स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३१९
तो है परन्तु इसे 'अस्ति' और 'नास्ति' दोनों नहीं कह सकते। यह मत वात्सीपुत्रीय बौद्धों का है ।¹ ( ४ )
आत्मा है। या नहीं, यह कहना असंभव है। इन चारों मान्यताओंका स्पष्टीकरण :
( १ ) आत्मा पाच स्कंधोंसे भिन्न नहीं है :
मिलिन्द—भन्ते ! आपका क्या नाम है ?
नागसेन—महाराज ! नागसेन। परन्तु यह व्यवहारमात्र है, कारण कि पुद्गल² ( आत्मा ) की
उपलब्धि नहीं होती।
मिलिन्द—यदि आत्मा कोई वस्तु नहीं है तो आपको कौन पिंडपात ( भिक्षा ) देता है, कौन उस
भिक्षाका सेवन करता है, कौन शीलकी रक्षा करता है, ओर कौन भावनाओंका चिन्तन करनेवाला है ?
तथा फिर तो अच्छे, बुरे कर्मोंका कोई कर्ता और भोक्ता भी न मानना चाहिये, आदि ।
नागसेन—मैं यह नहीं कहता ।
मिलिन्द—क्या रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञानसे मिलकर नागसेन बने हैं ?
नागसेन—नहीं ।
मिलिन्द—क्यां पांच स्कंधोंके अतिरिक्त कोई नागसेन हैं ?
नागसेन—नहीं ।
मिलिन्द—तो फिर सामने दिखाई देनेवाले नागसेन क्या हैं ?
नागसेन—महाराज ! आप यहां रथसे आये हैं, या पैदल चलकर ?
मिलिन्द—रथ से ।
नागसेन—आप यहां रथसे आये हैं, तो मैं पूछता हूं कि रथ किसे कहते हैं ? क्या पहियोंको रथ
कहते हैं ? क्या धुरेको रथ कहते हैं ? क्या रथमें लगे हुए डण्डोंको रथ कहते हैं ?
( मिलिन्दने इनका उत्तर नकारमें दिया )
नागसेन—तो क्या पहिये, धुरे, डण्डे आदिके अलावा रथ अलग वस्तु है ?
( मिलिन्दने फिर नकार कहा )
नागसेन—तो फिर जिस रथ से आप आये हैं, वह क्या है ?
मिलिन्द—पहिये, धुरा, डण्डे आदि सबको मिलाकर व्यवहारसे रथ कहा जाता है। पहिये आदि-
को छोड़कर रथ कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं ।
नागसेन—जिस प्रकार पहिये, धुरे आदिके अतिरिक्त रथका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसी तरह रूप,
वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार इन पाँच स्कंधोंको छोड़कर नागसेन कोई अलग वस्तु नहीं है ।³
१. आत्मवादकी इन तीन मान्यताओंका उल्लेख धर्मपालाचार्यने अपनी विज्ञानमात्रशास्त्रकी संस्कृत टीकामें
किया है। यह टीका उपलब्ध नहीं है। जापानी विद्वान यामाकामी सोगेनने ने यह उल्लेख
अपनी Systems of Buddhist thought नामक पुस्तकके १७ वें पृष्ठपर उक्त ग्रंथके
हुएनत्सांग के चीनी अनुवादके आधारसे किया है।
२. पुग्गलो नुपलब्भति । मिलिन्दपण्हमें अत्ता ( आत्मा ) शब्दके स्थानपर जीव, पुग्गल और वेदगू शब्दोंका
व्यवहार किया है। देखिये मिसेज राइस डेविड्स Question of Milinda ।
३. नागसेनोति संखा समञ्ञा पञ्ञत्ति वोहारो नाममत्तं पवत्तति । परमत्यत्तो पन एत्थ पुग्गलो नुपलब्भति ।
भासितं पन एतं महाराज वजिराय भिक्खुनीया भगवतो सम्मुखा—
यथाहि अंग संभारा होति सद्दो रथो इति ।
एवं खन्धेसु सन्तेसु होंति सत्तोति सम्मुति ॥ मिलिन्दपण्ह, अध्याय २, पृ. २५-२८ ।
३२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
(२) आत्मा पांच स्कंधोंसे भिन्न पदार्थ है :
बौद्धोंको दूसरो मान्यता है कि आत्मा पंचस्कंधोंसे पृथक् पदार्थ है। यह मान्यता नैयायिक आदि
दार्शनिकों जैसी ही है। यहां पर आत्मा (पुद्गल) को पांच स्कंध रूप बोझको ढोनेवाला कहा हैं।१
(३) आत्मा पांच स्कंधोंसे न भिन्न है, न अभिन्न :
बौद्धोंके आत्मा संबंधी तीसरे सिद्धान्तको माननेवाले पुद्गलवादी वात्सीपुत्रीय बौद्ध हैं। ये लोग आत्मा-
के अस्तित्वको मानते हैं, परन्तु इनके अनुसार जिस तरह अग्निको न जलती हुई लकड़ीसे भिन्न कह सकते
हैं, और न अभिन्न, परन्तु फिर भी अग्नि भिन्न वस्तु है; उसी तरह यद्यपि पुद्गल भिन्न पदार्थ है, परन्तु यह
पुद्गल न पांच स्कंधोंसे सर्वथा भिन्न कहा जा सकता है और न अभिन्न । यह न नित्य है, और न अनित्य ।
यह पुद्गल अपने अच्छे, बुरे कर्मोंका कर्ता और भोक्ता है, इसलिये इसके अस्तित्वका निषेध नहीं कर सकते ।
(४) आत्मा अव्याकृत है :
इस मान्यताके अनुसार आत्मा क्या है, यह नहीं कहा जा सकता । (क) जिस समय
अनुराधने बुद्धसे प्रश्न किया कि क्या जीव रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञानसे बाह्य है
तो बुद्धने उत्तर दिया कि तुम इसी लोकमें जीव दिखानेमें समर्थ नहीं, फिर परलोककी बात तो दूर
रही; इसलिये मैं 'दुःख, और दुखका निरोध' इन दो तत्त्वोंका ही उपदेश करता हूँ । जिस प्रकार किसी
तीरसे आहत मनुष्यका 'यह तीर किसने मारा है'? कौनसे समयमें मारा है ? कौनसी दिशासे आया है ?'
आदि प्रश्न करना वृथा है, क्योंकि उस समय मनुष्यको इन सब प्रश्नोत्तरोंमें न पड़कर घावकी रक्षा की ही
बात सोचनी चाहिये; उसी प्रकार आत्मा क्या है ? परलोक क्या है ? मरनेके बाद तथागत पैदा होता है
या नहीं ? आदि प्रश्न अव्याकृत हैं२ । (ख) बहुतसी जगह आत्माके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर बुद्ध मौन
धारण करते हैं३ । इस मौनका कारण हैं कि यदि वे कहें कि आत्मा है तो लोग शाश्वतवादी हो जाते हैं और
यदि कहा जाये कि आत्मा नहीं है, तो लोग उच्छेदवादी हो जाते हैं। अतएव एक ओर शाश्वतवाद और
दूसरी ओर उच्छेदवादका निराकरण करनेके लिये मौन रहना ही ठीक समझा गया४ । (ग) अनेक बौद्ध
तथा—दुखमेव हि न कोचि दुःखितो ।
कारको न किरियाव विज्जति ।
अत्थि निवृत्ति न निवृत्तो पुमा ।
मग्गमत्थि गमको न विज्जति ॥ विसुद्धिमग्ग, अध्याय १६ ।
तथा देखिये कथावत्थु १-२; अभिधर्मकोश ३-१८ टीका; दीघनिकाय, पायासिझुत्त; संयुत्तनिकाय
५-१०-६ ।
१. “भारं वो भिक्षवो देशयिष्यामि भारादानं भारनिक्षेपं भारहारं च । तत्र भारः पंचोपादानस्कंधाः,
भारादानं तृप्तिः, भारनिक्षेपो मोक्षः, भारहारः पुद्गलाः......” तत्त्वसंग्रहपंजिका, आत्मवादपरीक्षा ३४६;
तथा धम्मपद, अत्तवग्गो ।
२. संयुत्तनिकाय, अनुराधसुत्त; तथा—‘स्कंधाः सत्त्वा एव ततो भिन्ना वा' इति प्रश्नः सत्त्वस्य विषये,
सत्त्वश्च नास्त्येव किमपि वस्तु । तेनायं प्रश्नः ‘वन्ध्यापुत्रः शुक्ल कृष्णो वा' इतिवत् स्थापनीय (अनु-
त्तरितं ) एव । अभिधर्मकोश ५-२२ टिप्पणी; बुद्धचर्या पृ. १८६ से आगे ।
३. किंनु खो गोतम अत्यत्ताति ।
एवं वुत्ते भगवा तुण्ही अहोसि ॥
किं पन भो गोतम नत्थत्ताति ॥
दुतियंपि खो भगवा तुण्ही अहोसि । संयुत्तनिकाय ४-१०० ।
४. अस्तीति शाश्वतग्राहो नास्तीत्युच्छेददर्शनं । तस्मादस्तित्वनास्तित्वे नाश्रीयेत विचक्षणः ॥
माध्यमिककारिका १८-१० ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२१
सूत्रोंमें आत्माके विषयमें प्रश्न किये जानेपर आत्माका स्पष्ट विवेचन न करके बार बार यही कहा गया है कि
रूप आत्मा नहीं, वेदना आत्मा नहीं, संज्ञा आत्मा नहीं, संस्कार आत्मा नहीं, विज्ञान आत्मा नहीं १ तथा जो
लोग रूप, वेदना आदिको आत्मा समझते हैं, उनके सत्कायदृष्टि कही जाती है २ । महायान सम्प्रदायने इसी
अनत्तावाद ( नैरात्म्यवाद ) पर अपने विज्ञानवाद और शून्यवादकी स्थापना कर क्लेशावरण और ज्ञेयावरण
के नाश करनेके लिये नैरात्म्यवादके प्रतिपादनपूर्वक आत्मदृष्टिसे क्लेशोंकी उत्पत्ति बतायी है ३ । नागार्जुनने
कहा है, "बुद्धने यह भी कहा है कि आत्मा है, और यह भी कहा है कि आत्मा नहीं है । तथा बुद्धने
आत्मा और अनात्मा किसीका भी उपदेश नहीं दिया ४ ।"
१. मज्झिमनिकाय, महापुण्णमसुत्त १०९ ।
२. सत् कायः पंच उपादानस्कंधाः एव । तत्राहं मम दृष्टिः । अभिधर्मकोश ५-७ ।
३. सत्कायदृष्टिप्रभवानशेषान् क्लेशांश्च दोषांश्च धिया विपश्यन् ।
आत्मानमस्याविषयं च बुद्ध्वा । योगी करोत्यात्मनिषेधमेव ॥ माध्यमिककारिका १८-१८ ।
४. आत्मेत्यपि प्रज्ञपितमनात्मेत्यपि देशितः । बुद्धैर्नात्मा न चानात्मा कश्चिदित्यपि देशितं ॥
माध्यमिककारिका १८-६ ।
४१
न्याय-वैशेषिक परिशिष्ट ( ग )
( श्लोक ४ से १० तक )
न्याय-वैशेषिकदर्शन
( १ ) न्याय दर्शनके मूल प्रवर्तक अक्षपाद गौतम कहे जाते हैं। अक्षपादको महायोगी, अहल्यापति
आदि नामोंसे भी कहा गया है¹। पुराणोंके अनुसार स्वमतदूषक व्यास ऋषिका मुख देखनेके लिए गौतमके
पैरोंमें नेत्र थे, इसलिए इनका नाम अक्षपाद पड़ा²। प्राचीन मान्यताके अनुसार, गौतम ऋषिके आश्रममें
वृष्टिके न होनेपर भी वरुणके वरसे वृक्ष आदि वनस्पतियाँ सदा हरी भरी रहा करती थीं। नैयायिक
योग; और शैव नामसे भी कहे जाते हैं। नैयायिक दर्शनमें शिव भगवान जगतकी सृष्टि और संहार
करते हैं; वे व्यापक, नित्य, एक और सर्वज्ञ हैं, और इनकी बुद्धि शाश्वती रहती है। नैयायिक लोग प्रमाण,
प्रमेय संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति
और निग्रहस्थान इन सोलह तत्त्वोंके ज्ञानसे दुखका नाश होनेपर मुक्ति स्वीकार करते हैं। ये लोग प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान, और आगम इन चार प्रमाणोंको मानते हैं।³ ( २ ) वैशेषिक दर्शनके आद्यप्रणेता
कणाद कहे जाते हैं। कणादको कणभक्ष अथवा औलूक्य नामसे भी कहा गया है। पौराणिक मान्यताके
अनुसार, कणाद ऋषि रास्तेमें पड़े हुए चावलोंके कणोंका आहार करके कपोती वृत्तिसे अपना निर्वाह करते
थे, अतएव इनका नाम कणाद अथवा कणभक्ष पड़ा⁴। कणादने काश्यपगोत्री उलूक ऋषिके घर जन्म
१. अक्षपादो महायोगी गौतमाख्योऽभवन्मुनिः ।
गोदावरीसमानेता अहल्यायाः पतिः प्रभुः ॥
स्कन्दपुराण, कुमारिकाखण्ड ।
२. पुराणोंमें सांख्य-योगकी तरह अक्षपाद और कणादप्रणीत शास्त्रोंको श्रुतिविरुद्ध कहा है—
अक्षपादप्रणीते च काणादे योगसांख्ययोः ।
त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽर्थः । पद्मपुराण; न्यायकोश पृ. २ ।
३. न्याय ग्रन्थोंमें प्रमाणके लक्षण निम्न प्रकारसे मिलते हैं—
( क ) जिस प्रत्यक्ष आदिके द्वारा प्रमाता पदार्थोंको यथार्थ रूपसे जानता है, उसे प्रमाण कहते हैं--
प्रमाता येनार्थं प्रमिणोति तत् प्रमाणम् । वात्स्यायनभाष्य १-१-१ ।
( ख ) जो ज्ञानमें कारण हो, उसे प्रमाण कहते हैं--उपलब्धिहेतुः प्रमाणम् । उद्योतकर, न्यायवार्तिक ।
( ग ) अव्यभिचारी और असंदिग्ध रूपसे पदार्थोंके ज्ञान करनेवाली बोधाबोध स्वभाववाली सामग्रीको
प्रमाण कहते हैं--अव्यभिचारिणीमसंदिग्धार्योपलब्धिम् विदधति बोधाबोधस्वभावा सामग्री
प्रमाणम् । जयन्त, न्यायमंजरी पृ. १२ ।
( घ ) पदार्थोंके यथार्थ रूपसे जाननेको प्रमा और प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं--यथार्थानुभवः
प्रमा । तत्साधनं च प्रमाणम् । उदयन, तात्पर्यपरिशुद्धि ।
( ङ ) प्रमासे नित्य संबंध रखनेवाले परमेश्वरको प्रमाण कहते हैं--साधनाश्रयव्यतिरिक्तत्वे सति
प्रमाव्याप्तं प्रमाणम् । सर्वदर्शनसंग्रह, अक्षपाददर्शन ।
४. मुनिविशेषस्य कापोतीं वृत्तिममुष्ठितवतो रथ्यानिपतितांस्तण्डुलकणानादाय कृताहारस्याहारनिमित्तात्
कणाद इति संज्ञाऽजनि । षड्दर्शनसमुच्चय, गुणरत्नटीका, पृ. १०७ ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२३
धारण किया था, अतएव इनका नाम औलूक्य पड़ा । वायुपुराणके अनुसार, औलूक्य द्वारकाके पास प्रभासके
रहनेवाले सोमशर्माके शिष्य थे । वैदिक परम्पराका अनुकरण करते हुए हेमचन्द्र, राजशेखर, गुणरत्न आदि
जैन विद्वानोंका कथन है कि स्वयं ईश्वरने उल्लू ( उलूक ) का रूप धारण करके कणाद ऋषिको द्रव्य, गुण,
कर्म सामान्य, विशेष और समवाय इन छह पदार्थोंका उपदेश किया था। इस उपदेशके ऊपरसे कणाद
ऋषिने जीवोंके उपकारके लिये वैशेषिक सूत्रोंकी रचना की, इसीलिए कणाद ऋषि औलूक्य नामसे कहे जाने
लगे ।१ "ईसाकी छठी शताब्दिके चित्साङ् ( Ci-tsan ) नामक एक चीनी बौद्ध वैशेषिक दर्शनके जन्मदाता
उलूकका समय बुद्धसे आठ सौ वर्ष पहले बताते हैं। चित्साङ्का कथन है कि उलूक रातको सूत्रोंकी रचना
करते थे और दिनमें भिक्षावृत्ति करते थे, इसलिये इनका नाम उलूक पड़ा। चित्साङ्ने दूसरी जगह लिखा
है कि उलूकके रचे हुए सूत्र सांख्य दर्शनके सूत्रोंसे बढ़े-चढ़े (विशेष) थे, इसलिये उलूकका दर्शन वैशेषिक
दर्शनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । सूत्रांलकारके कर्त्ता अश्वघोषका कहना है कि जैसे रातमें उल्लू शक्तिशाली
होता है, वैसे ही संसारमें बुद्धके आनेके पहले यह दर्शन शक्तिशाली था। बुद्धके प्रादुर्भाव होनेपर इस
दर्शनका प्रभाव हीन हो गया, इसलिये इस दर्शनको औलूक्य दर्शन कहते हैं२ ।" वैशेषिकोंका दूसरा नाम
पाशुपत है। वैशेषिक लोग द्रव्य,३ गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छह तत्त्वोंको४, और
प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाणोंको स्वीकार करते हैं।
न्याय-वैशेषिकोंके समानतंत्र
नैयायिक और वैशेषिक लोग बहुतसी मान्यताओंसे एकमत हैं, इसलिये इन्हें 'समानतंत्र' कहा गया
है। न्यायभाष्यकार वात्स्यायनने वैशेषिक सिद्धांतको न्यायका 'प्रतितंत्र' सिद्धांत कहा है। बौद्ध विद्वान
आर्यदेव और हरिवर्मन् भी न्याय और वैशेषिक सिद्धांतोंका भिन्न-भिन्न रूपमें उल्लेख नहीं करते । उद्योतकर
अपने न्यायवार्तिकमें वैशेषिक सिद्धांतोंका ही उपयोग करते हैं। आगे चलकर वरदराज तार्किकरक्षामें,
केशवमिश्र तर्कभाषामें, शिवादित्य सप्तपदार्थीमें, लौगाक्षिभास्कर तर्ककौमुदीमें, विश्वनाथ भाषापरिच्छेद और
सिद्धांतमुक्तावलिमें, अन्नंभट्ट तर्कसंग्रहमें और जगदीश तर्कामृतमें न्याय-वैशेषिक सिद्धांतोंका समान रूपसे उप-
योग करते हैं। विद्वानोंका मत है कि प्रशस्तपादभाष्यकारके समयके वैशेषिक सिद्धांत और उद्योतकरके
समयके न्याय सिद्धांतोंमें बहुत कम अन्तर था, परन्तु उत्तरकालीन वैशेषिकोंने आत्मा और अनात्माके
१. वैशेषिकः स्यादौलूक्यः । नित्यद्रव्यवृत्तयोऽत्र विशेषाः, ते प्रयोजनमस्य वैशेषिकं शास्त्रं तद् वेत्यधीते
वा वैशेषिकाः । उलूकस्यापत्यमिव । तज्जन्मत्वादौलूक्यं शास्त्रं, उलूकवेषधारिणा महेश्वरेण प्रणीतमिति
प्रसिद्धिः । अभिधानचिन्तामणि ३-५२६ वृत्ति ।
२. प्रोफेसर ध्रुव, स्याद्वादमंजरी, नोट्स, पृ. २३-२५ ।
३. वैशेषिकोंके द्रव्य, गुण, काल, आत्मा, परमाणु आदिकी मान्यताओंके साथ जैनदर्शनके सिद्धांतोंकी
तुलना करनेके लिये देखिये वैशेषिकसूत्र और तत्त्वार्थाधिगमसूत्र; तथा प्रोफेसर याकोबी का Jain Sutras
भाग २, भूमिका, पृ. ३३ से ३८ ।
४. वैशेषिकसूत्र और प्रशस्तपादभाष्यमें द्रव्य, गुण आदि छह पदार्थोंका ही उल्लेख पाया जाता है।
हरिभद्र, शंकराचार्य आदि विद्वानोंने छह पदार्थोंका उल्लेख किया है। आगे जाकर श्रीधर, उदयन,
शिवादित्य आदि विद्वान छह पदार्थोंमें अभाव नामका सातवां पदार्थ मिलाकर सात पदार्थोंको स्वीकार
करते हैं। इन विद्वानोंकी मान्यता है कि अभाव तुच्छ रूप नहीं है। अन्य पदार्थोंकी तरह अभाव भी
अलग पदार्थ है। यह अभाव भावके आश्रयसे रहता है, इसलिये भाष्यकारने अभावको अलग पदार्थ
नहीं कहा ( अभावस्य पृथगनुपदेशः भावपारतन्त्र्यात् न त्वभावात्—न्यायकंदली पृ. ६) । शिवादित्यने
सात पदार्थोंके विवेचन करनेके लिये सप्तपदार्थी नामक स्वतंत्र ग्रंथकी रचना की है।
'विशेष' की ओर अधिक ध्यान दिया, और परमाणुवादका विशेष रूपसे अध्ययन किया, तथा उत्तरकालीन
नैयायिकोंने न्याय और तर्कको वृद्धिंगत करनेमें अपनी शक्ति लगाई इसलिये आगे चलकर न्याय और
वैशेषिक सिद्धांतोंमें परस्पर बहुत अन्तर पड़ता गया । यह अन्तर इतना बढ़ा कि वैशेषिकोंके पदार्थोंका
खण्डन करनेके लिये नव्य-नैयायिक रघुनाथ आदिको 'पदार्थखण्डन' जैसे ग्रंथोंकी रचना करनी पड़ी ।
गुणरत्नसूरिने नैयायिक और वैशेषिकोंके मतको अभिन्न१ बताते हुए उनके साधुओंके समान वेष और
आचारका वर्णन करते हुए लिखा है—"ये लोग निरन्तर दण्ड धारण करते हैं, मोटी लंगोटी पहिनते हैं,
अपने शरीरको कंबलसे ढके रहते हैं, जटा बढ़ाते हैं, भस्म लपेटते हैं, यज्ञोपवीत रखते हैं, हाथमें जलपात्र
रखते हैं, नीरस भोजन करते हैं, प्रायः वृक्षके नीचे वनमें रहते हैं, तूंबी रखते हैं, कन्दमूल और फलके ऊपर
रहते हैं, आतिथ्यकर्ममें रत रहते हैं, कोई सस्त्रीक होते हैं और कोई स्त्री रहित होते हैं, दोनोंमें स्त्री
रहित अच्छे समझे जाते हैं। ये पंचाग्नि तप तपते हैं, संयमकी उत्कृष्ट स्थितिमें नग्न रहते हैं और
प्रातःकाल दांत, पेट आदिको साफ करके अंगमें भस्म लगाकर शिवका ध्यान करते हैं। जब इनको
यजमान लोग नमस्कार करते हैं, ये 'ओं नमः शिवाय' बोलते हैं, और संन्यासी लोग केवल 'नमः शिवाय'
कहते हैं। ये तपस्वी शैव, पाशुपत, महाव्रतधर और कालमुखके भेदसे चार प्रकारके होते हैं। नैयायिक
और वैशेषिकोंका देवताके विषयमें मतभेद नहीं है।"
न्याय-वैशेषिकोंमें मतभेद
१ वैशेषिक लोग शब्दको भिन्न प्रमाण नहीं मानते, परन्तु नैयायिक वेदोंके प्रामाण्यको स्वीकार
करते हैं। नैयायिक शब्दको भिन्न प्रमाण मानकर वेदोंके प्रमाणके अतिरिक्त ऋषि, आर्य और म्लेच्छ
आप्तोंको प्रमाण मानते हैं।
२ नैयायिक उपमानको भिन्न प्रमाण मानते हैं, तथा अर्थापत्ति, संभव और ऐतिह्यको प्रमाण मान
कर उनका प्रत्यक्ष, अनुमान आदि चार प्रमाणोंमें अंतर्भाव करते हैं। वैशेषिक सूत्रोंमें उक्त प्रमाणोंका कोई
उल्लेख नहीं। वैशेषिक प्रत्यक्ष और अनुमान केवल दो ही प्रमाण मानते हैं।
३ नैयायिक लोग सोलह पदार्थ मानते हैं। न्यायसूत्रोंमें द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष और समवायके
विषयमें कोई चर्चा नहीं आती। वैशेषिकसूत्रोंकी चर्चा प्रधानतया द्रव्य, गुण आदि पदार्थोंके संबंधमें
ही होती है।
४ वैशेषिकसूत्रोंमें ईश्वरका नाम नहीं। न्यायसूत्र ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध करते हैं।
५ वैशेषिक मोक्षको निश्रेय अथवा मोक्ष नामसे कहते हैं, और शरीरसे सदाके लिये संबंध
छूट जानेको मोक्ष मानते हैं। नैयायिक मोक्षको अपवर्ग नामसे कहते हैं, और दुखके क्षयको अपवर्ग
मानते हैं।
६ वैशेषिक पोलुपाकके सिद्धांतको और नैयायिक पिठरपाकके सिद्धांतको मानते हैं२ ।
वैदिक साहित्यमें ईश्वरके विविध रूप
(१) वैदिक युगके लोग सूर्य, चन्द्र, उषा, अग्नि, विद्युत्, आकाश आदिको अपना आराध्य
देव समझ कर सूर्य आदिकी पूजा और आराधना करते थे। धीरे-धीरे सूर्य आदिका स्थान इन्द्र, वरुण
१. अन्ये केचनाचार्याः नैयायिकमताद्वैशेषिकैः सह भेदं पार्थक्यं न मन्यन्ते । एकदेवतत्त्वेन तत्त्वानां मिथोऽ-
न्तर्भाविनाल्पीयस एव भेदस्य भावाच्च नैयायिकवैशेषिकाणां मिथो मतैक्यमेवेच्छन्तीत्यर्थः । षड्दर्शन-
समुच्चयटीका पृ. १२१ ।
२. देखिये दासगुप्तकी A History of Indian Philosophy, Vol. I, पृ. ३०४-५ ।
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३२५
आदि देवताओंका मिला। ये इन्द्र, वरुण आदि देवतागण, जिस तरह कोई बढ़ई अथवा सुनार किसी नूतन
पदार्थकी सृष्टि करता है, उसी तरह एक साथ अथवा एक-एक करके जगतकी सृष्टि करते हैं । तत्पश्चात्
वेदोंमें जन, सृज, अण्ड, गर्भ, रेतस आदि शब्दोंका प्रयोग मिलता है, और यहाँ देवताओंको सृष्टिसर्जक
और शासक कहकर पिता रूपसे उल्लेख किया गया है । आगे चलकर सृष्टिको देवताओंकी माया कह कर
सृष्टिको मनुष्यबुद्धिके बाह्य बताया है। इन्द्र मायाके द्वारा सृष्टिकी रचना करता है, और अपने
शरीरसे ही अपने माता-पिताका निर्माण करता है । तत्पश्चात् वैदिक ऋषि ईश्वरको निश्चित रूप देनेके
लिये सत्, असत् तथा जीवन, मृत्यु आदि परस्पर विरोधी शब्दोंसे ईश्वरका वर्णन करते¹ हैं । (२)
ब्राह्मणोंमें भी ईश्वर संबंधी अनेक मनोरंजक कल्पनायें पायी जाती हैं । (अ) प्रजापतिने एकसे अनेक
होनेकी इच्छा की, इसके लिये प्रजापतिने तप किया और तीन लोकोंकी सृष्टि की² । (ब) सृष्टिके पहले
पृथिवी, आकाश आदि किसी पदार्थका भी अस्तित्व नहीं था । प्रजापतिने एकसे अनेक होनेके लिये
तपश्चरण किया । तपश्चरणके बलसे धूम, अग्नि, प्रकाश, ज्वाला, किरणें और वाष्पकी उत्पत्ति हुई, और
बादमें ये सब पदार्थ बाद़लकी तरह जमकर घनीभूत हो गये । इससे प्रजापतिका लिंग फट गया, और
उसमेंसे समुद्र फूट निकला । प्रजापति रुदन करने लगे, क्योंकि अब उनके ठहरनेकी कोई जगह नहीं रह
गई थी । प्रजापतिकी आँखोंके अश्रुबिन्दु समुद्रके जलमें गिरे और ये पृथिवीके रूपमें परिणत हो गये ।
तत्पश्चात् प्रजापतिने पृथिवीको साफ किया और उसमें वायुमंडल और आकाशकी उत्पत्ति हुई ।³ (स)
प्रजापतिने एकसे अनेक होनेके लिये कठोर तपश्चरण किया । उससे ब्राह्मन् (वेद) और जलकी उत्पत्ति
हुई । प्रजापतिने त्रयीविद्याको लेकर जलमें प्रवेश किया, इससे अंडा उत्पन्न हुआ । प्रजापतिने अंडेका
स्पर्श किया और फिर अग्नि, वाष्प, मृत्तिका आदिकी उत्पत्ति हुई ।⁴
(३) उपनिषद्-साहित्यमें भी सृष्टि और सृष्टिकर्ताके विषयमें विविध सिद्धांतोंका प्रतिपादन किया
गया है । (अ) केवल बृहदारण्यक उपनिषद्में कई कल्पनायें मिलती हैं । यहाँ असत्, मृत्यु और क्षुधाको
एक मानकर मृत्युसे जीवनकी, तथा मृत्युसे जल, पृथिवी, अग्नि, वायु, लोक आदिकी सृष्टि स्वीकार की
गई है । दूसरे स्थलपर आत्मा अथवा पुरुषसे सृष्टि की उत्पत्ति मानकर कहा गया है कि जिस समय
आत्मामें संवेदन शक्तिका आविर्भाव हुआ, उस समय आत्मा अपनेको अकेले पाकर भयभीत हो उठा ।
आत्मा पुरुष और स्त्री दो भागोंमें विभक्त हुआ । स्त्रीने देखा कि पुरुष उसका सर्जक है और साथ ही
उसका प्रेमी भी है । स्त्रीने गौका रूप धारण कर लिया । पुरुषने बैलका रूप धारण किया । इसी प्रकार
बकरी, बकरा आदि युगलोंकी उत्तरोत्तर सृष्टि होती गई । अन्यत्र ब्रह्मसे सृष्टिकी रचना मानी गई हैं ।
यहां कहा गया है कि सृष्टिके पहले एक ब्रह्म ही था । ब्रह्मने अपनेको पर्याप्त शक्तिशाली न देखकर क्षत्रिय,
वैश्य, शूद्र जातियोंकी और सत्यकी सृष्टि⁵ की । (ब) छान्दोग्य उपनिषद्में असत्को अंडा बताकर अंडेके
फूटनेसे पृथिवी, आकाश, पर्वत आदिकी रचना मानी गई है ।⁶ (स) प्रश्न उपनिषद्में सृष्टिकर्ताको
अनादि मानकर कहा गया है कि जिस समय ईश्वरको सृष्टिके रचनेकी इच्छा हुई, उस समय
ईश्वरने रयि और प्राणके युगलको पैदा किया⁷ । (ड) मुण्डक उपनिषद्में अक्षरसे सृष्टि मानी गई
१. देखिये वेल्वेल्कर और रानड़ेकी History of Indian Philosophy Vol, II अध्याय १।
२. ऐतरेयब्राह्मण ५-२३। देखिये वही, अध्याय २।
३. तैत्तिरीयब्राह्मण ११-२-९। वही ।
४. शतपथब्राह्मण ६-१-१-८ और आगे । वही ।
५. बृहदारण्यक उ. अध्याय १।
६. छान्दोग्य उ. ३-१९-१।
७. प्रश्न उ. १-४।
३२६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
है¹। इसी प्रकार अन्य उपनिषदोंमें तम, प्राण, आकाश, हिरण्यगर्भ, जल, वायु, अग्नि आदिसे सृष्टिका
आरंभ स्वीकार किया गया है।²
भारतीय दर्शनमें चार्वाक, बौद्ध, जैन, मीमांसा, सांख्य³ और योग४ दर्शनकार ईश्वरको सृष्टिकर्त्ता
स्वीकार नहीं करते। वेदान्त५, न्याय६ और वैशेषिक७ दर्शनोंमें ईश्वरको सृष्टिका रचयिता माना
गया है।
ईश्वरके अस्तित्वमें प्रमाण
ईश्वरवादियोंका मत है कि इस अचेतन सृष्टिका कोई सचेतन नियन्ता होना चाहिये। परमाणु और
कर्मशक्तिसे सृष्टिकी रचना नहीं हो सकती क्योंकि परमाणु और कर्मशक्ति दोनों अचेतन हैं। इसलिये इस
सृष्टिका सचेतन नियन्ता सर्वव्यापी, करुणाशील और जीवोंके कर्मोंके अनुसार सुख-दुःखका फल देनेवाला
एक ईश्वर ही हो सकता है। ईश्वरके अस्तित्वमें दिये जानेवाले प्रमाणोंको तीन विभागोंमें विभक्त किया जा
१. मुण्डक उ. १-७।
२. देखिये रानड़े और बेलवलकरकी Constructive Survey of the Upanisadic Philosophy,
अ. २।
३. सांख्यदर्शनके इतिहासको तीन प्रधान युगोंमें विभक्त किया जाता है—(१) मौलिक अर्थात् उपनिषद्,
भगवद्गीता, महाभारत और पुराणोंका सांख्य ईश्वरवादी था। (२) दूसरे युगका अर्थात् महाभारत-
के अर्वाचीन भागमें, तथा सांख्यकारिका और वादरायणके सूत्रोंमें वर्णित सांख्य 'प्रकृतिवाद' के सिद्धांत-
से प्रभावित होकर अनीश्वरवादी हो गया। (३) तीसरे युगका अर्थात् ईसाकी सोलहवीं शताब्दिका
सांख्यदर्शन विज्ञानभिक्षुके अधिपतित्वमें फिरसे ईश्वरवादकी ओर झुक गया।
४. योगको सेश्वर सांख्य भी कहा जाता है। इस मतमें ईश्वरको सृष्टिका कर्त्ता नहीं मानकर एक पुरुष-
विशेषको ईश्वर माना गया है। यह पुरुषविशेष सदा क्लेश, कर्म, कर्मोंका फल और वासनासे अस्पृष्ट
रहता है।
५. वेदान्तके अनुसार, ईश्वर जगतका निमित्त और उपादान कारण है, इसलिये वेदान्तियोंका मत है कि
ईश्वरने स्वयं अपनेमेंसे ही जगतको बनाया है, जब कि न्याय-वैशेषिकोंके अनुसार सृष्टिमें ईश्वर केवल
निमित्त कारण है। इसके अतिरिक्त, वेदान्त मतमें अनुमानसे ईश्वरकी सिद्धि न मानकर जन्म, स्थिति
और प्रलय तथा शास्त्रोंका कारण होनेसे ईश्वरको सिद्धि मानी गई है।
६. गार्वे (Garbe) आदि विद्वानोंके मतके अनुसार, न्यायसूत्र और न्यायभाष्यमें ईश्वरवादका प्रतिपादन
नहीं किया गया है। यहाँ ईश्वरको केवल द्रष्टा, ज्ञाता सर्वज्ञ और सर्वशक्तिशाली कहा गया है, सृष्टि-
का कर्त्ता नहीं; परन्तु यह ठीक नहीं। क्योंकि न्यायभाष्यमें ईश्वरके पितृतुल्य होनेका स्पष्ट उल्लेख
मिलता है—यथा पिताऽपत्यानां तथा पितृभूत ईश्वरो भूतानाम् ४-१-२१।
७. कुछ विद्वानोंका मत है कि वैशेषिकसूत्रोंमें ईश्वरके विषयका कोई उल्लेख नहीं पाया जाता। यहां पर-
माणु और आत्माकी क्रिया अदृष्टके द्वारा प्रतिपादित की जाती है। इसलिये मौलिक वैशेषिक दर्शन
अनीश्वरवादी था। अथैली (Athalye) आदि विद्वान इस मतका विरोध करते हैं। उनका कहना
है कि वैशेषिक दर्शन कभी भी अनीश्वरवादी नहीं रहा। वैशेषिकसूत्रोंका ईश्वरके विषयमें मौन रहने-
का यही कारण है कि वैशेषिक दर्शनका मुख्य ध्येय आत्मा और अनात्माकी विशेषताओंको प्ररूपण
करना रहा है। Tarka-Samgraha, पृ. १३६, ७—देखिये प्रोफेसर राधाकृष्णनकी Indian
Philosophy, Vol. II, पृ. २२५।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२७
सकता है—कार्यकारणभावमूलक ( Cosmological ), सत्तामूलक ( Ontological ), प्रयोजनमूलक
( Teleological ) ।
( १ ) कार्यकारणभावमूलक : न्याय-वैशेषिकोंका ईश्वरकी सिद्धिमें यह सुप्रसिद्ध प्रमाण है ।
नैयायिकोंका कहना है : 'जितने भी कार्य होते हैं, वे सब किसी बुद्धिमान कर्ताके बनाये हुए देखे जाते हैं ।
इसलिये पृथिवी, पर्वत आदि किसी कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योंकि ये कार्य हैं। जो जो कार्य होते हैं, वे
किसी कर्ताकी अपेक्षा रखते हैं, जैसे घट । पृथिवी, पर्वत आदि भी कार्य हैं, इसलिये ये भी किसी कर्ताके
बनाये हुए है । यह कर्ता ईश्वर ही है ।'¹ शंका—हम जो घट आदि साधारण कार्योंको देखते हैं, उनका
कोई कर्ता अवश्य है परन्तु पृथिवी, पर्वत आदि असाधारण कार्योंके कर्ताका अनुमान नहीं किया जा सकता ।
अतएव 'जो कार्य होते हैं, वे किसी कारणकी अपेक्षा रखते हैं' यह अनुमान ठीक नहीं है । समाधान—
हमने उक्त अनुमानमें सामान्य रूपसे व्याप्तिका ग्रहण किया है । जिस प्रकार रसोईघरमें धूम और अग्निकी
व्याप्तिका ग्रहण होनेपर उस व्याप्तिसे पर्वत आदिमें भी धूम और अग्निकी व्याप्तिका ग्रहण किया जा सकता है,
उसी तरह घट आदि कार्य और कुम्हार आदि कर्ताका संबंध देखकर पृथिवी, पर्वत आदि सम्पूर्ण कार्योंके
कर्ताका अनुमान किया जाता है । उक्त अनुमानमें घट केवल दृष्टांतमात्र है। दृष्टांतके सम्पूर्ण धर्म दाष्टाँ-
तिक में नहीं आ सकते । इसलिये जैसे छोटेसे छोटे कार्यका कोई कर्ता है, उसी तरह बड़ेसे बड़े पृथिवी
आदि कार्योंका कर्ता ईश्वर है। शंका—अंकुर आदिके कार्य होनेपर भी उनका कोई कर्ता नहीं देखा
जाता, इसलिये उक्त अनुमान बाधित है । समाधान—अंकुर आदि कार्य हैं, इसलिये उनका कर्ता भी
ईश्वर ही है । ईश्वर अदृश्य है, अतएव हम उसे अंकुर आदिको उत्पन्न करता हुआ नहीं देख सकते ।
( २ ) सत्तामूलक : पश्चिमके एन्सेल्म ( Anselm ) और दकार्त ( Descarte ) आदि विद्वान ईश्वर-
के अस्तित्वमें दूसरा प्रमाण यह देते हैं कि यदि ईश्वरकी सत्ता न होती तो हमारे हृदयमें ईश्वरके अस्तित्व-
की भावना नहीं उपजती । जिस प्रकार त्रिभुजकी कल्पनाके लिये यह मानना आवश्यक है कि त्रिभुजके
तीन कोण मिलकर दो समकोणके बराबर होते हैं, उसी प्रकार ईश्वरकी कल्पनाके लिये ईश्वरका अस्तित्व
मानना अनिवार्य है ।² ( ३ ) प्रयोजनमूलक : ईश्वरके सद्भावमें तीसरा प्रमाण है कि हमें सृष्टिमें एक
अद्भुत व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है । यह सृष्टिकी व्यवस्था और उसका सामंजस्य केवल परमाणु आदिके
संयोगके फल नहीं हो सकते । इसलिये अनुमान होता है कि कोई ऐसी शक्तिशाली महान् चेतनाशक्ति
अवश्य है जिसने इस सृष्टिकी रचना की है ।³
१. ह्यूम ( Hume ) आदि पश्चिमके विद्वानोंने इस तर्कका खण्डन किया है । इन लोगोंका कहना है कि
जिस प्रकार हम सम्पूर्ण कार्योंके कारणका पता लगाते-लगाते आदिकारण ईश्वर तक पहुँचते हैं, उसी
प्रकार ईश्वरके कारणका भी पता क्यों न लगाया जाय ? यदि हम ईश्वर रूप आदिकारणका पता लगा-
कर रुक जाते हैं, तो इससे मालूम होता है कि हम ईश्वरको केवल श्रद्धाके आधारपर मान लेना चाहते
हैं । जैन, बौद्ध आदि अनीश्वरवादियों ने भी यह तर्क दिया है ।
२. काण्ट ( Kant ) आदि पाश्चिमात्य दार्शनिकोंने इस युक्तिका खण्डन किया है । इन लोगोंका कथन
है कि यदि हम मनुष्य-हृदयमें ईश्वरकी कल्पनाके आधारसे ईश्वरके अस्तित्वको स्वीकार करें तो
"संसारमें जितने भिक्षुक हैं, वे मनमें अशर्फियोंकी कल्पना करके करोड़पति हो जायें।"
३. काण्ट (Kant), स्पेंसर, (Spencer), प्रोफेसर टिण्डल ( Tyndall ), प्रोफेसर नाइट ( Knight )
आदि विद्वानोंका कहना है कि हम ससीम ब्रह्माण्डको देखकर उससे असीम उपादान कारणका अनुमान
नहीं कर सकते । इसलिये जब तक हम अन्य प्रमाणोंके द्वारा ईश्वरका निश्चय न कर लें, अथवा जब
तक स्वयं ईश्वरके समान शक्तिशाली न बन जांय, तब तक ईश्वरके विषयमें हम अपना निर्णय नहीं दे
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आचार्य उदयनने ईश्वर की सिद्धिमें निम्न प्रमाणोंका उल्लेख किया है—
(क) सृष्टि कार्य है, इसलिये इसका कोई कारण होना चाहिये । (ख) सृष्टिके आदिमें दो
परमाणुओंमें संबंध होनेसे द्वयणुककी उत्पत्ति होती है, इस आयोजन-क्रियाका कोई कर्त्ता होना चाहिये ।
(ग) सृष्टिका कोई आधार चाहिये । (घ) बुनने आदि कार्योंको सृष्टिके पहले किसीने सिखाया होगा,
इसलिये कोई आदिशिक्षक होना चाहिये । (ङ) वेदोंमें कोई शक्तिका प्रदाता होना चाहिये । (च) कोई
श्रुतिका बनानेवाला होना चाहिये । (छ) वेदवाक्योंका कोई कर्ता होना चाहिये । (ज) दो परमाणुओंके
संबंधसे द्वयणुक बनता है, इसका कोई ज्ञाता होना चाहिये¹।
ईश्वरविषयक शंकायें
शंका—जगतके निर्माण करनेमें ईश्वरकी प्रवृत्ति अपने लिये होती है, अथवा दूसरेके लिये ? ईश्वर
कृतकृत्य है, उसकी सम्पूर्ण इच्छाओंकी पूर्ति हो चुकी है, अतएव वह अपनी इच्छाओंको पूर्ण करनेके लिये
जगतका निर्माण नहीं कर सकता । यदि ईश्वर दूसरोंके लिये सृष्टिकी रचना करता है तो उसे बुद्धिमान
नहीं कहा जा सकता । करुणासे बाध्य होकर भी ईश्वरने सृष्टिका निर्माण नहीं किया, अन्यथा जगतके
सम्पूर्ण प्राणियोंको सुखी होना चाहिये था ।² ईश्वरवादी—वास्तवमें करुणाके वशीभूत होकर ही ईश्वरकी
सृष्टिके निर्माण करनेमे प्रवृत्ति होती है³। ईश्वर भिन्न-भिन्न प्राणियोंके पुण्य और पाप कर्मोंके अनुसार
सृष्टिका सर्जन करता है, इसलिये सर्वथा सुखमय सृष्टिको रचना नहीं हो सकती । जीवोंके अच्छे ओर
बुरे कर्मोंके अनुसार जगतको रचना करनेसे ईश्वरको स्वतंत्रतामें कोई बाधा नहीं पड़ सकती । क्योंकि जिस
तरह अपने हाथ, पैर आदि अवयव अपने कार्यमें बाधक नहीं होते, इसी तरह जोवोंके कर्मोंकी अपेक्षा रख-
कर सृष्टिके निर्माण करने से ईश्वरको परावलम्बी नहीं कहा जा सकता । शंका—सृष्टिका बनानेवाला
ईश्वर शरीर सहित होकर सृष्टि रचता है, अथवा शरीर रहित होकर ? यदि ईश्वरको सशरीर माना
जाय तो ईश्वरको अदृष्टका विषय कहना चाहिये, क्योंकि सम्पूर्ण शरीर अदृष्टसे ही निश्चित होते हैं।
इसी प्रकार ईश्वरको अशरीरी भी नहीं मान सकते, क्योंकि अशरीर ईश्वर सृष्टिको उत्पन्न नहीं कर
सकता । ईश्वरवादी—जिस प्रकार शरीर रहित आत्मा शरीरमें परिवर्तन उत्पन्न करती है, उसी तरह
अशरीरी ईश्वर अपनी इच्छासे संसारका सर्जन करता है । ईश्वरमें इच्छा और प्रयत्नकी उत्पत्ति होनेके
लिये भी ईश्वरको सशरीरी मानना ठीक नहीं। क्योंकि ईश्वरकी इच्छा और प्रयत्न स्वाभाविक हैं, कारण
कि हम लोग ईश्वरकी बुद्धि, इच्छा और प्रयत्नको नित्य स्वीकार करते हैं।⁴ अथवा परमाणुओंको ही
सकते । इसलिये प्रयोजनमूलक अनुमानसे हम विश्वके नियामक अथवा संयोजक ईश्वरका ही अनुमान
कर सकते हैं, इससे विश्वके रचयिता अथवा उत्पादक ईश्वरका अनुमान नहीं हो सकता ।
१. कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः ।
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः ॥ न्यायकुसुमाञ्जलि ५-१ ।
२. जे. एस. मिल (J. S. Mill) आदि पश्चिमके विद्वानोंने भी ईश्वरके विरुद्ध यह शंका उपस्थित
की है ।
३. अनुपभुक्तफलानां कर्मणां न प्रक्षयः सर्गमन्तरेण च तत्फलोभोगाय नरकादिसृष्टिमारभते दयालुरेव
भगवान् । उपभोगप्रबन्धेन परिश्रांतानामंतरांतरा विश्रांतये जंतूनां भुवनोपसंहारमपि करोतीति सर्व-
मेतत्कृपानिबंधनमेव । न्यायमंजरी पृ. २०२ ।
४. यत्पुनर्विकल्पितं सशरीर ईश्वरः सृजति जगद् अशरीरो वेति तत्राशरीरस्यैव सृष्टत्वमस्याभ्युपगच्छामः ।
ननु क्रियावेशनिबन्धनकम् कर्तृत्वं न पारिभाषिकं तदशरीरस्य क्रियाविरहात् कथं भवेत् । कस्य च
कुत्राशरीरस्य कर्तृत्वं दृष्टमिति । उच्यते । प्रयत्नज्ञानचिकीर्षायोगित्वं कर्तृत्वमाचक्षते । तच्चेश्वरे
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२९
ईश्वरका शरीर माना जा सकता है। जिस प्रकार हमारी आत्मामें इच्छा होनेके कारण हमारे शरीरमें क्रिया
होती है, उसी तरह ईश्वरकी नित्य इच्छासे परमाणुओंमें क्रिया होती है। शंका—ईश्वर प्रत्यक्ष, अनुमान,
आगम और उपमान प्रमाणोंसे सिद्ध नहीं होता। किसी पदार्थको प्रत्यक्ष प्रमाणसे जाननेके लिये इन्द्रिय और
पदार्थोंका संबंध होना आवश्यक है; परन्तु ईश्वरका इन्द्रियोंसे संबंध नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वरवादी
ईश्वरको इन्द्रियोंके विषयके बाह्य मानते हैं, इसलिये प्रत्यक्षसे ईश्वरको नहीं जान सकते। अनुमान प्रत्यक्ष-
पूर्वक ही होता है, अतएव ईश्वरका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरको अनुमानसे भी नहीं जान सकते। आप्तके उप-
देशमें और उपमान प्रमाणमें भी प्रत्यक्षकी आवश्यकता पड़ती है, इसलिये उपमान और शब्दसे भी ईश्वरकी
सिद्धि नहीं होती¹। ईश्वरवादी—ईश्वर हमारे इन्द्रियप्रत्यक्षका विषय नहीं है, यह ठीक है। परन्तु इससे
हम ईश्वरका अभाव सिद्ध नहीं कर सकते। अधिकसे अधिक हम यह कह सकते हैं कि ईश्वर प्रत्यक्षसे सिद्ध
नहीं किया जा सकता। परन्तु किसी हालतमें प्रत्यक्षसे ईश्वरका अभाव सिद्ध नहीं होता। अनुमानसे ईश्वरकी
सिद्धि और असिद्धि दोनों नहीं हो सकती। उपमान प्रमाणका ईश्वरसिद्धिसे कोई संबंध नहीं है। तथा शब्द
प्रमाणसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है²।
ईश्वरके विषयमें आधुनिक पाश्चात्य विद्वानोंका मत
पश्चिमके आधुनिक दार्शनिक विद्वान प्रायः ईश्वरको सृष्टिका कर्ता नहीं मानते हैं। इन लोगोंका कहना
है कि यदि ईश्वर सृष्टिका कर्ता होता और वह प्राणियोंका शुभचिन्तक होता तो गत यूरोपीय महायुद्धमें
असंख्य नर-नारियोंका रक्त पानीकी तरह कभी नहीं बहाया जाता। अतएव यदि सृष्टिकर्ता ईश्वर कृपालु है,
तो उसे नाना प्रकारके दुःख और व्याधियोंसे परिपूर्ण सृष्टिकी कभी रचना नहीं करनी चाहिये थी। इस बात-
को पाश्चात्य विद्वानोंने विभिन्न रूपोंमें प्रगट किया है। एच. जी. वेल्स ( H. G. Wells ) का कथन है
कि ईश्वरको सर्व शक्तिमान सृष्टिका सर्जक नहीं कह सकते। यदि ईश्वर सृष्टिके प्राणियोंको युद्ध, मृत्यु आदिसे
बचानेमें समर्थ होकर भी केवल अपनी क्रीड़ाके लिये ही सृष्टिका निर्माण करता है तो मैं उसे घृणाकी दृष्टिसे
देखता हूँ। विलियम जेम्स ( William James ) के कथनानुसार हमें ऐसे ईश्वरकी आवश्यकता है जो
हमारे जैसा ही हो, और हम उसे अपना मित्र, साथी, नायक, सेनापति और राजा मानकर अपनी असहाय
और हीन दशामें उससे सहानुभूति प्राप्त कर सकें। इस विश्वमें ईश्वरीय क्रम दिखाई नहीं देता, इसलिये हम
अनादि, अनन्त ईश्वरकी कल्पना नहीं कर सकते। प्रो. हेल्महोल्ट्ज़ ( Prof. Helmholtz ) का कहना
है कि आंखमें वे सब दोष हैं जो किसीके देखनेके यंत्रमें पाये जा सकते हैं, और कुछ अधिक भी। इसमें कुछ
अत्युक्ति नहीं है कि यदि कोई चश्मा बेचनेवाला इन दोषोंवाला चश्मा मुझे देता तो मैं उसकी मूर्खता या
असावधानीको बड़े बलपूर्वक दिखाता और उसके चश्मेको लोटा देता। कॉमटे ( Comte ) आदिका कहना
है कि सौर्यमण्डल ऐसा नहीं बना जिससे अधिकसे अधिक लाभ हो सकता। आवश्यकता थी कि चांद पृथिवी-
के चारों ओर उतने ही समयमें घूमता जितनेमें पृथिवी सूर्यके चारों ओर घूमती है। यदि ऐसा होता तो चांद
हर रातको पूरा-पूरा चमका करता। लैंग ( Lange ) और हक्सले ( Huxley ) आदि विद्वानोंका कथन
है, सृष्टिमें उतना ही अपव्यय है जितना खेतमें एक खरगोशको मारनेके लिये करोड़ों तोपें छोड़नेमें होता है।
१. ईश्वरविषयक अन्य शंकाओंके लिये देखिये न्यायमंजरी पृ. १९०-४।
२. कुसुमांजलि स्तवक ३। तथा देखिये श्रीधरकी न्यायकंदली, पृ. ५४-५७; जयन्तकी न्यायमंजरी, पृ. १९४
से आगे। जयन्तने ईश्वरकी सिद्धिमें सामान्यतोदृष्ट अनुमान दिया है—सामान्यतोदृष्टं तु लिंगमीश्वर-
सत्तायामिदं ब्रूमहे। पृथिव्यादिकार्यं धर्मि तदुत्पत्तिप्रकारप्रयोजनाद्यभिज्ञकर्तृपूर्वकमिति साध्यो धर्मः कार्य-
त्वात् घटादिवत्।
४२
३३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्लोटिनस ( Plotinus ) कहा करता था कि मुझे तो अपनी उत्पत्तिकी रीतिका ध्यान करके लज्जा आती
है। इससे प्रतीत होता है या तो ईश्वर सृष्टिको न बनाता, या वह बुद्धिमान नहीं है। ईश्वरको चाहिये था
कि कान, नाक, या अंगूठा आदिसे सन्तोत्पत्ति करता¹। इसी प्रकार मैक्टैगर्ट ( McTaggart ), कैनन
राशडल ( Canon Rashdall ) आदि विद्वानोंने ईश्वरको अकर्ता और असर्वव्यापक माना है² ।
न्याय-वैशेषिक साहित्य
कणादके वैशेषिक सूत्रोंकी रचना अक्षपादके न्यायसूत्रोंसे पहले मानी जाती है। यूई ( Ui ) वैशेषिक
दर्शनकी उत्पत्ति बुद्धके समय, और कमसे कम ईसाकी प्रथम शताब्दीके अन्तमें वैशेषिकसूत्रोंकी रचनाका समय
मानते हैं। प्रशस्तपाद वैशेषिकसूत्रोंके समर्थ भाष्यकार हो गये हैं। इनका समय ईसाकी पाँचवी-छठी शताब्दी
बताया जाता है। वैशेषिकसूत्रोंके ऊपर रावणभाष्य और भारद्वाजवृत्ति नामके भाष्योंका भी उल्लेख मिलता
है। ये भाष्य आजकल लुप्त हो गये हैं। प्रशस्तपादभाष्य पर व्योमशेखरने व्योमवती, श्रीधरने न्याय-
कन्दली, उदयनने किरणावलि और श्रीवत्सने लीलावती, तथा नवद्वीपके जगदीश भट्टाचार्यने भाष्यसूक्ति और
शंकरमिश्रने कणादरहस्य टीकायें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त शिवादित्यकी सप्तपदार्थी, लौगाक्षिभास्करकी
तर्ककौमुदी, विश्वनाथका भाषापरिच्छेद, तर्कसंग्रह, तर्कामृत आदि ग्रंथ वैशेषिकदर्शनका ज्ञान करनेके लिये
महत्त्वपूर्ण हैं।
न्यायसूत्रोंकी रचनाके विषयमें विद्वानोंका मतभेद है। प्रो. याकोबीका मत है कि न्यायसूत्र
२००-४५० ईसवी सन्में रचे गये हैं। यूई ( Ui ) ने इस समयको १५०-२५० ईसवी सन् स्वीकार किया
है। प्रो. ध्रुवने उक्त मतोंकी विस्तृत समालोचना करते हुए न्यायसूत्रोंके रचनाके समयको ईसवी सन्के पूर्व
दूसरी शताब्दी माना है³। वात्स्यायन न्यायसूत्रोंके प्रथम भाष्यकार गिने जाते हैं। इनका समय ईसाकी
चौथी शताब्दी माना जाता है। वात्स्यायन पर बौद्ध तार्किक दिङ्नागके आक्षेपोंका परिहार करनेके
लिये उद्योतकर ( ६३५ ई. स. ) ने वात्स्यायनभाष्य पर न्यायवार्तिककी रचना की। न्यायवार्तिक
पर वाचस्पतिमिश्रने ( ८४० ई. स. ) न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका लिखी। वाचस्पतिको न्यायसूचिनिबंध
और न्यायसूत्रोद्धारका भी कर्ता कहा जाता है। वाचस्पतिमिश्रने वेदांत, सांख्य, योग और पूर्वमीमांसा
दर्शनों पर भी ग्रंथोंकी रचनाकी है। वाचस्पतिके बाद जयंतभट्टका ( ८८० ई० स० ) नाम बहुत
महत्त्वका है। इन्होंने कुछ चुने हुए न्यायसूत्रों पर स्वतंत्र टीका लिखी है। जयन्तने न्यायमंजरी,
न्यायकलिका आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। मल्लिषेणने स्याद्वादमंजरीमें जयन्तका उल्लेख किया है।
उदयन आचार्य दसवीं शताब्दीके विद्वान हैं। इन्होंने वाचस्पतिकी तात्पर्यटीकापर तात्पर्यटीका-
परिशुद्धि नामकी टीका, तथा न्यायकुसुमांजलि, आत्मतत्त्वविवेक, लक्षणावलि, किरणावलि, न्यायपरिशिष्ट
नामक ग्रंथोंकी रचना की है। उदयनकी रचनाओं पर, गंगेश नैयायिकके पुत्र वर्धमान आदिने
१. ये उद्धरण पं. गंगाप्रसाद उपाध्यायकी आस्तिकवाद नामक पुस्तकके १० वें अध्यायमें फ्लिन्ट ( Flint )
की Theism के आधारसे दिये गये हैं।
२. कहा जाता है कि जिस समय कुसुमांजलिके कर्ता उदयनके नाना युक्तियोंसे ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध
करनेपर भी ईश्वरने दयालुताका भाव प्रदर्शन नहीं किया, उस समय उदयनने ईश्वरको ऐश्वर्यके
मदसे मत्त हुआ कहकर ईश्वरके अस्तित्वकी स्थितिको अपने अधीन बताकर निम्न श्लोककी रचना की-
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मां अवज्ञाय वर्तसे ।
पराक्रान्तेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थितिः ॥
३. देखिये प्रो. ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी भूमिका, पृ. ४१-५४।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३३१
टीकायें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त भासर्वज्ञका न्यायसार, तथा मुक्तावली, दिनकरी, रामरुद्री नामकी
भाषापरिच्छेदकी टीकायें, तर्कसंग्रह, तर्कभाषा, तार्किकरक्षा आदि न्यायदर्शनके उल्लेखनीय ग्रन्थोंमेंसे
हैं। न्यायदर्शनमें नव्यन्यायका जन्म मिथिलाके गंगेश उपाध्यायसे आरंभ होता है। गंगेशका जन्म
ई० स० १२०० में हुआ था । गंगेशने तत्त्वचिन्तामणि नामक स्वतंत्र ग्रन्थकी रचना की । इस ग्रंथमें नैया-
यिकोंके चार प्रमाणोंपर चर्चाकी गई है । तेरहवीं शताब्दीमें गंगेशके तत्त्वचिंतामणिपर जयदेवने प्रत्यक्षालोक
नामकी टीका लिखी । इसके पश्चात् वासुदेव सार्वभौम ( ई० स० १५०० ) ने तत्त्वचिंतामणिव्याख्या लिखी ।
वासुदेवके चैतन्य, कृष्णानंद, रघुनंदन और रघुनाथ नामके चार उत्तम शिष्य थे । इनमें रघुनाथने तत्त्वचिंता-
मणि पर दीधिति, और वैशेषिक मतका खंडन करनेके लिये पदार्थखंडन, तथा ईश्वरकी सिद्धिके लिये
ईश्वरानुमान नामक ग्रंथ लिखे । इसके अतिरिक्त मथुरानाथ ( १५८० ई. स. ), जगदीश ( १५९० ई. स. )
और गदाधर ( १६५० ई० स० ) ने तत्त्वचिंतामणि पर टीकायें लिखकर नव्यन्यायको पल्लवित किया ।
सांख्य-योग परिशिष्ट ( घ )
( श्लोक २५ )
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध दर्शनोंकी तुलना और उनकी प्राचीनता
सांख्य जैन और बौद्धोंकी तरह वेदोंको नहीं मानते, मीमांसकोंके यज्ञ-याग आदिकी निन्दा करते हैं,
तत्त्वज्ञान और अहिंसापर अधिक भार देते हैं, सांसारिक जीवनके दुख रूप साक्षात्कार करनेका उपदेश
करते हैं, जातिभेद स्वीकार नहीं करते, ईश्वरको नहीं मानते, संन्यासको प्रधानता देते हैं, जैनोंकी तरह
आत्मबहुत्ववाद और बौद्धोंके क्षणिकवादकी तरह परिणामवादको मानते हैं, तथा जैन और बौद्धोंके तीर्थंकरों-
की तरह कपिलका जन्म क्षत्रिय कुलमें होना स्वीकार करते हैं। इस परसे अनुमान किया जा सकता है कि
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध इन चारों संस्कृतियोंको जन्म देनेवाली कोई एक प्राचीन संस्कृति होनी
चाहिये। ऋग्वेदमें एक जटाधारी मुनिका वर्णन आता है; इस युग में एक सम्प्रदाय वैदिक देवता और इन्द्र
आदिमें विश्वास नहीं करता। यह सम्प्रदाय वेदकी ऋचाओंपर भी कटाक्ष किया करता था। यजुर्वेदमें भी
वैदिक धर्मके विरुद्ध प्रचार करनेवाले यतियोंका उल्लेख आता है। एतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मणोंमें भी वेदको
न माननेवाले सम्प्रदायोंकी चर्चा और कर्मकाण्डकी अपेक्षा तपश्चरण, ब्रह्मचर्य, त्याग, इन्द्रियजय आदि भाव-
नाओंकी उत्कृष्टताका उल्लेख किया गया है। उपनिषद् साहित्यमें तो ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं जहां ब्राह्मण
क्षत्रिय गुरुसे अध्ययन करते हैं, ऋषि ब्रह्मचर्यको ही वास्तविक यज्ञ मानते हैं, वेदको अपराविद्या
कहकर यज्ञ, याग आदिका तिरस्कार करते हैं, और भिक्षाचर्याकी प्रधानताका प्रतिपादन कर ब्रह्मविद्याके
महत्त्वका प्रसार करते हैं। महाभारतमें भी जातिसे वर्णव्यवस्था न मानकर कर्मसे वर्णव्यवस्था माननेके,
अपनी आंख और शरीरका मांस आदि काटकर दान करनेके, तथा अनेक प्रकारकी कठोर तपश्चर्यायें
करनेके अनेक उदाहरण पाये जाते हैं। इस पर से ऋग्वेदमें भी एक ऐसी संस्कृतिके मौजूद रहनेका अनुमान
होता है, जो संस्कृति कर्मकाण्डकी अपेक्षा ज्ञानकाण्डको, और गृहस्थधर्मकी अपेक्षा संन्यासधर्मका अधिक महत्व
देती थी। १ इस संस्कृतिको श्रमण अथवा क्षत्रिय संस्कृति कह सकते हैं। २ उपनिषदोंका साहित्य अधिकतर
इसी सांसकृतिके मस्तिष्ककी उपज ३ कहा जाता है।
१. सिन्धमें मोहेन्जोदरो और हरप्पाकी खुदाईमें पायी जानेवाली ध्यानस्थ मूर्तियोंसे भी इस संस्कृतिकी
प्राचीनताका अनुमान किया जा सकता है।
२. ब्राह्मण और श्रमण इन दोनों वर्गोंके इतिहासका मूल बहुत प्राचीन है। जिस तरह ब्राह्मणोंके धर्मशास्त्र,
पुराण आदि ग्रन्थोंमें श्रमणोंका नास्तिक और असुरके रूपमें उल्लेखकर उनका स्पर्श करके सचेल स्नान
आदिका विधान किया गया है, उसी तरह जैन, बौद्ध आदिके ग्रन्थोंमें ब्राह्मणोंका मिथ्यादृष्टि, कुमार्गगामी,
अभिमानी आदि शब्दोंसे तिरस्कार किया गया है। जितेन्द्रबुद्धि आदि वैयाकरणोंने ब्राह्मण और श्रमणोंके
विरोधको सर्प और नकुलकी तरह जाति-विरोध कहकर उल्लेख किया है। विशेषके लिये देखिये पं०
सुखलालजीकी 'पुरातत्त्व' में प्रकाशित 'साम्प्रदायिकता अने तेना पुरावाओनुं दिग्दर्शन' नामक लेखमाला।
इस लेखमालाका इस पुस्तकके लेखकद्वारा किया हुआ हिन्दी अनुवाद 'जैनजगत' में भी प्रकाशित हुआ है।
३. विशेषके लिये देखिये, सन् १९३४ में बम्बईमें होनेवाली २१ वीं इन्डियन सांइस कांग्रेसके अवसरपर
रायबहादुर आर. पी. चन्दा ( R. P. Chanda ) का श्रमणसंस्कृति ( Shramanism ) पर पढ़ा
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३३३
सांख्य-योगदर्शन
सांख्य और योगदर्शन बुद्धके समयके पहिले दर्शन माने जाते हैं। १ पतंजलिके योगसूत्र
सांख्यप्रवचनके नामसे कहे जाते हैं, वाचस्पतिमिश्र भी सांख्य-योगके उपदेष्टा वार्षगण्यको
'योगशास्त्रव्युत्पादयिता' कहकर उल्लेख करते हैं, तथा स्वयं महर्षि पतंजलि सांख्य तत्त्वज्ञान
पर ही योग सिद्धांतोंका निर्माण करते हैं। इससे मालूम होता है कि किसी समय सांख्य और योग
दर्शनोंमें परस्पर विशेष अन्तर नहीं था। वास्तवमें सांख्य और योग दोनों दर्शनोंको एक दर्शनकी ही दो
धारायें कहना चाहिये। इन दोनोंमें इतना ही अन्तर कहा जा सकता है कि सांख्यदर्शन तत्त्वज्ञानपर अधिक
भार देता हुआ तत्त्वोंकी खोज करता है और तत्त्वोंके ज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति स्वीकार करता है, जब कि
योगदर्शन यम, नियम आदि योगकी अष्टांगी प्रक्रियाका विस्तृत वर्णन करके योगकी सक्रियात्मक प्रक्रियाओंके
द्वारा चित्तवृत्तिका निरोध होनेसे मोक्षकी सिद्धि मानता है।२ सांख्यदर्शनको कापिलसांख्य और योगदर्शनको
पातंजलसांख्य कह सकते हैं।
सांख्यदर्शन
शुद्ध आत्माके तत्त्वज्ञानको सांख्य कहते हैं३। अन्यत्र सम्यग्दर्शनके प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रको सांख्य
कहा है।४ अन्यत्र पच्चीस तत्त्वोंका वर्णन करनेके कारण सांख्यदर्शनको सांख्य कहा जाता है।५ गुणरत्नने
गया लेख; प्रो. विन्टरनीज़की Some Problems in Indian Literature नामक पुस्तकमें
Ascetic Literature ih Ancient lndia नामक अध्याय; इलियट ( Eliot ) की Hinduism
and Buddhism, भाग २, अध्याय ६ और ७।
१. वेबर ( Weber ) आदि विद्वानोंके मतमें सांख्यदर्शन सम्पूर्ण वर्तमान भारतीय दर्शनोंमें प्राचीनतम है।
महाभारतमें सांख्य और योगदर्शनका 'सनातन' कहकर उल्लेख किया है।
२. सांख्य और योगदर्शनमें भेद प्रदर्शन करनेके लिये सांख्यको निरीश्वर सांख्य और योगको सेश्वर सांख्य
भी कहा जाता है। न्यायसूत्रोंके भाष्यकार वात्स्यायनने सांख्य और योग दर्शनोंमें निम्न प्रकारसे भेदका
प्रदर्शन किया है—सांख्य लोग असत्की उत्पत्ति और सत्का नाश नहीं मानते। उनके मतमें चेतनत्व
आदिकी अपेक्षा सम्पूर्ण आत्मायें समान हैं, तथा देह, इन्द्रिय, मन और शब्दमै; स्पर्श आदिके विषयोंमें और
देह आदिके कारणोंमें विशेषता होती है। योग मतके अनुयायी सम्पूर्ण सृष्टिको पुरुषके कर्म आदि द्वारा
मानते हैं, दोष और प्रवृत्तिको कर्मोंका कारण बताते हैं, आत्मामें ज्ञान आदि गुणोंको, असत्की उत्पत्ति-
को, और सत्के नाशको स्वीकार करते हैं—नासतः आत्मलाभः न सत आत्महानम्। निरतिशयाश्चेतनाः।
देहेन्द्रियमनस्सु विषयेषु तत्कारणेषु च विशेष इति सांख्यानाम्। पुरुषकर्मादिनिमित्तो भूतसर्गः। कर्महेतवो
दोषाः प्रवृत्तिश्च। स्वगुणविशिष्टाश्चेतनाः। असदुत्पद्यते उत्पन्नं निरुध्यते। न्यायभाष्य १-१-२९।
३. शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते। न्यायकोश पृ० ९०४ टिप्पणी
४. न्यायकोश पृ० ९०४।
५. पंचविंशतितत्त्वानां संख्यानं संख्या। तदधिकृत्य कृतं शास्त्रं सांख्यम्। हेमचन्द्र-अभिधानचिन्तामणि-टीका
३-५२६। यूनानी विद्वान पाइथैगोरस (Pythagoras) संख्या ( Number ) के सिद्धांतको मानते थे।
प्रो० विन्टरनीज ( Winternitz ) आदि विद्वानोंके अनुसार पाइथैगोरसपर भारतीय सांख्य सिद्धान्तों-
का प्रभाव पड़ा है। ग्रीक और सांख्यदर्शनकी तुलनाके लिये देखिये प्रो० कीथ ( Keith का Sam-
khya System अ० ६, पृ० ६५ से आगे।
३३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
षड्दर्शनसमुच्चयकी टीकामें सांख्यमतके साधुओंके आचारका निम्न प्रकारसे वर्णन किया वै—“सांख्य मतके
अनुयायी साधु त्रिदंडी अथवा एकदंडी होते हैं, ये कौपीन धारण करते हैं, गेरुए रंगके वस्त्र पहिनते हैं, बहुतसे
चोटी रखते हैं, बहुतसे जटा बढ़ाते हैं, और बहुतसे छुरेसे मुंडन कराते हैं । ये मृगचर्मका आसन रखते हैं,
ब्राह्मणोंके घर आहार लेते हैं, पांच ग्रास मात्र भोजन करते हैं, और बारह अक्षरोंको जाप करते हैं। इनके
भक्त नमस्कार करते समय 'ओं नमो नारायणाय' कहते हैं, और साधु केवल 'नारायणाय नमः' बोलते
हैं । सांख्य परिव्राजक जीवोंकी रक्षाके लिए लकड़ीको मुखवस्त्रिका (बीटा) रखते हैं। ये जीवोंकी दया
पालनेके लिये स्वयं जल छाननेका वस्त्र रखते हैं और अपने भक्तोंको पानी छाननेके लिये छत्तीस अंगुल लंबा
और बीस अंगुल चौड़ा मजबूत बस्त्र रखनेका उपदेश देते हैं। ये मीठे पानीमें खारा पानी मिलानेसे जीवोंकी
हिंसा मानते हैं, और जलकी एक बूँदमें अनंत जीवोंका अस्तित्व स्वीकार करते हैं। इनके आचार्योंके
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३३५
प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण माने गये हैं। वैदिक ग्रन्थोंमें कपिलको नास्तिक और श्रुतिविरुद्ध १
तंत्रका प्रवर्तक कहकर कपिलप्रणीत सांख्य और पतंजलिके योगशास्त्रको अनुपादेय कहा है ।
सांख्यदर्शनके प्ररूपक
कपिल—सांख्यदर्शनके आद्य प्रणेता, आदि विद्वान कपिल परमर्षि कहे जाते हैं २ । कपिल क्षत्रिय थे ।
कुछ लोग कपिलको ब्रह्माका पुत्र बताते हैं । भागवतमें कपिलको विष्णुका अवतार कहकर उन्हें अपनी माता
देवहूतिको सांख्य तत्त्वज्ञानका उपदेष्टा कहा गया है ३ । विज्ञानभिक्षुने कपिलको अग्निका अवतार बताया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद्में कपिलका हिरण्यगर्भके अवतार रूपमें उल्लेख आता है । रामायणमें कपिल योगीको
वासुदेवका अवतार और सगरके साठ हजार पुत्रोंका दाहक बताया गया है । अश्वघोष बुद्धके जन्मस्थान
कपिलवस्तुको कपिल ऋषिकी बसाई हुई नगरी कहकर उल्लेख करते हैं। कपिलने अपने पवित्र और प्रधान
दर्शनको सर्व प्रथम आसुरिको सिखाया था ! आसुरिने पंचशिखको सिखाया और पंचशिखने इस दर्शनको
विस्तृत किया । पंचशिखके पश्चात् यह दर्शन भार्गव, वाल्मीकि, हारीत और देवल प्रभृतिने और ईश्वरकृष्णने
सीखा । कपिलको सांख्यप्रवचनसूत्र और तत्त्वसमास नामके ग्रंथोंका प्रणेता कहा जाता है, परन्तु इस कथनका
कोई आधार नहीं जान पड़ता ४ ।
आसुरि—आसुरि कपिलके साक्षात् शिष्य और पंचशिखके गुरु कहे जाते हैं । आसुरिका मत था कि
सुख और दुख बुद्धिके विकार हैं और ये जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें है, उसी तरह पुरुषमें प्रति-
विम्बित होते हैं ५ आसुरिके सिद्धांतोंके विषयमें विशेष पता नहीं लगता । आसुरिका समय ईसाके पूर्व ६००
वर्ष कहा जाता है ।
पंचशिख—वाचस्पतिमिश्र, भावागणेश आदि टीकाकार पंचशिखका उल्लेख करते हैं । भावागणेशकी
योगसूत्रवृत्तिसे मालूम होता है कि तत्त्वसमासपर पंचशिखने विवरण अथवा व्याख्या लिखी थी । पंचशिखका
वर्णन महाभारतमें आता है। कहा जाता है कि पंचशिख अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंद-
मय आत्माके शिखास्थानमें रहनेवाले ब्रह्माको जानते थे, इसलिये उनका नाम पंचशिख पड़ा। कपिल मतका
अनुसरण करनेके कारण पंचशिख कापिलेय नामसे भी कहे जाते थे । चीनके बौद्ध सम्प्रदायके अनुसार पंच-
१. अतश्च सिद्धमात्मभेदकल्पनयापि कपिलस्य तन्त्रं वेदविरुद्धं वेदानुसारि मनुवचनविरुद्धं च। ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य
२-१-१ । तथा-नास्तिककपिलप्रणीतसांख्यस्य पतञ्जलिप्रणीतयोगशास्त्रस्य चानुपादेयत्वमुक्तं भारते मोक्षधर्मेषु—
सांख्यं योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च।
ज्ञानान्येतानि भिन्नानि नात्र कार्या विचारणा ।।
गीता. मध्वभाष्य, अ. २ श्लो. ३९ । न्यायकोश पृ. ९०४ टिप्पणी ।
२. सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः पुरातनः ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः । महाभारत, मोक्षधर्म ।
प्रो. राधाकृष्णन् आदि विद्वान् सांख्य सिद्धांतके अव्यक्त बीजका ऋग्वेदमें पाये जानेका उल्लेख करते हैं।
३. कपिलस्तत्त्वसंख्याता भगवानात्ममायया ।
जातः स्वयमजः साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम् । भागवत ३-२५-१ ।
४. सांख्यसूत्र सर्वप्रथम अनिरुद्ध ( १५०० ई. स. ) की वृत्ति सहित और कुछ समय बाद विज्ञानभिक्षुके
भाष्य ( १६५० ई. स. ) सहित देखनेमे आते हैं। अनिरुद्ध और विज्ञानभिक्षुके पूर्ववर्ती ईश्वरकृष्ण,
शंकर, वाचस्पतिमिश्र, माधव आदि विद्वान सांख्यसूत्रोंका उल्लेख नहीं करते, इस परसे विद्वान
सांख्यसूत्रोंको चौदहवीं शताब्दीके बाद बना हुआ अनुमान करते हैं ।
५. देखिये पृ. १३८ ।
३३६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
शिखको षष्टितंत्रका १ प्रणेता कहा जाता है, परन्तु यह ठीक नहीं है। पंचशिख चौबीस तत्त्वोंको स्वीकार करते
हैं और भूतोंके समूहसे आत्माकी उत्पत्ति मानते हैं। प्रो. दासगुप्तका मत है कि ईश्वरकृष्णकी सांख्यकारिका-
का और महाभारतमें वर्णन किये हुए सांख्यसिद्धान्तोंका चरक ( ७८ ई. स. ) में कोई उल्लेख नहीं मिलता,
इसलिए महाभारतमें आया हुआ पंचशिखका सांख्य मौलिक सांख्यदर्शन है, तथा सांख्यकारिकाका ईश्वरकृष्ण-
का सांख्य सांख्यदर्शनका अर्वाचीनका रूप है। गार्बे ( Garbe ) पंचशिखको ईसाकी प्रथम शताब्दीका
विद्वान कहते हैं।
वार्षगण्य —वार्षगण्य विन्ध्यवासीके गुरु थे। महाभारतमें वार्षगण्यको सांख्य-योगके प्रणेताओंमें माना
गया है। वाचस्पतिने इनका योगशास्त्र-व्युत्पादयिता कहकर उल्लेख किया है। अहिर्बुध्न्यसंहितामें और
वाचस्पति आदिने वार्षगण्यको षष्टितंत्रका रचयिता कहा है। इनका समय ईसवी सन् २३०-३०० कहा
जाता है।
विन्ध्यवासी —विन्ध्यवासीका उल्लेख मीमांसाश्लोकवार्तिक और तत्त्वसंग्रहपंजिका में आता है। इनका
असली नाम रुद्रिल था। वसुबंधुके जीवनचरितके लेखक परमार्थके अनुसार, विन्ध्यवासीने वसुबंधुके गुरु
बुद्धिमित्रको शास्त्रार्थमें पराजित करके अयोध्याके विक्रमादित्य राजासे पारितोषिक प्राप्त किया था । विन्ध्य-
वासी जय प्राप्त करके विन्ध्याचलको लौट गये और वहीं पर इन्होंने शरीर छोड़ा। इनका समय ई. स.
२५०-३२० कहा जाता है ।२
ईश्वरकृष्ण —ईश्वरकृष्ण सांख्यकारिकाके कर्ता हैं। सांख्यकारिको सांख्यसप्तति भी कहते हैं। यह
ग्रंथ षष्टितंत्रके आधारसे रचा गया है। सांख्यकारिकाके ऊपर माठर और गौड़पादने टीकायें लिखी हैं। बौद्ध
साधु परमार्थ छठी शताब्दीमें सांख्यकारिकाको चीनमें ले गये थे, और वहाँ उन्होंने इसका चीनी अनुवाद
करके इसके ऊपर टीका लिखी थी। पहले ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीको एक ही व्यक्ति समझा जाता था,
परन्तु कमलशील तत्त्वसंग्रहपञ्जिका में ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीका अलग-अलग उल्लेख करते हुए विन्ध्यवा-
सीका रुद्रिल नामसे उल्लेख करते हैं। गुणरत्न भी विन्ध्यवासी और ईश्वरकृष्णको अलग-अलग नामसे कहते
हैं, इसलिये ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीको एक व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग ईश्वरकृष्णका समय
वार्षगण्यके पूर्व मानकर ईश्वरकृष्णका समय दूसरी शताब्दी मानते हैं। कुछका कहना है कि महाभारतके
वार्षगण्य ईश्वरकृष्णसे बिलकुल अनभिज्ञ हैं, इसलिये वार्षगण्यको ईश्वरकृष्णके उत्तरकालीन नहीं कहा जा
सकता। इन विद्वानोंके मतमें ईश्वरकृष्णका समय ईसवी सन् ३४०-३८० माना जाता है।
वाचस्पतिमिश्र —नवमी शताब्दीमें वाचस्पतिने न्याय-वैशेषिक दर्शनोंकी तरह सांख्यकारिकापर सांख्य-
तत्त्वकौमुदी और व्यासभाष्यपर तत्त्ववैशारदी नामक टीकाकी रचनाकी है।
विज्ञानभिक्षु —वाचस्पतिमिश्रके बाद विज्ञानभिक्षु अथवा विज्ञानयति एक प्रतिभाशाली सांख्य विचा-
रक हो गये हैं। इन्होंने सांख्यसूत्रोंपर सांख्यप्रवचनभाष्य तथा सांख्यसार, पातंजलभाष्यवार्तिक, ब्रह्मसूत्रके
ऊपर विज्ञानामृतभाष्य आदि ग्रन्थोंकी रचनाकी है। बहुतसे सिद्धांतोंमें विज्ञानभिक्षुका वाचस्पतिमिश्रसे भिन्न
अभिप्राय था। विज्ञानभिक्षुने पंचशिख और ईश्वरकृष्णके समयमें लुप्त हुए ईश्वरवादका सांख्यदर्शनमें फिरसे
प्रतिपादन किया है। भावागणेशदीक्षित, प्रसादमाधवयोगी और दिव्यसिंहमिश्र नामके इनके तीन प्रधान
शिष्य थे।
१. वाचस्पतिमिश्र आदि विचारकोंके अनुसार षष्टितंत्र वार्षगण्यका बनाया हुआ है। षष्टितन्त्रका भगवती
ज्ञातृधर्मकथा, नन्दि आदि जैन आगमोंमें उल्लेख आता है। जैन कथाके अनुसार षष्टितंत्र आसुरिका
बनाया हुआ कहा जाता है। जैन टीकाकारोंने षष्टितंत्रका अर्थ कापिलीय शास्त्र किया है।
२. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका।
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३३७
इनके अतिरिक्त सनक, नन्द, सनातन, सनत्कुमार, अंगिरा वोढु आदि अनेक सांख्य विचारक हो गये
हैं, जिनका अब केवल नाम शेष रह गया है।
योगदर्शन
योगशब्द ऋग्वेदमें अनेक स्थलोंपर आता है, परन्तु यहाँ यह शब्द प्रायः जोड़नेके अर्थमें प्रयुक्त हुआ
है। श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय, कठ, मैत्रायणी आदि प्राचीन उपनिषदोंमें योग समाधिके अर्थमें पाया जाता है।
यहाँ योगके अंगोंका वर्णन किया गया है। आगे जाकर शांडिल्य, योगतत्त्व, ध्यानविन्दु, हंस, अमृतनाद,
वराह, नादविन्दु, योगकुण्डली आदि उत्तरकालकी उपनिषदोंमें यौगिक प्रक्रियाओंका सांगोपांग वर्णन मिलता
है। सांख्यदर्शनके कपिल मुनिकी तरह हिरण्यगर्भ योगदर्शनके आदि वक्ता माने जाते हैं। हिरण्यगर्भको
स्वयंभू भी कहते हैं। महाभारत और श्वेताश्वतर उपनिषद्में हिरण्यगर्भका नाम आता है। पतंजलि आधुनिक
योगसूत्रोंके व्यवस्थापक समझे जाते हैं। १ व्यासभाष्यके टीकाकार वाचस्पति और विज्ञानभिक्षु भी पतंजलिका
योगसूत्रोंके कर्त्ता रूपमें उल्लेख नहीं करते। प्रो० दासगुप्त आदि विद्वानोंके मतानुसार व्याकरण महाभाष्यकार
और योगसूत्रकार पतंजलि दोनों एक ही व्यक्ति थे। पतंजलिका समय ईसाके पूर्व दूसरी शताब्दी माना जाता
है। पतंजलिके योगसूत्रोंके ऊपर व्यासने भाष्य लिखा है। व्यासका समय ईसाकी चौथी शताब्दी कहा
जाता है। ये व्यास महाभारत और पुराणकार व्याससे भिन्न व्यक्ति माने जाते हैं। व्यासके भाष्यके ऊपर
वाचस्पति मिश्रने तत्त्ववैशारदी नामकी टीका लिखी है। व्यासभाष्यपर भोज (दसवीं शताब्दी) ने भोजवृत्ति,
विज्ञानभिक्षुने योगवार्त्तिक और नागोजी भट्ट (सतरहवीं शताब्दी) ने छायाव्याख्या नामकी टीकायें लिखी हैं।
योगकी अनेक शाखायें हैं। सामान्यसे योगके दो भेद हैं-राजयोग और हठयोग। पतंजलि ऋषिके योगको
राजयोग कहते हैं। प्राणायाम आदिसे परमात्माके साक्षात्कार करनेको हठयोग कहते हैं। हठयोगके ऊपर
हठयोगप्रदीपिका, शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता आदि शास्त्र मुख्य हैं। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोगके भेद-
से योगके तीन भेद भी होते हैं। योगतत्त्व उपनिषद्में मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग इस तरह
योगके चार भेद किये हैं।
जैन और बौद्ध दर्शनमें योग
महाभारत, पुराण, भगवद्गीता आदि वैदिक ग्रंथोंके अतिरिक्त जैन और बौद्ध साहित्यमें
भी योगका विशद वर्णन मिलता है। जैन आगम ग्रन्थ और प्राचीन जैन संस्कृत साहित्यमें योग
शब्द प्रायः ध्यानके अर्थमें प्रयुक्त किया गया है। यहाँ ध्यानका लक्षण, भेद प्रभेद आदिका विस्तृत वर्णन मिलता
है। योगविषयक साहित्यको पल्लवित करनेमें सर्वप्रथम हरिभद्रसूरिका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है।
हरिभद्रने योगके ऊपर योगबिन्दु, योगदृष्टिसमुच्चय, योगविंशिका, षोडशक आदि ग्रन्थोंके लिखनेके साथ पतं-
जलिके योगशास्त्रका पांडित्य प्राप्त करके पतंजलिके योगसूत्रोंके साथ जैनयोगकी प्रक्रियाओंकी तुलना की है।
हरिभद्रके योगदृष्टिसमुच्चयमें मित्रा; तारा आदि आठ दृष्टियोंका स्वरूप जैन साहित्यमें बिलकुल अभूतपूर्व है।
जैन योगशास्त्रके दूसरे विद्वान् हेमचन्द्रसूरि हैं। इन्होंने योगपर योगशास्त्र नामक स्वतंत्र ग्रंथ लिखकर अनेक
जैन यौगिक प्रक्रियाओंका पतंजलिकी प्रक्रियाओंसे समन्वय किया है। हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें शुभचन्द्र आचार्य
के ज्ञानार्णवमें आये हुए ध्यान आदिके वर्णनके साथ ध्यान, आसन आदिका विस्तृत वर्णन मिलता है। जैन-
योग-साहित्यको वृद्धिगत करनेवाले सतरहवीं सदीके अंतिम विद्वान् यशोविजय उपाध्याय माने जाते हैं।
१. तुलना करो-ननु
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ।
इति याज्ञवल्क्यस्मृतेः पतंजलिः कथं योगस्य शासितेति चेत्-अद्धा । अतएव तत्र तत्र पुराणादौ विशिष्य
योगस्य विप्रकीर्णतया दुर्ग्राह्यार्थत्वं मन्यमानेन भगवता कृपासिंधुना फणिपतिना सारं संजिघृक्षुणानुशासन-
मारब्धं न तु साक्षाच्छासनम् । सर्वदर्शनसंग्रह १५ ।
४३
३३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
यशोविजयजीने योगके ऊपर अध्यात्मसार, अध्यात्मोपनिषद्, तथा योगलक्षण, पातंजलयोगलक्षणविचार, योग-
भेद, योगविवेक, योगावतार, मित्रा, तारादित्रय, योगमाहात्म्य आदि द्वात्रिंशिकायें लिखनेके साथ हरिभद्रकी
योगविंशिका और षोडशकपर टीका लिखकर, पतंजलिके योगसूत्रोंपर जैन प्रक्रियाके अनुसार वृत्ति रची है।
यशोविजयजीने उक्त ग्रंथोंमें भगवद्गीता, योगवासिष्ठ, तैत्तिरीय उपनिषद्, पातंजल योगसूत्र आदि वैदिक ग्रंथों
का उपयोग किया है और साथ ही जैन और पतंजलिके योगकी प्रक्रियाओंकी तुलना करते हुए अनेक स्थलोंपर
पतंजलिकी प्रक्रियाका प्रतिवाद किया है। १ बौद्ध ग्रंथोंमें भी योगका वर्णन मिलता है। स्वयं बुद्धने बोधि
प्राप्त करनेके पूर्व योगका अभ्यास किया था। पातंजल योगदर्शनकी तरह बौद्ध शास्त्रोंमें भी अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदिको धर्मके प्रधान अङ्ग मान इनके विशद वर्णन
के साथ हेय, हेयहेतु, हान और हानोपायको तरह दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है। महायान सम्प्रदायकी विज्ञानवाद शाखा योगाभ्यासपर विशेष ध्यान देनेके कारण ही योगा-
चार नामसे कही जाती थी। योगाचार सम्प्रदायमें ध्यान, पारमिता, समाधि आदि प्रक्रियाओंका विस्तृत
वर्णन पाया जाता है। बौद्धतन्त्रकी क्रियातन्त्रका नाम बहुत महत्त्वका है। अनुत्तरयोगतन्त्रके पंचक्रममें भी
योगकी पांच दशाओंका वर्णन आता है। हीनयान सम्प्रदायमें भी योगाभ्यासको महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया
है। २
१. जैन योगके विषयमें विशेष जाननेके लिए देखिये पं० सुखलालजीकी योगदर्शन और योगविंशिकाकी भूमिका।
२. हीनयानके योगसंबंधी सिद्धांतोंके लिये देखिये मिसेज राइस डेविड्सका Yogavchara's Mannual,
पाली टैक्स्ट सोसायटी, १९१६ ।