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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 458 में से

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पृष्ठ 215

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६३
संवेदनतामात्रेणैव नीलं गृह्णाति, स्वसंवेदनतामात्रेणैव च नीलबुद्धिम् । तदेवमनयोर्युगपद्
ग्रहणात्सहोलम्भनियमोऽस्ति अभेदश्च नास्ति । इति सहोपलम्भनियमरूपस्य हेतोर्विपक्षाद्
व्यावृत्तेः संदिग्धत्वात् संदिग्धानैकान्तिकत्वम् । असिद्धश्च सहोपलम्भनियमः, नीलमेतत् इति
बहिर्मुखतयाऽर्थेनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य नीलाद्नुभवस्याननुभवात्, इति कथं प्रत्यक्ष-
स्यानुमानेन ज्ञानार्थयोरभेदसिद्ध्या भ्रान्तत्वम् । अपि च, प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनावाधितविषय-
त्वादन्नुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वम्, इत्यन्योन्याश्रयदोषोऽपि
दुर्निवारः । अर्थाभावे च नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिः कुतः । न हि तत्र विवक्षितदेशेऽय-
मारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः ॥
वासनानियमात्तदारोपनियम इति चेत् । न । तस्या अपि तद्देशनियमकारणत्वाभावात् ।
सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशोऽनुभवः तद्देशा च तत्पूर्विका वासना । बाह्यार्थाभावे तु तस्याः
किंकृतो देशनियमः ॥
गया सहोपलंभरूप हेतु संदिग्धानैकांतिक होनेसे अनुमानाभास है । ( जिस हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध
होती है, उस हेतु को संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभास कहा जाता है ) । ज्ञान परमार्थतः स्व और पर को जानने-
वाला होता है । परसंवेदन स्वभावके कारण ही ज्ञान नील पदार्थ को जानता है, तथा स्वसंवेदन स्वभावके
कारण नीलके ज्ञान को ग्रहण करता है । इस प्रकार नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान, इन दोनों को
एक साथ ग्रहण करनेसे सहोपलंभ नियम का सद्भाव है । तथा नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान; इन
दोनोंमें अभेद नहीं है । इस प्रकार सहोपलंभ नियम रूप हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध होनेके कारण
उस हेतु का संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभासत्व सिद्ध हो जाता है । ( ख ) ज्ञान और अर्थ की एक साथ उप-
लब्धि होने का नियम असिद्ध है—उसकी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि ‘यह नील है,’ इस प्रकार वहिर्मुख रूपसे
जब पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी समय अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव नहीं होता । इस प्रकार नील पदार्थ
का ज्ञान तथा अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव एक साथ न होनेसे, सहोपलंभ नियमके स्वरूप की सिद्धि नहीं
होती । इससे सहोपलंभ नियमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास ठहरता है और अनुमान नहीं बनता । ऐसी हालत-
में असिद्ध अनुमानद्वारा सिद्ध किये जानेवाले ज्ञान और अर्थके अभेद द्वारा प्रत्यक्ष का भ्रान्तत्व कैसे सिद्ध हो
सकता है ? ( ग ) तथा, यदि प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो, तो अनुमानका विषय अबाधित सिद्ध होनेसे अनु-
मान की उत्पत्ति हो, तथा अनुमान की उत्पत्ति होने पर प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो—इस प्रकार अनुमान
और प्रत्यक्षके परस्पर अन्योन्याश्रित होनेसे अन्योन्याश्रय दोष दुर्निवार हो जाता है । इसलिये प्रत्यक्ष अथवा
अनुमानसे भी ज्ञान और पदार्थमें अभेद सिद्ध नहीं होता । तथा, यथार्थ का अभाव होने पर पदार्थोंके निश्चित
स्थानकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए । इसलिये विवक्षित स्थानमें ही अमुक पदार्थ का आरोप करना चाहिये,
अन्यत्र नहीं, इस नियम का कारण नहीं बन सकता ।
विज्ञानवादी बौद्ध—हम लोग वासनाद्वारा प्रतिनियत स्थानमें रहनेवाले पदार्थोंका ज्ञान करते हैं ।
( घटके प्रतिनियत स्थानमें रहनेसे उस स्थानका स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, परन्तु हम वासनाके द्वारा
अमुक पदार्थके अमुक स्थानमें स्थित रहनेका ज्ञान करते हैं । अतएव बाह्य पदार्थोंका ज्ञान हमारी वासनाके
कारण होता है, वास्तवमें बाह्य पदार्थ स्वतन्त्र वस्तु नहीं है ) । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि हम वासना-
से पदार्थके प्रतिनियत स्थानका ज्ञान नहीं कर सकते । पदार्थके होनेपर ही जिस स्थानमें पदार्थका अस्तित्व
होता है, उसी स्थानमें पदार्थका ज्ञान होता है, और उसी स्थानमें पदार्थज्ञानपूर्वक वासना उत्पन्न होती हैं ।
बाह्य पदार्थका अभाव होनेपर केवल उस वासना द्वारा पदार्थके प्रतिनियत स्थानका निश्चय कौन कर
सकता है ? अतएव यदि बाह्य पदार्थ कोई वस्तु नहीं है, तो प्रतिनियत स्थानके निश्चयका कोई नियम नहीं
बन सकता ।