स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
ईश्वर इन तीन पदार्थोंको मानना चाहिये । जीव और जगत शरीर रूप है और परब्रह्म शरीरी है । रामा-
नुजका समय ११ वीं शताब्दी माना जाता है ।
वल्लभ—ये शुद्धाद्वैतके मुख्य प्रवर्तक गिने जाते हैं। इनके मतमें यह जगत परब्रह्मका ही अविकृत
परिणाम है। इसे माया रूप समझकर ब्रह्मकी विवर्त नहीं कह सकते । इसलिये ब्रह्मको माया रहित मानना
चाहिये । ब्रह्मन् अंशी है तथा जीव और जड़ ब्रह्मके अंश हैं। जीव भक्तिके द्वारा ही परब्रह्मको प्राप्त करता
है । शुद्धाद्वैतको अविकृत ब्रह्मवाद भी कहते हैं । वल्लभका समय ईसाकी १५ वीं शताब्दी है ।
विज्ञानभिक्षु—ये अविभागाद्वैतके स्थापक माने जाते हैं। केवलाद्वैत और शुद्धाद्वैतका इन्होंने खंडन
किया है। इनके मतमें जिस प्रकार जलमें शक्कर डालनेसे शक्कर जलके साथ अविभक्त हो जाती है, उसी
तरह पर जड़-अजड़ जगत परब्रह्ममें अविभक्तरूपसे रहता है। विज्ञानभिक्षुका समय ईसाकी १७ वीं शताब्दी है।
श्रीकंठाचार्य—ये शक्तिविशिष्ट अद्वैतको मानते हैं। यह सिद्धांत अद्वैतवाद केवलाद्वैतके साथ मिलता
जुलता है । अन्तर इतना ही है कि यहाँ ब्रह्मको सविशेष भावसे प्रधान, और निर्विशेष भावसे गौण माना
गया है । ब्रह्मतत्त्व चित् शक्ति और आनन्द शक्तिसे युक्त है । यहाँपर इस शक्तितत्त्वको माया रूप अथवा
अविद्या रूप न मानकर उसे चिन्मय माना गया है । श्रीकंठका समय १५वीं शताब्दी है ।
भट्टभास्कर—ये औपाधिक भेदाभेदको मानते हैं । भट्टभास्कर भेद और अभेद दोनोंको सत्य मानते हैं ।
ब्रह्म और जगतमें कार्य-कारण संबंध है । इसलिये कार्य और कारण दोनों ही सत्य हैं; कारणको सत्य और
कार्यको कल्पित नहीं कहा जा सकता । भट्टभास्करका समय ईसाकी १० वीं शताब्दी माना जाता है ।
निम्बार्क—स्वाभाविक भेदाभेदको मानते हैं। इनके मतमें जगत ब्रह्मका परिणाम है, इसे काल्पनिक
नहीं कह सकते । निम्बार्कके मतमें जीव और जगतको न ईश्वरसे सर्वथा अभिन्न कह सकते हैं, और न सर्वथा
भिन्न। अतएव चेतन और अचेतनको ईश्वरसे भिन्नाभिन्न मानना चाहिये। निम्बार्कका समय ११वीं शताब्दी है ।
मध्व—मध्व द्वैत वेदान्ती माने जाते हैं। मध्वके अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे भेदकी ही
सिद्धि होती है । पदार्थ दो तरहके होते हैं—स्वतंत्र और परतंत्र । ईश्वर स्वतंत्र पदार्थ है । परतंत्र पदार्थ
भाव और अभावके भेदसे दो प्रकारके हैं। भावके दो भेद हैं—चेतन और अचेतन । चेतन और अचेतन ईश्वरके
आधीन हैं । मध्वको पूर्णप्रज्ञ अथवा आनन्दतीर्थ भी कहा जाता है। मध्वका समय ईसाकी १२ वीं शताब्दी है ।१
शंकरका मायावाद
कुछ लोगोंका कहना कि शंकराचार्यने मायावादके सिद्धांतोंकी रचना बौद्धोंके विज्ञानवाद और शून्य-
वादके आधारसे की है । बादरायणके ब्रह्मसूत्रोंमें, भगवद्गीतामें और वृहदारण्यक, छान्दोग्य आदि उपनिषदोंमें
मायावादके सिद्धांत नहीं पाये जाते, विज्ञानभिक्षु शंकराचार्यको ‘प्रच्छन्नबौद्ध’ कहकर उल्लेख करते हैं, पद्म-
पुराणमें ‘मायावाद’ को असत् शास्त्र कहा गया है, तथा मध्व शून्यवादियोंके शून्य और मायावादियोंके ब्रह्मको
एक बताते हैं । इससे मालूम होता है कि शंकर अपने परमगुरु गौड़पादके सिद्धांतोंसे प्रभावित थे । प्रोफेसर
दासगुप्तके अनुसार ये गौड़पाद स्वयं बौद्ध विद्वान थे, और उपनिषदों और बुद्धके सिद्धांतोंमें भेद नहीं समझते
थे । गौड़पादने माण्डूक्य उपनिषद्के ऊपर माण्डूक्यकारिका टीका लिखकर बौद्ध और औपनिषदिक सिद्धांतोंका
समन्वय किया है । आगे चलकर गौड़पादके सिद्धांतोंका उनके शिष्य शंकराचार्यने प्रसार किया२ । प्रोफेसर
ध्रुव इस मतसे सहमत नहीं हैं । ध्रुवका मत है कि हीनयान बौद्धदर्शन ब्राह्मणदर्शनसे प्रभावित होकर ही
महायान बौद्धदर्शनके रूपमें विकसित हुआ है ।३
१. विशेषके लिये देखिये नर्मदाशंकरका हिंदतत्त्वज्ञाननो इतिहास उत्तरार्ध पृ० १७४-१८८ ।
२. गौड़पाद आचार्यकी माण्डूक्यकारिका और नागार्जुनकी माध्यमिककारिकाकी तुलनाके लिये देखिये प्रोफे-
सर दासगुप्तकी A History of Indian Philosohpy Vol. I पृ. ४२३ से ४२८ ।
३. देखिए प्रोफेसर ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी पृ० ६२ भूमिका ।