स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
२५२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २८
एवायं गोपिण्डः गोसदृशो गवयः स एवायं जिनदत्त इत्यादिः । उपलम्भानुपलम्भसम्भवं
त्रिकालीकलितसाध्यसाधनसम्बन्धाद्यालम्बनमिदमस्मिन् सत्येव भवतीत्याद्याकारं संवेदन-
मूहस्तर्कापरपर्यायः । यथा यावान् कश्चिद् धूमः स सर्वो वह्नौ सत्येव भवतीति तस्मिन्नसति
असौ न भवत्येवेति वा । अनुमानं द्विधा स्वार्थं परार्थं च । तत्रान्यथानुपपत्त्येकलक्षणहेतुग्रहण-
संबन्धस्मरणकारणं साध्यविज्ञानं स्वार्थम् । पक्षहेतुवचनात्मकं परार्थमनुमानमुपचारात्” । १
“आप्तवचनाद् आविर्भूतमर्थसंवेदनमागमः । उपचाराद् आप्तवचनं च”२ इति । स्मृत्या-
दीनां च विशेषस्वरूपं स्याद्वादरत्नाकरात् साक्षेपपरिहारं ज्ञेयमिति । प्रमाणान्तराणां पुनरर्था-
पत्त्युपमानसंभवप्रातिभैतिह्यादीनामत्रैवान्तर्भावः । ३सन्निकर्षादीनां तु जडत्वाद् एव न
प्रामाण्यमिति । तदेवंविधेन नयप्रमाणोपन्यासेन दुर्नयमार्गस्त्वया खिलीकृतः ॥ इति
काव्यार्थः ॥ २८ ॥
( वर्तमान कालवर्ती एक जातिके पदार्थोंमें रहनेवाला सामान्य ) और ऊर्ध्वता सामान्य ( एक ही पदार्थके
क्रमवर्ती सम्पूर्ण पर्यायोंमें रहनेवाला सामान्य ) आदिको जाननेवाले संकलनात्मक ज्ञानको प्रत्यभिज्ञान कहते हैं;
जैसे यह गोपिंड उसी जातिका है, यह गवय गौके समान है, यह वही जिनदत्त है, आदि । उपलंभ और
अनुपलंभसे उत्पन्न, त्रिकालकलित, साध्य-साधनके संबंध आदिसे होनेवाले, 'इसके होनेपर यह होता है,'
इस प्रकारके ज्ञानको ऊह अथवा तर्क कहते हैं; जैसे अग्निके होनेपर ही धूम होता है, अग्निके न होनेपर धूम
नहीं होता । अनुमानके स्वार्थ और पदार्थ दो भेद हैं । अन्यथानुपपत्ति रूप हेतु-ग्रहण करनेके संबंधके स्मरण-
पूर्वक साध्यके ज्ञानको स्वार्थानुमान कहते हैं । पक्ष और हेतु कह कर दूसरेको साध्यके ज्ञान करानेको परार्था-
नुमान कहते हैं । परार्थानुमानको उपचारसे अनुमान कहा गया है ।” “आप्तके वचनसे पदार्थोंके ज्ञान करनेको
आगम कहते हैं ॥” उपचारसे आप्त वचनको प्रमाण कहा है । स्मृति आदिका विशेष स्वरूप और किये गये
आक्षेपोंका परिहार स्याद्वादरत्नाकर आदि ग्रंथोंसे जानना चाहिये । अर्थापत्ति, उपमान, संभव, प्रातिभ,
आदि प्रमाणोंका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणोंमें हो जाता है । सन्निकर्ष आदिके जड़ होनेके कारण
प्रमाण नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार आपने नय और प्रमाणका उपदेश देकर दुर्नयवादके मार्गका
निराकरण किया है ॥ यह श्लोक का अर्थ है ॥ २८ ॥
भावार्थ— ( १ ) किसी वस्तुके सापेक्ष निरूपण करनेको नय कहते हैं । प्रत्येक वस्तुमें अनन्त धर्म
विद्यमान हैं । इन अनन्त धर्मोंमें किसी एक धर्मको अपेक्षासे अन्य धर्मोंका निषेध न करके पदार्थोंका ज्ञान
करना नय है । प्रमाणसे जाने हुए पदार्थोंमें ही नयसे वस्तुके एक अंशका ज्ञान होता है । शंका—नयसे
पदार्थोंका निश्चय होता है, इसलिये नयको प्रमाण ही कहना चाहिये, नय और प्रमाणको अलग अलग कहनेकी
आवश्यकता नहीं । समाधान—नयसे सम्पूर्ण वस्तुका नहीं, किन्तु वस्तुके एक देशका ज्ञान होता है ।
इसलिये जिस प्रकार समुद्रको एक बूँदको सम्पूर्ण समुद्र नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यदि समुद्रकी एक
बूँदको समुद्र कहा जाय, तो शेष समुद्रके पानीको असमूद्र कहना चाहिये, अथवा समुद्रके पानीकी अन्य बूँदोंको
भी समुद्र कहकर बहुतसे समुद्र मानने चाहिये । तथा, समुद्रकी एक बूँदको असमुद्र भी नहीं कहा जा सकता ।
यदि समुद्रकी एक बूँदको असमुद्र कहा जाय, तो शेष अंशको भी समुद्र नहीं कहा जा सकता । उसी प्रकार
पदार्थोंके एक अंशके ज्ञान करनेको वस्तु नहीं कह सकते, अन्यथा वस्तुके एक अंशके अतिरिक्त वस्तुके अन्य
धर्मोंको अवस्तु मानना चाहिये, अथवा वस्तुके प्रत्येक अंशको अवस्तु मानना चाहिये । तथा, पदार्थोंके एक
अंशके ज्ञान करनेको अवस्तु भी नहीं कह सकते, अन्यथा वस्तुके शेष अंशोंको भी अवस्तु मानना पड़ेगा ।
अतएव जिस प्रकार समुद्रकी एक बूँदको समुद्र अथवा असमुद्र नहीं कहा जा सकता, उसी तरह वस्तुके एक
१. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे ३-३-२३ ।
२. प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकारे ४-१, २ ।
३. प्रत्यक्षजनकः संबंधः । यथा चाक्षुषप्रत्यक्षे चक्षुर्विषययोः संसर्गः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५३
अंशके जाननेको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं कहा जा सकता । इसलिये नयको प्रमाण और अप्रमाण दोनोंसे
अलग मानना चाहिए । ¹
( २ ) जितने तरहके वचन हैं, उतने ही नय हो सकते हैं । इसलिये नयके उत्कृष्ट भेद असंख्यात
हो सकते हैं । इसलिये विस्तारसे नयोंका प्ररूपण नहीं किया जा सकता । एकसे लेकर नयोंके असंख्यात भेद
किये गये हैं । ( क ) सामान्यसे शुद्ध निश्चय नयकी अपेक्षा नयका एक भेद ² है ( ख ) सामान्य और विशेष-
की अपेक्षा द्रव्यार्थिक ( द्रव्यास्तिक ) और पर्यायार्थिक ( पर्यायास्तिक ) ये नयके दो भेद हैं । सामान्य और
विशेषको छोड़कर नयका कोई दूसरा विषय नहीं होता, अतएव सम्पूर्ण नैगम आदि नयोंका इन्हीं दो नयोंमें
अन्तर्भाव हो जाता है । ³ ( ग ) संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र इन तीन अर्थनयोंमें शब्द नयको मिलाकर
नयके चार भेद होते हैं । ⁴ ( घ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द नयके भेदसे नय पाँच प्रकारके
होते हैं । यहाँ भाष्यकारने सांप्रत, समभिरूढ़ और एवंभूतको शब्द नयके भेद स्वीकार किये हैं । ⁵ ( च )
जिस समय नैगम नय सामान्यको विषय करता है, उस समय वह संग्रह नयमें गर्भित होता है, और जिस
समय विशेषको विषय करता है, उस समय व्यवहारमें गर्भित होता है । अतएव नैगम नयका संग्रह और
व्यवहार नयमें अन्तर्भाव करके सिद्धसेन दिवाकरने छह नयोंको माना है । ⁶ ( छ ) नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूतके भेदसे नयके सात भेद होते हैं । यह मान्यता श्वेताम्बर आगम
परंपरामें और दिगम्बर ग्रन्थोंमें पायी जाती है । ⁷ ( ज ) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र तथा सांप्रत,
१. नायं वस्तु न चावस्तु वस्त्वंशः कथ्यते बुधैः ।
नासमुद्रः समुद्रो वा समुद्रांशो यथैव हि ॥
तन्मात्रस्य समुद्रत्वे शेषांशास्यासमुद्रता ।
समुद्रबहुता वा स्यात् तत्त्वे क्वास्तु समुद्रवित् ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-६-५, ६ ।
२. (अ) सामान्यादेशतस्तावदेक एव नयः स्थितः ।
स्याद्वादप्रविभक्तार्थविशेषव्यञ्जनात्मकः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२ ।
(आ) यदि वा शुद्धत्वनयान्नाप्युत्पादो व्ययोऽपि न ध्रौव्यम् ।
गुणश्च पर्यय इति वा न स्याच्च केवलं सदिति ॥ राजमल्ल-पंचाध्यायी १-२१६ ।
३. ( अ ) दव्वट्ठिओ य पज्जवणओ य सेसा वियप्पा सिं ।
( द्रव्यास्तिकश्च पर्यायनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः ) सन्मतितर्क १-३ ।
परस्परविविक्तसामान्यविशेषविषयत्वात् द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकावेव नयौ, न च तृतीयं प्रकारान्तर-
मस्ति यद्विषयोऽन्यस्ताभ्यां व्यतिरिक्तो नयः स्यात् । अभयदेव टीका ।
( आ ) संक्षेपाद् द्वौ विशेषेण द्रव्यपर्यायगोचरौ । तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-३ ।
४. नैगमनयो द्विविधः सामान्यग्राही विशेषग्राही च । तत्र यः सामान्यग्राही स संगृहेऽन्तर्भूतः, विशेषग्राही तु
व्यवहारे । तदेवं संग्रहव्यवहारऋजुसूत्रशब्दादित्रयं चैक इति चत्वारो नयाः । समवायांग टीका ।
५. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा नयाः । तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४ ।
६. जो सामन्नगाही स नेगमो संगहं गओ अहवा ।
इयदो ववहारमिओ जो तेण समाणणिद्देसो ॥ विशेषावश्यक भाष्य ३९ ।
सिद्धसेनीयाः पुनः षडेव नयानभ्युपगतवन्तः । नैगमस्य संग्रहव्यवहारयोरन्तर्भावविवक्षणात् । विशेषावश्यक
भाष्य ४५ ।
७. से किं तं णए ? सत्तमूलणया पण्णत्ता । तं जहा—णेगमे संगहे ववहारे उज्जुसुए सद्दे समभिरूढे एवंभूए ।
अनुयोगद्वारसूत्र । तथा स्थानांग सू० ५५२; भगवती सू० ४६९ ।
२५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २८
समभिरूढ और एवंभूत ये शब्दके तीन विभाग करनेसे नयोंके आठ भेद होते हैं ।१ ( झ ) नैगम, संग्रह
आदि सात प्रसिद्ध नयोंमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय मिला देनेसे नयोंकी संख्या नौ हो जाती है । इन
नयोंके माननेवाले आचार्योंका खंडन द्रव्यानुयोगतर्कणामें मिलता है ।२ ( ट ) नैगमके नौ भेद करके
संग्रह आदि छह नयोंको मिलानेसे नयोंके १५ भेद होते हैं ।३ ( ठ ) निश्चय नयके २८ और व्यवहार नयके
८ भेद मिलाकर नयोंके ३६ भेद होते हैं ।४ ( ड ) प्रत्येक नयके सौ सौ भेद करनेपर नैगम, संग्रह, व्यवहार,
ऋजुसूत्र और शब्द इन पाँच नयोंके माननेसे नयोंके पाँच सौ, और सात नय माननेसे नयोंके सात सौ भेद
होते हैं ।५ ( ढ ) जितने प्रकारके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं, इसलिये नयके असंख्यात
भेद हैं ।
( ३ )—( १ ) ( क ) सामान्य और विशेष पदार्थोंको ग्रहण करना नैगम नय है । यह लक्षण
मल्लिषेण, सिद्धर्षि, जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण, अभयदेव आदि श्वेताम्बर आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता
है ।६ ( ख ) दो धर्म, अथवा दो धर्मी अथवा एक धर्म और एक धर्मीमें प्रधान और गौणताकी विवक्षा
करनेको नैगम कहते हैं । नैगम नयका यह लक्षण देवसूरि, विद्यानन्दि, यशोविजय आदिके ग्रन्थोंमें
पाया जाता है ।७ ( ग ) जिसके द्वारा लौकिक अर्थका ज्ञान हो, उसे नैगम कहते हैं । यह लक्षण जिन-
भद्रगणि, सिद्धसेनगणि आदि आचार्योंके ग्रन्थोंमें मिलता है ।८ ( घ ) संकल्प मात्रके ग्रहण करनेको
नैगम कहते हैं ।९ जैसे किसी पुरुषको प्रस्थ ( पाँच सेरका परिमाण ) बनानेके लिये जंगलमें लकड़ी लेने
जाते हुए देखकर किसीने पूछा, तुम कहाँ जा रहे हो ? उस आदमीने उत्तर दिया कि वह प्रस्थ लेने जा
रहा है । पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानंदि आदि दिगम्बर आचार्योंको यही लक्षण मान्य है । ( प्रस्थका
उदाहरण नैगम नयके वर्णनमें हरिभद्रके आवश्यकटिप्पणमें भी दिया गया है )। नैगमके नौ भेद हैं ।
आरंभमें पर्याय नैगम, द्रव्य नैगम, द्रव्य-पर्याय नैगम—ये नैगमके तीन भेद हैं । इनमें अर्थ-पर्याय नैगम, व्यंजन-
पर्याय नैगम और अर्थ व्यंजन-पर्याय नैगम—ये पर्याय नैगमके तीन भेद हैं । शुद्ध द्रव्य नैगम और अशुद्ध द्रव्य
नैगम—ये द्रव्य नैगमके दो भेद हैं । तथा शुद्ध द्रव्यार्थ-पर्याय नैगम, शुद्ध द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम, अशुद्ध
द्रव्यार्थ द्रव्य व्यंजन-पर्याय नैगम—ये चार द्रव्य-पर्याय नैगमके भेद हैं । इन सबको मिलानेसे नैगमके नौ भेद
होते हैं । न्याय-वैशेषिकोंका नैगमाभासमें अन्तर्भाव होता है । ( २ ) विशेषोंकी अपेक्षा न करके वस्तुको
सामान्य रूपसे जाननेको संग्रह नय कहते हैं; जैसे जीव कहनेसे त्रस, स्थावर आदि सब प्रकारके जीवोंका
ज्ञान होता है । संग्रह नय पर संग्रह और अपर संग्रहके भेदसे दो प्रकारका है । सत्ताद्वैतको मानकर सम्पूर्ण
१. तत्त्वार्थाधिगम भाष्य १-३४, ३५ ।
२. यदि पर्यायद्रव्यार्थनयौ भिन्नौ विलोकितौ ।
अर्पितानर्पिताभ्यां तु स्युर्नैकादश तत्कथम् ॥ द्रव्यानुयोगतर्कणा ८-११ ।
३. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-४८ ।
४. देवसेनसूरि, नयचक्रसंग्रह १८६, १८७, १८८ ।
५. इक्किक्कको य सयविहो सत्तणयसया हवंति एमेव ।
अन्ने वि य आएसो पंचेव सया नयाणं तु ॥ विशेषावश्यक भाष्य २२६४ ।
६. ये परस्परविशकलितौ सामान्यविशेषाविच्छन्ति तत् समुदायरूपो नैगमः । सिद्धर्षि, न्यायावतार टीका ।
७. यद्वा नैकं गमो योऽत्र सततां नैगमो मतः ।
धर्मयोर्धर्मिणो वापि विवक्षा धर्मधर्मिणोः ॥ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक १-३३-२१ ।
८. निगम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते इति लौकिका अर्थाः तेषु निगमेषु भवो योऽध्यवसायः ज्ञानाख्यः स नैगमः ।
सिद्धसेनगणि, तत्त्वार्थ टीका ।
९. अर्थसंकल्पमात्रग्राही नैगमः । पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि पृ० ७८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २८ ] स्याद्वादमञ्जरी २५५
विशेषोंके निषेध करनेको संग्रहाभास कहते हैं। अद्वैत वेदान्तियों और सांख्योंका संग्रहाभासमें अन्तर्भाव
होता है। (३) संग्रह नयसे जाने हुए पदार्थके योग्य रीतिसे विभाग करनेको व्यवहार नय कहते
हैं; जैसे जो सत् है वह द्रव्य या पर्याय है। इसके सामान्य भेदक और विशेष भेदकके भेदसे दो भेद हैं।
द्रव्य और पर्यायके एकान्तभेदको मानना व्यवहाराभास है। इसमें चार्वाक दर्शन गर्भित होता है। (४)
वस्तुकी अतीत और अनागत पर्यायको छोड़कर वर्तमान क्षणकी पर्यायको जानना ऋजुसूत्र नय हैं; जैसे इस
समय मैं सुखकी पर्याय भोग रहा हूँ। सूक्ष्म ऋजुसूत्र और स्थूल ऋजुसूत्रके भेदसे ऋजुसूत्रके दो भेद हैं।
केवल क्षण-क्षणमें नाश होनेवाली पर्यायोंको मानकर पर्यायके आश्रित द्रव्यका सर्वथा निषेध करना ऋजुसूत्र
नयाभास है। बौद्ध दर्शन इसमें गर्भित होता है। (५) पर्यायवाची शब्दोंमें भी काल, कारक, लिंग, संख्या,
पुरुष और उपसर्गके भेदसे अर्थभेद मानना शब्द नय है; जैसे 'आप्' जलका पर्यायवाची होनेपर भी जलकी
एक बूँदके लिये 'आप्' का प्रयोग नहीं करना; 'विरमते' और 'विरमति' पर्यायवाची होनेपर भी दूसरेके
लिये 'विरमति' परस्मैपदका प्रयोग, और अपने लिये 'विरमते' आत्मनेपदका प्रयोग करना काल आदिके भेदसे
शब्द और अर्थको सर्वथा भिन्न मानना शब्दाभास है (६) पर्यायवाची शब्दोंमें व्युत्पत्तिके भेदसे अर्थभेद
मानना समभिरूढ नय है; जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर इन शब्दोंके पर्यायवाची होनेपर भी ऐश्वर्यवानको
इन्द्र, सामर्थ्यवानको शक्र, और नगरोंके नाश करनेवालेको पुरन्दर कहना । पर्यायवाची शब्दोंको सर्वथा भिन्न
मानना समभिरूढ़ाभास है (७) जिस समय पदार्थोंमें जो क्रिया होती हो, उस समय क्रियाके अनुकूल
शब्दोंसे अर्थके प्रतिपादन करनेको एवंभूत नय कहते हैं; जैसे पूजा करते समय पुजारी, और पढ़ते समय
विद्यार्थी कहना । जिस समय पदार्थमें जो क्रिया होती है, उस समयको छोड़कर दूसरे समय उस पदार्थको
उस नामसे नहीं कहना एवंभूत नयाभास हैं; जैसे जल लानेके समय ही घड़ेको घट कहना, दूसरे
समय नहीं।
(४) (क) सात नयोंको द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक दो विभागोंमें विभक्त किया जा सकता है।¹
नैगम, संग्रह और व्यवहार नय ये तोन नय द्रव्यार्थिक हैं, क्योंकि ये द्रव्यकी अपेक्षा वस्तुका प्रतिपादन करते
हैं। तथा ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये चार नय पर्यायार्थिक हैं, क्योंकि ये वस्तुमें पर्यायकी
प्रधानताका ज्ञान करते हैं। (ख) नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र—ये चार अर्थनय हैं। इनमें शब्दके लिंग
आदि बदल जानेपर भी अर्थमें अन्तर नहीं पड़ता, इसलिए अर्थकी प्रधानता होनेसे ये अर्थनय कहे जाते हैं।
शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत नयोंमें शब्दोंके लिंग आदि बदलनेपर अर्थमें भी परिवर्तन हो जाता है, इसलिये
शब्दकी प्रधानतासे ये शब्दनय कहे जाते हैं। (ग) नय व्यवहार और निश्चय नयमें भी विभक्त हो सकते
हैं। एवंभूतका विषय सब नयोंकी अपेक्षा सूक्ष्म है, इसलिये एवंभूतको निश्चय, और बाकीके छह नयोंको
व्यवहार नय कहते हैं। (घ) सात नयोंके ज्ञाननय और क्रियानय विभाग भी हो सकते हैं। ये नय सत्यका
विचार करते हैं, इसलिये ज्ञानदृष्टिकी प्रधानता होनेके कारण ज्ञाननय, और क्रियादृष्टिकी प्रधानता होनेसे
क्रियानय कहे जाते हैं। नैगम आदि नय उत्तरोत्तर सूक्ष्म-सूक्ष्म विषयको जानते हैं।
१. तार्किकाणां त्रयो भेदा आद्या द्रव्यार्थिनो मताः ।
सैद्धान्तिकानां चत्वारः पर्यायार्थगताः परे ॥ यशोविजय, नयोपदेश १८ ।
यहाँ जैन शास्त्रोंमें दो परम्परायें दृष्टिगोचर होती हैं। पहली परम्पराके अनुसार द्रव्यास्तिकके नैगम
आदि चार और पर्यायास्तिकके शब्द आदि तीन भेद हैं। इस सैद्धांतिक परम्पराके अनुयायी जिनभद्रगणि,
विनयविजय, देवसेन आदि आचार्य हैं। दूसरी परम्परा तार्किक विद्वानोंकी है। इसके अनुसार द्रव्या-
स्तिकके नैगम आदि तीन, और पर्यायास्तिकके ऋजुसूत्र आदि चार भेद हैं। इसके अनुयायी सिद्धसेन
दिवाकर, माणिक्यनन्दि, वादिदेवसूरि, विद्यानन्दि, प्रभाचन्द्र, यशोविजय आदि विद्वान् हैं।
२५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
इदानीं सप्तद्वीपसमुद्रमात्रो१ लोक इति वावदूकानां तन्मात्रलोके परिमितानामेव सत्त्वानां
सम्भवात् परिमितात्मवादिनां दोषदर्शनमुखेन भगवत्प्रणीतं जीवानन्त्यवादं निर्दोषतया-
भिष्टुवन्नाह—
मुक्तोऽपि वाभ्येतु भवम् भवो वा भवस्थशून्योऽस्तु मितात्मवादे ।
षड्जीवकायं त्वमनन्तसंख्यमाख्यस्तथा नाथ यथा न दोषः ॥ २९ ॥
मितात्मवादे संख्यातानामात्मनामभ्युपगमे दूषणद्वयमुपतिष्ठते । तत्क्रमेण दर्शयति ।
मुक्तोऽपि वाभ्येतु भवमिति । मुक्तो निर्वृतिमाप्तः । सोऽपि वा । अपिर्विस्मये । वाशब्द
उत्तरदोषापेक्षया समुच्चयार्थः यथा देवो वा दानवो वेति । भवमभ्येतु संसारमभ्यागच्छतु ।
इत्येको दोषप्रसङ्गः । भवो वा भवस्थशून्योऽस्तु । भवः संसारः स वा भवस्थशून्यः संसारि-
[L
अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५७
न च क्षीणकर्मणां भवाधिकारः ।
“दग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः ।
कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्कुरः ॥”१
इति वचनात् । आह च पतञ्जलिः—“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः”२ इति । तट्टीका३
च—“सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुषावनद्धा
शालितण्डुला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति नापनीततुषा दग्धबीजभावा । तथा
क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति । नापनीतक्लेशो न प्रसंख्यानदग्धक्लेशबीजभावो
वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोगः” इति । अक्षपादोऽप्याह—“न प्रवृत्तिः प्रति-
सन्धानाय हीनक्लेशस्य”४ इति ॥
एवं विभङ्गज्ञानिशिवराजर्षिमतानुसारिणो दूषयित्वा उत्तरार्द्धेन भगवदुपज्ञमपरि-
मितात्मवादं निर्दोषतया स्तौति । षड्जीवेत्यादि । त्वं तु हे नाथ तथा तेन प्रकारेण अनन्त-
संख्यमनन्ताख्यसंख्याविशेषयुक्तं षड्जीवकायम् । अजीवन् जीवन्ति जीविष्यन्ति चेति जीवा
इन्द्रियादिज्ञानादिद्रव्यभावप्राणधारणयुक्ताः तेषां “संघे चानूर्ध्वे ।”५ इति चिनोतेर्घञि आदेइच
कत्वे कायः समूह जीवकायः पृथिव्यादिः षण्णां जीवकायानां समाहारः षड्जीवकायम् ।
पात्रादिदर्शनाद् नपुंसकत्वम् । अथवा षण्णां जीवानां कायः प्रत्येकं सङ्घातः षड्जीवकायस्तं
षड्जीवकायम् । पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसलक्षणषड्जीवनिकायम् । तथा तेन प्रकारेण ।
जिन जीवोंके कर्म नष्ट हो गये हैं, वे फिरसे संसारमें नहीं आते । कहा भी है—
“जिस प्रकार बीजके जल जानेपर बीजसे अंकुर नहीं पैदा हो सकता, उसी तरह कर्मबीजके जल
जानेपर संसार रूपी अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता ।”
पतंजलिने कहा है—“मूलके रहनेपर ही जाति, आयु और भोग होते हैं ।” टीकाकार व्यासने
कहा है—“क्लेशोंके होनेपर ही कर्मोंकी शक्ति फल दे सकती है, क्लेशके उच्छेद होनेपर कर्म फल नहीं देते ।
जिस प्रकार छिलकेसे युक्त चावलोंसे अंकुर पैदा हो सकते हैं, छिलका उतार देनेसे चावलोंमें पैदा होनेकी
शक्ति नहीं रहती, उसी प्रकार क्लेशोंसे युक्त कर्मशक्ति फल देती है, क्लेशोंमें नष्ट हो जानेपर कर्मशक्तिमें
विपाक नहीं होता । यह विपाक जाति, आयु और भोगके भेदसे तीन प्रकारका है ।” अक्षपाद ऋषिने भी
कहा है—“जिसके क्लेशोंका क्षय हो गया है, उसको प्रवृत्ति बन्धका कारण नहीं होती ।”
इस प्रकार विभंगज्ञानी शिवराज महर्षिके अनुयायियोंकी मान्यता सदोष सिद्ध करके जिन
भगवान्के कहे हुए अनन्त जीववादको निर्दोष सिद्ध करते हैं । जो भूतकालमें जीते थे, वर्तमानमें जीते हैं,
और भविष्यमें जीयेंगे, उन्हे जीव कहते हैं । ये जीव इन्द्रिय आदि दस द्रव्य प्राणोंको और ज्ञान आदि भाव
प्राणोंको धारण करते हैं । जीवोंके समूहको जीवकाय कहते हैं । यहाँ 'संघे वानूर्ध्वे' सूत्रसे 'चि' धातुसे
'घञ्' प्रत्यय होनेपर 'च' के स्थानमें 'क' हो जानेसे 'काय' शब्द बनता है । पृथिवी, अप्, तेज, वायु,
वनस्पति और त्रस इन छह प्रकारके जीवोंको 'षट्काय जीव' कहा है । यहाँ 'पात्र' आदि शब्दोंमें षड्-
१. तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये १०-७ ।
२. पातञ्जलसूत्रे २-१३ ।
३. व्यासभाष्ये । २-१३ ।
४. गौतमसूत्रे ४-१-६४ ।
५. हैमसूत्रे ५-३-८० ।
३३
२५८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
आख्यः मर्यादां प्ररूपितवान् । यथा येन प्रकारेण न दोषो दूषणमिति । जात्यपेक्षमेकवचनम् ।
प्रागुक्तदोषद्वयजातीया अन्येऽपि दोषा यथा न प्रादुःष्यन्ति तथा त्वं जीवानन्त्यमुपदिष्टवा-
नित्यर्थः । आख्यः इति आङ्पूर्वकस्य ख्यातेरङि सिद्धिः । त्वमित्येकवचनं चेदं ज्ञापयति यद्
जगद्गुरोरेव एकस्येदृक्प्ररूपणसामर्थ्यं, न तीर्थान्तरशास्तृणामिति ॥
पृथिव्यादीनां पुनर्जीवत्वमित्थं साधनीयम्¹ । यथा सात्मिका विद्रुमशिलादिरूपा
पृथिवी, छेदे समानधातूत्थानाद्, अर्शोऽङ्कुरवत् । भौममम्भोऽपि सात्मकम्, क्षतभूसजातीयस्य
स्वभावस्य सम्भवात्, शालूरवत् । आन्तरिक्षमपि सात्मकम्, अभ्रादिविकारे स्वतः सम्भूय
पातात्, मत्स्यादिवत् । तेजोऽपि सात्मकम्, आहारोपादानेन वृद्धयादिविकारोपलम्भात्, पुरु-
षाङ्गवत् । वायुरपि सात्मकः, अपरप्रेरितत्वे तिर्यग्गतिमत्त्वाद् गोवत् । वनस्पतिरपि सात्मकः,
अपरप्रेरितत्वे तिर्यग्गतिमत्त्वाद् गोवत् । वनस्पतिरपि सात्मकः, छेदादिभिर्म्लान्यादिदर्शनात्,
पुरुषाङ्गवत् । केषाञ्चित् स्वापाङ्गानोपश्लेषादिविकाराच्च² । अपकर्षतश्चैतन्याद् वा सर्वेषां
सात्मकत्वसिद्धिः । आप्रवचनाच्च । त्रसेषु च कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादिषु न केषाञ्चित्
सात्मकत्वे विगानमिति ।
यथा च भगवदुपक्रमे जीवानन्त्ये न दोषस्तथा दिङ्मात्रं भाष्यते । भगवन्मते हि
जीवकाय शब्दको मान कर समासमें ‘षड्जीवकायं’ नपुंसक लिंग बनाया है । अथवा समूह अर्थमें समास
न करके ‘छह प्रकारके जीवोंका संघात’ अर्थ करके ‘षड्कायजीवः’ पुँल्लिंगान्त समास बनाना चाहिये ।
अतएव जिन भगवान्ने ही निर्दोष रीतिसे जीवोंको अनन्त स्वीकार किया है, दूसरे वादियोंने नहीं । आङ्
पूर्वक ‘ख्या’ धातुसे अङ् प्रत्यय लगानेपर ‘आख्यः’ क्रियापद बनता है ।
(१) मूंगा पाषाण आदिरूप पृथिवी सजीव है, क्योंकि अर्शके अंकुरकी तरह पृथिवीके काटनेपर
वह फिरसे उग आती है । (२) पृथिवीका जल सजीव है, क्योंकि मेंढककी तरह जलका स्वभाव खोदी
हुई पृथिवीके समान है । आकाशका जल भी सजीव है, क्योंकि मछलीकी तरह बादलके विकार होनेपर
वह स्वतः ही उत्पन्न होता है । (३) अग्नि भी सजीव है, क्योंकि पुरुष के अंगोंकी तरह आहार आदिके
ग्रहण करनेसे उसमें वृद्धि होती है । (४) वायुमें भी जीव है, क्योंकि गौकी तरह वह दूसरेसे प्रेरित होकर
गमन करती है । (५) वनस्पतिमें भी जीव है, क्योंकि पुरुषके अंगोंकी तरह छेदनेसे उसमें मलिनता देखी
जाती है । कुछ वनस्पतियोंमें स्त्रियों के पादाघात आदिसे विकार होता है, इसलिये भी वनस्पतिमें जीव है ।
अथवा जिन जीवोंमें चेतना घटती हुई देखी जाती है, वे सब सजीव हैं । सर्वज्ञ भगवान्ने पृथिवी आदिको
जीव कहा है । (६) कृमि, पिपीलिका, भ्रमर, मनुष्य आदि त्रस जीवोंमें सभी लोगोंने जीव माना है ।
जिनमतमें छहनिकायके जीवोंमें सबसे कम त्रस जीव हैं । त्रस जीवों में संख्यात गुणे अग्निकायिक,
१. ननु चेतनत्वमपि क्वचिदचेतनत्वाभिमतानां भूतेन्द्रियाणां श्रूयते । यथा ‘मृदब्रवीत्’ ‘आपोऽब्रुवन्’
(श० प० ब्रा० ६–१–३–२–४) इति, ‘तत्तेज ऐक्षत’ ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छा० ६–२–३, ४)
इति चैवमाद्या भूतविषया चेतनत्वश्रुतिः । ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्ये २–१–४। वनस्पत्यादीनां चेतनत्वं
महाभारते (शांति० मो० अ० १८२ श्लोक ६–१८) मनुस्मृतौ (अ० १ श्लो० ४६–४९) च समर्थितम् ।
२. तथा मत्तकामिनीसनूपुरसुकुमारचरणताडनादशोकपरोः पल्लवकुसुमोद्भवः । तथा युवत्यालिंगनात्
पनंसस्य । तथा सुरभिसुरागण्डूषसेकाद्वकुलस्य । तथा सुरभिनिर्मलजलसेकाच्चम्पकस्य । तथा कटाक्ष-
वीक्षणात्तिलकस्य । तथा पंचमस्वरोद्गाराच्च्छीरपस्य विरहकस्य पुष्पविकिरणम् ।
षड्दर्शनसमुच्चय गुणरत्न टीका पृ० ६३ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २९ ] स्याद्वादमञ्जरी २५९
षण्णां जीवनिकायानामेतद् अल्पबहुत्वम् । सर्वस्तोकास्त्रसकायिकाः । तेभ्यः संख्यातगुणाः
तेजस्कायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिकाः पृथिवीकायिकाः । तेभ्यो विशेषाधिका अप्कायिकाः ।
तेभ्योऽपि विशेषाधिका वायुकायिकाः । तेभ्योऽनन्तगुणा वनस्पतिकायिकाः । ते च व्यवहारिका
अव्यवहारिकाश्च ।¹
"गोला य असंखिज्जा असंखणिग्गोअ गोलओ भणिओ ।
इक्किक्कम्मि णिगोए अणन्तजीवा मुणेअव्वा ॥ १ ॥
सिज्झन्ति जत्तिया खलु इह संव्यवहारजीवरासीओ ।
एंति अणाइवणस्सइ रासीओ तत्तिया तम्मि ॥ २ ॥"²
इति वचनाद् यावन्तश्च यतो मुक्तिं गच्छन्ति जीवास्तावन्तोऽनादिनिगोदवनस्पतिरा-
शेस्तत्रागच्छन्ति । न च तावता तस्य काचित् परिहाणिर्निगोदजीवानन्त्यस्याक्षयत्वात् । निगोद्-
स्वरूपं च समयराग्गराद् अवगन्तव्यम् । अनाद्यननन्तेऽपि काले ये केचिन्निर्वृताः निर्वान्ति निर्वा-
अग्निकायसे विशेष अधिक पृथिवीकायिक, पृथिवीकायसे जलकायिक जलकायसे वायुकायिक और वायुकायसे
अनंतगुणे वनस्पतिकायिक जीव हैं । व्यवहारिक और अव्यवहारिकके भेदसे वनस्पतिकायिक जीव
दो प्रकारके होते हैं—
"गोल असंख्यात होते हैं, एक गोलमें असंख्यात निगोद रहते हैं और एक निगोदमें अनन्त जीव
रहते हैं । जितने जीव व्यवहारराशिसे निकल कर मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि वनस्पति राशिसे
निकल कर व्यवहारराशि में आ जाते हैं ।"
इसलिये जितने जीव मोक्ष जाते हैं, उतने प्राणी अनादि निगोद [ देखिये परिशिष्ट ( क ) ]
वनस्पति राशिमेंसे आ जाते हैं । अतएव निगोद राशिमेंसे जीवोंके निकलते रहनेके कारण संसारी जीवोंका
कभी सर्वथा क्षय नहीं हो सकता । निगोदका स्वरूप समयसागर से जानना चाहिये । जितने जीव अब
तक मोक्ष गये हैं, और आगे जानेवाले हैं, वे निगोद जीवोंके अनन्तवें भाग भी न हैं, न हुए हैं और न
होंगे । अतएव हमारे मतमें न तो मुक्त जीव संसारमें लौटकर आते हैं, और न यह संसार जीवोंसे शून्य
होता है । इसे दूसरे वादियोंने भी माना है। वार्त्तिककारने भी कहा है—
"इस ब्रह्माण्डमें अनन्त जीव हैं, इसलिये संसारसे ज्ञानी जीवोंकी मुक्ति होते हुए यह संसार जीवोंसे
खाली नहीं होता । जिस वस्तुका परिमाण होता है, उसीका अंत होता है, वही घटती और समाप्त होती
१. द्विविधा जीवा सांव्यवहारिका असांव्यवहारिकाश्चेति । तत्र ये निगोदावस्थात ऽउद्धृत्य पृथिवीकायि-
कादिभेदेषु वर्तन्ते ते लोकेषु दृष्टिपथमागताः सन्तः पृथिवीकायिकादिव्यवहारमनुपतन्तीति व्यवहारिका
उच्यन्ते । ते च यद्यपि भूयोऽपि निगोदावस्थामुपयान्ति तथापि ते सांव्यवहारिका एव, संव्यवहारे पति-
तत्वात् । ये पुनरनादिकालादारभ्य निगोदावस्थामुपगता एवावतिष्ठन्ते ते व्यवहारपथातीतत्वादसांव्य-
वहारिकाः । प्रज्ञापनाटीकायां सू० २३४ ।
२. छाया—गोलाश्च असंख्येयाः असंख्येयनिगोदो गोलको भणितः ।
एकैकस्मिन् निगोदे अनन्तजीवा ज्ञातव्याः ॥ १ ॥
सिद्ध्यन्ति यावन्तः खलु इह संव्यवहारजीवराशितः ।
आयान्ति अनादिवनस्पतिराशितस्तावन्तस्तस्मिन् ॥ २ ॥
.२६० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २९
स्यन्ति च ते निगोदानामनन्तभागेऽपि१ न वर्तन्ते नावतिष्ठत न वत्स्यन्ति । ततश्च कथं मुक्तानां
भवागमनप्रसङ्गः, कथं च संसारस्य रिक्तताप्रसक्तिरिति । अभिप्रेतं चैतद् अन्ययूथ्यानामपि ।
यथा चोक्तं वार्तिककारेण—
“अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।
ब्रह्माण्डलोकजीवानामनन्तत्वाद् अशून्यता ॥ १ ॥
अत्यन्यूनातिरिक्तत्वैर्युज्यते परिमाणवत् ।
वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः ॥ २ ॥”
इति काव्यार्थः ॥ २९ ॥
हैं । अपरिमित वस्तुका न कभी अंत होता है, न वह घटती ओर न समास होती है ।”
यह श्लोकका अर्थ है ॥२९॥
भावार्थ—( १ ) यदि संसारी जीवोंको बराबर मोक्ष मिलता रहे ( जैन शास्त्रोंके अनुसार छह
महीने और आठ समयमें ६०८ जीव मोक्ष जाते हैं ) तो कभी यह संसार जीवों से खाली हो जाना चाहिये !
आजीविक मतानुयायी मस्करी२ ( गोशाल ) आदिका मत था कि मुक्त जीव फिरसे संसारमें जन्म लेते
हैं । अश्वमित्रनेभी इस प्रश्नको लेकर जैन संघमें वाद खड़ा किया था । स्वामी दयानन्दके अनुसार जीव
महाकल्प कालपर्यंत मुक्तिके सुखको भोग कर फिरसे संसारमें उत्पन्न होते हैं । इस कथनकी पुष्टिके लिये
दयानन्द स्वामीने ऋग्वेद३ तथा मुण्डक उपनिषद्के४ प्रमाण उद्धृत किये हैं ।५
जैन विद्वानोंकी मान्यता है कि जिस प्रकार बीजके जल जानेपर अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता,
उसी प्रकार कर्मोंका सर्वथा क्षय होनेपर जीव फिरसे संसारमें जन्म नहीं लेते । पतंजलि, व्यास, अक्षपाद
आदि ऋषियोंकी भी यही मान्यता है । जैन सिद्धांतमें द्वीप और समुद्रोंका असंख्यात परिमाण स्वीकार
किया गया है । इन द्वीप-समुद्रोंमें अनन्तानन्त जीव रहते हैं । सबसे कम त्रस जीव हैं, त्रस जीवोंसे संख्यात
गुणे अग्निकायिक, अग्निकायिक जीवोंसे अधिक पृथिवीकायिक, पृथ्वीसे जलकायिक, जलसे वायुकायिक
और वायुकायिकसे अनन्तगुणे वनस्पतिकायिक जीव हैं । वनस्पतिकायिक जीव व्यावहारिक और अव्याव-
हारिकके भेदसे दो प्रकारके होते हैं । जो जीव निगोदसे निकल कर पृथिवीकाय आदि अवस्थाको प्राप्त
करके फिरसे निगोद अवस्थाको प्राप्त करते हैं, वे जीव व्यवहारिक कहे जाते हैं । तथा जो जीव अनादि
कालसे निगोद अवस्थामें ही पड़े हुए हैं, उन्हें अव्यवहारिक कहते हैं । जैन सिद्धांतके अनुसार असंख्यात
१. एक्कणिगोदसरीरे जीवा दव्वप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहिं अणंतगुणा सव्वेण विदीदकालेण ॥
छाया—एकनिगोदशरीरे जीवा द्रव्यप्रमाणतो दृष्टा ।
सिद्धैरनन्तगुणाः सर्वेण व्यतीतकालेन ॥
गोम्मटसारे जीव० १९५ ।
२. कर्मजनसंश्लेषात् संसारसमागमोऽस्तीति मस्करिदर्शनं । गोम्मटसार जीवकांड ६९ टीका । तथा, ‘ज्ञानिनो
धर्मतीर्थस्य’ आदि, देखिये पीछे, स्याद्वादमंजरी पृ० ४ ।
३. १-२४-१-२ ।
४. ते ब्रह्मलोके ह परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे । मुण्डक उ० ३-२-६ ।
५. देखिये सत्यार्थप्रकाश सं० १९८३ पृ० १५५ ।
सर जे० सी० बोसने टिन, शीशा६, प्लैटिनम आदि धातुओंमें भी Footnote marker:शीशा६`.
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प्रतिक्रिया ( Response ) सिद्ध की है ।७
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परस्पर विरुद्ध अर्थको प्रतिपादन करनेवाले अन्य दर्शन एक दूसरेसे ईर्ष्या करते हैं, अतएव सम्पूर्ण -
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नय स्वरूप होनेसे भगवानका सिद्धान्त ही मात्सर्य रहित हो सकता है— -
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Footnotes:
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१. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपरिणामेन भविष्यतीति भव्यः । तद्विपरीतोऽभव्यः । तत्त्वार्थराजवार्तिक २-७,
Wait, let's verifyतद्विपरीतोऽभव्यः:
तद्विपरीतोऽभव्यः ।-> yes, avagrahaऽ.
तत्त्वार्थराजवार्तिक २-७, - Line 20:
`७,
- Line 19:
२६२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो . व्य. श्लोक ३०
अन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावाद् यथा परे मत्सरिणः प्रवादाः ।
नयानशेषानविशेषमिच्छन् न पक्षपाती समयस्तथा ते ॥३०॥
प्रकर्षेण उद्यते प्रतिपाद्यते स्वाभ्युपगतोऽर्थो यैरिति प्रवादाः । यथा येन प्रकारेण । परे
भवच्छासनाद् अन्ये । प्रवादा दर्शनानि । मत्सरिणः अतिशयने मत्वर्थीयविधानात् साति-
शयासहनताशालिनः क्रोधकषायकलुषितान्तःकरणाः सन्तः पक्षपातिनः, इतरपक्षतिरस्कारेण
स्वकक्षीकृतपक्षव्यवस्थापनप्रवणा वर्तन्ते । कस्माद् हेतोर्मत्सरिणः इत्याह । अन्योऽन्यपक्ष-
प्रतिपक्षभावात् । पच्यते व्यक्तीक्रियते साध्यधर्मवैशिष्टयेन हेत्वादिभिरिति पक्षः । कक्षीकृत-
धर्मप्रतिष्ठापनाय साधनोपन्यासः । तस्य प्रतिकूलः प्रतिपक्षः । पक्षस्य प्रतिपक्षो विरोधी
पक्षः प्रतिपक्षः । तस्य भावः पक्षप्रतिपक्षभावः । अन्योऽन्यं परस्परं यः पक्षप्रतिपक्षभावः
पक्षप्रतिपक्षत्वमन्योऽन्यपक्षप्रतिपक्षभावस्तस्मात् ॥
तथाहि । य एव मीमांसकानां नित्यः शब्द इति पक्षः स एव सौगातानां प्रतिपक्षः ।
तन्मते शब्दस्यानित्यत्वात् । य एव सौगतानामनित्यः शब्द इति पक्षः स एव मीमांसकानां
प्रतिपक्षः । एवं सर्वप्रयोगेषु योज्यम् । तथा तेन प्रकारेण ते तव । सम्यक् एति गच्छति शब्दोऽ-
र्थमनेन इति “पुंनाम्नि घः ।२” समयः संकेततः । यद्वा सम्यग् अवैपरीत्येन ईयन्ते ज्ञायन्ते
जीवाजीवादयोऽर्था अनेन इति समयः सिद्धान्तः । अथवा सम्यग् अयन्ते गच्छन्ति जीवाद्यः
पदार्थाः स्वस्मिन् स्वरूपे प्रतिष्ठां प्राप्नुवन्ति अस्मिन् इति समय आगमः । न पक्षपाती नैक-
पक्षानुरागी । पक्षपातित्वस्य हि कारणं मत्सरित्वं परप्रवादेषु उक्तम् । त्वत्समयस्य च
मत्सरित्वाभावाद् न पक्षपातित्वम् । पक्षपातित्वं हि मत्सरित्वेन व्याप्तम् , व्यापकं च निवर्तमानं
श्लोकार्थ—अन्यवादी लोग परस्पर पक्ष और प्रतिपक्ष भाव रखनेके कारण एक दूसरेसे ईर्ष्या करते
हैं, परन्तु सम्पूर्ण नयोंको एक समान देखनेवाले आपके शास्त्रोंमें पक्षपात नहीं है ।
व्याख्यार्थ—जिसके द्वारा इष्ट अर्थको उत्तमतासे प्रतिपादन किया जाय, उसे प्रवाद कहते हैं ।
आपके शासनके अतिरिक्त अन्य दर्शन परस्पर पक्ष और प्रतिपक्षका दुराग्रह रखनेके कारण एक दूसरेके
पक्षका तिरस्कार करके अपने सिद्धान्तको स्थापित करते हैं, अतएव वे लोग अत्यन्त असहनशील होनेके
कारण क्रोध कषायसे युक्त होकर अपने दर्शनोंमें पक्षपात करते हैं । 'मत्सरी' शब्दमें मत्वर्थमें इन् प्रत्यय
सातिशय अर्थको द्योतन करनेके लिए किया गया है । जो साध्यसे युक्त होकर हेतु आदिके द्वारा व्यक्त किया
जाय, उसे पक्ष कहते हैं । जो पक्षके विरुद्ध हो, उसे प्रतिपक्ष कहते हैं ।
तथाहि—जैसे मीमांसकोंके मतमें 'शब्द नित्य है,' यह पक्ष बौद्धोंकाप्रतिपक्ष है, क्योंकि बौद्धोंके मतमें
शब्द अनित्य है, इसी तरह 'शब्द अनित्य है' यह बौद्धोंका पक्ष मीमांसकोंका प्रतिपक्ष है । इसी प्रकार अन्यत्र
भी समझना चाहिये । परन्तु आपके समयमें किसी एक पक्षके प्रति अनुराग नहीं देखा जाता । अन्य वादोंमें
ईर्ष्या करना ही पक्षपातका कारण है । आपके समयमें ईर्ष्याका अभाव होनेसे पक्षपात नहीं है । व्यापकके
न होनेपर व्याप्य भी नहीं होता, अतएव आपके समयमें ईर्ष्या न होनेसे पक्षपातका भी अभाव है । यहाँ
समय शब्दका चार प्रकारसे अर्थ किया गया है । ( १ ) जिससे शब्दका अर्थ ठीक-ठीक मालूम हो—संकेत ।
यहाँ सम्-इ धातुसे “पुंनाम्नि घः” सूत्रसे समय शब्द बनता है; ( २ ) जिससे जीव, अजीव आदि पदार्थोंका
भले प्रकारसे ज्ञान हो—सिद्धान्त; ( ३ ) जिसमें जीव आदि पदार्थोंका ठीक प्रकारसे वर्णन हो—आगम;
१. भूमिन्निन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशयने । संबन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुवादयः ।
२. हैमसूत्रे ५-३-१३० ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ३० ] स्याद्वादमञ्जरी २६३
व्याप्यमपि निवर्तयति इति मत्सरित्वे निवर्त्तमाने पक्षपातित्वमपि निवर्त्तत इति भावः । तव
समय इति वाच्यवाचकभावलक्षणे सम्बन्धे षष्ठी । सूत्रापेक्षया गणधरकर्तृकत्वेऽपि समयस्य
अर्थापेक्षया भगवत्कर्तृकत्वाद् वाच्यवाचकभावो न विरुध्यते । “अत्थं भासइ अरहा सुत्तं
गंथंति गणहरा णिउणं”¹ इति वचनात् । अथवा उत्पादव्ययध्रौव्यप्रपञ्चः समयः । तेषां च
भगवता साक्षान्मातृकापदरूपतयाभिधानात् । तथा चार्षम्— “उप्पन्ने वा विगमे वा धुवेति
वा” इत्यदोषः ॥
मत्सरित्वाभावमेव विशेषणद्वारेण समर्थयति । नयानशेषानविशेषमिच्छन् इति ।
अशेषान् समस्तान् नयान् नैगमादीन्, अविशेषं निर्विशेषं यथा भवति एवम् इच्छन् आकाङ्-
क्षन् सर्वनयात्मकत्वादनेकान्तवादस्य । यथा विशकलितानां मुक्तामणीनामेकसूत्रानुस्यूतानां
हारव्यपदेशः एवं पृथगभिसन्धीनां नयानां स्याद्वादलक्षणैकसूत्रप्रोतानां श्रुताख्यप्रमाणव्यपदेश
इति । ननु प्रत्येकं नयानां विरुद्धत्वे कथं समुदितानां निर्विरोधितोच्यते । यथा हि समी-
चीनं मध्यस्थं न्यायनिर्णेतारमासाद्य परस्परं विवदमाना अपि वादिनो विवादाद् विरमन्ति
एवं नया अन्योऽन्यं वैरायमाणा अपि सर्वज्ञशासनमुपेत्य स्याच्छब्दप्रयोगोपशमितविप्रति-
पत्तयः सन्तः परस्परमत्यन्तं सुहृद्भूयावतिष्ठन्ते । एवं च सर्वनयात्मकत्वे भगवत्समयस्य
सर्वदर्शनमयत्वमविरुद्धमेव, नयरूपत्वाद् दर्शनानाम् ॥
न च वाच्यं तर्हि भगवत्समयस्तेषु कथं नोपलभ्यते इति । समुद्रस्य सर्वसरिन्मयत्वेऽपि
विभक्तासु तासु अनुपलम्भात् । तथा च वक्तृवचनयोरैक्यमध्यवस्य श्रीसिद्धसेनदिवाकर-
पादाः—
( ४ ) तथा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके सिद्धान्तको समय कहते हैं । उत्पाद आदिको जिन भगवान्ने 'अष्ट
प्रवचनमाता' कहा है । आर्षवाक्य भी है— “उत्पन्न भी होता है, नष्ट भी होता है, और स्थिर भी रहता
है । यद्यपि आगमोंके सूत्र गणधरोंके बनाये हुए होते हैं, परन्तु "अर्हंत अर्थका व्याख्यान करते हैं, और
गणधर उसे सूत्रमें उपनिबद्ध करते हैं”—इस वचनसे अर्थकी अपेक्षासे भगवान् ही समयके रचयिता हैं ।
अतएव आपके साथ आगमका वाच्य-वाचक भाव बन सकता है ।
आपका सिद्धान्त ईर्ष्यासे रहित है, क्योंकि आप नैगम आदि सम्पूर्ण नयोंको एक समान देखते हैं ।
अनेकांत वादमें सर्वनयोंका समावेश होता है । जिस प्रकार बिखरे हुए मोतियोंको एक सूतमें पिरो देनेसे
मोतियों का सुन्दर हार बन कर तैयार हो जाता है, उसी तरह भिन्न-भिन्न नयोंको स्याद्वाद रूपी सूतमें पिरो
देनेसे सम्पूर्ण नय 'श्रुत प्रमाण' कहे जाते हैं । शङ्का—यदि प्रत्येक नय परस्पर विरुद्ध है, तो उन नयोंके
एकत्र मिलानेसे उनका विरोध किस प्रकार नष्ट होता है । समाधान—जैसे परस्पर विवाद करते हुए वादी
लोग किसी मध्यस्थ न्यायीके द्वारा न्याय किये जानेपर विवाद करना बन्द करके आपसमें मिल जाते हैं,
वैसे ही .परस्पर विरुद्ध नय सर्वज्ञ भगवान्के शासनकी शरण लेकर 'स्यात्' शब्दसे विरोधके शान्त हो
जानेपर परस्पर अत्यन्त सुहृद् भावसे एकत्र रहने लगते हैं । अतएव भगवान्के शासनके सर्व नय स्वरूप
होनेसे भगवान्का शासन सम्पूर्ण दर्शनोंसे अविरुद्ध है, क्योंकि प्रत्येक दर्शन नय स्वरूप है ।
शङ्का—यदि भगवान्का शासन सर्व दर्शन स्वरूप हैं, तो यह शासन सब दर्शनोंमें क्यों नहीं पाया
जाता ? समाधान—जिस प्रकार समुद्रके अनेक नदी रूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न नदियोंमें समुद्र नहीं
पाया जाता, उसी तरह भिन्न-भिन्न दर्शनोंमें जैन दर्शन नहीं पाया जाता । वक्ता और उसके वचनोंमें अभेद
मान कर सिद्धसेन दिवाकरने कहा है—
१. छाया-अर्थं भाषतेऽर्हन् सूत्रं ग्रन्थन्ति गणधरा निपुणम् । विशेषावश्यकभाष्ये १११९ ।
तृतीय भाग: सप्तभङ्गी न्याय, अनेकान्त-स्वरूप एवं ग्रन्थ उपसंहार
२६४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ३०
“उद्धाविव सर्वसिन्धवः समुदीर्णास्त्वयि नाथ दृष्टयः ।
न च तासु भवान् प्रदृश्यते विभक्तासु सरित्स्विवोदधिः” ॥१
अन्ये त्वेवं व्याचक्षते । तथा अन्योन्यपक्षप्रतिपक्षभावात् परे प्रवादा मत्सरिणस्तथा तव समयः
सर्व नयान् मध्यस्थतयाऽङ्गीकुर्वाणो न मत्सरी । यतः कथंभूतः । पक्षपाती पक्षमेकपक्षाभिनिवेशम्
पातयति तिरस्करोतीति पक्षपाती । रागस्य जीवनस्य नष्टत्वात् । अत्र च व्याख्याने मत्सरीति
विधेयपदम् पूर्वस्मिंश्च पक्षपातीति विशेषः । अत्र च क्लिष्टाक्लिष्टव्याख्यानविवेको विवेकिभिः
स्वयं कार्यः ॥ इति काव्यार्थः ॥ ३० ॥
“हे नाथ, जिस प्रकार नदियां समुद्रमें जा कर मिलती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण दृष्टियों ( दर्शन ) का
आपमें समावेश होता है । जिस प्रकार भिन्न नदियोंमें समुद्र नहीं रहता, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न दर्शनोंमें
[L11
अन्य. यो. व्य. श्लोक ३१ ] स्याद्वादमञ्जरी २६५
इत्थङ्कारं कतिपयपदार्थविवेचनद्वारेण स्वामिनो यथार्थवादाख्यं गुणमभिष्टुत्य समग्र-
वचनातिशयस्यावर्णने स्वस्यासामर्थ्यं दृष्टान्तपूर्वकमुपदर्शयन् औद्धत्यपरिहाराय भङ्ग्यन्तरति-
रोहितं स्वाभिधानं च प्रकाशयन् निगमनमाह—
वाग्वैभवं ते निखिलं विवेक्तुमाशास्महे चेद् महनीयमुख्य ।
लङ्घम जङ्घालतया समुद्रं वहेम चन्द्रद्युतिपानतृष्णाम् ॥ ३१ ॥
विभव एव वैभवं । प्रज्ञादित्यात् स्वार्थेऽण् । विभोर्भावः कर्म चेति वा वैभवम् । वाचां
वैभवं वाग्वैभवं वचनसंपत्प्रकर्षम् । । विभोर्भाव इति पक्षे तु सर्वनयव्यापकत्वम् । विभु-
शब्दस्य व्यापकपर्य्यायतया रूढत्वात् । ते तव संवन्धिनं निखिलं कृत्स्नं विवेक्तुं विचारयितुं
चेद् यदि वयमाशास्महे इच्छामः । हे महनीयमुख्य महनीयाः पूज्याः पञ्च परमेष्ठिनस्तेषु
मुख्यः प्रधानभूतः, आद्यत्वात् तस्य संबोधनम् ॥
ननु सिद्धेभ्यो हीनगुणत्वाद् अर्हतां कथं वागतिशयशालिनामपि तेषां मुख्यत्वम् । न च
हीनगुणत्वमसिद्धम् । प्रव्रज्यावसरे सिद्धेभ्यस्तेषां नमस्कारकरणश्रवणात् । “काऊण नमुक्कारं
सिद्धाणमभिग्गहं तु सो गिण्हे”१ इति श्रुतकेवलिवचनात् । मैवम् । अर्हदुपदेशेनैव सिद्धाना-
लिये जैन विद्वानोंने कहा है कि अनेकांतवादका मुख्य ध्येय सम्पूर्ण दर्शनोंको समान भावसे देखकर माध्यस्थ
भाव प्राप्त करनेका है । यही धर्मवाद है, और यही शास्त्रोंका मर्म है । अतएव जिस प्रकार पिता अपने
सम्पूर्ण पुत्रोंके ऊपर समभाव रखता है, उसी तरह अनेकान्तवाद सम्पूर्ण नयोंको समान भावसे देखता है ।२
इसलिये जिस प्रकार सम्पूर्ण नदियाँ एक समुद्रमें जाकर मिलती हैं, उसी तरह सम्पूर्ण दर्शनोंका अनेकांत
दर्शनमें समावेश होता है । अतएव जैन दर्शन सब दर्शनोंका समन्वय करता है ।
इस प्रकार कुछ पदार्थोंके विवेचनसे भगवानके यथार्थवाद गुणकी स्तुति करनेके पश्चात् भगवानके
सम्पूर्ण वचनातिशयोंका वर्णन करनेमें अपनी असमर्थता बतलाकर प्रकारान्तरसे औद्धत्यको दूर करनेके लिये
अपने वक्तव्यका उपसंहार करते हैं—
श्लोकार्थ—हे पूज्य शिरोमणि ! आपके सम्पूर्ण गुणोंकी विवेचना करना वेगसे समुद्रको लांघने,
अथवा चन्द्रमाकी चांदनीका पान करनेकी तृष्णाके समान है ।
व्याख्यार्थ—प्रज्ञा आदिसे स्वार्थमें अण् प्रत्यय होकर विभवसे वैभव शब्द बनता है । अथवा विभुके
भाव और कर्मको वैभव कहते हैं । वचनके वैभवको ‘वाग्वैभव’ अर्थात् वचनोंकी उत्कृष्टता कहते हैं । विभु
शब्दका व्यापक अर्थ करनेपर ‘वाग्वैभव’ शब्दका ‘सम्पूर्ण नयोंमें व्यापक’ अर्थ करना चाहिये । पाँचों परमे-
ष्ठियोंमें अर्हंत भगवान् मुख्य हैं, अतएव भगवान्को पूज्य शिरोमणि कहकर संबोधन किया है ।
शङ्का—अर्हत भगवान्में सिद्धोंकी अपेक्षा कम गुण हैं, अर्हंत दीक्षाके समय सिद्धोंको नमस्कार
करते हैं । श्रुतकेवलियोंने कहा भी है—“अर्हंत सिद्धोंको नमस्कार करके दीक्षा ग्रहण करते हैं ।” अतएव
अर्हंतोंको मुख्य नहीं कहना चाहिये । समाधान—अर्हंत भगवान्के उपदेशसे ही सिद्धोंकी पहचान होती
१. छाया-कृत्वा नमस्कारं सिद्धेभ्योऽभिग्रहं तु सोऽग्रहीत् ।
२. यस्य सर्वत्र समता नयेषु तनयेष्विव ।
तस्यानेकांतवादस्य क्व न्यूनाधिकशेमुषी ॥
तेन स्याद्वादमालंब्य सर्वदर्शनतुल्यतां ।
मोक्षोद्देशाविशेषेण यः पश्यति स शास्त्रवित् ॥
यशोविजय—अध्यात्मोपनिषद् ६१, ७० ।
३४
मपि परिज्ञानात् । तथा चार्षम्— “अरहन्तुवएसेणं सिद्धा णज्जंति तेण अरहाई”१ इति । ततः
सिद्धं भगवत एव मुख्यत्वम् । यदि तव वाग्वैभवं निखिलं विवेक्तुमाशास्महे ततः किमित्याह
लङ्घेम इत्यादि । तदा इत्यध्याहार्यम् । तदा जङ्घालतया जाङ्घिकतया वेगवत्तया समुद्रं लङ्घेम
किल समुद्रमिव अतिक्रामेमः । तथा वहेम धारयेम । चन्द्रद्युतीनां चन्द्रमरीचीनां पानं
चन्द्रद्युतिपानम् । तत्र तृष्णा तर्षोऽभिलाष इत यावत् चन्द्रद्युतिपानतृष्णा ताम् । उभयत्रापि
सम्भावने सप्तमी । यथा कश्चिच्चरणचङ्क्रमणवेगवत्तया यानपात्रादि अन्तरेणापि समुद्रं लङ्घि-
तुमीहते यथा च कश्चिचन्द्रमरीचीरमृतमयीः श्रुत्वा चुलुकादिना पातुमिच्छति, न चैतद्
द्वयमपि शक्यसाधनम् । तथा न्यक्षेण भवदीयवाग्वैभववर्णनाकाङ्क्षापि अशक्यारम्भप्रवृत्ति-
तुल्या । आस्तां तावत् तावकीनवचनविभवानां सामस्त्येन विवेचनविधानम्, तद्विषया-
काङ्क्षापि महत् साहसमिति भावार्थः ॥
अथवा 'लघु शोषणे'२ इति धातोर्लङ्घेम शोषयेम समुद्रं जङ्घालतया अतिरंहसा ।
अतिक्रमणार्थलङ्घस्तु प्रयोगे दुर्लभं परस्मैपदमनित्यं वा आत्मनेपदमिति । अत्र च औद्धत्य-
परिहारेऽधिकृतेऽपि यद् आशास्महे इत्यात्मनि बहुवचनमाचार्यः प्रयुक्तवांस्तदिति सूचयति
यद् विद्यन्ते जगति मादृशा मन्दमेधसो भूयांसः स्तोतारः, इति बहुवचनमात्रेण न खलु
अहङ्कारः स्तोतरि प्रभौ शङ्कनीयः । प्रत्युत निरभिमानताप्रासादोपरि पताकारोप एवावधार-
णीयः ॥ इति काव्यार्थः ॥ ३१ ॥ एषु एकत्रिशतिवृत्तेषु उपजातिच्छन्दः ॥
एवं विप्रतारकैः परतीर्थिकैर्व्यामोहमये तमसि निमज्जितस्य जगतोऽभ्युद्धरणेऽव्यभि-
है, अतएव अर्हत ही मुख्य हैं। आगममें कहा भी है— “अर्हंतके उपदेशसे सिद्धोंकी पहचान होती है, अतएव
अर्हंत मुख्य हैं।” जिस प्रकार जहाजके बिना ही पैदल चलकर समुद्रको लांघना असम्भव है, अथवा जिस
प्रकार चन्द्रमाकी अमृतमय किरणोंको केवल चुल्लूसे पान करना असंभव है, उसी तरह आपके वचनोंके
वैभवके वर्णनकी इच्छा करना भी असंभव है। अतएव आपके समस्त वचन-वैभवका वर्णन तो दूर रहा,
उस वर्णन करनेकी इच्छा करना भी महान् साहस है। श्लोकमें 'तदा' शब्दका अध्याहार करना चाहिये।
अथवा 'लघु' धातुका अर्थ शोषण करके 'समुद्रं जंघालतया लंघेम' का अर्थ करना चाहिये—जो
शीघ्रतासे समुद्रका शोषण करना चाहते हैं। अतिक्रमण अर्थमें 'लङ्घि' धातु परस्मैपदी नहीं होती, अतएव
यहाँ शोषण अर्थमें 'लघु' धातुसे परस्मैपदमें 'लंघेम' रूप बनाना चाहिये। अथवा यदि आत्मनेपदको अनित्य
माना जाय, तो अतिक्रमण अर्थमें प्रयुक्त 'लंघि' धातुसे भी यह रूप बन सकता है। श्लोकमें 'आशास्महे'
बहुवचनके प्रयोगसे स्तुतिकारका अहंकार प्रगट नहीं होता । इस प्रयोगसे स्तुतिकारका यही अभिप्राय है
कि संसारमें मेरे समान और भी मन्द बुद्धिवाले स्तुति करनेवाले हैं। अतएव इससे आचार्यका निरभिमान
ही सिद्ध होता है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥३१॥ इन इकतीस श्लोकोंमें उपजाति छन्दका प्रयोग किया गया है।
भावार्थ—हेमचन्द्र आचार्य अपनी लघुता बताते हुए कहते हैं, कि जिस प्रकार पैदल चल कर
समुद्रको लांघना अथवा चुल्लूसे चन्द्रमाकी चाँदनीका पान करना असम्भव है, उसी तरह आपके समस्त
गुणोंका वर्णन करना असम्भव है ।
वंचक अन्य तैर्थिक लोगोंके उपदेशसे व्यामोह रूप अन्धकारमें डूबे हुए जगत्का उद्धार करनेके लिये
२. छाया-अर्हदुपदेशेन सिद्धा ज्ञायन्ते तेनार्हदादिः । विशेषावश्यकभाष्ये ३२१३ ।
१. हैमधातुपारायणे भ्वादिगणे धा. ९८ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ३२ ] स्याद्वादमञ्जरी २६७
चारिवचनतासाध्येनान्ययोगव्यवच्छेदेन भगवत एव सामर्थ्य दर्शयन् तदुपास्तिविन्यस्तमान-
सानां पुरुषाणामौचितीचतुरतां प्रतिपादयति—
इदं तत्त्वातत्त्वव्यतिकरकरालेऽन्धतमसे
जगन्मायाकारैरिव हतपरैर्हा विनिहितम् ।
तदुद्धर्तुं शक्तो नियतमविसंवादिवचन-
स्त्वमेवास्तस्त्रातस्त्वयि कृतसपर्याः कृतधियः ॥३२॥
इदं प्रत्यक्षोपलभ्यमानं जगद् विश्वम् उपचाराद् जगद्वर्ती जनः। हतपरैः हता अधमा
ये परे तीर्थान्तरीया हतपरे तैः। मायाकारैरिव ऐन्द्रजालिकैरिव शाम्बरीयंप्रयोगनिपुणैरिव
इति यावत् । अन्धतमसे निबिडान्धकारे । हा इति खेदे । विनिहितं विशेषेण निहितं स्थापितं
पातितमित्यर्थः । अन्धं करोतीत्यन्धयति, अन्धयतीत्यन्धं तच्च तत्तम्श्चेत्यन्धतमसम् । "सम-
वान्धात् तमसः" इत्यत्प्रत्ययः, तस्मिन् अन्धतमसे । कथंभूतेऽन्धतमसे इति द्रव्यान्यकार-
व्यवच्छेदार्थमाह तत्त्वातत्त्वव्यतिकरकराले । तत्त्वं चातत्त्वं च तत्त्वातत्त्वे तयोर्व्यतिकरो
व्यतिकीर्णता व्यामिश्रता स्वभावविनिमयस्तत्त्वातत्त्वव्यतिकरस्तेन कराले भयङ्करे । यत्रान्ध-
तमसे तत्त्वेऽतत्त्वाभिनिवेशः अतत्त्वे च तत्त्वाभिनिवेश इत्येवंरूपो व्यतिकरः संजायत इत्यर्थः ।
अनेन च विशेषणेन परमार्थतो मिथ्यात्वमोहनीयमेव अन्धतमसम्, तस्यैव ईदृक्षलक्षणत्वात् ।
तथा च ग्रन्थान्तरे प्रस्तुतस्तुतिकारपादाः—
“अदेवे देवबुद्धिर्या गुरुधीरगुरौ च या ।
अधर्मे धर्मबुद्धिश्च मिथ्यात्वं तद्विपर्ययात्”३ ॥
ततोऽयमर्थः । यथा किल ऐन्द्रजालिकास्तथाविधसुशिक्षितपरव्यामोहनकलाप्रपञ्चाः तथा-
विधमौषधीमन्त्रहस्तलाघवादिप्रायं किञ्चित्प्रयुज्य परिपज्जनं मायामये तमसि मज्जयन्ति तथा
दूसरे मतोंका व्यवच्छेद करनेवाले निर्दोष वचनोंकी आपमें ही सामर्थ्य है, अतएव आपकी उपासनामें लगे
हुए मनुष्य ही चतुर हैं—
श्लोकार्थ—इन्द्रजालियोंकी तरह अधम अन्य दर्शनवालोंने इस जगत्को तत्त्व और अतत्त्वके अज्ञान-
से भयानक गाढ़ अन्धकारमें डाल रखा है । अतएव आप ही इस जगत्का उद्धार कर सकते हैं, क्योंकि
आपके वचन विसंवादसे रहित हैं । अतएव हे जगत्के रक्षक ! बुद्धिमान लोग आपकी सेवा करते हैं ।
व्याख्यार्थ—खेद है कि इन्द्रजालियोंके समान अधम अन्य तीर्थिकोंने प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर होनेवाले
इस जगत्को तत्त्व और अतत्त्वके अभेदसे भयानक गाढ़ अंधकारमें डाल रखा है । 'अन्धतमसे' में "सम-
वान्धात् तमसः” सूत्रसे अत् प्रत्यय होता है । यहाँ मिथ्यात्व मोहनीयको अन्धतमस कहा गया है। प्रस्तुत
स्तुतिकारपाद हेमचन्द्र आचार्यने योगशास्त्रमें कहा है—
“अदेवको देव, अगुरुको गुरु, और अधर्मको धर्म माना मिथ्यात्व है ।"
अतएव जिस प्रकार दूसरोंको व्यामोहित करनेकी कलामें निपुण इन्द्रजाली लोग औषधि, मन्त्र,
हाथकी सफाई आदिसे दर्शक लोगोंको मायामय अन्धकारमें डाल देते हैं, वैसे ही अन्य वादी अपनी
१. माया तु शाम्बरी । शम्बराख्यस्यासुरस्य इयं शाम्बरी । अभिधानचिन्तामणी ।
२. हैमसूत्रे ७-३-८० ।
३. हेमचन्द्रकृतयोगशास्त्रे २-३ ।
२६८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ३२
परतीर्थिकैरपि तादृक्प्रकारदुर्धीतकुतर्कयुक्तीरुपदर्श्य जगदिदं व्यामोहमहान्धकारे निक्षिप्त-
मिति । तज्जगदुद्धर्तुं मोहमहान्धकारोपप्लवात् कृष्टुम् नियतं निश्चितम् त्वमेव नान्यः शक्तः
समर्थः । किमर्थमित्थमेकस्यैव भगवतः सामर्थ्यमुपवर्ण्यते इति विशेषणद्वारेण कारणमाह ।
अविसंवादिवचनः । कषच्छेदतापलक्षणपरीक्षात्रयविशुद्धत्वेन फलप्राप्तौ न विसंवदतीत्ये-
वंशीलमविसंवादि । तथाभूतं वचनमुपदेशो यस्यासावविसंवादिवचनः । अव्यभिचारिवागि-
त्यर्थः । यथा च पारमेश्वरी वाग् न विसंवादमासादयति तथा तत्र तत्र स्याद्वादसाधने
दर्शितम् ॥
कषादिस्वरूपं चेत्थमाचक्षते प्रावचनिकाः—
“पाणवहाईआणं पावट्ठाणाण जो उ पडिसेहो ।
झाणज्झयणाईणं जो य विही एस धम्मकसो ॥ १ ॥
बज्झाणुट्ठाणेणं जेण ण बाहिज्जए तयं णियमा ।
संभवइ य परिसुद्धं सो पुण धम्मम्मि छेउत्ति ॥ २ ॥
जीवाइभाववाओ बंधाइपसाहगो इहं तावो ।
एएहिं परिसुद्धो धम्मो धम्मत्तणमुवेइ ॥ ३ ॥१”
तीर्थान्तरीयास्ता हि न प्रकृतपरीक्षात्रयविशुद्धवादिन इति ते महामोहान्धतमस एव जगत् पात-
यितुं समर्थाः, न पुनस्तदुद्धर्तुम् । अतः कारणात् । कुतः कारणात् ? कुमतध्वान्तार्णवान्तःपतित-
भुवनाभ्युद्धारणासाधारणसामर्थ्यलक्षणात् । हे त्रातस्त्रिभुवनपरित्राणप्रवीण । त्वयि काक्वाव-
कुतर्क पूर्ण पुर्ण युक्तियोंसे इस संसारको भ्रममें डाल देते हैं । इसलिये मोह महा अन्धकारसे जगत्को बचानेके
लिये आप ही समर्थ हैं, दूसरा कोई नहीं । क्योंकि आपके वचनोंमें कोई विसंवाद नहीं है । कारण कि आपके
वचन कष, छेद और ताप रूप परीक्षाओंसे विशुद्ध हैं, अतएव फलकी प्राप्तिमें आपके वचनोंमें कोई विरोध
न होनेसे आपके वचन निर्दोष हैं । आपके वचनोंमें विरोधका अभाव स्याद्वादकी सिद्धि करते समय प्रदर्शित
किया जा चुका है ।
धर्मशास्त्रके पंडितोंने कष आदिका स्वरूप निम्न प्रकारसे कहा है—
“प्राणवध आदि पाप स्थानोंके त्याग, और ध्यान, अध्ययन आदिकी विधिको कष कहते हैं । जिन
बाह्य क्रियाओंसे धर्ममें बाधा न आती हो, और जिससे निर्मलताकी वृद्धि हो, उसे छेद कहते हैं । जीवसे
सम्बद्ध दुःख और बन्धको सहन करना ताप है । कष आदिसे शुद्ध धर्म धर्म कहा जाता है ।”
अन्य तैर्थिक लोग कष, छेद और ताप रूप परीक्षाओंसे शुद्ध वचनोंको नहीं बोलते, अतएव वे लोग
संसारको महा मोहांधकारमें गिरानेवाले होते हैं, इसलिये उनके द्वारा संसारका उद्धार नहीं हो सकता ।
अतएव हे भगवन् ! आपमें कुमतरूप समुद्रमें पड़े हुए लोगोंका उद्धार करनेकी असाधारण सामर्थ्य है, इसलिये
१. छाया-प्राणवधादीनां पापस्थानां यस्तु प्रतिषेधः ।
ध्यानाध्ययनादीनां यश्च विधिरेष धर्मकषः ॥ १ ॥
बाह्यानुष्ठानेन येन न बाध्यते तन्नियमात् ।
संभवति च परिशुद्धं स पुनर्धर्मे छेद इति ॥ २ ॥
जीवादिभाववादो बन्धादिप्रसाधक इह तापः ।
एभिः परिशुद्धो धर्मो धर्मत्वमुपैति ॥ ३ ॥
हरिभद्रसूरिकृतपञ्चवस्तुकचतुर्थद्वारे ।
प्रशस्ति ] स्याद्वादमञ्जरी २६९
धारणस्य गम्यमानत्वात् त्वय्येव विषये न देवान्तरे। कृतधियः। करोतिरत्र परिकर्मणि
वर्तते यथा हस्तौ कुरु पादौ कुरु इति। कृता परिकर्मिता तत्त्वोपदेशपेलतत्तच्छास्त्राभ्यासप्रकर्षेण
संस्कृता धीर्बुद्धिर्येषां। ते कृतधियश्चिद्रूपाः पुरुषाः। कृतसपर्याः। प्रादिकं विनाप्यादिकर्मणो
गम्यमानत्वान्। कृता कर्तुमारब्धा सपर्या सेवाविधिर्यैस्ते कृतसपर्याः। आराध्यान्तरपरित्यागेन
त्वय्येव सेवाहेवाकितां परिशीलयन्ति ॥ इति शिखरिणीच्छन्दोऽलंकृतकाव्यार्थः ॥ ३२ ॥
॥ समाप्ता चेयमन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकास्तवनटीका ॥
टीकाकारस्य प्रशस्तिः ।
येषामुज्ज्वलहेतुहेतिरुचिरः प्रामाणिकाध्वस्पृशां
हेमाचार्यसमुद्भवस्तवनभूरर्थः समर्थः सखा।
तेषां दुर्नयदस्युसम्भवभयास्पृष्टात्मनां सम्भव-
त्यायासेन विना जिनागमपुरप्राप्तिः शिवश्रीप्रदा ॥ १ ॥
चातुर्विद्यमहोदधेर्भगवतः श्रीहेमसुरेर्गिरां
गम्भीरार्थविलोचने यदभवद् दृष्टिः प्रकृष्टा मम।
द्राघीयः समयादराग्रहपराभूतप्रभूतामयं
तन्नूनं गुरुपादरेणुकणिकासिद्धाञ्जनस्योर्जितम् ॥ २ ॥
आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। अतएव तत्त्वोपदेश और शास्त्राभ्याससे प्रकृष्ट बुद्धिवाले विद्वान्
लोग आपकी ही सेवा करते हैं, अन्य देवोंकी नहीं। जैसे 'हाथोंको कर' ( हस्तौ कुरु ), 'पैरोंको कर' (पादौ
कुरु ) यहाँ 'कृ' धातु परिकर्म अर्थमें प्रयुक्त हुई है, वैसे ही 'कृतधियः' पदमें 'कृ' धातुका परिकर्म अर्थ है।
'प्र' आदि उपसर्गके बिना भी 'कृ' धातुका अर्थ प्रारम्भ करना होता है, इसलिये 'कृतसपर्याः' में कृतका
अर्थ प्रारम्भ करना है ॥ यह शिखरिणी छन्द श्लोकका अर्थ है ॥ ३२ ॥
भावार्थ—वस्तुका सर्वथा एकान्त रूपसे प्रतिपादन करनेवाले एकान्तवादियोंने इस जगत्को
अज्ञान-अन्धकारमें डाल रखा है। अतएव सम्पूर्ण एकान्तवादोंका समन्वय करनेवाले अनेकान्तवादसे ही
इस जगत्का उद्धार हो सकता है। इसलिये अनेकान्तवादका प्रतिपादन करनेवाले जिन भगवान्में ही
जगतके उद्धार करनेकी असाधारण सामर्थ्य है।
इति अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिका टीका
टीकाकारकी प्रशस्ति
प्रामाणिक मार्गको अनुकरण करनेवाले जिन लोगोंके उज्ज्वल हेतुरूपी शस्त्रोंसे सुन्दर हेमचन्द्रा-
चार्यकी स्तुतिसे उत्पन्न होनेवाले अर्थरूपी समर्थ मित्र विद्यमान है, वे लोग दुर्नयरूपी लुटेरोंसे नहीं
डरते, और वे विना प्रयत्नके ही मोक्ष सुखके देनेवाले जिनागमरूपी नगरको प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥
चारों विद्याओंके समुद्र भगवान् श्री हेमचन्द्राचार्यकी वाणीके गम्भीर अर्थको अवलोकन करनेमें
जो मेरी प्रकृष्ट बुद्धि हुई है, और सतत बहुत समयके आदरसे जो विघ्नोंका नाश हुआ है, वह सब गुरु
महाराजके चरणोंकी धूलिरूप सिद्धांजनका फल है ॥ २ ॥
) ति(12) मे(13) नां(14)
Total = 14 syllables!
1: दृब् (-)
2: धां (-)
3: म (u)
4: यान् (-)
5: ति (u)
6: म (u)
7: जि (u)
8: न (u? followed by स्तु, so न is -!)
9: स्तु (u)
10: ति (u? followed by वृ, so ति is u!)
11: वृत् (-)
12: ति (u)
13: मे (-)
14: नां (-)
Wait:
7: जि (u)
8: न ( - because of स्तु)
9: स्तु (u)
-> u - u (ज-गण!)
10: ति (u)
11: वृत् (-)
12: ति (u)
-> u - u (ज-गण!)
13: मे (-)
14: नां (-)
-> गौ (- -)!
WOW! That is EXACTLY Vasantatilakā!
Let's verify:
10 = ति (u)
11 = वृत् (-)
12 = ति (u)
13 = मे (-)
14 = नां (-)
Now let's apply this exact same meter to line 2:
10 must be u!
11 must be -!
12 must be u!
1
हेमचन्द्राचार्यविरचिता
अयोगव्यवच्छेदिका
महावीर भगवान्की स्तुति—
अगम्यमध्यात्मविदामवाच्यं वचस्विनामक्षवतां परोक्षम् ।
श्रीवर्धमानाभिधमात्मरूपमहं स्तुतेर्गोचरमानयामि ॥¹ १ ॥
अर्थ—मैं (हेमचन्द्र) अध्यात्मवेत्ताओंके अगम्य, पंडितोंके अनिर्वचनीय, इन्द्रिय-ज्ञानवालोंके परोक्ष,
और परमात्मस्वरूप ऐसे श्रीवर्धमान भगवान्को अपनी स्तुतिका विषय बनाता हूँ ।
भगवान्के गुणोंके स्तवन करनेकी असमर्थता—
स्तुतावशक्तस्तव योगिनां न किं गुणानुरागस्तु ममापि निश्चलः ।
इदं विनिश्चित्य तव स्तवं वदन्न बालिशोऽप्येष जनोऽपराध्यति ॥² २ ॥
अर्थ—हे भगवन् ! आपकी स्तुति करनेमें योगी लोग भी समर्थ नहीं हैं । परन्तु असमर्थ होते
हुए भी योगी लोगोंने आपके गुणोंमें अनुराग होनेके कारण आपकी स्तुति की है। इसी प्रकार मेरे मनमें भी
आपके गुणोंमें दृढ़ अनुराग है, इसीलिये मेरे जैसा मूर्ख मनुष्य आपकी स्तुति करता हुआ अपराधका भागी
नहीं कहा जा सकता ।
स्तुतिकार अपनी लघुता बताते हैं—
क्व सिद्धसेनस्तुतयो महार्था अशिक्षितालापकला क्व चैषा ।
तथापि यूथाधिपतेः पथस्थः स्खलद्गतिस्तस्य शिशुर्न शोच्यः ॥ ३ ॥
अर्थ—कहाँ गम्भीर अर्थवाली सिद्धसेन दिवाकरकी स्तुतियाँ, और कहाँ अशिक्षित संभाषणकी
मेरी यह कला ! फिर भी जिस प्रकार बड़े-बड़े हाथियोंके मार्गपरसे जानेवाला हाथीका बच्चा मार्गभ्रष्ट
होनेके कारण शोचनीय नहीं होता, उसी प्रकार यदि मैं भी सिद्धसेन जैसे महान् आचार्योंका अनुकरण
करते हुए कहीं स्खलित हो जाऊँ, तो शोचनीय नहीं हूँ ।
आपने जिन दोषोंको नाश कर दिया है, उन्हीं दोषोंको परवादियोंके देवोंने आश्रय दिया है—
जिनेन्द्र यानेव विबाधसे स्म दुरंतदोषान् विविधैरुपायैः ।
त एव चित्रं त्वदसूययेव कृताः कृतार्थाः परतीर्थनाथैः ॥³ ४ ॥
अर्थ—हे जिनेन्द्र ! जिन कठिन दोषोंको आपने नाना उपायोंके द्वारा नाश कर दिया है, आश्चर्य
है कि उन्हीं दोषोंको दूसरे मतावलम्बियोंके गुरुओंने आपकी ईर्ष्यासे ही कृतार्थ कर लिया है ।
१. कीर्त्या महत्या भुवि वर्धमानं त्वां वर्धमानं स्तुतिगोचरत्वं ।
निनीषवः स्मो वयमद्य वीरं विशीर्णदोषाशयपाशबन्धम् ॥ युक्त्यनुशासन १ ।
२. गुणाम्बुधेर्विप्रुषमप्यजस्रं नाखण्डलः स्तोतुमलं तवर्षेः ।
प्रागेव मादृक्किमुतातिभक्तिर्मा बालमालापयतीदमित्थम् ॥ स्वयंभूस्तोत्र ३०; १५ ।
तथा भक्तामर ३-६; कल्याणमन्दिर ३-६; द्वा. द्वात्रिंशिका ५-३१ ।
३. को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैस्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश ।
दोषैरुपात्तविविधाश्रयजातगर्वैः स्वप्नांतरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥ भक्तामर २७ ।