।
इत्याभाससमानयोगक्षेमत्वात् । ननु तत्र व्यासः कर्तेति स्मर्यते ।
को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् ।
इत्यादाविति चेत् । तदप्यसारम् । ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ( तै०
आ० ३-१२ ) इति पुरुषसूक्ते वेदस्य सकर्तृकता प्रतिपादनात् । किं चानित्यः शब्दः सामान्यवत्त्वे सत्य-
स्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वाद्घटवत् । नन्विदमनुमानं स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञाप्रमाणप्रतिहतमिति
चेत् । तदतिफल्गु । लूनपुनर्जातकेशदलितकुन्दादाविव प्रत्यभिज्ञायाः सामान्यविषयत्वेन बाधकत्वाभावात् ।
नन्वशरीरस्य परमेश्वरस्य ताल्वादिस्थानाभावेन वर्णोच्चारणासंभवात्कथं तत्प्रणीतत्वं वेदस्य स्यादिति
चेत् । न तद्भद्रम् । स्वभावतोऽशरीरस्यापि तस्य भक्तानुग्रहार्थं लीलावियग्रहग्रहणसंभवात् । तस्माद्वेदस्या-
पौरुषेयत्ववाचोयुक्तिः न युक्ता । सर्वदर्शनसंग्रह-जैमिनिदर्शन ।
१. वेदान्ती लोग वेदको अपौरुषेय और आदिमान्, तथा सांख्य लोग वेदको पौरुषेय और आदिमान् मानते हैं।
२. मन्त्र और ब्राह्मण रूप वेदके चार भेद हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद । ऋग्वेदकी दस,
यजुर्वेदकी छियास्सी, सामवेदकी एक हजार ( ये अनध्यायके दिनोंमें पढ़ी जानेके कारण इन्द्रके वज्रसे
नष्ट हो गई मानी जाती हैं ) और अथर्ववेदकी नौ शाखायें हैं । ऋग्वेदका आयुर्वेद, यजुर्वेदका धनुर्वेद,
सामवेदका गान्धर्ववेद और अथर्ववेदका अर्थशास्त्र ( स्थापत्य ) ये चारों वेदोंके चार उपवेद होते हैं ।
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छह वेदके अंग, तथा पुराण, न्याय, मीमांसा
और धर्मशास्त्र ये चार उपांग हैं। ऋग्वेदका एतरेयब्राह्मण, यजुर्वेदका तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मण,
सामवेदका गोपथब्राह्मण तथा अथर्ववेदका ताण्ड्यब्राह्मण ये वेदोंके ब्राह्मण हैं ।
३. शब्दो नित्यः व्योममात्रगुणत्वात् व्योमपरिमाणवत्-प्रभाकर ।
शब्दो नित्यः निस्स्पर्शद्रव्यत्वात् आत्मवत्-भट्ट ।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३४१
शब्दके अर्थका ज्ञान होता है। यदि शब्द नित्य न होता तो हमारे पितामह आदिसे निश्चित किये हुए शब्दोंके
संकेतसे हमें उसी अर्थका ज्ञान न होता, इसलिये शब्दको नित्य ही मानना चाहिये। यदि कहो कि शब्दको
नित्य स्वीकार करनेपर सब लोगोंको हमेशा शब्द सुनाई देने चाहिये, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस समय
प्रत्येक वर्ण संबंधी तालु, ओष्ठ आदिका वायुसे संबंध होता है, उसी समय शब्दकी अभिव्यक्ति होती है। जिस
समय मनुष्य यत्नसे किसी शब्दका उच्चारण करता है, उस समय वायु नाभिसे उठकर, उरमें विस्तीर्ण हो,
कण्ठमें फैल, मस्तकमें लग वापिस आती हुई नाना प्रकारके शब्दोंकी अभिव्यक्ति करती है, इसलिये शब्दकी
व्यंजक वायुमें ही उत्पत्ति और विनाश होता है। अतएव शब्दको नित्य मानना चाहिये। १
३. ईश्वर और सर्वज्ञ—मीमांसक ईश्वरको सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता नहीं मानते। उनके मतमें
अपूर्व ही यज्ञ आदिका फल देनेवाला है, इसलिये ईश्वरको जगत्का कर्ता माननेकी कोई आवश्यकता नहीं
रहती। वेदोंको बनानेके लिये भी ईश्वरकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वेद अपौरुषेय होनेसे स्वतः प्रमाण हैं।
मीमांसकोंका कथन है कि यदि ईश्वर शरीर रहित होकर सृष्टिका सर्जन करता है तो अशरीरी ईश्वरके
जगत्के सर्जन करनेकी इच्छाका प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। यदि ईश्वर शरीर सहित होकर जगत्‌को बनाता
है तो ईश्वरके शरीरका भी कोई दूसरा कर्ता मानना चाहिये। परमाणुओंको ईश्वरका शरीर मानना भी
ठीक नहीं। क्योंकि बिना प्रयत्नके परमाणुओंमें क्रिया नहीं हो सकती। तथा, ईश्वरके प्रयत्नको नित्य माननेसे
परमाणुओंमें सदा ही क्रिया होती रहनी चाहिये। ईश्वरको धर्म-अधर्मका अधिष्ठाता भी नहीं मान सकते।
क्योंकि संयोग अथवा समवाय किसी भी संबंधसे धर्म और अधर्मका ईश्वरके साथ संबंध नहीं हो सकता।
तथा, यदि ईश्वर सृष्टिका कर्ता है, तो वह दुखी जगत्की क्यों रचना करता है ? जीवोंके भूत कर्मोंके कारण
ईश्वर द्वारा दुखी जीवोंकी सृष्टि मानना भी ठीक नहीं। क्योंकि जिस समय ईश्वरने सृष्टि की, उस समय कोई
भी जीव मौजूद नहीं था। दयासे प्रेरित होकर भी ईश्वरकी सृष्टि रचनाको नहीं मान सकते, क्योंकि सृष्टिको
बनानेके समय प्राणियोंका अभाव था। फिर भी यदि अनुकंपाके कारण जगत्का सर्जन माना जाय, तो
ईश्वरको सुखी प्राणियोंको ही जन्म देना चाहिये था। क्रीड़ाके कारण भी सृष्टिका निर्माण नहीं मान सकते।
क्योंकि ईश्वर सर्वथा सुखी है, उसे क्रीड़ा करनेकी आवश्यकता नहीं है। ईश्वर सृष्टिकी रचना करके फिर
उसका संहार क्यों करता है ? इसका कारण भी समझमें नहीं आता। इसलिये बीजवृक्षकी तरह अनादि
कालसे सृष्टिकी परंपरा माननी चाहिये। वास्तवमें नित्य और अपौरुषेय वेदोंके वाक्य ही प्रमाण हैं। कोई
अनादि ईश्वर न सृष्टिका निर्माण और न सृष्टिका संहार करता है। २
१. नैयायिक 'सकारणक होनेसे, 'ऐन्द्रियक होनेसे' और 'विनाशी होनेसे' शब्दको अनित्य मानते हैं। देखिये
न्यायसूत्र २-२-१३। न्यायदर्शनमें 'वीचीतरंग' न्यायसे और 'कदम्बकोरक' न्यायसे शब्दकी उत्पत्ति
मानी गई है। वैयाकरण अकार आदि वर्णको नित्य मानते हैं-वर्णो नित्यः ध्वन्यन्यशब्दत्वात् स्फोटवत् ।
२. सर्वज्ञत्वन्निषेध्या च स्रष्टुः सद्भावकल्पना ।
न च धर्मादृते तस्य भवेल्लोकाद्विशिष्टता ॥
न चाऽननुष्ठितो धर्मो नाऽनुष्ठानमृतेः मतेः ।
न च वेदादृते सा स्याद्वेदोन च पदादिभिः ॥
तस्मात् प्रागपि सर्वेऽमी स्रष्टुरासन् पदादयः ।
न हि स्रष्टुरस्मदादिभ्योऽतिशयः सहजः संभवति पुरुषत्वादस्मदादिवदेव । अतो धर्मनिमित्तो वक्तव्यः । न चाऽन-
नुष्ठितो धर्मः कार्यं करोति । न चाऽसतिज्ञानेऽनुष्ठानं संभवति । न च वेदादृते ज्ञानं । न च वेदः पदपदार्थसंबं-
धैर्विना शक्नोति अर्थमवबोधयितुं । अतः प्रागपि सृष्टेः सन्त्येव पदादयः । यथाह मनुः —
सर्वेषां च स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥
श्लोकवार्तिक संबंधाक्षेपपरिहार श्लोक ११४-११६ न्यायरत्नकार टीका।

३४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
मीमांसक सर्वज्ञको भी नहीं मानते। मीमांसकोंका कहना है कि सर्वज्ञकी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे
उपलब्धि नहीं होती, इसलिये उसका अभाव ही मानना चाहिये। तथा मनुष्यकी प्रज्ञा, मेधा आदिमें थोड़ा
बहुत ही अतिशय पाया जा सकता है। जिस प्रकार व्याकरणशास्त्रका प्रकृष्ट पंडित ज्योतिषशास्त्रका ज्ञाता
नहीं कहा जा सकता, जिस प्रकार वेद, इतिहास आदिका विद्वान् स्वर्गोंके देवताओंको प्रत्यक्षसे जाननेमें पंडित
नहीं कहा जा सकता, जिस प्रकार आकाशमें दश योजन कूदनेवाला मनुष्य सैकड़ों प्रयत्न करनेपर भी एक
हज़ार योजन नहीं कूद सकता, और जिस प्रकार कर्ण इन्द्रियमें अतिशय होनेपर भी उससे रूपका ज्ञान नहीं
हो सकता, उसी तरह प्रकृष्टसे प्रकृष्ट ज्ञानी भी अपने विषयका अतिक्रमण न करके ही इन्द्रियजन्य पदार्थोंका
ही ज्ञान कर सकता हैं। कोई भी प्राणी संपूर्ण लोकोंके संपूर्ण समयोंके संपूर्ण पदार्थोंका ज्ञाता नहीं हो सकता।
अतएव कोई अतींद्रिय पदार्थोंके साक्षात्कार करनेवाला सर्वज्ञ नहीं है।१
४. प्रमाणवाद—मीमांसक पहले नहीं जाने हुए पदार्थोंको जाननेको प्रमाण मानते हैं। प्रभाकर मत-
के अनुयायो प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति ये पांच, और कुमारिल भट्ट इन पांच प्रमाणोंमें अभा-
वको मिलाकर छह प्रमाण स्वीकार करते हैं। मीमांसक स्मृतिज्ञानके अतिरिक्त सम्पूर्ण ज्ञानोंको स्वतः प्रमाण
मानते हैं। मीमांसकोंका कहना है कि ज्ञानकी उत्पत्तिके समय ही हमें पदार्थोंका ज्ञान ( ज्ञप्ति ) होता है।
अतएव ज्ञान अपनी उत्पत्तिमें और पदार्थोंके प्रकाश करनेमें किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता। जिस समय
हमें कोई ज्ञान होता है, वह ज्ञान स्वतः ही प्रमाण होता है, तथा ज्ञानके स्वतः प्रमाण होनेसे ही हमारी पदा-
र्थोंमें प्रवृत्ति होती है। इसलिये ज्ञानके उत्पन्न होते ही ज्ञानके प्रामाण्यका पता लग जाता है। यदि ऐसा न
हो तो हमारी पदार्थोंमें प्रवृत्ति न होनी चाहिये। परन्तु अप्रामाण्य ज्ञानमें यह बात नहीं होती। कारण कि
मिथ्या ज्ञानमें हमारी इन्द्रियों आदिमें दोष होनेके कारण उत्तरकालमें होनेवाले बाधक ज्ञानसे ही हमारे ज्ञान-
का अप्रामाण्य सिद्ध होता है। अतएव मीमांसकोंके मतमें स्मृति ज्ञानको छोड़कर प्रत्येक ज्ञान, जब तक कि वह
उत्तरकालमें किसी बाधक ज्ञानसे अप्रमाण रूप सिद्ध नहीं होता, स्वतः प्रमाण कहा जाता है, और उत्तरकालमें
वही ज्ञान अप्रमाण सिद्ध होनेपर परतः कहा जाता है। नैयायिक मीमांसकोंके स्वतः प्रामाण्यवादका विरोध
करते हैं, प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनोंको परतः मानते हैं। सांख्य प्रामाण्य और अप्रामाण्य को स्वतः, जैन दोनोंको
कथंचित् स्वतः और कथंचित् परतः, तथा बौद्ध अप्रामाण्य ज्ञानको स्वतः और प्रामाण्यको परतः मानते हैं।२
आत्मा—मीमांसक लोग आत्माके अस्तित्वको स्वीकार करते हैं। इनके मतमें आत्माको शरीर,
इन्द्रिय और बुद्धिसे भिन्न मानकर आत्मबहुत्ववादके सिद्धांतको स्वीकार किया गया है। मीमांसक विद्वान्
१. संभवतः मीमांसक लोग ईश्वर और सर्वज्ञका सद्भाव न माननेके कारण 'लोकायत' 'नास्तिक' आदि
नामोंसे कहे जाने लगे थे। कुमारिल भट्टने इस आक्षेपको दूर करनेके लिये श्लोकवार्तिककी रचना कर
उसमें 'आत्मवाद' नामक भिन्न प्रकरण लिखा है—
प्रायेणैव हि मीमांसा लोके लोकायतीकृता ।
तामास्तिकपथे कर्तुमयं यत्नः कृतो मयाः ॥ श्लोकवार्तिक पृ० ४ श्लोक १० ।
तथा—इत्याह नास्तिक्यनिराकरिष्णु—
रात्मास्तितां भाष्यकृदत्र युक्त्या ।
दृढत्वमेतद्विषयश्च बोधः
प्रयाति वेदान्तनिषेवणेन ॥ पृ० ७२८ श्लोक १४८ ।
२. परापेक्षं प्रमाणत्वं नात्मानं लभते क्वचित् ।
मूलोच्छेदकरं पक्षं को हि नामाध्यवस्यति ॥
यदि हि सर्वमेव ज्ञानं स्वविषयतथात्वावधारणे स्वयमसमर्थं विज्ञानान्तरमपेक्षेत ततः कारणगुणसंवादार्थक्रि-
याज्ञानान्यपि स्वविषयभूतगुणाद्यवधारणे परमपेक्षेरन्, अपरमपि तथेति न कश्चिदर्थो जन्मसहस्रेणाप्यध्यव-
सीयेतेति प्रामाण्यमेवोत्सीदेत् । शास्त्रदीपिका पृ० २२ ।

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३४३
कुमारिलभट्ट और प्रभाकरके आत्मा संबंधी सिद्धांतोंमें मतभेद पाया जाता है । कुमारिलके मतमें आत्माको कर्ता,
भोक्ता, ज्ञानशक्तिवाला, नित्य, विभु और परिणामी मानकर अहंप्रत्ययका विषय माना जाता है १ । प्रभाकर
भी आत्माको कर्ता, भोक्ता और विभु स्वीकार करते हैं, परन्तु वे आत्मामें परिवर्तन नहीं मानते २ । प्रभा-
करके सिद्धांतके अनुसार आत्मा ज्ञाता है और पदार्थ ज्ञेय हैं । ज्ञाता और ज्ञेय एक नहीं हो सकते, इसलिये
आत्मा कभी स्वसंवेदनका विषय नहीं हो सकता । यदि आत्माको स्वसंवेदक माना जाय तो गाढ़ निद्रामें भी
ज्ञान मानना चाहिये ।
मोक्ष—गौतमधर्मसूत्र आदि धर्मशास्त्रोंमें धर्म, अर्थ और काम केवल इन तीन पुरुषार्थोंको मानकर
धर्मको ही मुख्य पुरुषार्थ स्वीकार किया गया है । मीमांसा दर्शनके प्राचीन आचार्य धर्मको सम्पूर्ण सुखोंका
कारण मानकर उससे स्वर्गकी प्राप्ति करना ही अपना अन्तिम ध्येय समझते थे । इन लोगोंके सामने मोक्षका
प्रश्न इतना बलवान नहीं था । परन्तु उत्तरकालीन मीमांसक आचार्य मोक्ष संबंधी प्रश्नसे अछूते न रह सके ।
प्रभाकरके मतके अनुसार संसारके कारण भूतकालीन धर्म और अधर्मके नाश होने पर शरीरके आत्यन्तिक
रूपसे नाश होनेको मोक्ष कहा है । ३ जिस समय जीवके शम, दम, ब्रह्मचर्य आदिके द्वारा आत्मज्ञान होनेसे
देहका अभाव हो जाता है, उस समय मोक्षकी प्राप्ति होती है । मोक्ष अवस्थाको आनन्द रूप नहीं कह सकते,
क्योंकि निर्गुण आत्मामें आनन्द नहीं रह सकता । इसलिये सुख और दुख दोनोंके क्षय होनेपर स्वात्मस्फुरण
रूप अवस्थाको ही मोक्ष कहते हैं । कुमारिल भट्टके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिकी अवस्था मात्रको मोक्ष कहा
गया है । कुमारिल भी मोक्षको आनंद रूप नहीं मानते । ४ पार्थसारथिमिश्र आदिने भी सुख-दुख आदि समस्त
विशेष गुणोंके नाश होनेको मुक्ति माना है ।
मीमांसक और जैन
मीमांसक याज्ञिक हिंसाको, जातिसे वर्णव्यवस्थाको और वेदके स्वतः प्रमाणको स्वीकार करते हैं ।
परन्तु जैन सांख्य, बौद्ध, आजीविक आदि श्रमण सम्प्रदायोंकी तरह उक्त बातोंका विरोध करते हैं । जैन लोग
हिंसाके उग्र विरोधी हैं । ये लोग जातिसे वर्ण व्यवस्थाको नहीं मानते । ब्राह्मणोंकी मान्यता है कि सबसे
पहले ब्रह्माके मुखसे ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई, उसके बाद ब्रह्माके अन्य अवयवोंसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जन्मे,
इसलिये ब्राह्मण ही सर्वपूज्य हैं । परन्तु आदिपुराण आदि जैन पुराणोंमें इससे विरुद्ध कल्पना देखनेमें
आती है । आदिपुराणके अनुसार पहले पहल जब ऋषभदेव भगवानने असि, मसि आदि छह कर्मोंका उपदेश
किया, उस समय उन्होंने पहले क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी सृष्टि की, और बादमें व्रतधारी श्रावकोंमेंसे ब्राह्मण
१. ज्ञानशक्तिस्वभावोऽतो नित्यः सर्वगतः पुमान् ।
देहान्तरक्षमः कल्प्यः सोऽगच्छन्नेव योक्ष्यते ॥ मी० श्लोकवार्तिक आत्मवाद ७३ ।
२. बुद्धीन्द्रियशरीरेभ्यो भिन्न आत्मा विभुर्ध्रुवः ।
नानाभूतः प्रतिक्षेत्रमर्थवित्तिषु भासते ॥ प्रकरणपंचिका पृ० १४१ ।
३. अतो नाविद्यास्तमयो मोक्षः । अत्यन्तिकस्तु देहोच्छेदो निःशेषधर्माधर्मपरिक्षयनिबंधनो मोक्ष इति सिद्धम् ।
प्रकरणपंचिका पृ० १५६ ।
४. सुखोपभोगरूपश्च यदि मोक्षः प्रकल्प्यते ।
स्वर्ग एव भवेदेष पर्ययेण चयी च सः ॥
न हि कारणवत्किंचिदक्षयित्वेन गम्यते ।
तस्मात्कर्मक्षयादेव हेतुभावेन मुच्यते ॥
न ह्यभावात्मकं मुक्त्वा मोक्षनित्यत्वकारणम् ।
भावरूपं सर्वमुत्पत्तिमद्धर्मकं घटादिक्षयधर्मकमेव । अतो न सुखात्मिका मुक्तिरात्मज्ञानेन क्रियते इति ।....
सिद्धयति चाभावात्मकत्वे मोक्षस्य नित्यता न त्वानन्दात्मकत्वे ।
श्लोकवार्तिक संबंधाक्षेपपरिहार श्लोक १०५-१०७ न्यायरत्नाकर टीका ।

३४४ श्रीमद्राजचन्द्रशास्त्रमालायां
वर्णका जन्म हुआ। वास्तवमें किसीको जातिसे ऊँच अथवा नीच नहीं कहा जा सकता, इसलिये गुण और
कर्मके अनुसार ही वर्णव्यवस्था माननी चाहिये। वैदिक वेदको अपौरुषेय और नित्य होनेके कारण प्रमाण
मानते हैं, और वेदविहित याज्ञिक हिंसाको पाप रूप नहीं गिनते। जैनोंका मानना है कि पूर्वकालीन आर्यवेद
हिंसाके विधानसे रहित, और पूर्वकालीन यज्ञ दयामय होते थे। वर्तमान हिंसाप्रधान वेद बादमें महाकालअसुर-
ने रचे हैं और हिंसामय यज्ञोंका भी प्रचार हुआ है। जैन प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, और द्रव्यानु-
योग इन चार वेदोंको मानते हैं। सिद्धसेन दिवाकरने वेदोंके ऊपर द्वात्रिंशिकाकी रचना की है। भगवानके निर्वा-
णोत्सवके बाद स्वयं इन्द्र और देवोंने श्रावक ब्रह्मचारियोंको गार्हपत्य, परमाहवनीयक और दक्षिणाग्नि नामके तीन
कुंड बना उनमें त्रिसंध्य अग्नि स्थापित करके अग्निहोत्रद्वारा जिन भगवानकी पूजा करनेका उपदेश किया था।
जैन और मीमांसकोंके सिद्धान्तोंकी तुलना करते समय यह बात विशेष रूपसे ध्यान देने योग्य है कि
कुमारिलभट्ट प्रकारान्तरसे जैनोंके अनेकांतवादके सिद्धांतको स्वीकार करते हैं। कुमारिलका पदार्थोंको
उत्पाद, व्यय और स्थिति रूप सिद्ध करना १ अवयवोंको अवयवीसे भिन्नाभिन्न मानना २, वस्तुको स्वरूपपररूपसे
सत्-असत् स्वीकार करना ३, तथा सामान्य और विशेषको सापेक्ष मानना ४, स्पष्ट रूपसे कुमारिलके अनेकांत-
वादके समर्थन करनेको सूचित करता है। तत्त्वसंग्रहकारके कथनसे भी यही मालूम होता है कि निर्ग्रन्थ जैनोंकी
तरह विप्रमीमांसक भी अनेकांतवादके सिद्धांतको मानते थे। ५ गुणरत्न भी मीमांसकोंके प्रकारान्तरसे अनेकांतके
१. वर्धमानकभंगे च रुचकः क्रियते यदा ।
तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिश्चाप्युत्तरार्थिनः ॥
हेमार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद्वस्तु त्रयात्मकम् । श्लोकवार्तिक वनवाद २१-२२ ।
२. पूर्वोक्तादेव तु न्यायात्सिध्येदत्रावयव्यपि ।
तस्याप्यत्यन्तभिन्नत्वं न स्यादवयवैः सह ॥ ७५ ॥
३. स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते केचिद्रूपं किंचित्कदाचन ।
सर्वं हि वस्तु स्वरूपतः सद्रूपं पररूपतश्चासद्रूपं । यथा घटो घटरूपेण सन् पटरूपेणासन् । घटोऽप्यसद्रूपेण भावा-
न्तरे घटादौ समवेतः तस्मिन् स्वीयाऽसद्रूपाकारां बुद्धि जनयति । योऽयं घटः स पटो न भवतीति । मी० श्लोक-
वार्तिक अभावपरिच्छेद १२ न्यायरत्नाकर ।
४. अन्योन्यापेक्षिता नित्यं स्यात्सामान्यविशेषयोः ।
विशेषाणां च सामान्ये ते च तस्य भवन्ति हि ॥
निर्विशेषं न सामान्यं भवेच्छशविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वाच्च विशेषास्तद्वदेव हि ॥
एवं च परिहर्तव्या भिन्नाभिन्नत्वकल्पना ॥
केनचिद्धात्मनैकत्वं नानात्वं चास्य केनचित् ।
गोत्वं हि शाबलेयात्मना बाहुलेयाद्भिद्यते । स्वरूपेण च न भिद्यते । तथा व्यक्तिरपि गुणकर्मजात्यन्तरात्मना
गोत्वाद्भिद्यते । स्वरूपेण च न भिद्यते । तथा व्यक्त्यन्तरादपि व्यक्तिः जात्यात्मना न भिद्यते । स्वरूपेण च
भिद्यते इति । अपेक्षाभेदादविरोधः । समाविशन्ति हि विरुद्धान्यपि एकत्वापेक्षाभेदात् । एकमपि हि किंचिदपेक्ष्य
ह्रस्वं किंचिदपेक्ष्य दीर्घं । तथैकोऽपि चैत्रो द्वित्वापेक्षया भिन्नोऽपि स्वात्मापेक्षया न भिद्यते । अनेन एकानेकत्वमपि
परिहर्तव्यं । तदेव हि वस्तु स्वरूपेण सर्वत्र सर्वदा चैकमपि शाबलेयादिरूपेणानेकं भवतीति न विरोधः ।
मी० श्लोकवार्तिक आकृतिवाद ९।१० तथा ५६ न्यायरत्नाकर ।
देखा पं० हंसराज शर्मा—दर्शन और अनेकांतवाद ।
५. कल्पनारचितस्यैव वैचित्र्यस्योपवर्णने ।
को नामातिशयः प्रोक्तो विप्रनिर्ग्रन्थकापिलैः ॥ तत्त्वसंग्रह पृ० ५०१ ।

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३४५
माननेका उल्लेख करते हैं।$^१$
मीमांसादर्शनका साहित्य
मीमांसासूत्रोंके रचयिता जैमिनी माने जाते हैं। वैदिक परम्पराके अनुसार जैमिनी ऋषि वेदव्यासके
शिष्य थे। वेदव्यासने मूल वेदकी चार संहिताओंकी रचना की और सामवेदकी संहिताको जैमिनीको पढ़ाया।
जैमिनीका समय ईसाके पूर्व २०० वर्ष माना जाता है। जैमिनीसूत्रोंके ऊपर भर्तृमित्र, भवदास, हरि और
उपवर्ष नामके विद्वानोंने टीकायें लिखीं हैं, जो आजकल उपलब्ध नहीं हैं। जैमिनोसूत्रोंपर भाष्य लिखनेवाले
शबरस्वामीका नाम मुख्य रूपसे उल्लेखनीय है। यह शबरभाष्य उत्तरकालके मीमांसक लेखकोंका खास
आधार रहा है। शबरस्वामीके सिद्धांतोंका तत्त्वसंग्रहमें खण्डन है। प्राच्य विद्वान शबरको वात्स्यायनका सम-
कालीन और नागार्जुनका उत्तरकालवर्ती मानते हैं। दूसरे लोग शबरका समय ईसाकी चौथी शताब्दी मानते
हैं। शबरभाष्यके बाद मीमांसकदर्शनके मुख्य विचारक प्रभाकर और कुमारिलभट्ट हो गये हैं। प्रभाकरने
(ई० स० ६५०) शबरभाष्य पर बृहती नामकी टीका लिखी है। शास्त्रीय परम्पराके अनुसार प्रभाकर कुमा-
रिलके शिष्य कहे जाते हैं। इन दोनोंके विचारोंमें मतभेद होनेके कारण दोनोंके सिद्धांतोंकी अलग-अलग
शाखायें हो गई हैं। प्रभाकरका मत गुरुमत के नामसे प्रसिद्ध है।$^२$ बृहती लिखते हुए प्रभाकर कुमारिलके
सिद्धांतोंका उल्लेख नहीं करते जब कि कुमारिल बृहतीकारके मतका उल्लेख करते हुए मालूम होते हैं। इससे
विद्वानोंका मत है कि प्रभाकर कुमारिलके शिष्य नहीं थे, किन्तु वे कुमारिलके पूर्ववर्ती हैं। प्रभाकरकी बृह-
तीके ऊपर प्रभाकरके शिष्य कहे जाने वाले शालिकानाथमिश्रने ऋजुविमला नामको टीका, और प्रभाकरके
सिद्धांतोंके विवेचन करनेके लिये प्रकरणपंचिका नामक ग्रंथ लिखे हैं। प्रभाकरकी बृहती और शालिकानाथकी
ऋजुविमला अभी सम्पूर्ण रूपसे प्रकाशमें नहीं आये, इसलिये प्रकरणपंचिका ही प्रभाकरके सिद्धांतोंको जान-
नेका एक आधार है। कुमारिलभट्ट, भट्टपाद और वार्तिककारके नामसे भी कहे जाते हैं। तिब्बती ग्रंथोंमें
इनको कुमारलील कहा है। कुमारिल (ई० स० ७००) ने शबरभाष्यके ऊपर स्वतंत्र रूपसे टीका लिखी
है। यह टीका श्लोकवार्तिक, तन्त्रवार्तिक और टुपटीका नामके तीन खंडोंमें विभक्त हैं। कुमारिल और उद्यो-
तकर बौद्धदर्शन और न्यायके खंडन करनेके लिये अद्वितीय समझे जाते थे। शान्तरक्षितने तत्त्वसंग्रहमें कुमारिलका
खंडन किया है। कुमारिल धर्मकीर्ति और भवभूतिके समकालीन कहे जाते हैं। कुमारिलके पश्चात् कुमारिलके
अनुयायी मंडनमिश्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है। मंडनमिश्रने विधिविवेक, भावना विवेक, मीमांसानु-
क्रमणी और कुमारिलकी तन्त्रवार्तिककी टीका लिखी है। कहा जाता है कि ये मण्डनमिश्र आगे जाकर वेदा-
न्तमतके अनुयायी हो गये। इसके अतिरिक्त, पार्थसारथिमिश्रने कुमारिलकी श्लोकवार्तिक पर न्यायरत्ना-
कर, तथा शास्त्रदीपिका, तन्त्ररत्न और न्यायरत्नमाला; सुचरितमिश्रने श्लोकवार्तिककी टीका और
काशिका; तथा सोमेश्वरभट्टने तन्त्रवार्तिककी टीका और न्यायसुधा नामके ग्रंथ लिखे। मीमांसादर्शनका ज्ञान
करनेके लिये माधवका न्यायमालाविस्तर, आपदेवका मीमांसान्यायप्रकाश, लौगाक्षिभास्करका अर्थसंग्रह और
खण्डदेवकी भाट्टदीपिका आदि ग्रंथ उल्लेखनीय हैं।
१. मीमांसकास्तु स्वयमेव प्रकारान्तरेणैकानेकाद्यनेकान्तं प्रतिपद्यमानास्तत्प्रतिपत्तये सर्वथा पर्यनुयोगं नार्हन्ति।
षड्दर्शनसमुच्चयटीका।
२. कहा जाता है कि कुमारिलभट्ट 'अत्र तुनोक्तम् तत्रापि नोक्तम् इति पौनरुक्तम्' इस वाक्यका अर्थ नहीं
समझ सके थे। कुमारिलने इसका अर्थ किया, 'यहाँ भी नहीं कहा गया, वहाँ भी नहीं कहा गया, इस-
लिये फिर कहा गया'। प्रभाकरने कहा कि इस वाक्यका यह अर्थ ठीक नहीं, इसका अर्थ करना
चाहिये—'यहाँ यह 'तु' से सूचित किया गया है, और वहाँ 'अपि' से सूचित किया गया है, इसलिये
फिर कहा गया है'। कुमारिल इससे बहुत प्रसन्न हुए और अपने शिष्य प्रभाकरको 'गुरु' कहने लगे।

वेदान्त परिशिष्ट ( च )
( श्लोक १३ )
वेदान्तदर्शन
वेदान्तदर्शनका निर्माण वेदोंके अंतिम भाग उपनिषदोंके आधारसे हुआ है, इसलिये इसे वेदान्त
कहते हैं। वेदान्तको उत्तरमीमांसा अथवा ब्रह्ममीमांसा भी कहते हैं। यद्यपि पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा
दोनों दर्शन मौलिक रूपसे भिन्न-भिन्न हैं, परन्तु बोधायनने इन दर्शनोंको 'संहित' कहकर उल्लेख किया
है, तथा उपवर्षने दोनों दर्शनोंपर टीका लिखी है। इससे विद्वानोंका अनुमान है कि किसी समय पूर्वमीमांसा
और उत्तरमीमांसा एक ही समझे जाते थे। "उत्तरमीमांसक साधु अद्वैतवादी होते हैं। ये ब्राह्मण ही होते
हैं। इनके नामके पीछे भगवत् शब्द लगाया जाता है। ये साधु कुटीचर, बहूदक, हंस और परमहंसके भेदसे
चार प्रकारके होते हैं। कुटीचर लोग मठमें वास करते हैं, त्रिदण्डी होते हैं, शिखा रखते हैं, ब्रह्मसूत्र पहनते हैं,
गृह-त्यागी होते हैं और यजमानोंके घर आहार लेते हैं, तथा एकाध बार अपने पुत्रके यहां भी भोजन करते हैं।
बहूदक साधुओंका वेष कुटीचरोंके समान होता है। ये लोग ब्राह्मणोंके घर नीरस भोजन लेते हैं, विष्णुकी जाप
करते हैं, और नदीके जलमें स्नान करते हैं। हंस साधु ब्रह्मसूत्र और शिखा नहीं रखते, कषाय वस्त्र धारण करते
हैं, दण्ड रखते हैं, गांवमें एक रात और नगरमें तीन रात रहते हैं, धूंआ निकलना बंद होनेपर और आगके बुझ
जानेपर ब्राह्मणोंके घर भोजन करते हैं और देश-देशमें भ्रमण करते हैं। जिस समय हंस आत्मज्ञानी हो जाते
हैं, उस समय वे परमहंस कहे जाते हैं। ये चारों वर्णोंके घर भोजन लेते हैं, इनके दंड रखनेका नियम नहीं है,
ये शक्ति हीन हो जानेपर भोजन ग्रहण करते हैं? १" वेदान्तके माननेवाले आजकल भी भारतवर्ष और उसके
बाहर पाये जाते हैं। जब कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य आदि अन्य भारतीय दर्शनोंकी परम्परा नष्ट-प्राय हो
गई है। ई० स० १६४० में दाराशिकोहने उपनिषदोंका फारसी भाषामें अनुवाद किया था। जर्मन तत्त्ववेत्ता
शोपेनहोर ( Schopenhauer ) ने औपनिषदिक तत्त्वज्ञानसे प्रभावित होकर भारतीय तत्त्वज्ञानकी मुक्त-
कंठसे प्रशंसा की है। शांकर वेदान्तके सिद्धांतोंकी तुलना पश्चिमके आधुनिक विचारक ब्रैडले (Bradley) के
सिद्धांतोंके साथ की जा सकती है।
वेदान्तसाहित्य
वेदान्त दर्शनका साहित्य बहुत विशाल है। सर्वप्रथम वेदान्तदर्शन उपनिषदोंमें, और उपनिषदोंके बाद
महाभारत और गीतामें देखनेमें आता है। तत्पश्चात् औडुलोमि, आश्मरथ्य, काशकृत्स्न,कार्ष्णाजिनि, बादरि,
आत्रेय और जैमिनी वेदान्तदर्शनके प्रतिपादक कहे जाते हैं। इन विद्वानोंका उल्लेख बादरायणने अपने ब्रह्मसूत्रमें
किया है। वेदान्तदर्शनके प्रतिपादकोंमें बादरायणके ब्रह्मसूत्रोंका नाम बहुत महत्त्वका है। ब्रह्मसूत्रोंको वेदान्त-
सूत्र अथवा शारीरकसूत्रोंके नामसे भी कहा जाता है। वेदान्तसूत्रोंके समयके विषयमें विद्वानोंमें बहुत मतभेद
है। वेदान्तसूत्रोंका समय ईसवी सन् ४०० के लगभग माना जाता है। वेदान्तसूत्रोंके ऊपर अनेक आचार्योंने
टीकायें लिखी हैं। बादरायणके पश्चात् ब्रह्मसूत्रोंके वृत्तिकार बोधायनका नाम सबसे पहले आता है। बहुतसे
विद्वान बोधायन और उपवर्ष दोनोंको एक ही व्यक्ति मानते हैं। बोधायन ज्ञानकर्मसमुच्चयके सिद्धांतको मानते
थे। द्रमिडाचार्यने छान्दोग्य उपनिषद्के ऊपर टीका लिखी थी। इस टीकाका उल्लेख छान्दोग्य उपनिषदपर
शांकरी टीकाके टीकाकार आनन्दगिरिने किया है। द्रमिडाचार्य 'भाष्यकार' के नामसे भी कहे जाते थे।
१. गुणरत्नसूरि-षड्दर्शनसमुच्चय टीका।

स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३४७
टंक 'वाक्यकार' के नामसे प्रसिद्ध हो गये हैं। टंकको आत्रेय अथवा ब्रह्मनन्दिन् नामसे भी कहा जाता है।
भर्तृप्रपंच भेदाभेद और ब्रह्मपरिणामवादके सिद्धांतको मानते थे। शंकर और आनंदतीर्थने भर्तृप्रपंचका बृहदा-
रण्यककी टीकामें उल्लेख किया है। औपनिषदिक ऋषियोंके पश्चात् अद्वैत वेदान्तका सुनिश्चित रूप सर्व-
प्रथम गौड़पादकी माण्डूक्यकारिकामें देखनेमें आता है। गौड़पादका समय ईसवी सन् ७८० के लगभग माना
जाता है। शंकर गौड़पाद आचार्यके शिष्य गोविन्दके शिष्य थे। शंकर केवलाद्वैतके प्रतिष्ठापक महान् आचार्य
माने जाते हैं। शंकराचार्यने अनेक शास्त्रोंकी रचना की है। इन शास्त्रोंमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक,
माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक इन दस उपनिषदोंपर, तथा भगवद्गीता और वेदान्तसूत्रोंके
ऊपर टीकाओंका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है। शंकरका समय ईसवी सन् ८०० है। मंडन अथवा मंड-
नमिश्र शंकरके समकालीन माने जाते हैं। मंडनने ब्रह्मसिद्धि आदि अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथोंकी रचना की है।
मंडन दृष्टिसृष्टिवादके प्रतिष्ठापक कहे जाते हैं। ब्रह्मसिद्धिके ऊपर वाचस्पति आदि अनेक विद्वानोंने टीकायें
लिखी हैं। सुरेश्वर शंकरके साक्षात् शिष्य थे। सुरेश्वरका समय ईसवी सन् ८२० है। इन्होंने नैष्कर्म्यसिद्धि,
बृहदारण्यक उपनिषद्-भाष्यवार्तिक आदि ग्रंथ लिखे हैं। नैष्कर्म्यसिद्धिके ऊपर चित्सुख आदिने टीकायें लिखी हैं।
पद्मपाद सुरेश्वरके समकालीन माने जाते हैं। पद्मपाद भी शंकराचार्यके साक्षात् शिष्य थे। पद्मपादने पंच-
पादिका आदि ग्रंथोंकी रचना की है। पंचपादिकाके ऊपर प्रकाशात्मन् आदिने टीकायें लिखी हैं। वेदान्त
दर्शनके प्रतिपादकोंमें मैथिल पंडित वाचस्पतिमिश्रका नाम भी बहुत महत्त्वका है। वाचस्पतिमिश्रने शांकरभा-
ष्यके ऊपर अपनी पत्नीके नामपर भामती, और मण्डनकी ब्रह्मसिद्धिके ऊपर तत्त्वसमीक्षा टीका लिखी है।
सर्वज्ञात्ममुनि सुरेश्वराचार्यके शिष्य थे। सर्वज्ञात्ममुनिने शांकर वेदान्तके सिद्धांतोंका प्रतिपादन करनेके लिये
संक्षेपशारीरक नामका ग्रंथ लिखा है। इनका समय ईसवी सन् ९०० है। इसके अतिरिक्त, आनन्दबोध (११
—१२ शताब्दी) का न्यायमकरन्द और न्यायदीपावलि, श्रीहर्ष (ई० स० ११५०) का खण्डनखण्डखाद्य,
चित्तसुखाचार्य (ई० स० १२५०) की चित्सुखी, विद्यारण्य (ई० स० १३५०) की पंचदशी और जीवन्मुक्ति-
विवेक, तथा मधुसूदनसरस्वती (१६ वीं शताब्दी) की अद्वैतसिद्धि, अप्पयदीक्षित, (१७ वीं शताब्दी) का
सिद्धांतलेश, और सदानन्दका वेदान्तसार आदि ग्रंथ वेदान्त दर्शनके अभ्यासियोंके लिये महत्त्वपूर्ण हैं।$^१$
वेदान्त दर्शनकी शाखायें
भर्तृप्रपंच — शंकरके पूर्व होनेवाले वेदान्त दर्शनके प्रतिपादकोंमें भर्तृप्रपंचका नाम बहुत महत्त्वका है।
भर्तृप्रपंचका इस समय कोई मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। सुरेश्वरकी वार्तिकके उल्लेखोंसे मालूम होता है कि
भर्तृप्रपंच अग्निवैश्वानरके उपासक थे और अग्निवैश्वानरके प्रसादसे इन्हें उच्च कोटिका तत्त्वज्ञान प्राप्त हुआ
था। भर्तृप्रपंच अद्वैतमतका प्रतिपादन करते है। ये शंकरकी तरह ब्रह्मके पर और अपर दो भेद करते हैं,
परन्तु दोनों प्रकारके ब्रह्मको सत्य मानते हैं। भर्तृप्रपंचका समय ईसाकी सातवीं शताब्दी माना जाता है।
शंकर — शंकराचार्य केवलाद्वैत अथवा ब्रह्माद्वैतका स्थापन करनेवाले महान प्रतिभाशाली विचारकोंमें
गिने जाते हैं। शंकरके मतमें व्यवहारिक और पारमार्थिकके भेदसे दो प्रकारके सत्य माने गये हैं। परमार्थ
सत्यसे संसारके सम्पूर्ण व्यवहार अविद्याके कारण ही होते हैं, इसलिये सब मिथ्या हैं। परमार्थसे एक केवल
सत्, चित्, और आनन्द रूप ब्रह्म ही सत्य है। जिस प्रकार प्रकाशमान सूर्यके जलमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य
नाना रूपमें दिखाई देता है, उसी तरह ब्रह्म भी अध्यास अथवा अविद्याके कारण नाना रूपमें प्रतिभासित
होता है। केवलाद्वैतके प्रतिपादक शंकरके पूर्ववर्ती अनेक आचार्य हो गये हैं, परन्तु उपलब्ध साहित्यमें शंकर-
का अद्वैतवाद ही सर्वप्रधान गिना जाता है।
रामानुज — ये विशिष्टाद्वैतके जन्मदाता माने जाते हैं। रामानुजके मतमें परब्रह्मका स्वरूप उसके
विशेषणोंसे ही समझमें आ सकता है, निर्विशेष वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती। इसलिये जीव, जगत और
१. विशेष जाननेके लिये देखिये प्रोफेसर दासगुप्तकी A History of Indian Philosophy vol II
अ. ११।

३४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
ईश्वर इन तीन पदार्थोंको मानना चाहिये । जीव और जगत शरीर रूप है और परब्रह्म शरीरी है । रामा-
नुजका समय ११ वीं शताब्दी माना जाता है ।
वल्लभ—ये शुद्धाद्वैतके मुख्य प्रवर्तक गिने जाते हैं। इनके मतमें यह जगत परब्रह्मका ही अविकृत
परिणाम है। इसे माया रूप समझकर ब्रह्मकी विवर्त नहीं कह सकते । इसलिये ब्रह्मको माया रहित मानना
चाहिये । ब्रह्मन् अंशी है तथा जीव और जड़ ब्रह्मके अंश हैं। जीव भक्तिके द्वारा ही परब्रह्मको प्राप्त करता
है । शुद्धाद्वैतको अविकृत ब्रह्मवाद भी कहते हैं । वल्लभका समय ईसाकी १५ वीं शताब्दी है ।
विज्ञानभिक्षु—ये अविभागाद्वैतके स्थापक माने जाते हैं। केवलाद्वैत और शुद्धाद्वैतका इन्होंने खंडन
किया है। इनके मतमें जिस प्रकार जलमें शक्कर डालनेसे शक्कर जलके साथ अविभक्त हो जाती है, उसी
तरह पर जड़-अजड़ जगत परब्रह्ममें अविभक्तरूपसे रहता है। विज्ञानभिक्षुका समय ईसाकी १७ वीं शताब्दी है।
श्रीकंठाचार्य—ये शक्तिविशिष्ट अद्वैतको मानते हैं। यह सिद्धांत अद्वैतवाद केवलाद्वैतके साथ मिलता
जुलता है । अन्तर इतना ही है कि यहाँ ब्रह्मको सविशेष भावसे प्रधान, और निर्विशेष भावसे गौण माना
गया है । ब्रह्मतत्त्व चित् शक्ति और आनन्द शक्तिसे युक्त है । यहाँपर इस शक्तितत्त्वको माया रूप अथवा
अविद्या रूप न मानकर उसे चिन्मय माना गया है । श्रीकंठका समय १५वीं शताब्दी है ।
भट्टभास्कर—ये औपाधिक भेदाभेदको मानते हैं । भट्टभास्कर भेद और अभेद दोनोंको सत्य मानते हैं ।
ब्रह्म और जगतमें कार्य-कारण संबंध है । इसलिये कार्य और कारण दोनों ही सत्य हैं; कारणको सत्य और
कार्यको कल्पित नहीं कहा जा सकता । भट्टभास्करका समय ईसाकी १० वीं शताब्दी माना जाता है ।
निम्बार्क—स्वाभाविक भेदाभेदको मानते हैं। इनके मतमें जगत ब्रह्मका परिणाम है, इसे काल्पनिक
नहीं कह सकते । निम्बार्कके मतमें जीव और जगतको न ईश्वरसे सर्वथा अभिन्न कह सकते हैं, और न सर्वथा
भिन्न। अतएव चेतन और अचेतनको ईश्वरसे भिन्नाभिन्न मानना चाहिये। निम्बार्कका समय ११वीं शताब्दी है ।
मध्व—मध्व द्वैत वेदान्ती माने जाते हैं। मध्वके अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे भेदकी ही
सिद्धि होती है । पदार्थ दो तरहके होते हैं—स्वतंत्र और परतंत्र । ईश्वर स्वतंत्र पदार्थ है । परतंत्र पदार्थ
भाव और अभावके भेदसे दो प्रकारके हैं। भावके दो भेद हैं—चेतन और अचेतन । चेतन और अचेतन ईश्वरके
आधीन हैं । मध्वको पूर्णप्रज्ञ अथवा आनन्दतीर्थ भी कहा जाता है। मध्वका समय ईसाकी १२ वीं शताब्दी है ।१
शंकरका मायावाद
कुछ लोगोंका कहना कि शंकराचार्यने मायावादके सिद्धांतोंकी रचना बौद्धोंके विज्ञानवाद और शून्य-
वादके आधारसे की है । बादरायणके ब्रह्मसूत्रोंमें, भगवद्गीतामें और वृहदारण्यक, छान्दोग्य आदि उपनिषदोंमें
मायावादके सिद्धांत नहीं पाये जाते, विज्ञानभिक्षु शंकराचार्यको ‘प्रच्छन्नबौद्ध’ कहकर उल्लेख करते हैं, पद्म-
पुराणमें ‘मायावाद’ को असत् शास्त्र कहा गया है, तथा मध्व शून्यवादियोंके शून्य और मायावादियोंके ब्रह्मको
एक बताते हैं । इससे मालूम होता है कि शंकर अपने परमगुरु गौड़पादके सिद्धांतोंसे प्रभावित थे । प्रोफेसर
दासगुप्तके अनुसार ये गौड़पाद स्वयं बौद्ध विद्वान थे, और उपनिषदों और बुद्धके सिद्धांतोंमें भेद नहीं समझते
थे । गौड़पादने माण्डूक्य उपनिषद्के ऊपर माण्डूक्यकारिका टीका लिखकर बौद्ध और औपनिषदिक सिद्धांतोंका
समन्वय किया है । आगे चलकर गौड़पादके सिद्धांतोंका उनके शिष्य शंकराचार्यने प्रसार किया२ । प्रोफेसर
ध्रुव इस मतसे सहमत नहीं हैं । ध्रुवका मत है कि हीनयान बौद्धदर्शन ब्राह्मणदर्शनसे प्रभावित होकर ही
महायान बौद्धदर्शनके रूपमें विकसित हुआ है ।३
१. विशेषके लिये देखिये नर्मदाशंकरका हिंदतत्त्वज्ञाननो इतिहास उत्तरार्ध पृ० १७४-१८८ ।
२. गौड़पाद आचार्यकी माण्डूक्यकारिका और नागार्जुनकी माध्यमिककारिकाकी तुलनाके लिये देखिये प्रोफे-
सर दासगुप्तकी A History of Indian Philosohpy Vol. I पृ. ४२३ से ४२८ ।
३. देखिए प्रोफेसर ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी पृ० ६२ भूमिका ।

चार्वाक परिशिष्ट ( छ )
( श्लोक २० )
चार्वाक मत
चार्वाक पुण्य-पाप आदि परोक्ष वस्तुओंको स्वीकार नहीं करते, इसलिये इन्हें चार्वाक कहते हैं ।१
सुन्दर वाणी होनेके कारण भी ये लोग चार्वाक कहे जाते हैं ।२ चार्वाक सामान्य लोगोंके समान आचरण
करनेके कारण लोकायत अथवा लोकायतिक कहे जाते हैं ।३ पुण्य पापको न स्वीकार करनेके कारण इन्हें
नास्तिक कहा गया है ।४ आत्माको न माननेके कारण इन्हें अक्रियावादी कहा गया है । चार्वाक वृहस्पतिके
शिष्य थे । वृहस्पतिने देवताओंके शत्रु असुरोंको मोहित करनेके लिये चार्वाक मतकी सृष्टि की थी । धूर्त
चार्वाक और सुशिक्षित चार्वाकके भेदसे चार्वाक दो प्रकारके बताये गये हैं । धूर्त चार्वाक पृथिवी, अप्, तेज
और वायु इन चार भूतोंको छोड़कर आत्माको अलग पदार्थ नहीं मानते । सुशिक्षित चार्वाक शरीरसे भिन्न
आत्माका अस्तित्व मानते हैं, परन्तु उनके मतमें यह आत्मा शरीरके नाश होनेके साथ ही नष्ट हो जाता है ।
कोई चार्वाक चतुर्भूत रूप जगत्‌को न मानकर आकाशको पांचवां भूत स्वीकार करके संसारको पंचभूत
रूप मानते हैं । "चार्वाक मतके साधु कापालिक होते हैं । ये शरीरपर भस्म लगाते हैं, और ब्राह्मणसे लेकर
अंत्यज तक किसी भी जातिके हो सकते हैं । ये मद्य और मांसका भक्षण करते हैं, व्यभिचार करते हैं, प्रत्येक
वर्ष इकट्ठे होकर स्त्रियोंसे क्रीड़ा करते हैं, तथा कामको छोड़कर और कोई धर्म नहीं मानते ।"५ परयोगी
आनंदघनजीने चार्वाक मतकी उपमा जिनेन्द्रकी कोखसे दी है ।६
१. चर्वन्ति, भक्षयन्ति तत्त्वतो न मन्यन्ते पुण्यपापादिकं परोक्षं वस्तुजातमिति चार्वाकाः । गुणरत्नसूरि ।
२. चारुः लोकसंमतः वाकः वाक्यम् यस्य सः । वाचस्पत्यकोश ।
३. लोकाः निर्विचाराः सामान्यलोकास्तद्वदाचरन्ति स्मेति लोकायता लोकायतिका इत्यपि । गुणरत्न ।
४. नास्ति पुण्यं पापमिति मतिरस्य नास्तिकः । हेमचन्द्र ।
यह ध्यान देने योग्य है कि वैदिक पुराणोंमें अद्वैत वेदान्तके प्रतिपादक शंकराचार्यको चार्वाक,
जैन और बौद्धोंकी तरह नास्तिक बताकर शंकरके मायावादको असत् शास्त्र कहा है—
मायावादी वेदान्ती ( शंकर भारती ) अपि नास्तिक एव पर्यवसाने संपद्यते इति ज्ञेयम् ।
अत्र प्रमाणानि सांख्यप्रवचनभाष्योदाहृतानि पद्मपुराणवचनानि यथा—
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमेव च ।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ॥
अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयंल्लोकगर्हितम् ।
कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥
सर्वकर्मपरिभ्रंशान्नैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते ।
परमात्मजीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥
सांख्यप्रवचन भाष्य १-१ भूमिका । न्यायकोश पृ० ३७२ ।
५. गुणरत्न षड्दर्शनसमुच्चय टीका ।
६. "लोकायतिक कूख जिनवरनी, अंश-विचार जो कीजे;
तत्त्व-विचार सुधारस धारा, गुरुगम विण केम पीजे" श्रीनेमिनाथजीनुं स्तवन, गा० ४ ।
पं० बेचनदास-जैनदर्शन पृ० ८० भूमिका।

३५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
चार्वाकों के सिद्धांत
चार्वाक आत्माको नहीं मानते । इनके मतमें चैतन्य विशिष्ट देहको ही आत्मा माना गया है । जिस
समय भौतिक शरीरका नाश होता है, उस समय आत्माका भी नाश हो जाता है, अतएव कोई परलोक-
जानेवाली आत्मा भिन्न वस्तु नहीं है । इसलिये चार्वाकोंका सिद्धांत है कि जब तक जीना है, तब तक खूब
आनंदके साथ जोवनको यापन करना चाहिये, क्योंकि मरनेके बाद फिरसे जीवका जन्म नहीं होता ।
चार्वाक लोग धर्म, अधर्म और पुण्य, पापको नहीं मानते । इनके मतमें एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । इसलिये
इनके मतमें संसारसे बाह्य कोई स्वर्ग, नरक, मोक्ष और ईश्वर जैसी वस्तु नहीं है । वास्तवमें कांटा लग जाने
आदिसे उत्पन्न होनेवाला दुख ही नरक है, लोकमें प्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहका छोड़ना ही मोक्ष है, और
स्त्रीका आलिंगन करना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है । चार्वाक वेदको नहीं मानते, तथा याज्ञिक हिंसाका और
श्राद्ध आदि कर्मोंका घोर विरोध करते हैं ।¹
चार्वाक साहित्य
चार्वाक साहित्यका कोई भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं है । इसलिये चार्वाकोंके सिद्धांतोंके प्रामाणिक ज्ञान
प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं है । आजीविक आदि सम्प्रदायोंकी तरह चार्वाक मतका थोड़ा बहुत ज्ञान जैन,
बौद्ध और ब्राह्मणोंके ग्रंथोंसे होता है । चार्वाक सिद्धांतोंके आद्य प्रणेता बृहस्पति कहे जाते हैं । गुणरत्न और
जयन्तभट्ट दो चार्वाकसूत्रोंका उल्लेख करते हैं, इससे जान पड़ता है कि बृहस्पतिने चार्वाकशास्त्रकी रचना
सूत्ररूपमें की थी । शान्तरक्षित तत्त्वसंग्रहमें चार्वाक सम्प्रदायके प्ररूपक कम्बलाश्वतरके एक सूत्रका उल्लेख
करते हैं ।² विद्वानोंका कहना है कि बौद्ध सूत्रोंमें वर्णित अजितकेशकम्बली और कम्बलाश्वतर दोनों एक ही
व्यक्ति थे ।³ इनका समय ईसवी सन् पूर्व ५५०-५०० बताया जाता है । चार्वाकके सिद्धांतोंका संक्षिप्त वर्णन
जयन्तकी न्यायमंजरी, माधवका सर्वदर्शनसंग्रह, गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय टीका और महाभारत आदि
ग्रंथोंमें पाया जाता है ।
१. लोकायत दर्शनकी देनके लिए देखिये जगदीशचन्द्र जैन, भारतीय तत्त्व चिन्तन, पृ० ५९-६१ ।
२. कायादेव ततो ज्ञानं प्राणापानाद्यधिष्ठितात् ।
युक्तं जायत इत्येतत्कम्बलाश्वतरोदितम् ॥
तथा च सूत्रम्-कायादेवेति । तत्त्वसंग्रह श्लोक १८६४ पंजिका ।
३. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका ।

विविध परिशिष्ट ( ज )
श्लो १ पृ० ३ पं० १६ आजीविक
भारतके अनेक सम्प्रदायोंकी तरह आजीविक सम्प्रदायका नाम भी आज निश्शेष हो चुका है ।
आजीविक मतके माननेवालोंके क्या सिद्धांत थे, इस मतके कौन-कौन मुख्य आचार्य थे, उन्होंने किन-किन
ग्रंथोंका निर्माण किया था, आदिके विषयमें प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आज कोई भी साधन नहीं
हैं । इसलिये आजीविक सम्प्रदायके विषयमें जो कुछ थोड़े बहुत सत्य अथवा अर्धसत्य रूपमें जैन और बौद्ध
शास्त्रोंमें उल्लेख मिलते हैं, हमें उन्हींसे सन्तोष करना पड़ता है । ई० स० पूर्व ३९१ में अशोकका आजीविकों-
को एक गुफा प्रदान करनेका उल्लेख मिलता है । ईसाकी ६ ठी शताब्दीके विद्वान वराहमिहिर अपने वृहज्जा-
तकमें आजीविकोंको एकदण्डी कहकर उल्लेख करते हैं । ई० स० ५७६ में शीलांक, ई० स० ५९० में हला-
युध आजीविक और दिगम्बरोंको, और मणिभद्र आजीविक और बौद्धोंको पर्यायवाची मानकर उल्लेख करते
हैं, तथा ई० स० १२३५ में राजराज नामके चोल राजाके शिलालेखोंपरसे आजीविकोंके ऊपर कर लगानेका
अनुमान किया जाता है । १ जैन और बौद्ध साहित्यमें नंदवच्छ, किससंकिच्च और मख्खलि गोशाल इन तीन
आजीविक मतके नायकोंका कथन आता है । मख्खलिगोशाल बुद्ध और महावीरके समकालीन प्रतिस्पर्धियोंमें
से माने जाते हैं । भगवती आदि जैन आगमोंके अनुसार, गोशाल महावीरकी तपस्याके समय महावीरके शिष्य
बनकर छह वर्ष तक उनके साथ रहे, और वादमें महावीरके प्रतिस्पर्धि बनकर आजीविक सम्प्रदायके नेता
बने । गोशालक भाग्यवादी थे । इनके मतमें सम्पूर्ण जीव अवश, दुर्बल, निर्वीर्य हैं, और भवितव्यताके वशमें
हैं । जीवोंके संक्लेशका कोई हेतु नहीं है, बिना हेतु और बिना प्रत्ययके प्राणी संक्लेशको प्राप्त होते हैं । गोशा-
लक आत्माको, पुनर्जन्मको और जीवके मुक्तिसे लौटनेको स्वीकार करते थे । उनके मतमें प्रत्येक पदार्थमें
जीव विद्यमान हैं । गोशालकने जीवोंको एकेन्द्रिय आदिके विभागमें विभक्त किया था, वे जीव हिंसा न करने-
पर ज़ोर देते थे, मुख्य योनि चौदह लाख मानते थे । भिक्षाके वास्ते पात्र नहीं रखते थे, हाथमें भोजन करते
थे, मद्य, मांस, कंदमूल और उद्दिष्ट भोजनके त्यागी होते थे, ओर नग्न रहा करते थे । आजीविक लोगोंका
दूसरा नाम तेरासिय ( त्रैराशिक ) भी है । ये लोग प्रत्येक वस्तुको सत्, असत् और सदसत् तीन तरहसे
कहते थे, इसलिये ये तेरासिय कहे जाने लगे । २
श्लोक १५ पृ० पं० संवर-प्रतिसंवर
क्षेमेन्द्रने सांख्यतत्त्वविवेचनमें संवर ( संचर ) और प्रतिसंवर ( प्रतिसंचर ) का लक्षण निम्न प्रकार-
से किया है —
संचर—
साम्यवस्थागुणानां या प्रकृति सा स्वभावतः ।
कालक्षोभेण वैषम्यात् क्षेत्रे परयुते पुरा ॥
बुद्धितत्त्वञ्चाहंकारस्त्रिविधोऽपि व्यजायत ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि महाभूतानि च क्रमात् ॥
एवं क्रमेणैवोत्पत्तिः संचरः परिकीर्तितः ।
१. प्रोफेसर होर्नल ईसाकी छठी शताब्दीतक आजीविकदर्शनके स्वतंत्र आचार्योंके होनेका अनुमान करते हैं ।
२. प्रोफेसर याकोबी और प्रोफेसर बरुआ आदि विद्वानोंके अनुसार महावीरके जैनधर्मके सिद्धान्तोंके ऊपर
गोशालके सिद्धान्तोंका प्रभाव पड़ा है। विशेषके लिये देखिये प्रोफेसर बरुआकी Pre-Buddhist Indian

३५२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रतिसंचर—
व्युत्क्रमेणैव लीयन्ते तन्मात्रे भूतपंचकम् ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि अहंकारे विलीयते ।
अहंकारोऽथ बुद्धौ तु बुद्धिरव्यक्तसंज्ञके ।
अव्यक्तं न क्वचिल्लीनं प्रतिसंचर इति स्मृतः ।
श्लोक २० पृ० पं० क्रियावादी-अक्रियावादी ।
क्रियावादी जीवोंके अपने अपने कर्मोंके अनुसार फल मिलनेके सिद्धान्तको मानते हैं । अक्रियावादियोंका
सिद्धांत इस सिद्धांतसे बिलकुल उलटा है । जैन और बौद्ध आगम ग्रंथोंमें पकुधकात्यायन और मख्खलिगोशालको
अक्रियावादी कहकर उल्लेख किया गया है । निगंठ नातपुत्त बुद्धको क्रियावाद और अक्रियावाद दोनों सिद्धा-
न्तोंके माननेवाला कहते हैं ।¹ प्रोफेसर बेनीमाधव बरुआ आदि विद्वानोंका मत हैं कि जैन धर्मका मौलिक नाम
किरियावाद (क्रियावाद) था । क्रियावादी महावीर अक्रियावादी और अज्ञानवादियोंका विरोध करते थे,
पुण्य-पाप, आस्रव-बंध, निर्जरा-मोक्षको स्वीकार करते थे, और पुरुषार्थको प्रधान ²मानते थे । जैन ग्रंथोंमें
परमतवादियोंके ३६३ मतोंमें क्रियावादी और अक्रियावादियोंके मतोंको गिनाया गया है । क्रियावादी आत्माको
मानते हैं । इनके मतमें दुःख स्वयंकृत है, अन्यकृत नहीं । इनके कौत्कल, कांडविद्धि, कौशिक, हरिशमश्रु,
मांछयिक, रोमस, हारित, मुंड और अश्वलायन आदि १८० भेद हैं । अक्रियावादी प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्तिके
पश्चात् ही पदार्थका नाश मानते हैं । अक्रियावादी आत्माके अस्तित्वको नहीं मानते, और अपने माने हुए
तत्त्वोंका निश्चित रूपसे प्ररूपण नहीं कर सकते । राजवार्तिककारने अक्रियावादियोंके मरीच, कुमार, कपिल,
उलूक, गार्ग्य, व्याघ्रभूति, वाढलि, मौद्गलायन, माठर प्रभृति ४० भेद माने हैं ।³
philosophy भाग ३ अ. २१; प्रो. होर्नेले—Encyclopaedia of Religion and Ethics
जि० पृ० २२९ । आजीविकोंकी गणना पाँच प्रकारके श्रमणोंमें की गई है । विशेषके लिये देखिये जगदी-
शचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ. १२-१७, ४१९-२१
१. तेव्हां नातपुत्त म्हणाला, 'तूं क्रियावादी असून अक्रियावादी अशा श्रमण गोतमाला भेटण्याची कां इच्छा
करितोस ?' तरीहि सिंह गेलाच. तेव्हां बुद्धानें त्यास आपणांस क्रियावादी व अक्रियावादी ही दोन्हीं
विशेषणें कशीं लागू पडतील हें अनेक प्रकारांनीं सांगितलें (महावग्ग ६-३१ अंगत्तर ८-१२) देखिये
राजवाडेका दीघनिकाय भाग १ मराठी भाषांतर पृ० १०० ।
२. देखिये Pre-Buddhist Indian Philosophy.
३. तथा देखिये, जगदीशचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० ४२१-२२ ।

अनुक्रमणिका
स्याद्वादमंजरीके अवतरण( १ )
स्याद्वाद मंजरीमें निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रन्थकार ( २ )
स्याद्वाद मंजरीके श्लोकोंकी सूची ( ३ )
स्याद्वाद मंजरीके शब्दोंकी सूची ( ४ )
स्याद्वाद मंजरीके न्याय ( ५ )
स्याद्वाद मंजरींके विशेष शब्दोंकी सूची ( ६ )
स्याद्वाद मंजरीके संस्कृत, तथा हिन्दी-अनुवादकी टिप्पणियोंके ग्रन्थ ओर ग्रन्थकार( ७ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची ( ८ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची.(९ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके टिप्पणीके ग्रन्थ ( १० )
परिशिष्टोंके विशेष शब्दोंकी सूची ( ११ )
परिशिष्टोंमें उपयुक्त ग्रंथोंकी सूची( १२ )
संपादनमें उपयुक्त ग्रंथोंकी सूची ( १३ )

स्याद्वादमंजरीके अवतरण ( १ )
श्लोक १
ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् । पृष्ठ
गत्वागच्छन्ति भूयोऽपि भवं तीर्थनिकारतः ॥ [ ] ४
सर्वं पश्यतु वा मा वा तत्त्वमिष्टं तु पश्यतु ।
कीटसंख्यापरिज्ञानं तस्य नः क्वोपयुज्यते ॥
तस्मादनुष्ठानगतं ज्ञानमस्य विचार्यताम् ।
प्रमाणं दूरदर्शी चेदेते गृध्रानुपास्महे ॥ [ वैशेषिकवचन ] ४
जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ।।
[ आचारांग १-३-४-१२२ ] ४
एको भावः सर्वथा येन दृष्टः सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टा एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥ [ ] ५
अभ्रादित्वात् ( अभ्रादिम्यः ) [ हैमशब्दानुशासन ७-२-४६ ] ७
शाखादेर्यः [ हैमशब्दानुशासन ७-१-११४ ] ८
श्रीवर्धमानाभिधमात्मरूपम् [ अयोगव्यवच्छेदिका १ ] ९
श्लोक २
तादर्थ्ये चतुर्थी [ हैमशब्दानुशासन २-२-५४ ] १०
स्पृहेर्येप्स्यं वा [ हैमशब्दानुशासन २-२-२६ ] १०
श्लोक ३
अदसस्तु विप्रकृष्टे [ हैमव्याकरण संग्रहश्लोक ] ११

  • रुसउ वा परो मा वा विसं वा परियत्तऊ ।
    भासियन्वा हिया भासा सपक्खगुणकारिया ॥
    [ हेमचन्द्र-श्रेणिकचरित्र २-३२ ] १२
    न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यैकान्ततो हितश्रवणात् ।
    ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति ॥
    [ वाचकमुख्य उमास्वाति-तत्त्वार्थभाष्यकारिका २९ ] १३
    श्लोक ४
    गम्ययपः कर्मधारे [ हैमशब्दानुशासन २-२-७४ ] १४
    श्लोक ५
    उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-२६ ] १५
    अवकाशदमाकाशम् [ उत्तराध्ययन-भावविजयगणिवृत्ति २८-९ ] १८
  • ये अवतरण सम्पूर्णतया उपलब्ध न होकर कुछ अंशमें ही उपलब्ध होते हैं ।

स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ३
पृष्ठ
अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद्विरुद्धधर्माध्यासः कारणभेदश्चेति [ ] १८
अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपं नित्यम् [ ] १९
तद्भावाव्ययं नित्यं [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-३० ] १९

  • द्रव्यं पर्यायवियुतं पर्याया द्रव्यवर्जिताः ।
    क्व कदा केन किंरूपा दृष्टा मानेन केन वा ॥
    [ सन्मतितर्क १-१२ ] १९
  • त्रिविधः खल्वयं धर्मिणः परिणामो धर्मलक्षणावस्थारूपः ।
    .... इत्युभयमुपपन्नमिति [ योगसूत्र ३-१३ व्यासभाष्य ] २१
    सा तु द्विविधा नित्याऽनित्या च....त्वनित्या
    [ प्रशस्तपादभाष्य-पृथिवी निरूपण ] २२
    शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागी
    [ प्रशस्तपादभाष्य आकाशनिरूपण ] २२
    यो यत्रैव स यत्रैव यो यदैव तदैव सः ।
    न देशकालयोर्व्याप्तिर्भावानामिह विद्यते ॥ [ ] २५
    भागे सिंहो नरो भागे योऽर्थो भागद्वयात्मकः ।
    तमभागं विभागेन नरसिंहं प्रचक्षते ॥ [ ] २७
    श्लोक ६
    सर्वे गत्यर्था ज्ञानार्थाः [ हेमहंसगणि-हेमचन्द्रव्याकरण न्याय ४४ ] ३०
    ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ।
    अन्यो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ॥
    [ महाभारत वनपर्व ] ३०
    अपगतमले हि मनसि...........शूलमभव्यस्य
    [ कादम्बरी पूर्वार्ध पृ. १०३ ] ३१
    सद्धर्मबीजवपनानघकौशलस्य
    यल्लोकबान्धव तवापि खिलान्यभूवन् ।
    तन्नाद्भुतं खगकुलेष्विह तामसेषु
    सूर्यांशवो मधुकरीचरणावदाताः ॥
    [ सिद्धसेन-द्वात्रिंशिका २-१३ ] ३२
    विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतः पाणिरुत विश्वतः पात् ।
    [ शुक्लयजुर्वेद संहिता १७-१९ ] ३४
    किरणा गुणा न दव्वं तेसिं पयासो गुणो न वा दव्वं ।
    जं नाणं आयगुणो कहमदव्वो स अन्नत्थ ॥
    गन्तूण न परिच्छिन्दइ नाणं गेयं तयम्मि देसम्मि ।
    आयत्थं चिय नवरं अचित्तसत्ती उ विण्णेयं ॥
    लोहोवलस्स सत्ती आयत्था चेव भिन्नदेसंपि ।
    लोहं आगरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥
    एवमिह नाणसत्ती आयत्था चेव हंदि लोगंतं ।
    जइ परिच्छिदइ सम्मं को णु विरोहो भवे तत्थ ॥
    [ हरिभद्र—धर्मसंग्रहणी ३७०-३७३ ] ३६

४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
पृष्ठ
न हिंस्यात् सर्वभूतानि [ छान्दोग्य उपनिषद् अ. ८ ] ३८
षट्‌शतानि नियुज्यन्ते पशूनां मध्यमेऽहनि ।
अश्वमेधस्य वचनात् न्यूनानि पशुभिस्त्रिभिः ॥ [ ] ३८
अग्निषोमीयं पशुमालभेत [ ऐतरेय आरण्यक ६-१३ ] ३८
सप्तदश प्राजापत्यान् पशुनालभेत [ तैत्तिरीय संहिता १-४ ] ३८
नानृतं ब्रूयात् [ ] ३८
ब्राह्मणार्थेऽनृतं ब्रूयात् [ ] ३८

  • न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । ....
    प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि ॥
    [ वसिष्ठधर्मसूत्र १६-३६ ] ३८
    परद्रव्याणि लोष्ठवत् [ ] ३८
  • यद्यपि ब्राह्मणो हठेन.........स्वं ददाति
    [ मनुस्मृति १-१०१ ] ३८
    अपुत्रस्य गतिर्नास्ति [ देवी भागवत ] ३८
    अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
    दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ॥ [ आपस्तम्भ ] ३९
    श्लोक ७
    आवर्जिता किंचिदिव स्तनाभ्यां [ कुमारसंभव ३-५४ ] ४३
    उद्वृत्तः क इव सुखावहः परेषांम् [ शिशुपालवध ] ४३
    प्राप्तानामेव प्राप्तिः समवायः [ ] ४३
    अव्यभिचारी मुख्योऽविकलोऽसाधारणोऽन्तरंगश्च ।
    विपरीतो गौणोऽर्थः सति मुख्ये धीः कथं गौणे ॥
    [ ] ४६
    ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः [ हैमलिंगानुशासन पुंस्त्री. ५ ] ४७
    श्लोक ८
    पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशः कालो दिगात्मा मन इति नव द्रव्याणि
    [ वैशेषिकसूत्र १-१-५ ] ४८
    रूपरसगंधस्पर्शसंख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे
    बुद्धिः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च
    [ वैशेषिकसूत्र १-१-६ तथा प्रशस्तपादभाष्य ] ४८
    अन्तेषु भवा अन्त्याः............तेऽन्त्या विशेषाः
    [ प्रशस्तपादभाष्य पृ. १६८ ] ५०
  • द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता [ वैशेषिक सूत्र १-२-७ ] ५१
    व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानवस्थितिः ।
    रूपहानिरसंबन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥
    [ उदयनाचार्य—किरणावलि द्रव्यप्रकरण पृ. १६१ ] ५१

[Blank line or centered heading: श्लोक ९]

Line 34:
सर्वगतत्वेऽप्यात्मनो देहप्रदेशे ज्ञातृत्वम् । नान्यत्र शरीरस्योपभोगायतनत्वात् ।

Line 35:
अन्यथा तस्य वैयर्थ्यात् [ श्रीधर—न्यायकन्दली ] ६८

Line 36:
*नानात्मनो व्यवस्थातः [ वैशेषिकसूत्र ३-२-२० ] ६९

Line 37:
आकाशोऽपि सदेशः सकृत्सर्वमूर्ताभिसंबंधार्हत्वात्

Line 38:
[ द्रव्यालंकार ] ७१

Let's double-check all details, numbers, punctuation, brackets:
Header:
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ५

Let's check line 1:
न हि वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । पृष्ठ
Line 2:
अशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः ॥
Line 3:
[ छान्दोग्य उपनिषद् ८-१२ ] ५३
Line 4:
यावदात्मगुणाः सर्वे नोच्छिन्ना वासनादयः ।
Line 5:
`तावदात्यन्तिकी दुःखव्यावृत्तिर्न विकल्प्यते

६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्लोक १० पृष्ठ
ईयकारके [ हैमशब्दानुशासन ३-२-१२१ ] ७७
बहुभिरात्मप्रदेशैरधिष्ठाता देहावयवा मर्माणि [ ] ७७
गुणादस्त्रियां न वा [ हैमशब्दानुशासन २-२-७७ ] ७७
लब्धिख्यात्यर्थिना तु स्याद् दुःस्थितेनामहात्मना ।
छलजातिप्रधानो यः स विवाद इति स्मृतः ॥
[ हरिभद्रसूरि-अष्टक १२-४ ] ७७
अभ्युपेत्य पक्षं यो न स्थापयति स वैतण्डिक इत्युच्यते
[ उद्योतकर—न्यायवार्तिक १-१-१ ] ७७
दुःशिक्षितकुतर्कशलेशवाचालितानाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपमण्डिताः ॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्प्रतारितः ।
मा गादिति छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः । [ ] ७८
प्रमाणप्रमेय········निःश्रेयसाधिगमः
[ गौतम न्यायसूत्र १-१-१ ] ७८
अर्थोपलब्धिहेतुः प्रमाणम् [ वात्स्यायनभाष्य ] ७९
सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम् [ भासर्वज्ञ—न्यायसार ] ७९
स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम् [ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार और प्रमाणमीमांसा ] ७९
प्रवृत्तिदोषजनितं सुखदुःखात्मकं मुख्यं फलं तत्साधनं तु गौणम्
[ जयन्त—न्यायमंजरी ] ८०
द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु प्रमेयम् [ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार ] ८०
साधर्म्यवैधर्म्यं........कार्यसमाः [ गौतम न्यायसूत्र ५-१-१ ] ८१
श्लोक ११
महोक्षं वा महाजं वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत्
[ याज्ञवल्क्यस्मृति आचार १०९ ] ८८
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पंच तु ॥
[ मनुस्मृति ३—२६८ ] ८८
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्
[ चाणक्य १—७ ] ८८
संबद्धं वर्तमानं च गृह्यते चक्षुरादिना
[ मी. श्लोकवार्तिक ४-८४ ] ९०
पुढवाइयाण जहवि हु होइ विणासो जिणालयाहिन्तो ।
तव्विसया विसुद्धदिट्ठिस्स नियमओ अतिय अणुकंपा ॥
एयाहिंतो बुद्धा विरया रक्खन्ति जेण पुढवाई ।
इत्तो निव्वाणगया अबाहिया अभवविमाणं ॥
रोगीसिरावेहो इव सुविज्जिकिरिया व सुप्पुउत्ताओ ।
परिणामसुंदरच्चिय चिट्ठा से वाहजोगे वि ॥
[ जिनेश्वरसूरि-पंचलिंगी ५८, ५९, ६० ] ९१