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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 458 में से

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पृष्ठ 211

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५६
अलङ्कारकारेणोप्युक्तम्—
“यदि संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ।
न चेत् संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ॥”
यदि बाह्योऽर्थो नास्ति, किंविषयस्तर्ह्ययं घटपटादिप्रतिभासः इति चेत्, ननु निरालम्बन
एवायमनादिवितथवासनाप्रवर्तितः, निर्विषयत्वात्, आकाशकेशज्ञानवत्, स्वप्नज्ञानवद् वेति ।
अत एवोक्तम्—
“नान्योऽनुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः ।
ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वयं सैव प्रकाशते ॥²
बाह्यो न विद्यते ह्यर्थो यथा बालैर्विकल्प्यते ।
वासनालुठितं चित्तमर्थाभासे प्रवर्तते” ॥ इति ॥
तदेतत्सर्वमवद्यम् । ज्ञानमिति हि क्रियाशब्दः । ततो ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं, ज्ञप्तिर्वा
ज्ञानमिति । अस्य च कर्मणा भाव्यं, निर्विषयाया ज्ञप्तेरघटनात् । न चाकाशकेशादौ निर्विष-
यमपि दृष्टं ज्ञानमिति वाच्यम्, तस्याप्येकान्तेन निर्विषयत्वाभावात् । न हि सर्वथागृहीत-
वाले इन्द्रियगोचर दृश्य पदार्थ अस्तिरूप नहीं हैं ।”
अलंकारकार ( प्रज्ञाकरगुप्त ) ने भी कहा है—
“यदि नील पदार्थका अनुभव किया जाता है तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे कह
सकते हैं ? यदि नील पदार्थका अनुभव नहीं किया जाता तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे
कह सकते हैं ।” ( जो जिसका होता है वह उसका अनुभव कर सकता है । नील पदार्थका अनुभव ज्ञानके
द्वारा किया जाता है तो वह नील पदार्थ ज्ञानका—ज्ञानरूप—होना चाहिये । नील पदार्थका ज्ञान नहीं
होता तो उसे बाह्य पदार्थ नहीं कह सकते । जिस पदार्थका किसी भी हालतमें ज्ञान होता ही नहीं, उसका
बाह्य अस्तित्व नहीं हो सकता, और जिसका अस्तित्व होता है उसका किसी न किसी प्रकारसे ज्ञान
होता ही है ) ।
शंका—यदि बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं है तो घट, पट आदिका ज्ञान किस प्रकार होता है ?
समाधान—जिस प्रकार आकाशकेशरूप बाह्य पदार्थके अभावमें आकाशकेशका ज्ञान होता है, अथवा
जिसप्रकार स्वप्नज्ञानका विषय बने हुए पदार्थका वस्तुतः सद्भाव न होनेपर भी स्वप्नमें उसका ज्ञान होता
है, उसी तरह घट, पट आदि बाह्य पदार्थोंका अभाव होनेसे, आलंबनरहित होनेपर भी, अनादि मिथ्या-
वासनाके कारण घट, पट आदिका ज्ञान होता है । इसलिए कहा है—
“जिसका बुद्धिके द्वारा अनुभव किया जाता है, वह बुद्धिसे भिन्न नहीं होता । अनुभव बुद्धिसे भिन्न
नहीं है । ग्राह्य-ग्राहक ( अनुभाव्य-अनुभावक ) भावसे रहित होनेसे बुद्धि स्वयं प्रकाशित होती है । मूर्खो
द्वारा कल्पित बाह्य अर्थ विद्यमान नहीं है । ( अनादि ) वासनासे प्रतिहत चित्त ( बुद्धि ) अर्थाभास ( अयथार्थ
अर्थ ) में प्रवृत्त होता है ।”
( ४ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । ज्ञान शब्द क्रियाका द्योतक है । जिसके द्वारा जाना जाय, अथवा
जानने मात्रको ज्ञान कहते हैं । ज्ञान ( क्रिया ) के कोई कर्म अवश्य होना चाहिये, क्योंकि ज्ञान निर्विषय नहीं
होता । यदि आकाशमें निर्विषय केशज्ञानकी तरह मिथ्या ज्ञानको ही ज्ञानका विषय मानो, तो यह भी ठीक
नहीं । क्योंकि आकाशमें केशज्ञान भी एकान्त रूपसे निर्विषय नहीं है । कारण कि जिसने कभी वास्तविक
१. प्रज्ञाकरगुप्तकृतः प्रमाणवार्तिकालङ्काराख्यो बौद्धग्रन्थः ।
२. प्रमाणवार्तिके ३-३२७ ।