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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 458 में से

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पृष्ठ 404

३५२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रतिसंचर—
व्युत्क्रमेणैव लीयन्ते तन्मात्रे भूतपंचकम् ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि अहंकारे विलीयते ।
अहंकारोऽथ बुद्धौ तु बुद्धिरव्यक्तसंज्ञके ।
अव्यक्तं न क्वचिल्लीनं प्रतिसंचर इति स्मृतः ।
श्लोक २० पृ० पं० क्रियावादी-अक्रियावादी ।
क्रियावादी जीवोंके अपने अपने कर्मोंके अनुसार फल मिलनेके सिद्धान्तको मानते हैं । अक्रियावादियोंका
सिद्धांत इस सिद्धांतसे बिलकुल उलटा है । जैन और बौद्ध आगम ग्रंथोंमें पकुधकात्यायन और मख्खलिगोशालको
अक्रियावादी कहकर उल्लेख किया गया है । निगंठ नातपुत्त बुद्धको क्रियावाद और अक्रियावाद दोनों सिद्धा-
न्तोंके माननेवाला कहते हैं ।¹ प्रोफेसर बेनीमाधव बरुआ आदि विद्वानोंका मत हैं कि जैन धर्मका मौलिक नाम
किरियावाद (क्रियावाद) था । क्रियावादी महावीर अक्रियावादी और अज्ञानवादियोंका विरोध करते थे,
पुण्य-पाप, आस्रव-बंध, निर्जरा-मोक्षको स्वीकार करते थे, और पुरुषार्थको प्रधान ²मानते थे । जैन ग्रंथोंमें
परमतवादियोंके ३६३ मतोंमें क्रियावादी और अक्रियावादियोंके मतोंको गिनाया गया है । क्रियावादी आत्माको
मानते हैं । इनके मतमें दुःख स्वयंकृत है, अन्यकृत नहीं । इनके कौत्कल, कांडविद्धि, कौशिक, हरिशमश्रु,
मांछयिक, रोमस, हारित, मुंड और अश्वलायन आदि १८० भेद हैं । अक्रियावादी प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्तिके
पश्चात् ही पदार्थका नाश मानते हैं । अक्रियावादी आत्माके अस्तित्वको नहीं मानते, और अपने माने हुए
तत्त्वोंका निश्चित रूपसे प्ररूपण नहीं कर सकते । राजवार्तिककारने अक्रियावादियोंके मरीच, कुमार, कपिल,
उलूक, गार्ग्य, व्याघ्रभूति, वाढलि, मौद्गलायन, माठर प्रभृति ४० भेद माने हैं ।³
philosophy भाग ३ अ. २१; प्रो. होर्नेले—Encyclopaedia of Religion and Ethics
जि० पृ० २२९ । आजीविकोंकी गणना पाँच प्रकारके श्रमणोंमें की गई है । विशेषके लिये देखिये जगदी-
शचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ. १२-१७, ४१९-२१
१. तेव्हां नातपुत्त म्हणाला, 'तूं क्रियावादी असून अक्रियावादी अशा श्रमण गोतमाला भेटण्याची कां इच्छा
करितोस ?' तरीहि सिंह गेलाच. तेव्हां बुद्धानें त्यास आपणांस क्रियावादी व अक्रियावादी ही दोन्हीं
विशेषणें कशीं लागू पडतील हें अनेक प्रकारांनीं सांगितलें (महावग्ग ६-३१ अंगत्तर ८-१२) देखिये
राजवाडेका दीघनिकाय भाग १ मराठी भाषांतर पृ० १०० ।
२. देखिये Pre-Buddhist Indian Philosophy.
३. तथा देखिये, जगदीशचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० ४२१-२२ ।