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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 458 में से

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पृष्ठ 219

वेदन ज्ञानमें क्रियाका अभाव होनेसे कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता । क्योंकि स्वसंवेदनसे स्वसंवेदनकी
उत्पत्ति नहीं होती । ( ट ) कपालके प्रथम क्षणसे घटका अंतिम क्षण उत्पन्न होता है, परन्तु कपालके प्रथम
क्षणसे घटके अंतिम क्षणका ज्ञान नहीं होता । इसी प्रकार समानजातीय ज्ञानसे समनन्तर ज्ञानके उत्पन्न
होनेपर समानजातीयसे समनन्तर ज्ञानका ज्ञान नहीं होता । ( ठ ) अतएव जिस समय ज्ञानको आवरण
करनेवाले कर्मका क्षयोपशम हो जानेसे आत्मामें क्षय और उपशम रूप योग्यता होती है, उसी समय प्रतिनियत
पदार्थोंका ज्ञान स्वीकार करना चाहिये ।
योगाचार ( बौद्ध )—( ४ ) ज्ञान मात्र ही परमार्थसत् है, क्योंकि ज्ञानका कारण कोई बाह्य
पदार्थ नहीं है । बाह्यार्थवादी परमाणुओंके समूहको बाह्य पदार्थ कहते हैं, अथवा स्थूल अवयवीरूप पिंडको ?
प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंकी सिद्धि नहीं होती, अतएव बाह्य पदार्थ परमाणुरूप
नहीं हो सकते । तथा बाह्य पदार्थोंकी परमाणुरूप सिद्धि न होनेसे उन्हें स्थूल अवयवी भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि परमाणुओंके समूहको अवयवी कहते हैं । अतएव जो नील, पीत आदि पदार्थ प्रतिभासित होते हैं,
वे सब ज्ञानरूप ही हैं । जिस प्रकार बाह्य आलम्बनके बिना आकाशमें केशका ज्ञान होता है, उसी तरह
अनादि कालकी अविद्याकी वासनासे बाह्य पदार्थोंके अवलम्बनके बिना ही घट, पट आदि पदार्थोंका ज्ञान
होता है । वास्तवमें स्वयं ज्ञान ही ग्राह्य और ग्राहकरूप प्रतिभासित होता है । जैन ( क ) यदि बाह्य
पदार्थोंको ज्ञानका विषय नहीं माना जाय, तो ज्ञानको निर्विषय माननेसे ज्ञानको अप्रमाण मानना पड़ेगा ।
वास्तविक बाह्य पदार्थोंके बिना हमें ज्ञान मात्रसे ही पदार्थोंका प्रतिभास नहीं हो सकता । ज्ञानसे बाह्य
पदार्थोंका ज्ञान होना अनुभवसे सिद्ध है । ( ख ) परमाणुरूप बाह्य पदार्थकी प्रत्यक्ष और अनुमानसे सिद्धि
होती है । क्योंकि हम परमाणुओंके कार्य घट आदिके प्रत्यक्षसे परमाणुओंका कथंचित् प्रत्यक्ष करते हैं ।
इसलिये परमाणुओंकी अनुमानसे भी सिद्धि होती है; क्योंकि परमाणुओंके अस्तित्वके बिना घट आदि स्थूल
अवयवीकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । अवयव ( परमाणु ) और अवयवीका हमलोग कथंचित् भेदाभेद स्वीकार
करते हैं, अतएव बाह्य पदार्थोंको परमाणु और स्थूल अवयवी दोनों रूप मानना चाहिये । ( ग ) वासना-
वैचित्र्यसे भी पदार्थोंका नाना रूप प्रतिभासित मानना ठीक नहीं । क्योंकि बाह्य पदार्थोंके अनुभव होनेपर ही
वासना उत्पन्न होती है । तथा ज्ञान और वासनाको अलग-अलग माननेसे ज्ञानाद्वैत नहीं बन सकता ।
योगाचार—'जो जिसके साथ उपलब्ध नहीं होता है, वह उससे अभिन्न है । जैसे आकाश-चन्द्रमा
जल-चन्द्रमाके साथ उपलब्ध होता है, इसलिये दोनों परस्पर अभिन्न हैं । इसी तरह ज्ञान और पदार्थ एक
साथ उपलब्ध होते हैं । अतएव ज्ञान और पदार्थ एक दूसरेसे अभिन्न हैं'—इस अनुमानसे ज्ञान और पदार्थकी
अभिन्नता सिद्ध होती है । जैन—यह अनुमान संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभास है । क्योंकि ज्ञानसे जाने हुए
नील और नीलज्ञानमें सहोपलंभ नियम होनेपर भी उनमें अभिन्नता नहीं पायी जाती । तथा सहोपलंभ
नियम पक्षमें नहीं रहनेके कारण असिद्ध भी है । क्योंकि ज्ञान और पदार्थमें अभेद सिद्ध नहीं होता ।
तथा, बाह्य पदार्थोंका अभाव माननेसे, यह वस्तु इसी स्थानपर है, दूसरे स्थानपर नहीं, यह नियम नहीं बन
सकता । अतएव नील, पीत आदि ज्ञानसे भिन्न हैं, क्योंकि ज्ञान और ज्ञेय परस्पर विरोधी हैं । ज्ञान अन्तरंग
है, ज्ञेय बाह्य; ज्ञान ज्ञेयके पश्चात् उत्पन्न होता है, ज्ञेय ज्ञानके पूर्व; ज्ञान आत्मामें उत्पन्न होता है, ज्ञान
अपने भिन्न कारणोंसे; तथा ज्ञान प्रकाशक है, और ज्ञेय जड़ है । अतएव विज्ञानाद्वैतको न मान कर ज्ञान और
बाह्य पदार्थोंका परस्पर भेद मानना चाहिये ।