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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 458 में से

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पृष्ठ 320

२६८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ३२
परतीर्थिकैरपि तादृक्प्रकारदुर्धीतकुतर्कयुक्तीरुपदर्श्य जगदिदं व्यामोहमहान्धकारे निक्षिप्त-
मिति । तज्जगदुद्धर्तुं मोहमहान्धकारोपप्लवात् कृष्टुम् नियतं निश्चितम् त्वमेव नान्यः शक्तः
समर्थः । किमर्थमित्थमेकस्यैव भगवतः सामर्थ्यमुपवर्ण्यते इति विशेषणद्वारेण कारणमाह ।
अविसंवादिवचनः । कषच्छेदतापलक्षणपरीक्षात्रयविशुद्धत्वेन फलप्राप्तौ न विसंवदतीत्ये-
वंशीलमविसंवादि । तथाभूतं वचनमुपदेशो यस्यासावविसंवादिवचनः । अव्यभिचारिवागि-
त्यर्थः । यथा च पारमेश्वरी वाग् न विसंवादमासादयति तथा तत्र तत्र स्याद्वादसाधने
दर्शितम् ॥
कषादिस्वरूपं चेत्थमाचक्षते प्रावचनिकाः—
“पाणवहाईआणं पावट्ठाणाण जो उ पडिसेहो ।
झाणज्झयणाईणं जो य विही एस धम्मकसो ॥ १ ॥
बज्झाणुट्ठाणेणं जेण ण बाहिज्जए तयं णियमा ।
संभवइ य परिसुद्धं सो पुण धम्मम्मि छेउत्ति ॥ २ ॥
जीवाइभाववाओ बंधाइपसाहगो इहं तावो ।
एएहिं परिसुद्धो धम्मो धम्मत्तणमुवेइ ॥ ३ ॥१”
तीर्थान्तरीयास्ता हि न प्रकृतपरीक्षात्रयविशुद्धवादिन इति ते महामोहान्धतमस एव जगत् पात-
यितुं समर्थाः, न पुनस्तदुद्धर्तुम् । अतः कारणात् । कुतः कारणात् ? कुमतध्वान्तार्णवान्तःपतित-
भुवनाभ्युद्धारणासाधारणसामर्थ्यलक्षणात् । हे त्रातस्त्रिभुवनपरित्राणप्रवीण । त्वयि काक्वाव-
कुतर्क पूर्ण पुर्ण युक्तियोंसे इस संसारको भ्रममें डाल देते हैं । इसलिये मोह महा अन्धकारसे जगत्को बचानेके
लिये आप ही समर्थ हैं, दूसरा कोई नहीं । क्योंकि आपके वचनोंमें कोई विसंवाद नहीं है । कारण कि आपके
वचन कष, छेद और ताप रूप परीक्षाओंसे विशुद्ध हैं, अतएव फलकी प्राप्तिमें आपके वचनोंमें कोई विरोध
न होनेसे आपके वचन निर्दोष हैं । आपके वचनोंमें विरोधका अभाव स्याद्वादकी सिद्धि करते समय प्रदर्शित
किया जा चुका है ।
धर्मशास्त्रके पंडितोंने कष आदिका स्वरूप निम्न प्रकारसे कहा है—
“प्राणवध आदि पाप स्थानोंके त्याग, और ध्यान, अध्ययन आदिकी विधिको कष कहते हैं । जिन
बाह्य क्रियाओंसे धर्ममें बाधा न आती हो, और जिससे निर्मलताकी वृद्धि हो, उसे छेद कहते हैं । जीवसे
सम्बद्ध दुःख और बन्धको सहन करना ताप है । कष आदिसे शुद्ध धर्म धर्म कहा जाता है ।”
अन्य तैर्थिक लोग कष, छेद और ताप रूप परीक्षाओंसे शुद्ध वचनोंको नहीं बोलते, अतएव वे लोग
संसारको महा मोहांधकारमें गिरानेवाले होते हैं, इसलिये उनके द्वारा संसारका उद्धार नहीं हो सकता ।
अतएव हे भगवन् ! आपमें कुमतरूप समुद्रमें पड़े हुए लोगोंका उद्धार करनेकी असाधारण सामर्थ्य है, इसलिये
१. छाया-प्राणवधादीनां पापस्थानां यस्तु प्रतिषेधः ।
ध्यानाध्ययनादीनां यश्च विधिरेष धर्मकषः ॥ १ ॥
बाह्यानुष्ठानेन येन न बाध्यते तन्नियमात् ।
संभवति च परिशुद्धं स पुनर्धर्मे छेद इति ॥ २ ॥
जीवादिभाववादो बन्धादिप्रसाधक इह तापः ।
एभिः परिशुद्धो धर्मो धर्मत्वमुपैति ॥ ३ ॥
हरिभद्रसूरिकृतपञ्चवस्तुकचतुर्थद्वारे ।