स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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मीमांसक परिशिष्ट ( ङ )
( श्लोक ११ और १२ )
मीमांसकोंके आचार विचार
मीमांसक दर्शनको जैमिनीय दर्शन भी कहते हैं। मीमांसक लोग उपनिषदोंसे पूर्ववर्ती वेदोंको ही
प्रमाण मानते हैं, इसलिये ये पूर्वमीमांसक कहे जाते हैं। मीमांसक धूममार्गके अनुयायी होते हैं। ये यज्ञ-यागके
द्वारा देवताओंको प्रसन्न करके स्वर्गकी प्राप्ति ही अपना मुख्य धर्म समझते हैं। १ मीमांसक वैदिक हिंसाको
हिंसा नहीं मानते, पितरोंको तृप्त करनेके लिये श्राद्ध करते हैं, देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये मांसकी आहुति
देते हैं, तथा अतिथियोंका मधुपर्क आदिसे सत्कार करते हैं। पूर्वमीमांसावादियोंको कर्ममीमांसक भी कहते
हैं। "मीमांसक साधु कुकर्मसे रहित होते हैं, यजन आदि छह् कर्मोंमें रत रहते हैं, ब्रह्मसूत्र रखते हैं, और
गृहस्थाश्रममें रहते हैं। ये लोग सांख्य साधुओंकी तरह एकदण्डी अथवा त्रिदंडी होते हैं। ये गेरुआ रंगके
वस्त्र पहिनते हैं, मृगचर्मके ऊपर बैठते हैं; कमण्डलु रखते हैं और सिर मुं