स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३४५
माननेका उल्लेख करते हैं।$^१$
मीमांसादर्शनका साहित्य
मीमांसासूत्रोंके रचयिता जैमिनी माने जाते हैं। वैदिक परम्पराके अनुसार जैमिनी ऋषि वेदव्यासके
शिष्य थे। वेदव्यासने मूल वेदकी चार संहिताओंकी रचना की और सामवेदकी संहिताको जैमिनीको पढ़ाया।
जैमिनीका समय ईसाके पूर्व २०० वर्ष माना जाता है। जैमिनीसूत्रोंके ऊपर भर्तृमित्र, भवदास, हरि और
उपवर्ष नामके विद्वानोंने टीकायें लिखीं हैं, जो आजकल उपलब्ध नहीं हैं। जैमिनोसूत्रोंपर भाष्य लिखनेवाले
शबरस्वामीका नाम मुख्य रूपसे उल्लेखनीय है। यह शबरभाष्य उत्तरकालके मीमांसक लेखकोंका खास
आधार रहा है। शबरस्वामीके सिद्धांतोंका तत्त्वसंग्रहमें खण्डन है। प्राच्य विद्वान शबरको वात्स्यायनका सम-
कालीन और नागार्जुनका उत्तरकालवर्ती मानते हैं। दूसरे लोग शबरका समय ईसाकी चौथी शताब्दी मानते
हैं। शबरभाष्यके बाद मीमांसकदर्शनके मुख्य विचारक प्रभाकर और कुमारिलभट्ट हो गये हैं। प्रभाकरने
(ई० स० ६५०) शबरभाष्य पर बृहती नामकी टीका लिखी है। शास्त्रीय परम्पराके अनुसार प्रभाकर कुमा-
रिलके शिष्य कहे जाते हैं। इन दोनोंके विचारोंमें मतभेद होनेके कारण दोनोंके सिद्धांतोंकी अलग-अलग
शाखायें हो गई हैं। प्रभाकरका मत गुरुमत के नामसे प्रसिद्ध है।$^२$ बृहती लिखते हुए प्रभाकर कुमारिलके
सिद्धांतोंका उल्लेख नहीं करते जब कि कुमारिल बृहतीकारके मतका उल्लेख करते हुए मालूम होते हैं। इससे
विद्वानोंका मत है कि प्रभाकर कुमारिलके शिष्य नहीं थे, किन्तु वे कुमारिलके पूर्ववर्ती हैं। प्रभाकरकी बृह-
तीके ऊपर प्रभाकरके शिष्य कहे जाने वाले शालिकानाथमिश्रने ऋजुविमला नामको टीका, और प्रभाकरके
सिद्धांतोंके विवेचन करनेके लिये प्रकरणपंचिका नामक ग्रंथ लिखे हैं। प्रभाकरकी बृहती और शालिकानाथकी
ऋजुविमला अभी सम्पूर्ण रूपसे प्रकाशमें नहीं आये, इसलिये प्रकरणपंचिका ही प्रभाकरके सिद्धांतोंको जान-
नेका एक आधार है। कुमारिलभट्ट, भट्टपाद और वार्तिककारके नामसे भी कहे जाते हैं। तिब्बती ग्रंथोंमें
इनको कुमारलील कहा है। कुमारिल (ई० स० ७००) ने शबरभाष्यके ऊपर स्वतंत्र रूपसे टीका लिखी
है। यह टीका श्लोकवार्तिक, तन्त्रवार्तिक और टुपटीका नामके तीन खंडोंमें विभक्त हैं। कुमारिल और उद्यो-
तकर बौद्धदर्शन और न्यायके खंडन करनेके लिये अद्वितीय समझे जाते थे। शान्तरक्षितने तत्त्वसंग्रहमें कुमारिलका
खंडन किया है। कुमारिल धर्मकीर्ति और भवभूतिके समकालीन कहे जाते हैं। कुमारिलके पश्चात् कुमारिलके
अनुयायी मंडनमिश्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है। मंडनमिश्रने विधिविवेक, भावना विवेक, मीमांसानु-
क्रमणी और कुमारिलकी तन्त्रवार्तिककी टीका लिखी है। कहा जाता है कि ये मण्डनमिश्र आगे जाकर वेदा-
न्तमतके अनुयायी हो गये। इसके अतिरिक्त, पार्थसारथिमिश्रने कुमारिलकी श्लोकवार्तिक पर न्यायरत्ना-
कर, तथा शास्त्रदीपिका, तन्त्ररत्न और न्यायरत्नमाला; सुचरितमिश्रने श्लोकवार्तिककी टीका और
काशिका; तथा सोमेश्वरभट्टने तन्त्रवार्तिककी टीका और न्यायसुधा नामके ग्रंथ लिखे। मीमांसादर्शनका ज्ञान
करनेके लिये माधवका न्यायमालाविस्तर, आपदेवका मीमांसान्यायप्रकाश, लौगाक्षिभास्करका अर्थसंग्रह और
खण्डदेवकी भाट्टदीपिका आदि ग्रंथ उल्लेखनीय हैं।
१. मीमांसकास्तु स्वयमेव प्रकारान्तरेणैकानेकाद्यनेकान्तं प्रतिपद्यमानास्तत्प्रतिपत्तये सर्वथा पर्यनुयोगं नार्हन्ति।
षड्दर्शनसमुच्चयटीका।
२. कहा जाता है कि कुमारिलभट्ट 'अत्र तुनोक्तम् तत्रापि नोक्तम् इति पौनरुक्तम्' इस वाक्यका अर्थ नहीं
समझ सके थे। कुमारिलने इसका अर्थ किया, 'यहाँ भी नहीं कहा गया, वहाँ भी नहीं कहा गया, इस-
लिये फिर कहा गया'। प्रभाकरने कहा कि इस वाक्यका यह अर्थ ठीक नहीं, इसका अर्थ करना
चाहिये—'यहाँ यह 'तु' से सूचित किया गया है, और वहाँ 'अपि' से सूचित किया गया है, इसलिये
फिर कहा गया है'। कुमारिल इससे बहुत प्रसन्न हुए और अपने शिष्य प्रभाकरको 'गुरु' कहने लगे।