स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
अथोत्तराद्धं व्याख्यातुमुपक्रम्यते । तत्र च बाह्यार्थनिरपेक्षं ज्ञानाद्वैतमेव ये बौद्धविशेषा
मन्वते तेषां प्रतिक्षेपः । तन्मतं चेदम् । ग्राह्यग्राहकादिकल्पनारहितं निष्प्रपञ्चं ज्ञानमात्रं परमार्थ-
सत् । बाह्यार्थस्तु विचारमेव न क्षमते । तथाहि । कोऽयं बाह्योऽर्थः ? किं परमाणुरूपः स्थूला-
वयविरूपो वा ? न तावत् परमाणुरूपः, प्रमाणाभावात् । प्रमाणं हि प्रत्यक्षमनुमानं वा ?
न तावत्प्रत्यक्षं तत्साधनबद्धकक्षम् । तद्धि योगिनां¹ स्यात् अस्मदादीनां वा ? नाद्यम्,
अत्यन्तविप्रकृष्टतया श्रद्धामात्रगम्यत्वात् । न द्वितीयम्, अनुभवबाधितत्वात् । न हि वयमयं
परमाणुरयं परमाणुरिति स्वप्नेऽपि प्रतीमः, स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमित्येवमेव नः सदैव संवेदनो-
दयात् । नाप्यनुमानेन तत्सिद्धिः, अणूनामतीन्द्रियत्वेन तैः सहाविनाभावस्य क्वापि लिङ्गे
ग्रहीतुमशक्यत्वात् ॥
किञ्च, अमी नित्या अनित्या वा स्युः । नित्याश्चेत्, क्रमेणार्थक्रियाकारिणो युगपद्वा ?
न क्रमेण, स्वभावभेदेनानित्यत्वापत्तेः । न युगपत्, एकक्षण एव कृत्स्नार्थक्रियाकरणात् क्षणान्तरे
तदभावादसत्त्वापत्तिः । अनित्याश्चेत्, क्षणिकाः कालान्तरस्थायिनो वा ? क्षणिकाश्चेत्,
सहेतुका निर्हेतुका वा ? निर्हेतुकाश्चेत्, नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा स्यात्, निरपेक्षत्वात् ।
अपेक्षातो हि कादाचित्कत्वम् । सहेतुकाश्चेत्, किं तेषां स्थूलं किंचित् कारणं परमाणवो
( ४ ) ज्ञानाद्वैतवादी ( पूर्वपक्ष ) — ग्राह्य, ग्राहक आदिसे रहित निष्प्रपंच ज्ञान मात्र ही परमार्थसत्
है, क्योंकि बाह्य पदार्थोंका अभाव है । हम पूछते हैं कि परमाणुओंके समूहको बाह्य पदार्थ कहते हैं, अथवा
स्थूल अवयवीरूप एक पिंडको ? यदि परमाणुओंके समूहको बाह्य अर्थ कहते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि
प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाणसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । योगिप्रत्यक्ष अत्यन्त परोक्ष
है, और वह केवल श्रद्धाका ही विषय है, इसलिये योगिप्रत्यक्षसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं
होता । इन्द्रियप्रत्यक्षसे भी बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि इन्द्रियप्रत्यक्षसे परमाणुरूप सूक्ष्म
पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उससे केवल स्तंभ ( खंभा ) और कुंभ ( घड़ा ) रूप स्थूल पदार्थोंका ही
ज्ञान हो सकता है । अनुमानसे भी परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय
पदार्थ हैं, इसलिये परमाणुरूप साध्यका प्रत्यक्षसे ज्ञान न होनेके कारण, साध्यके अविनाभावी हेतुका भी
ज्ञान नहीं हो सकता ।
तथा, परमाणु नित्य हैं, या अनित्य ? यदि नित्य हैं तो क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, अथवा एक
साथ ? यदि परमाणु नित्य होकर क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि परमाणुओंमें क्रमसे
अर्थक्रिया माननेमें परमाणुओंमें स्वभावका भेद मानना पड़ेगा । तथा परमाणुओंमें स्वभाव-भेद माननेसे
परमाणुओंको नित्य नहीं कह सकते । परमाणु एक साथ भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते । क्योंकि यदि परमाणु
एक साथ समस्त अर्थक्रिया करने लगें, तो विश्वमें जो क्रम-क्रमसे परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, वह नहीं
होना चाहिये । तथा समस्त अर्थक्रियाके एक ही समयमें समाप्त हो जानेसे दूसरे क्षणमें अर्थक्रियाका अभाव
होगा, इसलिये परमाणुओंका अस्तित्व ही नष्ट हो जायगा । यदि परमाणु अनित्य हैं, तो वे क्षणिक हैं,
अथवा एक क्षणके बाद भी रहते हैं ? यदि परमाणु क्षणिक हैं, तो वे किसी कारणसे उत्पन्न हुए हैं ? या
किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं ? यदि परमाणु किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं तो उन परमाणुओंका
या तो नित्यकाल अस्तित्व होगा ( विनश्वर न होनेसे वे क्षणिक नहीं होंगे ) ? अथवा नित्यकाल उनका
अभाव होगा ( उत्पादक, उपादान और निमित्त कारणोंका सदा अभाव होनेसे उन परमाणुओंका सभी
कालोंमें अभाव होगा ) ? क्योंकि निर्हेतुक पदार्थ उत्पत्तिके कारणोंकी अपेक्षा नहीं रखते । कादाचित्कत्व —
अनित्यत्व — उत्पादक कारणोंकी अपेक्षा रखने ही होता है । ( तात्पर्य यह है कि परमाणुओंको अनित्य भी
१. भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति—न्यायविन्दौ १-११.