स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविविध परिशिष्ट ( ज )
श्लो १ पृ० ३ पं० १६ आजीविक
भारतके अनेक सम्प्रदायोंकी तरह आजीविक सम्प्रदायका नाम भी आज निश्शेष हो चुका है ।
आजीविक मतके माननेवालोंके क्या सिद्धांत थे, इस मतके कौन-कौन मुख्य आचार्य थे, उन्होंने किन-किन
ग्रंथोंका निर्माण किया था, आदिके विषयमें प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आज कोई भी साधन नहीं
हैं । इसलिये आजीविक सम्प्रदायके विषयमें जो कुछ थोड़े बहुत सत्य अथवा अर्धसत्य रूपमें जैन और बौद्ध
शास्त्रोंमें उल्लेख मिलते हैं, हमें उन्हींसे सन्तोष करना पड़ता है । ई० स० पूर्व ३९१ में अशोकका आजीविकों-
को एक गुफा प्रदान करनेका उल्लेख मिलता है । ईसाकी ६ ठी शताब्दीके विद्वान वराहमिहिर अपने वृहज्जा-
तकमें आजीविकोंको एकदण्डी कहकर उल्लेख करते हैं । ई० स० ५७६ में शीलांक, ई० स० ५९० में हला-
युध आजीविक और दिगम्बरोंको, और मणिभद्र आजीविक और बौद्धोंको पर्यायवाची मानकर उल्लेख करते
हैं, तथा ई० स० १२३५ में राजराज नामके चोल राजाके शिलालेखोंपरसे आजीविकोंके ऊपर कर लगानेका
अनुमान किया जाता है । १ जैन और बौद्ध साहित्यमें नंदवच्छ, किससंकिच्च और मख्खलि गोशाल इन तीन
आजीविक मतके नायकोंका कथन आता है । मख्खलिगोशाल बुद्ध और महावीरके समकालीन प्रतिस्पर्धियोंमें
से माने जाते हैं । भगवती आदि जैन आगमोंके अनुसार, गोशाल महावीरकी तपस्याके समय महावीरके शिष्य
बनकर छह वर्ष तक उनके साथ रहे, और वादमें महावीरके प्रतिस्पर्धि बनकर आजीविक सम्प्रदायके नेता
बने । गोशालक भाग्यवादी थे । इनके मतमें सम्पूर्ण जीव अवश, दुर्बल, निर्वीर्य हैं, और भवितव्यताके वशमें
हैं । जीवोंके संक्लेशका कोई हेतु नहीं है, बिना हेतु और बिना प्रत्ययके प्राणी संक्लेशको प्राप्त होते हैं । गोशा-
लक आत्माको, पुनर्जन्मको और जीवके मुक्तिसे लौटनेको स्वीकार करते थे । उनके मतमें प्रत्येक पदार्थमें
जीव विद्यमान हैं । गोशालकने जीवोंको एकेन्द्रिय आदिके विभागमें विभक्त किया था, वे जीव हिंसा न करने-
पर ज़ोर देते थे, मुख्य योनि चौदह लाख मानते थे । भिक्षाके वास्ते पात्र नहीं रखते थे, हाथमें भोजन करते
थे, मद्य, मांस, कंदमूल और उद्दिष्ट भोजनके त्यागी होते थे, ओर नग्न रहा करते थे । आजीविक लोगोंका
दूसरा नाम तेरासिय ( त्रैराशिक ) भी है । ये लोग प्रत्येक वस्तुको सत्, असत् और सदसत् तीन तरहसे
कहते थे, इसलिये ये तेरासिय कहे जाने लगे । २
श्लोक १५ पृ० पं० संवर-प्रतिसंवर
क्षेमेन्द्रने सांख्यतत्त्वविवेचनमें संवर ( संचर ) और प्रतिसंवर ( प्रतिसंचर ) का लक्षण निम्न प्रकार-
से किया है —
संचर—
साम्यवस्थागुणानां या प्रकृति सा स्वभावतः ।
कालक्षोभेण वैषम्यात् क्षेत्रे परयुते पुरा ॥
बुद्धितत्त्वञ्चाहंकारस्त्रिविधोऽपि व्यजायत ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि महाभूतानि च क्रमात् ॥
एवं क्रमेणैवोत्पत्तिः संचरः परिकीर्तितः ।
१. प्रोफेसर होर्नल ईसाकी छठी शताब्दीतक आजीविकदर्शनके स्वतंत्र आचार्योंके होनेका अनुमान करते हैं ।
२. प्रोफेसर याकोबी और प्रोफेसर बरुआ आदि विद्वानोंके अनुसार महावीरके जैनधर्मके सिद्धान्तोंके ऊपर
गोशालके सिद्धान्तोंका प्रभाव पड़ा है। विशेषके लिये देखिये प्रोफेसर बरुआकी Pre-Buddhist Indian