स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
१५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
अथोत्तराद्धं व्याख्यातुमुपक्रम्यते । तत्र च बाह्यार्थनिरपेक्षं ज्ञानाद्वैतमेव ये बौद्धविशेषा
मन्वते तेषां प्रतिक्षेपः । तन्मतं चेदम् । ग्राह्यग्राहकादिकल्पनारहितं निष्प्रपञ्चं ज्ञानमात्रं परमार्थ-
सत् । बाह्यार्थस्तु विचारमेव न क्षमते । तथाहि । कोऽयं बाह्योऽर्थः ? किं परमाणुरूपः स्थूला-
वयविरूपो वा ? न तावत् परमाणुरूपः, प्रमाणाभावात् । प्रमाणं हि प्रत्यक्षमनुमानं वा ?
न तावत्प्रत्यक्षं तत्साधनबद्धकक्षम् । तद्धि योगिनां¹ स्यात् अस्मदादीनां वा ? नाद्यम्,
अत्यन्तविप्रकृष्टतया श्रद्धामात्रगम्यत्वात् । न द्वितीयम्, अनुभवबाधितत्वात् । न हि वयमयं
परमाणुरयं परमाणुरिति स्वप्नेऽपि प्रतीमः, स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमित्येवमेव नः सदैव संवेदनो-
दयात् । नाप्यनुमानेन तत्सिद्धिः, अणूनामतीन्द्रियत्वेन तैः सहाविनाभावस्य क्वापि लिङ्गे
ग्रहीतुमशक्यत्वात् ॥
किञ्च, अमी नित्या अनित्या वा स्युः । नित्याश्चेत्, क्रमेणार्थक्रियाकारिणो युगपद्वा ?
न क्रमेण, स्वभावभेदेनानित्यत्वापत्तेः । न युगपत्, एकक्षण एव कृत्स्नार्थक्रियाकरणात् क्षणान्तरे
तदभावादसत्त्वापत्तिः । अनित्याश्चेत्, क्षणिकाः कालान्तरस्थायिनो वा ? क्षणिकाश्चेत्,
सहेतुका निर्हेतुका वा ? निर्हेतुकाश्चेत्, नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा स्यात्, निरपेक्षत्वात् ।
अपेक्षातो हि कादाचित्कत्वम् । सहेतुकाश्चेत्, किं तेषां स्थूलं किंचित् कारणं परमाणवो
( ४ ) ज्ञानाद्वैतवादी ( पूर्वपक्ष ) — ग्राह्य, ग्राहक आदिसे रहित निष्प्रपंच ज्ञान मात्र ही परमार्थसत्
है, क्योंकि बाह्य पदार्थोंका अभाव है । हम पूछते हैं कि परमाणुओंके समूहको बाह्य पदार्थ कहते हैं, अथवा
स्थूल अवयवीरूप एक पिंडको ? यदि परमाणुओंके समूहको बाह्य अर्थ कहते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि
प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाणसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । योगिप्रत्यक्ष अत्यन्त परोक्ष
है, और वह केवल श्रद्धाका ही विषय है, इसलिये योगिप्रत्यक्षसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं
होता । इन्द्रियप्रत्यक्षसे भी बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि इन्द्रियप्रत्यक्षसे परमाणुरूप सूक्ष्म
पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उससे केवल स्तंभ ( खंभा ) और कुंभ ( घड़ा ) रूप स्थूल पदार्थोंका ही
ज्ञान हो सकता है । अनुमानसे भी परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय
पदार्थ हैं, इसलिये परमाणुरूप साध्यका प्रत्यक्षसे ज्ञान न होनेके कारण, साध्यके अविनाभावी हेतुका भी
ज्ञान नहीं हो सकता ।
तथा, परमाणु नित्य हैं, या अनित्य ? यदि नित्य हैं तो क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, अथवा एक
साथ ? यदि परमाणु नित्य होकर क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि परमाणुओंमें क्रमसे
अर्थक्रिया माननेमें परमाणुओंमें स्वभावका भेद मानना पड़ेगा । तथा परमाणुओंमें स्वभाव-भेद माननेसे
परमाणुओंको नित्य नहीं कह सकते । परमाणु एक साथ भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते । क्योंकि यदि परमाणु
एक साथ समस्त अर्थक्रिया करने लगें, तो विश्वमें जो क्रम-क्रमसे परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, वह नहीं
होना चाहिये । तथा समस्त अर्थक्रियाके एक ही समयमें समाप्त हो जानेसे दूसरे क्षणमें अर्थक्रियाका अभाव
होगा, इसलिये परमाणुओंका अस्तित्व ही नष्ट हो जायगा । यदि परमाणु अनित्य हैं, तो वे क्षणिक हैं,
अथवा एक क्षणके बाद भी रहते हैं ? यदि परमाणु क्षणिक हैं, तो वे किसी कारणसे उत्पन्न हुए हैं ? या
किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं ? यदि परमाणु किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं तो उन परमाणुओंका
या तो नित्यकाल अस्तित्व होगा ( विनश्वर न होनेसे वे क्षणिक नहीं होंगे ) ? अथवा नित्यकाल उनका
अभाव होगा ( उत्पादक, उपादान और निमित्त कारणोंका सदा अभाव होनेसे उन परमाणुओंका सभी
कालोंमें अभाव होगा ) ? क्योंकि निर्हेतुक पदार्थ उत्पत्तिके कारणोंकी अपेक्षा नहीं रखते । कादाचित्कत्व —
अनित्यत्व — उत्पादक कारणोंकी अपेक्षा रखने ही होता है । ( तात्पर्य यह है कि परमाणुओंको अनित्य भी
१. भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति—न्यायविन्दौ १-११.
वा ? न स्थूलं, परमाणुरूपस्यैव बाह्यार्थस्याङ्गीकृतत्वात् । न च परमाणवः ते हि सन्तोऽसन्तः
सद्सन्तो वा स्वकार्याणि कुर्युः । सन्तश्चेत्, किमुत्पत्तिक्षण एव क्षणान्तरे वा ? नोत्पत्तिक्षणे,
तदानीमुत्पत्तिमात्रव्यग्रत्वात् तेषाम् । अथ “भूतिर्येषां क्रिया सैव कारणं सैव चोच्यते” इति
वचनाद् भवनमेव तेषामपरोत्पत्तौ कारणमिति चेत्, एवं तर्हि रूपाणवो रसाणूनाम्, ते च
तेषामुपादानं स्युः, उभयत्रभवनाविशेषात् । न च क्षणान्तरे, विनष्टत्वात् । अथासन्तस्ते तदु-
त्पादकाः, तर्हि एकं स्वसत्ताक्षणमपहाय सदा तदुत्पत्तिप्रसङ्गः, तदसत्त्वस्य सर्वदाऽविशेषात् ।
सदसत्पक्षस्तु “प्रत्येकं यो भवेद्दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः” इति वचनाद्विरोधान्नात एव ।
तन्नाणवः क्षणिकाः ॥
नापि कालान्तरस्थायिनः । क्षणिकपक्षसदृक्षयोगक्षेमत्वात् । किञ्च, अमी कियत्काल-
स्थायिनोऽपि किमर्थक्रियापराङ्मुखाः तत्कारिणो वा ? आद्ये खपुष्पवदसत्त्वापत्तिः । उद्गद्वि-
कल्पे किमसद्रूपं सदरूपमुभयरूपं वा ते कार्यं कुर्युः ? असद्रूपं चेत्, शशविषाणादेरपि किं न
मानना और निरपेक्ष भी मानना उचित नहीं । क्योंकि अनित्य पदार्थ सापेक्ष होता है और नित्य पदार्थ
निरपेक्ष होता हैं, अर्थात् अपने उत्पादक कारणोंकी अपेक्षा वह नहीं रखता ) । यदि परमाणु सहेतुक हैं
तो कोई स्थूल कारण परमाणुओंका हेतु है, अथवा स्वयं परमाणु ही परमाणुओंमें हेतु है ? यदि स्थूल
पदार्थको परमाणुओंका कारण माना जाय, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि आप स्थूल बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व
स्वीकार नहीं करते—आप लोगोंने बाह्य पदार्थोंको परमाणुरूप ही माना हैं । तथा स्वयं परमाणु
भी परमाणुओंमें कारण नहीं हैं। क्योंकि हम पूछते हैं कि ये परमाणु सत्, असत्, अथवा सत्-असत् होकर
अपने कार्यको करते हैं ? यदि परमाणु सत्रूप होकर अपने कार्यको करें तो परमाणु उत्पत्तिके समय ही
अपना कार्य करते हैं, अथवा उत्पत्तिके दूसरे क्षणमें ? परमाणु उत्पत्तिके समय अपना कार्य नहीं करते,
क्योंकि उस समय परमाणु अपनी उत्पत्तिमें ही व्यग्र रहते हैं। यदि कहो कि “उत्पन्न होना ही
क्रिया है, और क्रिया ही कारण है” इसलिये परमाणुओंकी उत्पत्ति होना ही दूसरोंकी उत्पत्ति होनेमें
कारण है; यह भी ठीक नहीं। क्योंकि यदि उत्पन्न होना ही उत्पत्तिमें कारण मान लिया जाय, तो
रूपके परमाणुओंको रसके परमाणुओंकी उत्पत्तिमें कारण मानना चाहिये, इसलिये रूपके परमाणुओंको
रस-परमाणुओंका उपादान कारण कहना चाहिये । क्योंकि जैसे एक परमाणु स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे
परमाणुओंकी उत्पत्ति कर सकता है, वैसे ही रूप और रसके परमाणु भी साथ उत्पन्न होते हुए एक दूसरेकी
उत्पत्तिमें सहायक हो सकते हैं। अतएव रूप-परमाणु और रस-परमाणुओंको अपनी-अपनी उत्पत्तिमें पृथक्
कारण न मानकर रूपके परमाणुओंकी रसके परमाणुओंसे उत्पत्ति माननी चाहिये । यदि कहो कि परमाणु
सत्रूप होकर दूसरे क्षणमें अपना कार्य करते हैं, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि परमाणु उत्पत्तिके बाद
ही नष्ट हो जाते हैं। यदि कहो कि परमाणु असत्रूप होकर अपना कार्य करते हैं ( दूसरा पक्ष ) तो यह
भी ठीक नहीं । क्योंकि अपनी उत्पत्तिके समयको छोड़कर सदा ही इन परमाणुओंको अपना कार्य करते
रहना चाहिये; कारण कि असत् परमाणु सदा एकसे रहते हैं । तथा, सत्-असत्रूप होकर भी परमाणु
कार्य नहीं करते (तीसर पक्ष ), क्योंकि “जो दोष सत् और असत् एक-एक स्वभावके अलग-अलग
माननेमें कहे गये हैं, वे सब दोष सत्-असत् दोनों स्वभावोंको एक साथ माननेमें भी आते हैं।" इसलिये
परमाणु सत् और असत्रूप होकर भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते । अतएव परमाणु क्षणिक नहीं हैं ।
तथा, अनित्य परमाणु एक क्षणके बाद दूसरे क्षणमें स्थित रह कर भी ( एक क्षणसे अधिक, परन्तु
परिमित समय तक रहनेवाले ) अर्थक्रिया नहीं कर सकते । क्योंकि परमाणुओंको क्षणिक मानकर अर्थ-
क्रियाकारी माननेमें जो दोष आते हैं, वे यहाँ भी आते हैं। तथा, एक क्षणके बाद रहनेवाले परमाणु अर्थ-
क्रिया करते हैं, अथवा नहीं ? यदि ये परमाणु अर्थक्रिया नहीं करते, तो आकाशके फूलकी तरह इन परमाणुओं-
१५८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
करणम्। सद्रूपं चेत्, सतोऽपि करणेऽनवस्था। तृतीयभेदस्तु प्रागवद्विरोधदुर्गन्धः। तन्नाणु-
रूपोऽर्थः सर्वथा घटते ॥
नापि स्थूलावयविरूपः। एकपरमाण्वसिद्धौ कथमनेकतत्सिद्धिः। तदभावे च तत्प्रचय-
रूपः स्थूलावयवी वाङ्मात्रम्। किञ्च, अयमनेकावयवाधार इष्यते। ते चावयवा यदि
विरोधिनः, तर्हि नैकः स्थूलावयवी, विरुद्धधर्माध्यासात्। अविरोधिनश्चेत्, प्रतीतिबाधः।
एकस्मिन्नेव स्थूलावयविनि चलाचलरक्तारक्तावृतानावृतादिविरुद्धावयवानामुपलब्धेः। अपि
च, असौ तेषु वर्तमानः कात्स्न्र्येन एकदेशेन वा वर्तते ? कात्स्न्र्येन वृत्तावेकस्मिन्नेवावयवे
परिसमाप्तत्वादनेकावयववृत्तित्वं न स्यात्। प्रत्यवयवं कात्स्न्र्येन वृत्तौ चावयविबहुत्वापत्तिः।
एकदेशेन वृत्तौ च तस्य निरंशत्वाभ्युपगमविरोधः। सांशत्वे वा तैऽशास्ततो भिन्नाः अभिन्ना
वा ? भिन्नत्वे पुनरप्यनेकांशवृत्तेरेकस्य कात्स्न्र्यैकदेशविकल्पानतिक्रमादनवस्था। अभिन्नत्वे
न केचिदंशाः स्युः ॥
इति नास्ति बाह्योऽर्थः कश्चित्। किन्तु ज्ञानमेवेदं सर्वं नीलाद्याकारेण प्रतिभाति।
बाह्यार्थस्य जडत्वेन प्रतिभासायोगात्। यथोक्तम् “स्वाकारबुद्धिजनका दृश्या नेन्द्रियगोचराः” ।
का अभाव मानना चाहिये। क्योंकि अर्थक्रियाकारित्व ही वस्तुका लक्षण है। यदि एक क्षणके बाद रहनेवाले
परमाणु अर्थक्रिया करते हैं, तो वह अर्थक्रिया सद्रूप है, असत्रूप, अथवा उभयरूप ? यदि परमाणुओंका
कार्य असद्रूप है, तो परमाणुओंको असद्रूप खरगोशके सींगोंकी उत्पत्तिमें भी कारण होना चाहिये।
यदि यह कार्य सद्रूप है, तो इसका यह अर्थ हुआ कि जो कार्य पहलेसे मौजूद था, उस कार्यको ही
परमाणुओंने किया है। अतएव इस मान्यतामें अनवस्था दोष आता है। अतएव सत् और असद्रूप कार्यके
न बननेसे सत्-असद्रूप कार्य भी नहीं बन सकता। अतएव परमाणु बाह्य पदार्थ नहीं हो सकते।
बाह्य पदार्थोंको स्थूल अवयवीरूप भी स्वीकार नहीं कर सकते। क्योंकि जब एक परमाणुरूप
बाह्य पदार्थोंकी सिद्धि नहीं होती, तो अनेक परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंकी कैसे सिद्धि हो सकती है ? अतएव
परमाणुओंके अभावमें परमाणुप्रचयरूप स्थूल अवयवीका सद्भाव होता है, यह कहना केवल कथन मात्र है।
तथा, अवयवीके अनेक अवयव आधार माने गये हैं। ये अवयव परस्पर विरोधी हैं, या अविरोधी ? यदि
ये परस्पर विरोधी हैं, तो इनसे एक स्थूल अवयवी ही नहीं बन सकता, क्योंकि अवयवीमें विरोधी धर्मोका
अध्यारोप हो जाता है। यदि इन परमाणुओंको परस्पर अविरोधी मानो, तो यह अनुभवके विरुद्ध है, क्योंकि
हमें प्रत्यक्षसे एक ही स्थूल अवयवीमें चल, अचल, रक्त, अरक्त, आवृत्त, अनावृत्त आदि विरुद्ध धर्म देखनेमें
आते हैं। तथा, अवयवी अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहता है, अथवा एक देशसे ? यदि अवयवी अवयवोंमें
सम्पूर्ण रूपसे रहते हैं, तो सम्पूर्ण अवयवीके एक अवयवमें समाप्त हो जानेसे अवयवी अनेक अवयवोंमें नहीं
रह सकता। यदि अवयवी अनेक अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहे भी, तो अनेक अवयवी मानने पड़ेंगे। यदि
अवयवी अवयवोंमें एक देशसे रहे, तो अवयवमें अंशोंकी कल्पना होनेसे उसे निरंश एक अवयवी नहीं कह
सकते; परन्तु अवयवी निरंश होता है। यदि कहो कि अवयवी अंश सहित होकर अवयवोंमें रहता है, तो ये
अंश अवयवोंसे भिन्न हैं, या अभिन्न ? यदि अंश अवयवसे भिन्न हैं, तो प्रश्न होगा, कि अवयवी
अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहते हैं, अथवा एक देशसे ? इस तरह अनवस्था माननी पड़ेगी। यदि अंश
अवयवसे अभिन्न हैं, तो अवयवोंको छोड़कर अवयवीके अंशोंका पृथक् अस्तित्व नहीं मान सकते।
इस प्रकार परमाणुरूप या स्थूलरूप बाह्य अर्थका सद्भाव नहीं है; किन्तु जो कुछ नील आदि
पदार्थोंके आकार रूपसे प्रतिभासित होता है, वह सब ज्ञान ही है। क्योंकि जड़ अर्थात् अचेतन या ज्ञानहीन
बाह्यार्थका अपने आपको जानना घटित नहीं होता। कहा भी है—“अपने आकाररूप बुद्धिको उत्पन्न करने-
अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५६
अलङ्कारकारेणोप्युक्तम्—
“यदि संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ।
न चेत् संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ॥”
यदि बाह्योऽर्थो नास्ति, किंविषयस्तर्ह्ययं घटपटादिप्रतिभासः इति चेत्, ननु निरालम्बन
एवायमनादिवितथवासनाप्रवर्तितः, निर्विषयत्वात्, आकाशकेशज्ञानवत्, स्वप्नज्ञानवद् वेति ।
अत एवोक्तम्—
“नान्योऽनुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः ।
ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वयं सैव प्रकाशते ॥²
बाह्यो न विद्यते ह्यर्थो यथा बालैर्विकल्प्यते ।
वासनालुठितं चित्तमर्थाभासे प्रवर्तते” ॥ इति ॥
तदेतत्सर्वमवद्यम् । ज्ञानमिति हि क्रियाशब्दः । ततो ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं, ज्ञप्तिर्वा
ज्ञानमिति । अस्य च कर्मणा भाव्यं, निर्विषयाया ज्ञप्तेरघटनात् । न चाकाशकेशादौ निर्विष-
यमपि दृष्टं ज्ञानमिति वाच्यम्, तस्याप्येकान्तेन निर्विषयत्वाभावात् । न हि सर्वथागृहीत-
वाले इन्द्रियगोचर दृश्य पदार्थ अस्तिरूप नहीं हैं ।”
अलंकारकार ( प्रज्ञाकरगुप्त ) ने भी कहा है—
“यदि नील पदार्थका अनुभव किया जाता है तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे कह
सकते हैं ? यदि नील पदार्थका अनुभव नहीं किया जाता तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे
कह सकते हैं ।” ( जो जिसका होता है वह उसका अनुभव कर सकता है । नील पदार्थका अनुभव ज्ञानके
द्वारा किया जाता है तो वह नील पदार्थ ज्ञानका—ज्ञानरूप—होना चाहिये । नील पदार्थका ज्ञान नहीं
होता तो उसे बाह्य पदार्थ नहीं कह सकते । जिस पदार्थका किसी भी हालतमें ज्ञान होता ही नहीं, उसका
बाह्य अस्तित्व नहीं हो सकता, और जिसका अस्तित्व होता है उसका किसी न किसी प्रकारसे ज्ञान
होता ही है ) ।
शंका—यदि बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं है तो घट, पट आदिका ज्ञान किस प्रकार होता है ?
समाधान—जिस प्रकार आकाशकेशरूप बाह्य पदार्थके अभावमें आकाशकेशका ज्ञान होता है, अथवा
जिसप्रकार स्वप्नज्ञानका विषय बने हुए पदार्थका वस्तुतः सद्भाव न होनेपर भी स्वप्नमें उसका ज्ञान होता
है, उसी तरह घट, पट आदि बाह्य पदार्थोंका अभाव होनेसे, आलंबनरहित होनेपर भी, अनादि मिथ्या-
वासनाके कारण घट, पट आदिका ज्ञान होता है । इसलिए कहा है—
“जिसका बुद्धिके द्वारा अनुभव किया जाता है, वह बुद्धिसे भिन्न नहीं होता । अनुभव बुद्धिसे भिन्न
नहीं है । ग्राह्य-ग्राहक ( अनुभाव्य-अनुभावक ) भावसे रहित होनेसे बुद्धि स्वयं प्रकाशित होती है । मूर्खो
द्वारा कल्पित बाह्य अर्थ विद्यमान नहीं है । ( अनादि ) वासनासे प्रतिहत चित्त ( बुद्धि ) अर्थाभास ( अयथार्थ
अर्थ ) में प्रवृत्त होता है ।”
( ४ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । ज्ञान शब्द क्रियाका द्योतक है । जिसके द्वारा जाना जाय, अथवा
जानने मात्रको ज्ञान कहते हैं । ज्ञान ( क्रिया ) के कोई कर्म अवश्य होना चाहिये, क्योंकि ज्ञान निर्विषय नहीं
होता । यदि आकाशमें निर्विषय केशज्ञानकी तरह मिथ्या ज्ञानको ही ज्ञानका विषय मानो, तो यह भी ठीक
नहीं । क्योंकि आकाशमें केशज्ञान भी एकान्त रूपसे निर्विषय नहीं है । कारण कि जिसने कभी वास्तविक
१. प्रज्ञाकरगुप्तकृतः प्रमाणवार्तिकालङ्काराख्यो बौद्धग्रन्थः ।
२. प्रमाणवार्तिके ३-३२७ ।
१६० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
सत्यकेशज्ञानस्य तत्प्रतीतिः। स्वप्नज्ञानमप्यनुभूतदृष्टाद्यर्थविषयत्वान्न निरालम्बनम्। तथा च
महाभाष्यकारः—
"अणुहूयदिट्ठचिंतिय सुयपयइवियारदेवयाणूवा।
सुमिणस्स निमित्ताई पुण्णं पावं च णाभावो"¹
यश्च ज्ञानविषयः स बाह्योऽर्थः। भ्रान्तिरियमिति चेत् चिरं जीव। भ्रान्तिर्हि मुख्येऽर्थे
क्वचिद् दृष्टे सति करणापाटवादिनान्यत्र विपर्यस्तग्रहणे प्रसिद्धा, यथा शुक्तौ रजतभ्रान्तिः।
अर्थक्रियासमर्थेऽपि वस्तुनि यदि भ्रान्तिरुच्यते तर्हि प्रलीना भ्रान्ताभ्रान्तव्यवस्था। तथा च
सत्यमेतद्वचः—
"आशामोदकतृप्ता ये ये चास्वादितमोदकाः।
रसवीर्यविपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥”
न चामून्यर्थदूषणानि स्याद्वादिनां बाधां विदधते, परमाणुरूपस्य स्थूलावयविरूपस्य
चार्थस्याङ्गीकृतत्वात्। यच्च परमाणुपक्षखण्डनेऽभिहितं प्रमाणाभावादिति, तदसत् तत्कार्याणां
केशोंका ज्ञान नहीं किया है, उसे आकाशमें मिथ्या केशज्ञान नहीं हो सकता। इसी प्रकार स्वप्नमें भी जाग्रत्
दशामें अनुभूत पदार्थोंका ही ज्ञान होता है, इसलिये स्वप्नज्ञान भी सर्वथा निर्विषय नहीं है। महाभाष्य-
कार ( जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ) ने भी कहा है—
"अनुभव किये हुए, देखे हुए, विचारे हुए, सुने हुए पदार्थ, वात, पित्त आदि प्रकृतिके विकार, दैविक
और जलप्रधान देश स्वप्नमें कारण होते हैं। सुख-निद्रा आनेसे पुण्य रूप, और सुख-निद्रा न आनेसे पाप
रूप स्वप्न दिखाई देते हैं। वास्तवमें स्वप्नके निमित्तोंका अभाव नहीं है, अर्थात् स्वप्न निर्विषय नहीं होता।"
तथा, ज्ञानका विषय हो बाह्य अर्थ है। यदि कहो कि ज्ञानका विषय बाह्य पदार्थ है, यह कथन
भ्रान्तिरूप है, तो यह बहुत ठीक है। क्योंकि मुख्य पदार्थके कहीं देखे जानेपर इन्द्रियोंके रुग्ण आदि होनेसे
कहीं किसी अन्य पदार्थमें, उस मुख्य पदार्थको विपर्यास रूपसे जाननेपर भ्रान्तिकी सिद्धि होती है; सीपीमें
चाँदीकी भ्रान्तिकी भाँति । (चाँदीको देखनेसे उसके शुभ्रत्वका ज्ञान होनेपर, सीपीके शुभ्रत्वको देखनेसे
जिस प्रकार सीपीके विषयमें चाँदीका होनेवाला ज्ञान भ्रान्तिरूप होता है, उसी प्रकार कहीं मुख्य पदार्थको
देखनेपर, इन्द्रियोंके रुग्ण आदि होनेसे अन्य पदार्थमें विपर्यस्त अर्थात् अन्यत्र देखे हुए मुख्य पदार्थका जो
ज्ञान होता है, वह भ्रान्तिरूप होता है, यह सिद्ध हो जाता है। इस भ्रान्त ज्ञानसे भी बाह्यार्थके सद्भावकी
ही सिद्धि होती है)। प्रयोजन भूत कार्यकी उत्पत्ति करनेमें समर्थ होनेवाले पदार्थके विषयमें भी इस
पदार्थका अस्तित्व भ्रान्तरूप है—यह जो कहा गया है तो इससे यह ज्ञान भ्रांत है, और यह ज्ञान अभ्रान्त,
यह व्यवस्था ही नष्ट हो जायेगी। अतएव—
"जो मनके लड्डू खाकर तृप्त हुए हैं और जिन्होंने वास्तवमें लड्डुओंका स्वाद चखा है, उन
दोनोंके रस, वीर्य और विपाक आदिके समान होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है"—यह वचन सत्य है।
तथा, आप लोगोंने ज्ञानाद्वैतका प्रतिपादन करते हुए जो परमाणुरूप और स्थूल अवयवीरूप बाह्य
पदार्थोंका खण्डन किया, उससे स्याद्वादियोंके सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं आती। क्योंकि जैन लोगोंने परमाणु
और स्थूल अवयवी दोनों रूप बाह्य पदार्थोंको स्वीकार किया है। तथा, परमाणुपक्षका खण्डन करते हुए
'परमाणु रूप बाह्य पदार्थ नहीं है, क्योंकि उसके साधक प्रमाणोंका अभाव है'—यह जो कथन है, वह भी
१. छाया—अनुभूतदृष्टचिन्तितश्रुतप्रकृतिविकारदैविकानूपाः वा ।
स्वप्नस्य निमित्तानि पुण्यं पापं च नाभावः ॥
—जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणः विशेषावश्यकभाष्ये १७०३।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६१
घटादीनां प्रत्यक्षत्वे तेषामपि कथञ्चित् प्रत्यक्षत्वं योगिप्रत्यक्षेण च साक्षात्प्रत्यक्षत्वमव-
सेयम् । अनुपलब्धिस्तु सौक्ष्म्यात् । अनुमानादपि तत्सिद्धिः, यथा-सन्ति परमाणवः, स्थूला-
वयविनिष्पत्तेरन्यथानुपपत्तेः, इत्यन्तर्व्याप्तिः । न चाणुभ्यः स्थूलोत्पाद इत्येकान्तः, स्थूलादपि
सूत्रपटलादेः स्थूलस्य पटादेः प्रादुर्भावविभावनात्, आत्माकाशादेरपुद्गलत्वकक्षीकाराच्च ।
यत्र पुनरणुभ्यस्तदुत्पत्तिस्तत्र तत् कालादिसामग्रीसंव्यपेक्षक्रियावशात् प्रादुर्भूतं संयोगातिशय-
मपेक्षेयमवितथैव ॥
यदपि किञ्चायमनेकावयवाधार इत्यादि न्यगादि, तत्रापि कथञ्चिद्विरोध्यनेकावयवा-
विश्वग्भूतवृत्तिरवयव्यभिधीयते । तत्र च यद्विरोध्यनेकावयवाधारतायां विरुद्धधर्माध्यासनम-
भिहितं तत्कथञ्चिदुपयेत एव तावत्, अवयवात्मकस्य तस्यापि कथञ्चिदनेकरूपत्वात् । यच्चो-
पन्यस्तम्, अपि च असौ तेषु वर्तमानः कात्स्न्येनैकदेशेन वा वर्तेतेत्यादि, तत्रापि विकल्प-
द्वयानभ्युपगम एवोत्तरम्, अविश्वग्भावेनावयविनोऽवयवेषु वृत्तेः स्वीकारात् ॥
किञ्च, यदि बाह्योऽर्थो नास्ति, किमिदानीं नियताकारं प्रतीयते । नीलमेतत् इति
विज्ञानकारोऽयमिति चेत्, न । ज्ञानाद् बहिर्भूतस्य संवेदनात् । ज्ञानाकारत्वे तु अहं नीलम्
इति प्रतीतिः स्यान्न तु इदं नीलम् इति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकारभेदात् कस्यचित् 'अहम्' इति
प्रतिभासः, कस्यचित् 'नीलमेतत्' इति चेत्, न । नीलाद्याकारवदहमित्याकारस्य व्यवस्थितत्वा-
ठीक नहीं। क्योंकि परमाणुओंके कार्यरूप घट आदिका प्रत्यक्षसे ज्ञान होनेपर उन परमाणुओंका भी कथंचित्
प्रत्यक्षसे ज्ञान होता है, तथा योगिप्रत्यक्षसे उनका साक्षात् प्रत्यक्ष होता है। उन परमाणुओंके अत्यन्त सूक्ष्म
होनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होती । अनुमान प्रमाणसे भी उन परमाणुओंकी सिद्धि होती है। अनुमान-
परमाणु अस्तिरूप है क्योंकि परमाणुओंके अभावमें स्थूल अवयवीकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; यह अन्तर्व्याप्ति
है। (परमाणुरूप उपादानका उपादेयभूत कार्यमें स्व-स्वरूपसे अन्वय होनेसे, परमाणु और स्थूल अवयवीमें
अन्तर्व्याप्य-व्यापक भावका सद्भाव होनेसे इनमें अन्तर्व्याप्ति सिद्ध होती है)। परमाणुओंसे स्थूल अवयवीका
१६२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
भावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदेवापरेण त्वमिति प्रतीयते । नीलाद्याकारस्तु
व्यवस्थितः, सर्वैरप्येकरूपतया ग्रहणात् । भक्षितहत्पूरादिभिस्तु¹ यद्यपि नीलादिकं पीतादि-
तया गृह्यते, तथापि तेन न व्यभिचारः तस्य भ्रान्तत्वात् । स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रति-
भास इति चेत्, ननु किं परस्यापि संवेदनमस्ति । कथमन्थथा स्वशब्दस्य प्रयोगः । प्रतियोगी-
शब्दो ह्ययं परमपेक्षमाण एव प्रवर्तते । स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत्, हन्त
प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदः कथं न वास्तवः ॥
भ्रान्त प्रत्यक्षमिति चेत्, ननु कुत एतत् । अनुमानेन ज्ञानार्थयोरभेदसिद्धेरिति चेत्,
किं तदनुमानमिति पृच्छामः । यद्येन सह नियमेनोपलभ्यते तत् ततो न भिद्यते, यथा सचन्द्राद्-
सचन्द्रः । नियमेनोपलभ्यते च ज्ञानेन सहार्थ इति व्यापक्यानुपलब्धिः । प्रतिषेध्यस्य ज्ञानार्थयो-
र्भेदस्य व्यापकः सहोपलम्भानियमस्तस्यानुपलब्धिः । भिन्नयोर्नीलपीतयोर्युगपदुपलम्भनियमा-
भावात् । इत्यनुमानेन तयोरभेदसिद्धिरिति चेत् ॥
न । संदिग्धserviceानैकान्तिकत्वेनास्यानुमानाभासत्वात् । ज्ञानं हि स्वपरसंवेदनम् । तत्पर-
दोनों पदार्थ ज्ञानाकार होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि जिस प्रकार नील आकार निश्चित है,
वैसे 'अहम्' आकार निश्चित नहीं है । कारण कि जो मेरे लिये 'अहं' है वह दूसरेके लिये 'त्वं' है । परन्तु
नील आकार व्यवस्थित है, क्योंकि वह सब लोगोंके अनुभवमें एकरूपसे ही आता है । यदि कहो कि पित्त
उत्पन्न करनेवाले धतूरेको खा लेनेसे नील पदार्थ भी पीतरूप प्रतिभासित होता है, इसलिये नील आकार
सब लोगोंके अनुभवमें एकसा नहीं आता । यह भी ठीक नहीं । क्योंकि नीलका पीतरूप प्रतिभासित होना
भ्रान्त है । रोग रहित मनुष्योंको नील सदा नील रूप ही प्रतिभासित होता है । स्वयंको अपने आपका ज्ञान
होनेसे 'अहं' का प्रतिभास होता है, यह आपका कथन तभी सत्य माना जा सकता है, जब आप अपने अति-
रिक्त दूसरेका भी संवेदन मानते हों । 'स्व' शब्द प्रतियोगी शब्द है । अतएव स्व शब्दसे पर शब्दका भी ज्ञान
होता है । यदि कहो कि स्व शब्दमें पर स्वरूप भेदका ज्ञान होता है, वास्तवमें स्व और परमें कोई भेद
नहीं है, तो खेद है कि आप लोग प्रत्यक्षसे दिखाई देनेवाले स्व और पर, तथा अंतर और बाह्यके भेदको भी
वास्तविक नहीं मानना चाहते ।
बौद्ध—स्व और परके भेदको बतानेवाला प्रत्यक्ष भ्रान्त है । क्योंकि अनुमानसे ज्ञान और पदार्थका
अभेद सिद्ध होता है । 'जो जिसके साथ नियमसे उपलब्ध होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता । जैसे असत् या
भ्रान्त चन्द्रमा यथार्थ चन्द्रमा के साथ उपलब्ध होता है, अतएव भ्रान्त चन्द्रमा यथार्थ चन्द्रमासे भिन्न नहीं है !
इसी प्रकार ज्ञान और पदार्थ नियमसे एक साथ पाये जाते हैं । अतएव पदार्थ ज्ञानसे भिन्न नहीं है ।
( व्यापकका अभाव होने पर व्याप्यका अभाव होना व्यापकानुपलब्धि है । यहाँ व्याप्य-शिंशिपाका अभाव
है, क्योंकि यहाँ शिंशिपाव्यापक वृक्ष की अनुपलब्धि है । वृक्ष व्यापक है और वृक्ष होनेसे शिंशिपा व्याप्य
है । अतः वृक्षमात्रका अभाव शिंशिपा वृक्षके अभाव की सिद्धि करता है । प्रस्तुत प्रसंगमें अभेदव्यवस्थापक
सहोपलंभ नियम का अभाव व्यापक है तथा अर्थ और ज्ञानमें होनेवाला भेद व्याप्य । अर्थात् जहाँ सहोपलंभ
नियम का अभाव होता है, वहाँ अभेद का अभाव—भेदका सद्भाव—होता है । ) जिस प्रकार परस्पर भिन्न
नील और पीत पदार्थों का एक साथ ज्ञान होनेके नियम का अभाव होता है, उसी प्रकार ज्ञानके साथ अर्थ की
उपलब्धि नियमसे होती है, अतएव सहोपलंभ रूप नियमके अभावरूप व्यापक की उपलब्धि न होनेसे ज्ञानके
और अर्थके अभेदके अभावरूप व्याप्य की उपलब्धि नहीं होती—ज्ञान और अर्थमें भेद की सिद्धि नहीं होती ।
इस अनुमानसे ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध होता है ।
जैन—बौद्धों का यह कथन ठीक नहीं है । ( क ) बौद्धोंके द्वारा उपस्थित किये गये अनुमानमें दिया
१. हत्पूरः पित्तरोगकरः फलविशेषस्तद्भक्षणेन पित्तपीतिम्ना सर्वे पदार्थाः पीता इव भासन्ते ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६३
संवेदनतामात्रेणैव नीलं गृह्णाति, स्वसंवेदनतामात्रेणैव च नीलबुद्धिम् । तदेवमनयोर्युगपद्
ग्रहणात्सहोलम्भनियमोऽस्ति अभेदश्च नास्ति । इति सहोपलम्भनियमरूपस्य हेतोर्विपक्षाद्
व्यावृत्तेः संदिग्धत्वात् संदिग्धानैकान्तिकत्वम् । असिद्धश्च सहोपलम्भनियमः, नीलमेतत् इति
बहिर्मुखतयाऽर्थेनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य नीलाद्नुभवस्याननुभवात्, इति कथं प्रत्यक्ष-
स्यानुमानेन ज्ञानार्थयोरभेदसिद्ध्या भ्रान्तत्वम् । अपि च, प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनावाधितविषय-
त्वादन्नुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वम्, इत्यन्योन्याश्रयदोषोऽपि
दुर्निवारः । अर्थाभावे च नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिः कुतः । न हि तत्र विवक्षितदेशेऽय-
मारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः ॥
वासनानियमात्तदारोपनियम इति चेत् । न । तस्या अपि तद्देशनियमकारणत्वाभावात् ।
सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशोऽनुभवः तद्देशा च तत्पूर्विका वासना । बाह्यार्थाभावे तु तस्याः
किंकृतो देशनियमः ॥
गया सहोपलंभरूप हेतु संदिग्धानैकांतिक होनेसे अनुमानाभास है । ( जिस हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध
होती है, उस हेतु को संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभास कहा जाता है ) । ज्ञान परमार्थतः स्व और पर को जानने-
वाला होता है । परसंवेदन स्वभावके कारण ही ज्ञान नील पदार्थ को जानता है, तथा स्वसंवेदन स्वभावके
कारण नीलके ज्ञान को ग्रहण करता है । इस प्रकार नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान, इन दोनों को
एक साथ ग्रहण करनेसे सहोपलंभ नियम का सद्भाव है । तथा नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान; इन
दोनोंमें अभेद नहीं है । इस प्रकार सहोपलंभ नियम रूप हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध होनेके कारण
उस हेतु का संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभासत्व सिद्ध हो जाता है । ( ख ) ज्ञान और अर्थ की एक साथ उप-
लब्धि होने का नियम असिद्ध है—उसकी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि ‘यह नील है,’ इस प्रकार वहिर्मुख रूपसे
जब पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी समय अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव नहीं होता । इस प्रकार नील पदार्थ
का ज्ञान तथा अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव एक साथ न होनेसे, सहोपलंभ नियमके स्वरूप की सिद्धि नहीं
होती । इससे सहोपलंभ नियमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास ठहरता है और अनुमान नहीं बनता । ऐसी हालत-
में असिद्ध अनुमानद्वारा सिद्ध किये जानेवाले ज्ञान और अर्थके अभेद द्वारा प्रत्यक्ष का भ्रान्तत्व कैसे सिद्ध हो
सकता है ? ( ग ) तथा, यदि प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो, तो अनुमानका विषय अबाधित सिद्ध होनेसे अनु-
मान की उत्पत्ति हो, तथा अनुमान की उत्पत्ति होने पर प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो—इस प्रकार अनुमान
और प्रत्यक्षके परस्पर अन्योन्याश्रित होनेसे अन्योन्याश्रय दोष दुर्निवार हो जाता है । इसलिये प्रत्यक्ष अथवा
अनुमानसे भी ज्ञान और पदार्थमें अभेद सिद्ध नहीं होता । तथा, यथार्थ का अभाव होने पर पदार्थोंके निश्चित
स्थानकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए । इसलिये विवक्षित स्थानमें ही अमुक पदार्थ का आरोप करना चाहिये,
अन्यत्र नहीं, इस नियम का कारण नहीं बन सकता ।
विज्ञानवादी बौद्ध—हम लोग वासनाद्वारा प्रतिनियत स्थानमें रहनेवाले पदार्थोंका ज्ञान करते हैं ।
( घटके प्रतिनियत स्थानमें रहनेसे उस स्थानका स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, परन्तु हम वासनाके द्वारा
अमुक पदार्थके अमुक स्थानमें स्थित रहनेका ज्ञान करते हैं । अतएव बाह्य पदार्थोंका ज्ञान हमारी वासनाके
कारण होता है, वास्तवमें बाह्य पदार्थ स्वतन्त्र वस्तु नहीं है ) । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि हम वासना-
से पदार्थके प्रतिनियत स्थानका ज्ञान नहीं कर सकते । पदार्थके होनेपर ही जिस स्थानमें पदार्थका अस्तित्व
होता है, उसी स्थानमें पदार्थका ज्ञान होता है, और उसी स्थानमें पदार्थज्ञानपूर्वक वासना उत्पन्न होती हैं ।
बाह्य पदार्थका अभाव होनेपर केवल उस वासना द्वारा पदार्थके प्रतिनियत स्थानका निश्चय कौन कर
सकता है ? अतएव यदि बाह्य पदार्थ कोई वस्तु नहीं है, तो प्रतिनियत स्थानके निश्चयका कोई नियम नहीं
बन सकता ।
१६४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
अथास्ति तावदारोपनियमः । न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते । बाह्यार्थो
नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं तत्र हेतुरिति चेत्, तद्वासनावैचित्र्यं बोधाकारादन्यत्,
अनन्यद्वा ? अनन्यच्चेत्, बोधाकारस्यैकत्वात्कस्तासां परस्परतो विशेषः । अन्यच्चेत्, अर्थे कः
प्रद्वेषः, येन सर्वलोकप्रतीतिरपहूयते ? तदेवं सिद्धो ज्ञानार्थयोर्भेदः ॥
तथा च प्रयोगः । विवादाध्यासितं नीलादि ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं, विरुद्धधर्माध्यस्तत्वात् ।
विरुद्धधर्माध्यासश्च ज्ञानस्य शरीरान्तः, अर्थस्य च बहिः; ज्ञानस्यापरकाले, अर्थस्य च पूर्व-
काले वृत्तिमत्त्वात्; ज्ञानस्यात्मनः सकाशात्, अर्थस्य च स्वकारणेभ्य उत्पत्तेः । ज्ञानस्य
प्रकाशरूपत्वात्, अर्थस्य च जडरूपत्वादिति । अतो न ज्ञानाद्वैतेऽभ्युपगम्यमाने बहिरनुभूय
अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६५
विधातृत्वात् । सुगतेन्द्रजालं सर्वमिदं विलूनशीर्णम् । पूर्वं विलूनं पश्चात् शीर्णं विलूनशीर्णम् ।
यथा किञ्चित् तृणस्तम्भादि विलूनमेव शीर्यते विनश्यति, एवं तत्कल्पितमिन्द्रजालं तृणप्रायं
धारालयुक्तिशस्त्रिकया¹ छिन्नं सद्विशीर्यत इति । अथवा यथा निपुणेन्द्रजालिककल्पितमिन्द्र-
जालमवास्तवतत्तद्वस्त्वद्भुतोपदर्शनेन तथाविधं बुद्धिदुर्विदग्धं जनं विप्रतार्य पश्चादिन्द्रधनु-
रिव निरवयवं विलूनशीर्णतां कलयति, तथा सुगतपरिकल्पितं तत्तत्प्रमाणतत्तत्फलाभेदक्षण-
क्षयज्ञानार्थहेतुकत्वज्ञानाद्वैताभ्युपगमादि सर्वं प्रमाणानभिज्ञं लोकं व्यामोहयमानमपि युक्त्या
विचार्यमाणं विशरारुतामेव² सेवत इति । अत्र च सुगतशब्द उपहासार्थः । सौगता हि
शोभनं गतं ज्ञानमस्येति सुगतं इत्युशन्ति । ततश्चाहो तस्य शोभनज्ञानता, येनेत्थमयुक्तियुक्त-
मुक्तम् ॥ इति काव्यार्थः ॥१६॥
प्रकार बाजीगरका इन्द्रजाल मिथ्या होनेसे थोड़े समयके लिये अद्भुत-अद्भुत वस्तुओंका प्रदर्शन करके भोले
लोगोंको ठग कर इन्द्रधनुषकी तरह विलीन हो जाता है, उसी प्रकार 'प्रमाण और फल अभिन्न हैं', 'सब
पदार्थ क्षणिक हैं,' 'ज्ञान और पदार्थमें परस्पर अभेद हैं' आदि सिद्धान्तोंसे भोले प्राणियोंको व्यामोहित
करनेवाले बुद्धके सिद्धान्त युक्तियोंसे जर्जरित हो जाते हैं ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—इस कारिकामें बौद्धोंके चार सिद्धान्तोंपर विचार किया गया है । बौद्ध—( १ ) प्रमाण
और प्रमिति अभिन्न हैं । क्योंकि ज्ञान ही प्रमाण और प्रमाणका फल है, कारण कि वह अधिगमरूप है ।
ज्ञानसे पदार्थ जाने जाते हैं, इसलिये ज्ञान प्रमाण है । तथा पदार्थोंको जाननेके अतिरिक्त ज्ञानका दूसरा कोई
फल नहीं हो सकता, इसलिए ज्ञान ही प्रमाणका फल है। प्रमाण और प्रमितिमें प्रमाण कारण है, और
प्रमाणका फल प्रमाणका कार्य है । जैन—( क ) यदि प्रमाण और प्रमिति अभिन्न हैं, तो वे दोनों एक
साथ उत्पन्न होने चाहिए । इसलिए प्रमाण और प्रमितिमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं बन सकता । क्योंकि
कारण सदा कार्यके पहले ही उत्पन्न होता है ( ख ) प्रमाण और प्रमितिको क्रमभावी मानना भी ठीक
नहीं है । क्योंकि बौद्धोंके मतमें प्रत्येक वस्तु क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाली है । अतएव प्रमाणका निरन्वय-
विनाश होनेसे प्रमाणसे प्रमितिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । ( ग ) प्रमाण और प्रमितिमें कोई सम्बन्ध
नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण और प्रमिति दोनों क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं । तथा प्रमाण और प्रमितिमें
रहनेवाले कार्य-कारण सम्बन्धका ज्ञान दो वस्तुओंके ज्ञान होनेपर ही हो सकता है ।
सौत्रान्तिक बौद्ध—हम प्रमाण और प्रमितिमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक सम्बन्ध मानते हैं, कार्य-
कारण सम्बन्ध नहीं । ज्ञान पदार्थको जानते समय पदार्थके आकारको धारण करके पदार्थका ज्ञान करता
है । वास्तवमें चक्षु आदि इन्द्रियोंसे पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । जिस समय ज्ञानमें अमुक पदार्थके आकारका
अनुभव होता है, उस समय उस पदार्थका ज्ञान होता है । इसलिए प्रमाण प्रमितिको उत्पन्न नहीं करता,
किन्तु वह प्रमितिकी व्यवस्था करता है । जिस समय ज्ञान नील घटके आकार होकर नील घटको जानता
है, उस समय ज्ञानमें नील घटका सारूप्य व्यवस्थापक है, और घटका नीलरूप ज्ञान व्यवस्थाप्य है ।
पदार्थोंका जाननेवाला ज्ञान नील घटके आकारको धारण करके ही नील घटको जानता है । अतएव प्रमाण
और प्रमितिमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक सम्बन्ध स्वीकार करनेसे एक ही वस्तुमें प्रमाण और प्रमितिके माननेसे
विरोध नहीं आता । जैन—( क ) निरंश क्षणिक विज्ञानमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक सम्बन्ध नहीं बन सकता ।
क्योंकि व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रह सकता है । ( ख ) ज्ञानको अर्थाकार माननेमें
ज्ञानको जड़ प्रमेयके आकार माननेसे ज्ञानको भी जड़ मानना चाहिए । तथा, ज्ञानको पदार्थाकार माननेमें
'यह नील पदार्थ है' ऐसा ज्ञान न होकर 'मैं नील हूँ' इस प्रकारका ज्ञान होना चाहिये । तथा जल-चन्द्रके
१ तीक्ष्णधारायुक्तशस्त्रिका ।
२ विशीर्णशीलता ।
१६६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
आकाश-चन्द्रके आकारका होनेपर भी जल-चन्द्रसे आकाश-चन्द्रका ज्ञान नहीं होता । (ग) यदि प्रमाण
और प्रमिति सर्वथा अभिन्न होते, तो आप लोग सारूप्यको प्रमाण और ज्ञानसंवेदनको प्रमिति मानकर प्रमाण
और उसके फलको अलग-अलग नहीं मानते । अतएव प्रमाण और प्रमितिको सर्वथा अभिन्न न मानकर उन्हें
कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न मानना चाहिए ।
बौद्ध—(२) सम्पूर्ण विद्यमान पदार्थ क्षणिक हैं, क्योंकि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव है ।
पदार्थोंका नश्वर स्वभाव दूसरेके ऊपर अवलम्बित नहीं है। यदि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव न हो, तो
दूसरी वस्तुओंके संयोग होनेपर भी पदार्थ नष्ट न होने चाहिये । पदार्थोंका यह नाशमान स्वभाव पदार्थोंकी
आरम्भ और अन्त दोनों अवस्थाओंमें समान है। इसीलिए प्रत्येक पदार्थ क्षणस्थायी है । अतएव जो घट हमें
नित्य दिखाई देता है, वह भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है । घटका प्रत्येक पूर्वक्षण उत्तरक्षणको उत्पन्न
करता है। ये समस्त क्षण परस्पर इतने सदृश हैं कि घटके क्षण, क्षणमें नष्ट होनेपर भी घट एकरूप ही
दिखाई देता है । एव क्षणोंकी पारस्परिक सादृश्यताके कारण ही हमें अविद्याके कारण घटमें एकत्वका ज्ञान
होता है । जैन—पूर्व और उत्तरक्षणोंका एक साथ अथवा क्रमसे उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतएव
पदार्थोंको क्षणिक मानना ठीक नहीं है। तथा क्षणिकवादी निरन्वय विनाश मानते हैं, अतएव क्षणिकवादका
सिद्धान्त एकान्तरूप होनेसे सत्य नहीं कहा जा सकता । इसलिए पदार्थोंको उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप
ही स्वीकार करना चाहिए । यही सत्का लक्षण है । जिस समय मनुष्य गर्भमें आता है, उस समय जीवका
उत्पाद होता है, और उसी समयसे उसकी आयुके अंशोंकी हानि होना प्रारम्भ हो जाती है, इसलिए उसका
व्यय होता है, तथा जीवत्व दशाके सदा ध्रुव रहनेसे जीवमें ध्रौव्य पाया जाता है । अतएव पर्यायोंकी अपेक्षासे
ही पदार्थोंको क्षणिक मानना चाहिये । द्रव्यकी दृष्टिसे पदार्थ नित्य ही हैं।
वैभाषिक बौद्ध—(३) ज्ञान जिस पदार्थसे उत्पन्न होता है उसी पदार्थको जानता है । अतएव
पदार्थ कारण हैं, और ज्ञान कार्य है । जैसे अग्निका धूम कारण है, क्योंकि अग्नि और धूमका अन्वय-व्यतिरेक
सम्बन्ध है । इसी तरह पदार्थ भी ज्ञानका कारण है, क्योंकि पदार्थ ज्ञानके साथ अन्वय-व्यतिरेकसे सम्बद्ध
है । यदि ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न न हो, तो घड़ेके ज्ञानसे घड़ेका ही ज्ञान होना चाहिये, अन्य पदार्थोंका नहीं,
यह व्यवस्था नहीं बन सकती। जैन—(क) बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं ।
अतएव जब तक एक पदार्थ बनकर पूर्ण न हो जाय, उस समय तक वह ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं कर सकता ।
तथा जिस क्षणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय पदार्थ नष्ट हो जाता है । अतएव पदार्थ ज्ञानका कारण
नहीं कहा जा सकता । (ख) क्रमसे होनेवाले पदार्थोंमें ही कार्य-कारण भाव हो सकता है, परन्तु बौद्धमतमें
कोई भी वस्तु क्षण मात्रसे अधिक नहीं ठहरती । अतएव ज्ञानकी उत्पत्तिके क्षणमें ज्ञानके कारण पदार्थका
नाश हो जानेसे पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । क्योंकि ज्ञान उत्पन्न होनेके पहले ही पदार्थ नष्ट
हो जाता है । (ग) पदार्थको ज्ञानका सहभावी माननेसे भी पदार्थ ज्ञानका कारण नहीं हो सकता । क्योंकि
एक साथ उत्पन्न होनेवाली दो वस्तुओंमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं बन सकता । (घ) यदि पदार्थको
ज्ञानमें कारण माना जाय, तो इन्द्रियोंको भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण मानना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियाँ भी
ज्ञानको पैदा करती हैं। (च) ज्ञानकी उत्पत्ति पदार्थके ऊपर अवलम्बित नहीं है, कारण कि मृगतृष्णार्मे
जलरूप पदार्थके अभाव होनेपर भी जलका ज्ञान होता है । अतएव जब तक पदार्थ और ज्ञानमें 'जहाँ
पदार्थ न हो, वहाँ ज्ञान न हो' इस प्रकारका व्यतिरेक सम्बन्ध सिद्ध न हो, तब तक पदार्थको ज्ञानका हेतु
नहीं कह सकते । (छ) योगियोंके अतीत और अनागत पदार्थोंको जानते समय अतीत, अनागत पदार्थोंका
अभाव रहता है । अतएव अतीत, अनागत पदार्थ ज्ञानमें कारण नहीं हो सकते । (ज) प्रकाश्य रूप अर्थसे
प्रकाशक रूप ज्ञानकी उत्पत्ति मानना भी ठीक नहीं । क्योंकि घट दीपकसे उत्पन्न नहीं होता, फिर भी दीपक
घटको प्रकाशित करता है । (झ) ज्ञानकी पदार्थसे उत्पत्ति मानकर ज्ञानको पदार्थका ज्ञाता माननेसे स्मृतिको
भी प्रमाण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि स्मृति किसी पदार्थसे उत्पन्न नहीं होती । इसी प्रकार एक स्वसं-
वेदन ज्ञानमें क्रियाका अभाव होनेसे कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता । क्योंकि स्वसंवेदनसे स्वसंवेदनकी
उत्पत्ति नहीं होती । ( ट ) कपालके प्रथम क्षणसे घटका अंतिम क्षण उत्पन्न होता है, परन्तु कपालके प्रथम
क्षणसे घटके अंतिम क्षणका ज्ञान नहीं होता । इसी प्रकार समानजातीय ज्ञानसे समनन्तर ज्ञानके उत्पन्न
होनेपर समानजातीयसे समनन्तर ज्ञानका ज्ञान नहीं होता । ( ठ ) अतएव जिस समय ज्ञानको आवरण
करनेवाले कर्मका क्षयोपशम हो जानेसे आत्मामें क्षय और उपशम रूप योग्यता होती है, उसी समय प्रतिनियत
पदार्थोंका ज्ञान स्वीकार करना चाहिये ।
योगाचार ( बौद्ध )—( ४ ) ज्ञान मात्र ही परमार्थसत् है, क्योंकि ज्ञानका कारण कोई बाह्य
पदार्थ नहीं है । बाह्यार्थवादी परमाणुओंके समूहको बाह्य पदार्थ कहते हैं, अथवा स्थूल अवयवीरूप पिंडको ?
प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंकी सिद्धि नहीं होती, अतएव बाह्य पदार्थ परमाणुरूप
नहीं हो सकते । तथा बाह्य पदार्थोंकी परमाणुरूप सिद्धि न होनेसे उन्हें स्थूल अवयवी भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि परमाणुओंके समूहको अवयवी कहते हैं । अतएव जो नील, पीत आदि पदार्थ प्रतिभासित होते हैं,
वे सब ज्ञानरूप ही हैं । जिस प्रकार बाह्य आलम्बनके बिना आकाशमें केशका ज्ञान होता है, उसी तरह
अनादि कालकी अविद्याकी वासनासे बाह्य पदार्थोंके अवलम्बनके बिना ही घट, पट आदि पदार्थोंका ज्ञान
होता है । वास्तवमें स्वयं ज्ञान ही ग्राह्य और ग्राहकरूप प्रतिभासित होता है । जैन ( क ) यदि बाह्य
पदार्थोंको ज्ञानका विषय नहीं माना जाय, तो ज्ञानको निर्विषय माननेसे ज्ञानको अप्रमाण मानना पड़ेगा ।
वास्तविक बाह्य पदार्थोंके बिना हमें ज्ञान मात्रसे ही पदार्थोंका प्रतिभास नहीं हो सकता । ज्ञानसे बाह्य
पदार्थोंका ज्ञान होना अनुभवसे सिद्ध है । ( ख ) परमाणुरूप बाह्य पदार्थकी प्रत्यक्ष और अनुमानसे सिद्धि
होती है । क्योंकि हम परमाणुओंके कार्य घट आदिके प्रत्यक्षसे परमाणुओंका कथंचित् प्रत्यक्ष करते हैं ।
इसलिये परमाणुओंकी अनुमानसे भी सिद्धि होती है; क्योंकि परमाणुओंके अस्तित्वके बिना घट आदि स्थूल
अवयवीकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । अवयव ( परमाणु ) और अवयवीका हमलोग कथंचित् भेदाभेद स्वीकार
करते हैं, अतएव बाह्य पदार्थोंको परमाणु और स्थूल अवयवी दोनों रूप मानना चाहिये । ( ग ) वासना-
वैचित्र्यसे भी पदार्थोंका नाना रूप प्रतिभासित मानना ठीक नहीं । क्योंकि बाह्य पदार्थोंके अनुभव होनेपर ही
वासना उत्पन्न होती है । तथा ज्ञान और वासनाको अलग-अलग माननेसे ज्ञानाद्वैत नहीं बन सकता ।
योगाचार—'जो जिसके साथ उपलब्ध नहीं होता है, वह उससे अभिन्न है । जैसे आकाश-चन्द्रमा
जल-चन्द्रमाके साथ उपलब्ध होता है, इसलिये दोनों परस्पर अभिन्न हैं । इसी तरह ज्ञान और पदार्थ एक
साथ उपलब्ध होते हैं । अतएव ज्ञान और पदार्थ एक दूसरेसे अभिन्न हैं'—इस अनुमानसे ज्ञान और पदार्थकी
अभिन्नता सिद्ध होती है । जैन—यह अनुमान संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभास है । क्योंकि ज्ञानसे जाने हुए
नील और नीलज्ञानमें सहोपलंभ नियम होनेपर भी उनमें अभिन्नता नहीं पायी जाती । तथा सहोपलंभ
नियम पक्षमें नहीं रहनेके कारण असिद्ध भी है । क्योंकि ज्ञान और पदार्थमें अभेद सिद्ध नहीं होता ।
तथा, बाह्य पदार्थोंका अभाव माननेसे, यह वस्तु इसी स्थानपर है, दूसरे स्थानपर नहीं, यह नियम नहीं बन
सकता । अतएव नील, पीत आदि ज्ञानसे भिन्न हैं, क्योंकि ज्ञान और ज्ञेय परस्पर विरोधी हैं । ज्ञान अन्तरंग
है, ज्ञेय बाह्य; ज्ञान ज्ञेयके पश्चात् उत्पन्न होता है, ज्ञेय ज्ञानके पूर्व; ज्ञान आत्मामें उत्पन्न होता है, ज्ञान
अपने भिन्न कारणोंसे; तथा ज्ञान प्रकाशक है, और ज्ञेय जड़ है । अतएव विज्ञानाद्वैतको न मान कर ज्ञान और
बाह्य पदार्थोंका परस्पर भेद मानना चाहिये ।
१६८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
अथ तत्त्वव्यवस्थापकप्रमाणादिचतुष्टयव्यवहारापलापिनः शून्यवादिनः सौगतजातीयां-
स्तत्कक्षीकृतपक्षसाधकस्य प्रमाणस्याङ्गीकारानङ्गीकारलक्षणपक्षद्वयेऽपि तदभिमतार्थासिद्धि-
प्रदर्शनपूर्वकमुपहसन्नाह—
विना प्रमाणं परवन्न शून्यः स्वपक्षसिद्धेः पदमश्नुवीत ।
कुप्येत्कृतान्तः स्पृशते प्रमाणमहो सुदृष्टं त्वदसूयिदृष्टम् ॥१७॥
शून्यः शून्यवादी प्रमाणं प्रत्यक्षादिकं विना अन्तरेण स्वपक्षसिद्धेः स्वाभ्युपगतशून्यवाद-
निष्पत्तेः पदं प्रतिष्ठां नाश्नुवीत न प्राप्नुयात् । किंवत् ? परवत् इतरप्रामाणिकवत् । वैधर्म्येणायं
दृष्टान्तः । यथा इतरे प्रामाणिकाः प्रमाणेन साधकतमेन स्वपक्षसिद्धिमश्नुवते एवं नायम् ।
अस्य मते प्रमाणप्रमेयादिव्यवहारस्यापारमार्थिकत्वात्, "सर्व एवायमनुमानानुमेयव्यवहारो
बुद्धयारूढेन धर्मधर्मिभावेन न वहिःसदसत्त्वमपेक्षते" इत्यादिवचनात् । अप्रमाणकश्च शून्य-
वादाभ्युपगमः कथमिव प्रेक्षावतामुपादेयो भविष्यति, प्रेक्षावत्त्वव्याहतिप्रसंगात् ॥
अथ चेत् स्वपक्षसंसिद्धये किमपि प्रमाणमयमङ्गीकुरुते, तत्रायमुपालम्भः कुप्येदित्यादि ।
प्रमाणं प्रत्यक्षाद्यन्यतमत् स्पृशते आश्रयमाणाय, प्रकरणादस्मै शून्यवादिने, कृतान्तस्तत्सि-
द्धान्तः कुप्येत्कोपं कुर्यात्, सिद्धान्तबाधः स्यादित्यर्थः । यथा किल सेवकस्य विरुद्धवृत्त्या
कुपितो नृपतिः सर्वस्वमपहरति, एवं तत्सिद्धान्तोऽपि शून्यवादविरुद्धं प्रमाणव्यवहारमङ्गीकुर्वा-
णस्य तस्य सर्वस्वभूतं सम्यग्वादित्वमपहरति ॥
इसके बाद तत्त्वोंके व्यवस्थापक प्रमाण, प्रमिति, प्रमेय और प्रमाताके व्यवहारका लोप करनेवाले
शून्यवादी बौद्धोंके पक्षका खंडन करते हुए उसका उपहास करते हैं—
श्लोकार्थ—दूसरे वादी प्रमाणोंको मानते हैं, इसलिये उनके मतकी सिद्धि हो सकती है। परन्तु
शून्यवादी प्रमाणके बिना अपने पक्षकी सिद्धि नहीं कर सकते । यदि शून्यवादी किसी प्रमाणको मानें, तो
शून्यतारूपी यमके कुपित होनेसे शून्यवादकी सिद्धि नहीं हो सकती । हे भगवन् ! आपके मतसे ईर्ष्या रखनेवाले
लोगोंने जो कुछ कुमतिज्ञान रूपी नेत्रोंसे जाना है, वह मिथ्या होनेके कारण उपहासके योग्य है ॥
व्याख्यार्थ—शून्यवादी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंको बिना माने ही स्वमान्य शून्यवादके सिद्धान्तको
सिद्ध करना चाहते हैं, जो सिद्ध नहीं हो सकता। कैसे ? प्रमाणों को स्वीकार करनेवाले अन्य दार्शनिकोंके
समान । यह वैधर्म्य दृष्टान्त है। जैसे अन्य प्रामाणिक साधकतम ( साध्य की सिद्धि करनेवाले ) प्रमाण के
द्वारा अपने पक्ष की सिद्धि कर सकते हैं, उस प्रकार शून्यवादी ( साधकतम ) प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों को माने
बिना अपने पक्षकी सिद्धि नहीं कर सकते। क्योंकि इनके मतमें प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाणका व्यवहार
अपारमार्थिक—अवास्तविक—माना गया है। कहा भी है, “बुद्धि पर आरूढ़ हुए धर्म-धर्मि संबंधके कारण
समस्त अनुमान-अनुमेय व्यवहार बाह्य पदार्थके कारण सद्भाव और असद्भाव की अपेक्षा नहीं करता" अर्थात्
बाह्य पदार्थ का सद्भाव हो या असद्भाव, वह समस्त अनुमान-अनुमेय व्यवहार काल्पनिक धर्म-धर्मिके संबंधसे
रहता है। शून्यवाद की सिद्धि करनेवाले प्रमाणों का अभाव होनेसे शून्यवाद की मान्यता बुद्धिमानों द्वारा
ग्राह्य नहीं हो सकती, क्योंकि, इससे उनकी बुद्धिमत्ताके आहत होनेका प्रसंग उपस्थित होता है ।
यदि शून्यवादी अपने सिद्धांतको सिद्ध करनेके लिए कोई प्रमाण दें, तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणका आश्रय
लेनेके कारण शून्यवादियोंका सिद्धांत बाधित होता है। जिस प्रकार कोई राजा अपने सेवकके अवांछनीय
आचरणसे कुपित होकर सेवकका सर्वस्व हरण कर लेता है, वैसे ही शून्यवादका सिद्धांत शून्यवादके विरुद्ध
प्रमाण आदि व्यवहारको स्वीकार करनेवाले शून्यवादीका सर्वस्व हरण करता है। अतएव प्रत्यक्ष आदि प्रमा-
णसे शून्यवादकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
with i-matra = 'यि'!
Wait, why did I see 'ययि'? Ah, the stroke of the 'द' and 'सू' and then 'यि' - wait, let me look at:
शी (1) लाः (2) त्व (3) द (4) सू (5) य (6) यि (7) नः (8)?
Wait, look at line 9, character by character from the beginning:
- शी
- ला
- स्त्व
- द
- सू
- य
- यि ?? Wait! Is there a 'य' and a 'यि'?
Look at character 5: सू.
Character 6: य.
Character 7: यि.
Wait, let's compare with line 8:
Line 8: "तुभ्यमसूयन्ति गुणेषु दोषानाविष्कुर्वन्तीत्येवं"
Line 9 starts directly below "तुभ्यम":
"शीलास्त्वदसू..."
Wait! "शीलास्त्वदसूयिनः" - wait, in line 8:
तुक (tu), भ्य (bhya), म (ma), सू (sū), य (ya), न्ति (nti)
Below it in line 9:
शी (śī), ला (lā), स्त्व (stva), द (da), सू (sū), यि (yi), न (na)...
१७० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
वेत्यादौ शरीराश्रयतयाप्युपपत्तेः । किञ्च, यद्ययमहङ्कारप्रत्यय आत्मगोचरः स्यात् तदा न
कादाचित्कः स्यात् । आत्मनः सदा सन्निहितत्वात् । कादाचित्कं हि ज्ञानं, कादाचित्ककारण-
पूर्वकं दृष्टम् । यथा सौदामिनीज्ञानमिति । नाप्यनुमानेन, अव्यभिचारिलिङ्गाग्रहणात् । आग-
मानां च परस्परविरुद्धार्थवादिनां नास्त्येव प्रामाण्यम् । तथाहि । एकेन कथमपि कश्चिदर्थो
व्यवस्थापितः, अभियुक्ततरेणापरेण स एवान्यथा व्यवस्थाप्यते । स्वयमव्यवस्थितप्रामाण्यानां
च तेषां कथमन्यव्यवस्थापने सामर्थ्यम् । इति नास्ति प्रमाता ॥
प्रमेयं च बाह्योऽर्थः, स चानन्तरमेव बाह्यार्थप्रतिक्षेपक्षणे निर्लोठितः । प्रमाणं च
स्वपरावभासि ज्ञानम् । तच्च प्रमेयाभावे कस्य ग्राहकमस्तु, निर्विषयत्वात् । किंच, एतत् अर्थ-
समकालम्, तद्भिन्नकालं वा तद्ग्राहकं कल्प्येत ? आद्यपक्षे, त्रिभुवनवर्तिनोऽपि पदार्थास्तत्राव-
भासेरन्, समकालत्वाविशेषात् । द्वितीये तु, निराकारम् साकारम् वा तत्स्यात् ? प्रथमे, प्रति-
नियतपदार्थपरिच्छेदानुपपत्तिः । द्वितीये तु, किमियमाकारो व्यतिरिक्तो अव्यतिरिक्तो वा
ज्ञानात् ? अव्यतिरेके, ज्ञानमेवायम्, तथा च निराकारपक्षदोषः । व्यतिरेके, यद्ययं चिद्रू-
पस्तदानीमाकारोऽपि वेदकः स्यात् । तथा चायमपि निराकारः साकारो वा तद्वेदको भवेत् ?
'मैं काला हूँ' इस प्रकारका ज्ञान शरीरमें भी होता है। तथा, यदि 'अहं प्रत्यय' से आत्माका ज्ञान
होता है, तो यह 'अहं प्रत्यय' आत्मामें सदा होना चाहिये, कभी-कभी नहीं। क्योंकि आत्मा सदा
विद्यमान है। ज्ञान सदा विद्यमान नहीं रहता, इसलिये वह कभी-कभी उत्पन्न होता है; बिजली-
के ज्ञानकी तरह ज्ञान अनित्य कारणोंसे ही उत्पन्न होता है। अतएव आत्मामें सदा ही 'अहं प्रत्यय'
होना चाहिये। अनुमानसे भी आत्मा सिद्ध नहीं होती। क्योंकि आत्माको ग्रहण करनेवाला कोई निर्दोष
हेतु नहीं है। तथा, आगम परस्पर विरुद्ध अर्थके प्रतिपादन करनेवाले हैं, इसलिये आगमसे भी आत्माका
अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। तथाहि—जिस पदार्थको एक शास्त्र अमुक प्रकारसे प्रतिपादन करता
है, उसी पदार्थको दूसरा दूसरी तरहसे कहता है। अतएव आगमके स्वयं अव्यवस्थित होनेके कारण आगमसे
दूसरे तत्त्वोंकी व्यवस्था नहीं बन सकती। अतएव प्रमाता आत्माका अस्तित्व मानना ठीक नहीं है।
( ख ) जिसे प्रमेय कहते हैं वह वाह्य अर्थ है। वाह्य अर्थका परिहार करते समय उसकी खंडन
किया जा चुका है।
( ग ) स्व और परके जाननेवाले ज्ञानको प्रमाण अर्थात् प्रमिति क्रिया का कारण, कहते हैं।
प्रमेयके अभावमें प्रमाणभूत ज्ञानके विषयका अभाव हो जानेसे, वह प्रमाणभूत ज्ञान किसका ग्राहक
होगा, क्योंकि उसके पास कोई विपय ही नहीं है। तथा, अर्थके अस्तित्वकालमें विद्यमान ज्ञान पदार्थको
जानता है, अथवा जिस कालमें अर्थका सद्भाव होता है, उससे भिन्नकालमें प्रमाणभूत ज्ञान पदार्थको
जानता है ? प्रथम पक्ष स्वीकार करनेपर तीनों लोकोंके पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित होने चाहिये, क्योंकि
ज्ञान सभी पदार्थोंके समकालीन है। द्वितीय पक्षमें, वह ज्ञान निराकार (ज्ञेयाकार शून्य) होता है या
ज्ञेयाकार सहित ? यदि पदार्थके सद्भावके भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान निराकार है तो प्रतिनियत पदार्थके
ज्ञानकी सिद्धि न हो सकेगी। यदि पदार्थके सद्भावकालसे भिन्नकालमें होनेवाला ज्ञान साकार (पदार्थके
आकारवाला) है तो वह पदार्थका आकार ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न ? यदि पदार्थके सद्भावकालसे
भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे पदार्थोंका आकार भिन्न न हो तो यह पदार्थका आकार ज्ञानरूप ही होगा,
और पदार्थका आकार ज्ञानरूप होनेसे निराकार पक्षमें जो दोष आता है, वही दोष यहाँ भी उपस्थित होगा;
अर्थात् प्रतिनियत पदार्थके ज्ञानकी सिद्धि नहीं होगी। यदि पदार्थके कालसे भिन्नकालमें होनेवाले ज्ञानसे
पदार्थका आकार भिन्न है तो वह चिद्रूप है या अचिद्रूप ? यदि यह आकार चिद्रूप है तो वह-पदार्थके आकारका
भी ज्ञाता होगा। तथा, पदार्थके आकारका ज्ञाता होनेपर, यह आकार निराकार अथवा साकार होता हुआ
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७१
इत्यावर्त्तनेनानवस्था । अथ अचिद्रूपः, किमज्ञातः ज्ञातो वा तज्ज्ञापकः स्यात् । प्राचीनविकल्पे,
चैत्रस्येव मैत्रस्यापि तज्ज्ञापकोऽसौ स्यात् । तदुत्तरे तु, निराकारेण साकारेण वा ज्ञानेन, तस्यापि
ज्ञानं स्यात् । इत्याद्यावृत्तावनवस्थैवेति ।
इत्थं प्रमाणाभावे तत्फलरूपा प्रमितिः कुतस्तनी । इति सर्वशून्यतैव परं तत्त्वमिति ।
यथा च पठन्ति—
“यथा यथा विचार्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा
यदेतद् स्वयमर्थेभ्यो रोचते तन्न के वयम्”'१
इति पूर्वपक्षः । विस्तरतस्तु प्रमाणखण्डनं तत्त्वोपप्लवसिंहादवलोकनीयम् ॥
अत्र प्रतिविधीयते । ननु यदिदं शून्यवादव्यवस्थापनाय देवानांप्रियेण वचनमुपन्यस्तम्
पदार्थोंका ज्ञाता होता है क्या ? इस प्रकार फिर फिरसे प्रश्न उपस्थित होनेपर अनवस्था दोष उपस्थित
होता है । यदि वह पदार्थका आकार चिद्रूप न हो तो क्या वह ज्ञात आकार पदार्थका ज्ञान कराता है
या अज्ञात आकार ? यदि अज्ञात पदार्थका आकार पदार्थका ज्ञान कराता है तो वह अज्ञात आकार,
चैत्र और मैत्र द्वारा अज्ञात होनेसे, जिस प्रकार चैत्रको पदार्थका ज्ञान कराता है, उसी प्रकार मैत्रको भी
पदार्थका ज्ञान करायेगा । यदि पदार्थका आकार ज्ञात होनेपर पदार्थका ज्ञान कराता है तो क्या उस आकारका
ज्ञान आकारशून्य ज्ञानसे होता है या आकारसहित ज्ञानसे ? इस प्रकार फिर फिरसे प्रश्न उपस्थित
होनेपर अनवस्था दोष ही उपस्थित होता है ।
( घ ) प्रमाणकी सिद्धि न होनेपर प्रमाणका फल प्रमिति भी सिद्ध नहीं होती अतएव सर्वथा शून्यता
ही वास्तविक तत्त्व हैं । कहा भी है—
“जैसे जैसे तत्वोंका विचार करते हैं, वैसे वैसे तत्त्व विशीर्ण होते हैं । वास्तवमें पदार्थोंका स्वरूप
ही इस तरहका है, इसमें हमारा दोष नहीं ।”
प्रमाणका विस्तृत खंडन तत्त्वोपप्लवसिंह२ नामक ग्रंथमें देखना चाहिये ।
उत्तरपक्ष-जैन—देवानांप्रिय बौद्ध लोगोंने शून्यवादकी स्थापना करनेके लिये जो वाक्य कहा है, वह
१ बुद्धयां विवच्यमानानां स्वभावो नावधार्यते ।
अतो निरभिलाप्यास्ते निस्सभावाश्च कीर्तिताः
इदं वस्तु बलायातं यद्वदातं विपश्चितः ।
यथा यथाऽर्थाश्चिन्त्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा ॥
लंकावतारसूत्रे
२ यह ग्रंथ पाटनके एक जैन भंडारसे मिला है । इसके कर्ता जयराशि भट्ट हैं । पं. बेचरदास
जीवराज दोशीका अनुमान है, कि ये जयराशि भट्ट ही तत्त्वोपप्लववादी अथवा तत्त्वोपप्लवसिंह नामसे कहे
जाते थे । तत्त्वोपप्लवके अंतिम दो श्लोक—
‘ ये याता न हि गोचरं सुरगुरोर्बुद्धेर्विकल्पा दृढाः
प्राप्यन्ते ननु तेऽपि यत्र विमले पाषण्डदर्पच्छिदि ।
भट्टश्रीजयराशिदेवगुरुभिः सृष्टो महार्थोदय-
स्तत्त्वोपप्लवसिंह एव इति यः ख्यातिं परां यास्यति ॥
पाखण्डखण्डनाभिज्ञा ज्ञानोदधिविवर्धिताः ।
जयराशेर्जयन्तीह विकल्पा वादिजिष्णवः ॥
पहले श्लोकसे स्पष्ट है कि यही ग्रंथ तत्त्वोपप्लवसिंहके नामसे प्रसिद्ध था ।’
देखिये ‘पुरातत्त्व’ ५-४, पृ. २६१ ।
१७२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
तत् शून्यम् वा अशून्यम् वा ? । शून्यं चेत्, सर्वोपाख्याविरहितत्वात् खपुष्पेणेव नानेन
किञ्चित्साध्यते निषिध्यते वा । ततश्च निष्प्रतिपक्षा प्रमाणादितत्त्वचतुष्टयीव्यवस्था । अशून्यं
चेत्, प्रलीनस्तपस्वी शून्यवादः । भवद्वचनेनैव सर्वशून्यताया व्यभिचारात् । तत्रापि निष्कण्ट-
कैव सा भगवती । तथापि प्रामाणिकसमयपरिपालनाथं किञ्चित् तत्साधनं दूष्यते ॥
तत्र यत्तावदुक्तम् प्रमातुः प्रत्यक्षेण न सिद्धिः, इन्द्रियगोचरातिक्रान्तत्वादिति, तत्सिद्ध-
साधनम् । यत्पुनः अहंप्रत्ययेन तस्य मानसप्रत्यक्षत्वमनैकान्तिकमित्युक्तम् तदसिद्धम् । अहं
सुखी अहं दुःखी इति अन्तर्मुखस्य प्रत्ययस्यात्मालम्बनतयैवोपपत्तेः । तथा चाहुः—
“सुखादि चेत्यमानं हि स्वतंत्रं नानुभूयते ।
मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥
इदं सुखमिति ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥” १
यत्पुनः अहं गौरः श्यामः इत्यादिबहिर्मुखः प्रत्ययः स खल्वात्मोपकारकत्वेन लक्षणाय
शरीरे प्रयुज्यते । यथा प्रियभृत्येऽहमित्यपदेशः ॥ २
स्वयं शून्यरूप है, या अशून्यरूप ? यदियह वाक्य शून्यरूप है, तो समस्त इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य न होनेसे खरविषाणकी
तरह इस वचनके द्वारा न किसीकी सिद्धि हो सकती है, और न किसीका निषेध किया जा सकता है । अतएव
प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता इस प्रमाण चतुष्टयका निर्णय निर्विरोध सिद्ध हो जाता है । यदि कहो कि
उक्त वाक्य अशून्यरूप हैं, तो तपस्वी शून्यवाद ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि शून्यवादियोंके वचनोंको अशून्य
माननेसे सर्वशून्यता नहीं बन सकती । अतएव प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति और प्रमाता ये चारों निर्बाध सिद्ध
हो जाते हैं ।
( क )—आप लोगोंने जो कहा कि 'प्रमाता इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिए प्रमाता प्रत्यक्षसे सिद्ध
नहीं होता' सो हम भी आत्माको प्रत्यक्षका विषय नहीं मानते, अतएव उक्त कथन हमारे लिये सिद्धसाधन है ।
( ख ) 'अहं प्रत्यय' से मानस प्रत्यक्षद्वारा आत्माका अस्तित्व स्वीकार करनेमें 'अनैकांतिक दोष' नहीं
आता, क्योंकि 'मैं सुखी हूँ,' 'मैं दुखी हूँ' इस प्रकारका अंतरंग ज्ञान आत्मा ही के आधारसे होता है ।
कहा भी है—
“जिसका अनुभव किया जाता है, ऐसे सुख आदिका अनुभव स्वतंत्ररूपसे अर्थात् आत्माके विना
नहीं किया जाता । 'सुखी' शब्द मत्वर्थीय इन् प्रत्यय लगनेसे बना है । 'सुखमस्यास्मिन्नास्तीतिसुखी' इस
निरुक्तिमें जो 'अस्य' पद है वह सुखके आश्रयभूत आत्माका ज्ञान कराता है । अतः मतुप् प्रत्ययसे सुखके
आश्रयभूत आत्मपदार्थका सूचन होनेसे, 'सुखी' .शब्दसे आत्माका ग्रहण होता है ।। जिस प्रकार यह घट है'
ऐसा कहनेसे घट पदार्थ दिखाई देता है, उसो प्रकार 'यह सुख है' ऐसा कहने पर सुख दिखाई नहीं
देता । अतः 'मैं सुखी हूँ' यह ज्ञान आत्माको भी प्रकाशित करता है ।”
तथा 'मै गोरा हूँ, मैं काला हूँ' इत्यादि रूप जो बहिर्मुख ज्ञान होता है, वह इसी आत्माका उपकार
( सुख-दुख आदिका अनुभव करनेमें सहकारी ) होनेसे, लक्षणके द्वारा, शरीरके विषयमें प्रयुक्त किया जाता
१. न्यायमंजर्याम् ।
२. मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् ।
अन्योर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ।
—काव्यप्रकाशे मम्मटः ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७३
यच्च अहंप्रत्ययस्य कादाचित्कत्वम् तत्रेयं वासना । आत्मा तावदुपयोगलक्षणः १ । स च
साकारानाकारोपयोगयोरन्यतरस्मिन्नियमेनोपयुक्त एव भवति । अहंप्रत्ययोऽपि चोपयोग-
विशेष एव । तस्य च कर्मक्षयोपशमवैचित्र्यात् इन्द्रियानिन्द्रियालोकविषयादिनिमित्तसन्नपेक्ष-
तया प्रवर्त्तमानस्य कादाचित्कत्वमुपपन्नमेव । यथा बीजं सत्यामप्यङ्कुरोपजनशक्तौ पृथिव्युद-
कादिसहकारिकारणकलापसमवहितमेवाङ्कुरं जनयति, नान्यथा । न चैतावता तस्याङ्कुरो-
त्पादने कादाचित्केऽपि तदुत्पादनशक्तिरपि कादाचित्की, तस्याः कथंचिन्नित्यत्वात् । एवमात्मनः
सदा सन्निहितत्वेऽप्यहं प्रत्ययस्य कादाचित्कत्वम् ।।
यदप्युक्तम् तस्याव्यभिचारि लिङ्गं किमपि नोपलभ्यत इति तदप्यसारं । साध्याविना-
भाविनोऽनेकस्य लिङ्गस्य तत्रोपलब्धेः । तथाहि । रूपाद्युपलब्धिः सकर्तृका, क्रियात्वात् ,
छिदिक्रियावत् । यश्चास्याः कर्ता स आत्मा । न चात्र चक्षुरादीनां कर्तृत्वम् । तेषां कुठारादि-
वत् करणत्वेनास्वतन्त्रत्वात् । करणत्वं चैषां पौद्गलिकत्वेनाचेतनत्वात् , परप्रेर्यत्वात् , प्रयोक्तृ-
व्यापारनिरपेक्षप्रवृत्त्यभावात् । यदि हि इन्द्रियाणामेव कर्तृत्वं स्यात् , तदा तेषु विनष्टेषु पूर्वानु-
भूतार्थस्मृतेः मया दृष्टम् स्पृष्टम् घ्रातम् आस्वादितम् श्रुतम् इति प्रत्ययानामेककर्तृकत्वप्रतिपत्तेश्च
है । जैसे अपने प्रिय सेवकमें अहंबुद्धि होती है, उसी प्रकार यहाँ अहं प्रत्ययका प्रयोग आत्माके उपकारक
शरीरमें होता है ।
( ग ) 'अहं प्रत्यय'का जो कादाचित्कत्व ( अनित्यत्व ) है, उसके विषयमें यहाँ प्रतिपादन किया
गया है । आत्माका लक्षण उपयोग है । वह आत्मा साकार और अनाकार उपयोगमेंसे किसी एक
उपयोगमें नियमसे उपयुक्त ही रहती है । 'अहं प्रत्यय' भी एक प्रकारका उपयोग ही है । कर्मके क्षयोपशमके
वैचित्र्यके कारण इन्द्रिय, मन, आलोक, विषय आदि निमित्तोंकी अपेक्षा रखकर प्रवृत्त होनेवाले उस
'अहं प्रत्यय'रूप विशिष्ट उपयोगका कादाचित्क ( अनित्य ) होना ठीक ही है । जिस प्रकार बीजमें अंकुरके
उत्पन्न करनेकी शक्तिके सदा विद्यमान रहते हुए भी पृथिवी, जल आदि सहकारी सामग्री मिलनेपर
ही बीज अंकुरको उत्पन्न करता है, सहकारी सामग्रीके अभावमें वह अंकुरकी उत्पत्ति नहीं कर सकता ।
बीजकी अंकुर उत्पन्न करनेकी क्रियाके कादाचित्क ( अनित्य ) होनेपर भी बीजकी अंकुर उत्पादन करनेकी
शक्तिको कादाचित्क नहीं कह सकते, क्योंकि बीजकी वह अंकुर उत्पादन करनेकी शक्ति कथंचित् अनित्य
होती है । इसी तरह आत्माके सदा विद्यमान रहनेपर भी कर्मोंके क्षय और उपशमकी विचित्रतासे
इन्द्रिय, मन आदिके सहकार मिलनेपर ही 'अहं प्रत्यय' होता है, जो कादाचित्क ( अनित्य ) होता है ।
( घ ) आत्माको सिद्ध करनेवाले 'व्यभिचारी हेतुका अभाव', जो कहा है, वह भी ठीक
नहीं हैं । क्योंकि जिनका आत्मरूप साध्यके साथ अविनाभावी संबंध विद्यमान है, ऐसे अनेक हेतु हैं :
( १ ) रूप आदिको जाननेकी क्रियाका कर्ता विद्यमान है, क्योंकि रूप आदिको जानना क्रियारूप हैं, जैसे
छेदन क्रिया । जैसे छेदन रूप क्रियाका कोई काटनेवाला देखा जाता है, उसी तरह रूप आदि रूप
क्रियाका कोई कर्ता होना चाहिये । इन रूप आदिको जाननेकी जो क्रिया है उसका कर्ता आत्मा
ही है । यदि कहो कि चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदिको जाननेकी क्रियाके विषयमें कर्ता हैं, इसलिये
आत्माके माननेकी आवश्यकता नहीं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि जिस प्रकार कुठार आदि करण होनेसे
किसी दूसरे कर्ताके आधीन रहते हैं, उसी तरह इन्द्रियाँ करण हैं, इसलिये वे भी परतंत्र हैं । तथा,
इन्द्रियाँ पौद्गलिक होनेसे अचेतन होनेके कारण, दूसरेकी प्रेरणासे कार्य करनेके कारण और प्रयोक्ताकी क्रियाकी
अपेक्षाके अभावमें उनकी प्रवृत्ति न होनेके कारण, वे करणरूप हैं । यदि स्वयं इन्द्रियाँ ही रूप आदिको
जाननेकी क्रियाकी कर्ता हों, तो इन्द्रियोंके नष्ट होनेपर, इन्द्रियोंसे पूर्वकालमें अनुभूत पदार्थोंका स्मरण नहीं
१. बाह्याभ्यन्तरहेतुद्वयसन्निधाने यथासंभवमुपलब्धुश्चैतन्यानुविधायी परिणामः उपयोगः । राजवार्तिके पृ. ८२ ।
१७४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १७
कुतः संभवः । किञ्च, इन्द्रियाणां स्वस्वविषयनियतत्वेन रूपरसयोः साहचर्यप्रतीतौ न साम-
र्थ्यम् । अस्ति च तथाविधफलादे रूपग्रहणानन्तरं तत्सहचरितरसानुस्मरणम्, दन्तोदकसं-
प्लवान्यथानुपपत्तेः। तस्मादुभयोर्गवाक्षयोरन्तर्गतः प्रेक्षक इव द्वाभ्यामिन्द्रियाभ्यां रूपरसयोर्दर्शी
कश्चिदेकोऽनुमीयते । तस्मात्करणान्येतानि यश्चैषां व्यापारयिता स आत्मा ॥
तथा साधनोपादानपरिवर्जनद्वारेण हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्था चेष्टा प्रयत्नपूर्विका,
विशिष्टक्रियात्वात्, रथक्रियावत् । शरीरं प्रयत्नवदधिष्ठितम्, विशिष्टक्रियाश्रयत्वात्, रथवत् ।
यश्चास्याधिष्ठाता स आत्मा, सारथिवत् । तथात्रैव पक्षे, इच्छापूर्वकविकृतवाय्वाश्रयत्वाद्
भस्त्रावत् । वायुश्च प्राणापानादिः । यश्चास्याधिष्ठाता स आत्मा, भस्त्राध्मापयितृवत् ।
तथात्रैव पक्षे, इच्छाधीननिमेषोन्मेषवदवयवयोगित्वाद्, दारुयन्त्रवत् । तथा शरीरस्य वृद्धि-
क्षतभग्नसंरोहणं च प्रयत्नवत्कृतम् , वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणत्वाद्, गृहवृद्धिक्षतभग्नसंरोहणवत् ।
वृक्षादिगतेन वृद्ध्यादिना व्यभिचार इति चेत्, न । तेषामपि एकेन्द्रियजन्तुत्वेन सात्मक-
त्वात् । यश्चैषां कर्ता, स आत्मा, गृहपतिवत् । वृक्षादीनां च 'सात्मकत्वमाचाराङ्गादेरवसे-
यम् । किंचिद्वक्ष्यते च ॥
तथा प्रेर्यं मनः, अभिमतविषयसम्बन्धीनिमित्तक्रियाश्रयत्वाद्, दारकहस्तगतगोलकवत् ।
यश्चास्य प्रेरकः स आत्मा इति । तथा आत्मचेतनक्षेत्रज्ञजीवपुद्गलादयः पर्याया न निर्वि-
होना चाहियें । तथा, 'मैने देखा, मैने छुआ, मैने सूँघा, मैने चाखा, मैने सुना', इस प्रकार विविध इन्द्रियोंसे
उत्पन्न होनेवाला ज्ञान एक कर्ताके साथ संवद्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रत्येक इन्द्रियका विषय अलग
अलग है, इसलिये रूप और रसका एक साथ ज्ञान करनेमें वे समर्थ नहीं हैं; परन्तु हम देखते हैं कि
आम वगैरह फलके देखते ही मुँहमें पानी आ जानेसे, साथ ही साथ, आमके रसका भी अनुभव होता
हैं। अतएव दो खिड़कियोंमेंसे देखनेवाले प्रेक्षककी तरह, दो इन्द्रियों ( नेत्र और रसना ) द्वारा रूप
और रसको अनुभव करनेवाला एक आत्मा ही है । इसलिये ये इन्द्रियाँ करण हैं, और इन इन्द्रियोंका
प्रेरक आत्मा है ।
( २ ) हित रूप साधनोंका ग्रहण और अहित रूप साधनोंका त्याग प्रयत्नपूर्वक ही होता है, क्योंकि
यह क्रिया है । जितनी क्रिया होती हैं, वे सब यत्नपूर्वक होती हैं । जैसे रथकी चलनेकी क्रिया सारथिके
प्रयत्नसे होती है, वैसे ही शरीरको नियत दिशामें लेजानेवाली चेष्टा आत्माके प्रयत्नसे होती है । यही आत्मा
रथको चलानेवाले सारथिकी तरह कर्ता है । (३) जिस प्रकार वायुकी सहायतासे कोई पुरुष धोंकनीको फूंकता
है, वैसे ही इच्छापूर्वक श्वासोच्छ्वास रूप वायुसे शरीर रूपी धोंकनीको फूंकनेवाला शरीरका अधिष्ठाता आत्मा
है । (४) जिस प्रकार लकड़ीके बने मशीनके खिलौनेकी आखोंका खुलना और बंद होना किसी कर्ताके अधीन
रहता है, उसी प्रकार शरीर रूपी यंत्रका कर्ता किसी आत्माको स्वीकार करना चाहिये । ( ५ ) जैसे घरका
बनाना, फोड़ना और टूटे हुएकी मरम्मत करना आदि किसी कर्ताद्वारा किये जाते हैं, उसी प्रकार शरीरकी
वृद्धि, हानि, घावका भर जाना आदि कार्य आत्माके स्वीकार करनेसे ही बन सकते हैं । यदि कहो कि वृक्ष
आदिमें जो वृद्धि, हानि होती है, उसका कोई अधिष्ठाता नहीं देखा जाता, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि वृक्ष
आदि एकेन्द्रिय जीव हैं, इसलिए उनमें भी आत्मा है । वृक्ष आदिमें आत्माकी सिद्धि आचारांग ( १-१-५)
से जाननी चाहिये । इसका वर्णन आगे भी किया जायगा ( देखिये श्लोक २९ की व्याख्या ) ।
( ६ ) तथा जिसप्रकार बालकके हाथकी गेंद अभिमत विषयके साथ होनेवाले संबंध की निमित्तभूत
क्रियाका आश्रय होनेसे प्रेर्य ( प्रेरित करनेके योग्य-फेंकने के योग्य ) होती है; अर्थात् जिस प्रकार दीवार पर
१ आचाराङ्गसूत्रश्रुतस्कंधे १-१-५
अन्य. यो. व्य. श्लोक १७ ] स्याद्वादमञ्जरी १७५
पयाः, पर्यायत्वाद्, घटकुटकलशादिपर्यायवत् । व्यतिरेके षष्ठभूतादि । यश्चैषां विषयः स
आत्मा । तथा अस्त्यात्मा, असमस्तपर्यायवाच्यत्वात् । यो योऽसाङ्केतिकशुद्धपर्यायवाच्यः,
स सोऽस्तित्वं न व्यभिचरति, यथा घटादिः । व्यतिरेके खरविषाणनभोऽम्भोरुहादयः । तथा
सुखादीनि द्रव्याश्रितानि, गुणत्वाद्, रूपवत् । योऽसौ गुणी स आत्मा । इत्यादिलिङ्गानि ।
तस्मादनुमानतोऽप्यात्मा सिद्धः ॥
आगमानां च येषां पूर्वापरविरुद्धार्थत्वम् तेषामप्रामाण्यमेव । यस्त्वाप्तप्रणीत आगमः स
प्रमाणमेव, कषच्छेदतापलक्षणोपाधित्रयविशुद्धत्वात् । कषादीनां च स्वरूपं पुरस्ताद्वक्ष्यामः ।
न च वाच्यमाप्तः क्षीणसर्वदोषः तथाविधं चाप्तत्वं कस्यापि नास्तीति । यतः रागादयः कस्य-
चिदत्यन्तमुच्छिद्यन्ते, अस्मदादिषु तदुच्छेदप्रकर्षापकर्षोपलम्भात्, सूर्याद्यावरकजलदपटलवत् ।
तथा चाहुः—
पटकनेकी इच्छासे बालक जिस गेंदको अपने हाथमें लेता है, वह गेंद दीवारकी ओर जानेकी क्रियाका आश्रय
होनेवाली होनेसे प्रेर्य–पटकने योग्य होती है, उसी प्रकार मन अभिमत विषयके साथ होनेवाले संबंधकी निमित्त
भूत क्रियाका आश्रय होनेसे प्रेर्य है । इस मनकी प्रेरक आत्मा है । (७) तथा, जिस प्रकार घट, कुट, कलश
आदि पर्यायें पर्यायरूप होनेसे निराश्रय नहीं होतीं (उनका उपादानभूत मृत्तिका रूप विद्यमान होता है),
उसी प्रकार आत्मा, चेतन, क्षेत्रज्ञ, जीव, पुद्गल (पुद्गल-संज्ञक जीव द्रव्य) आदि (निष्पर्याय द्रव्य)
पर्यायें पर्यायरूप होनेसे निराश्रय (उपादानके बिना) नहीं होतीं । (साध्यके अभावमें जब साधनका
अभाव बताया जाता है, तब व्यतिरेकदृष्टांत होता है) । षष्ठभूत आदिका अभाव होने पर उनकी पर्यायोंका
अभाव होना व्यतिरेकदृष्टांत है । (तात्पर्य यह कि जिस प्रकार षष्ठभूतका अभाव होनेके कारण उसकी
पर्यायोंके द्वारा षष्ठभूतके अस्तित्वकी सिद्धि नहीं की जा सकती, उसी प्रकार पर्यायका अभाव होनेसे पर्यायी
आत्माके अभावकी सिद्धि नहीं की जा सकती । आत्माकी पर्यायोंका सद्भाव होनेसे उनके द्वारा आत्माकी
सिद्धि की जा सकती है ।) इन चेतन, आत्मा आदि पर्यायोंका आश्रय आत्मा है । (८) तथा, आत्मा
अस्तिरूप है, क्योंकि वह अपनी अनारोपित शुद्ध पर्यायके द्वारा वाच्य कहा जाता है । (असमस्त अर्थात्
अमिश्रित–शुद्ध । सोने और तांबेके मिश्रणसे बनाये आभूषणसे जिस प्रकार शुद्ध सुवर्णका ज्ञान नहीं होता,
उसी प्रकार आत्माकी अशुद्ध पर्यायसे शुद्ध आत्माका ज्ञान नहीं होता—आत्माकी शुद्ध पर्यायसे ही आत्माका
ज्ञान होता है) । जो अनारोपित शुद्ध होनेसे, जिसपर शुद्धत्वका आरोप नहीं किया गया होता, ऐसी शुद्ध
पर्यायके द्वारा वाच्य होता है, वह अस्तित्वरहित नहीं होता, जैसे घट आदि (घट आदिके कपाल आदि शुद्ध
पर्यायके द्वारा जिस प्रकार घट आदिका ज्ञान होता है; उसी प्रकार आत्माकी शुद्ध पर्यायके द्वारा शुद्ध
आत्माका ज्ञान होता है) । खरविषाण, आकाशपुष्प आदिका अभाव होनेसे उनकी अनारोपित शुद्ध पर्यायों
का अभाव होना, यह व्यतिरेकदृष्टांत है । (तात्पर्य यह कि जिस प्रकार खरविषाण आदिका अभाव होनेसे,
उनकी शुद्ध पर्यायोंका अभाव होनेके कारण, उन पर्यायोंके द्वारा खरविषाण आदि वाच्य नहीं होते, उसी
प्रकार आत्माकी शुद्ध पर्यायका अभाव न होनेसे–सद्भाव होनेसे–उसके द्वारा आत्मा वाच्य होती है) । (९)
तथा, जिसप्रकार रूप गुण होनेसे द्रव्यके आश्रित होता है, उसी प्रकार सुख आदि गुण होनेसे द्रव्यके आश्रित
होते हैं । जो गुणोंका आश्रय है, वह आत्मा है । इस प्रकार आत्माके अस्तित्वको सिद्ध करनेवाले अनेक
हेतुओंका सद्भाव पाया जाता है । अतएव अनुमानसे भी आत्माकी सिद्धि होती है ।
तथा, आप लोगोंने जो 'आगमोंका परस्पर विरोध' दिखलाया, वह भी ठीक नहीं । क्योंकि हम
आप्तके द्वारा प्रणीत आगमको ही प्रमाण मानते हैं, परस्पर विरुद्ध अर्थके प्रतिपादन करनेवाले आगमको
नहीं । आप्तकथित आगममें कष, छेद और ताप रूप उपाधियोंका निषेध किया गया है, इसलिये वह आगम
प्रमाण है । (कष आदिका स्वरूप बत्तीसवें श्लोककी व्याख्यामें बताया गया है) । शंका—जिसके सम्पूर्ण