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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

१३६ श्रीमद्रामचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
महाभूतभेदात् त्रयोविंशतिविधं व्यक्तम् । पुरुषश्चिद्रूप इति । तथा च ईश्वरकृष्णः—
“मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥”१
प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकानां लाघवोष्टम्भगौरवधर्माणां परस्परोपकारिणां त्रयाणां गुणानां
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । प्रधानमव्यक्तमित्यनर्थान्तरम् । तच्च अनादिमध्यान्त-
मनवयवं साधारणमशब्दमस्पर्शमरूपमगन्धमव्ययम् । प्रधानाद् बुद्धिर्महदित्यपरपर्यायोत्पद्यते ।
योऽयमध्यवसायो गवादिषु प्रतिपत्तिः एवमेतद् नान्यथा, गौरेवायं नाश्वः, स्थाणुरेव नायं पुरुष
इत्येषा बुद्धिः । तस्यास्त्वष्टौ रूपाणि धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यरूपाणि चत्वारि सात्त्विकानि । अधर्मा-
दीनि तु तत्प्रतिपक्षभूतानि चत्वारि तामसानि ॥
बुद्धेः अहङ्कारः । स च अभिमानात्मकः । अहं शब्देऽहं स्पर्शेऽहं रूपेऽहं गन्धेऽहं रसेऽहं
स्वामी अहमीश्वरः असौ मया हतः ससत्वोऽहममुं हनिष्यामीत्यादिप्रत्ययरूपः । तस्मात्
पञ्चतन्मात्राणि शब्दतन्मात्रादीनि अविशेषरूपाणि सूक्ष्मपर्यायवाच्यानि । शब्दतन्मात्राद् हि
शब्द एवोपलभ्यते, न पुनरुदात्तानुदात्तस्वरितकम्पितषड्जादिभेदाः२ । षड्जादयः शब्दविशेषा-
दुपलभ्यन्ते । एवं स्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्रेष्वपि योजनीयमिति । तत एव चाहङ्काराद् एकादशे-
न्द्रियाणि च । तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं त्वगिति पंचबुद्धीन्द्रियाणि । वाक्पाणिपादपायूपस्थाः
पञ्चकर्मेन्द्रियाणि । एकादशं मन इति ॥
गन्ध (पांच तन्मात्रा), ९-१९ घ्राण, रसना, चक्षु, स्पर्श और श्रोत्र (पांच बुद्धीन्द्रिय), और वाक् (वचन)
पाणि (हाथ), पाद (पांव), पायु (गुदा), उपस्थ (लिंग) (पांच कर्मेन्द्रिय), तथा मन, २०-२४ आकाश,
वायु, तेज, जल और पृथिवी (पांच महाभूत), तथा २५ प्रकृति और विकृति रहित पुरुष (चित्) । ईश्वर-
कृष्णने कहा भी है—
“पच्चीस तत्त्वोंका मूल कारण प्रकृति (प्रधान-अव्यक्त) है, यह स्वयं किसीका विकार नहीं है
(अविकृति) । महत्, अहंकार और पांच तन्मात्रायें ये प्रकृति और विकृति दोनों हैं (महत्त्व अहंकारकी
प्रकृति, और मूल प्रकृतिकी विकृति है । अहंकार पांच तन्मात्रा और इन्द्रियोंकी प्रकृति, और महान्की विकृति
है । पांच तन्मात्रायें पंचभूतोंकी प्रकृति और अहंकारकी विकृति है) । तथा ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महा-
भूत ये सोलह तत्त्व विकृति रूप ही हैं । पुरुष प्रकृति और विकृति दोनोंसे रहित है ।”
एक दूसरेका उपकार करनेवाले प्रीति और लाघव रूप सत्त्व, अप्रीति और उपष्टंभ रूप रज, और
विषाद और गौरव रूप तम गुणोंकी साम्य अवस्थाको प्रकृति, प्रधान अथवा अव्यक्त कहते हैं । यह प्रधान
आदि, मध्य, अन्त और अवयव रहित है, साधारण है, शब्द, स्पर्श, रूप और गन्धसे रहित, तथा अविनाशी
है । प्रधानसे बुद्धि अथवा महान् उत्पन्न होता है । यह गो ही है, घोड़ा नहीं; पुरुष ही है, ठूंठ नहीं, इस प्रकार
किसी वस्तुके निश्चयरूप ज्ञानको बुद्धि कहते हैं । बुद्धिके धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्त्विक) और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, और अनैश्वर्य (तामसिक) ये आठ गुण हैं ।
बुद्धिसे अहंकार होता है । यह अहंकार 'मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ, मैं देखता हूँ, मैं सूँघता हूँ,
मैं चखता हूँ, मैं स्वामी हूँ, मैं ईश्वर हूँ, यह मैंने मारा है, मैं बलवान हूँ, मैं इसे मारूँगा' आदि अभिमानरूप
होता है । अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ होती हैं । ये शब्द आदि पाँच तन्मात्राएँ सामान्यरूप और सूक्ष्म पर्याय
रूप हैं । शब्द तन्मात्रासे केवल शब्दका ही ज्ञान होता है, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, कंपित और षड्ज
आदि शब्दके विशेषरूपोंका नहीं, क्योंकि षड्ज आदिका ज्ञान विशेष शब्दसे ही होता है । इसी प्रकार स्पर्श,
रूप, रस, गंध आदि तन्मात्राओंसे सामान्यरूपसे स्पर्श, रूप, रस, गंध, आदिका ज्ञान होता है, विशेष स्पर्श
१. सांख्यकारिका ३ !
२. षड्जऋषभगान्धारा मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतो निषधः सप्त तन्त्रीकण्ठोद्भवाः स्वराः ॥
अभिधानचिन्तामणौ ६-३७ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३७
पञ्चतन्मात्रेभ्यश्च पञ्चमहाभूतान्युत्पद्यन्ते । तद्यथा शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दगुणम् ।
शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्राद् वायुः शब्दस्पर्शगुणः। शब्दस्पर्शतन्मात्रसहिताद् रूपतन्मात्रात्
तेजः शब्दस्पर्शरूपगुणम् । शब्दस्पर्शरूपतन्मात्रसहिताद् रसतन्मात्रादापःशब्दस्पर्शरूपरसगुणाः ।
शब्दस्पर्शरूपरसतन्मात्रसहिताद् गन्धतन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी जायत इति ॥
पुरुषस्तु—
“अमूर्तश्चेतनो भोगी नित्यः सर्वगतोऽक्रियः ।
अकर्ता निर्गुणः सूक्ष्म आत्मा कापिलदर्शने ॥”
इति । अन्धपङ्गुवत् प्रकृतिपुरुषयोः संयोगः । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या ।
यत इन्द्रियद्वारेण सुखदुःखादयो बुद्धौ प्रतिसंक्रामन्ति बुद्धिश्चोभयमुखदर्पणाकारा । ततस्तस्यां
चैतन्यशक्तिः प्रतिबिम्बते । ततः सुख्यहं दुःख्यहमित्युपचारः । आत्मा हि स्वं बुद्धेर्व्यतिरिक्त-
मभिमन्यते । आह च पतञ्जलिः— “शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन् अतदा-
त्मापि तदात्मक इव प्रतिभासते”१ इति । मुख्यतस्तु बुद्धेरेव विषयपरिच्छेदः । तथा च वाच-
स्पतिः— “सर्वो व्यवहर्ता आलोच्य नन्वहमत्राधिकृत इत्यभिमत्य कर्तव्यमेतन्मया इत्यध्यव-
स्यति । ततश्च प्रवर्तते इति लोकतः सिद्धम् । तत्र कर्तव्यमिति योऽयं निश्चयश्चितिसन्निधा-
नापन्नचैतन्याया बुद्धेः सोऽध्यवसायो बुद्धेरसाधारणो व्यापारः”२ इति । चिच्छक्तिसन्निधाना-
च्वाचेतनापि बुद्धिश्चेतनावतीवाभासते । वादमहार्णवोऽप्याह३ । “बुद्धिदर्पणसंक्रान्तमर्थप्रतिवि-
आदिका ज्ञान नहीं होता । अहंकारसे चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श (बुद्धीन्द्रिय); वाक्, पाणि, पाद,
गुदा, लिंग (कर्मेन्द्रिय) और मन ये ग्यारह इन्द्रियां उत्पन्न होती हैं ।
पाँच तन्मात्राओंसे पाँच महाभूत पैदा होते हैं । शब्द तन्मात्रासे आकाश पैदा होता है । शब्द और
स्पर्श तन्मात्राओंसे शब्द और स्पर्शके गुणसे युक्त वायु; शब्द, स्पर्श और रूप तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श और
रूप गुणोंसे युक्त अग्नि; शब्द, स्पर्श, रूप और रस तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, और रससे युक्त जल;
तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधसे युक्त पृथिवी उत्पन्न
होती है ।
पुरुष तो—
“सांख्य दर्शनमें अमूर्त, चेतन, भोक्ता, नित्य, सर्वव्यापी, क्रिया रहित, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म” है ।
अंधे और लंगड़े पुरुषकी तरह प्रकृति और पुरुषका संबंध होता है । चित् शक्ति (पुरुष) स्वयं पदार्थोंका
ज्ञान नहीं कर सकती, क्योंकि सुख-दुख इन्द्रियों द्वारा ही बुद्धिमें प्रतिभासित होते हैं। बुद्धि दोनों तरफसे दर्पणकी
तरह है, इसमें एक ओर चेतनाशक्ति और दूसरी ओर बाह्य जगत् झलकता है । बुद्धिमें चेतनाशक्तिके प्रति-
बिम्ब पड़नेसे आत्मा (पुरुष) अपनेको बुद्धिसे अभिन्न समझता है, और इसलिये आत्मामें 'मैं सुखी हूँ', 'मैं
दुखी हूँ', ऐसा ज्ञान होता है । पतंजलिने भी कहा है— “यद्यपि पुरुष स्वयं शुद्ध है, परन्तु वह बुद्धि सम्बन्धी
अध्यवसायको देखकर, बुद्धिसे भिन्न होकर भी अपने आपको बुद्धिसे अभिन्न समझता है ।” वास्तवमें वह
ज्ञान बुद्धिका ही होता है । वाचस्पतिने भी कहा है— “लोकके कार्योंमें प्रवृत्ति करनेवाले सभी लोग यह
मानते हैं कि इसमें हमारा अधिकार है, और यह हमारा कर्तव्य है, ऐसा समझकर निश्चय करते हैं ।
निश्चय करनेके पश्चात् कार्यमें प्रवृत्ति होती है, इस प्रकार लोगोंमें परिपाटी चलती है । यहाँ बुद्धिमें
चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे ही कर्तव्य-बुद्धिका निश्चय होता है; यह निश्चय बुद्धिका असाधारण
व्यापार है ।” बुद्धिमें चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे अचेतन बुद्धि चेतनकी तरह प्रतिभासित होने लगती
है । वादमहार्णवमें भी कहा है— “दर्पणके समान बुद्धिमें पड़नेवाला पदार्थोंका प्रतिबिम्ब पुरुषरूपी दर्पणमें
१. व्यासभाष्ये । २. सांख्यतत्त्वकौमुद्यां ।
३. सांख्यग्रन्थविशेषः । जैनाचार्यः अभयदेवसूरिरपि वादमहार्णवनामग्रन्थं कृतवान् ।
१८

१३८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
म्बकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति । तदेव भोक्तृत्वमस्य न त्वात्मनो विकारापत्तिः।"
इति । तथा चासुरिः¹—
"विविक्ते दृक्परिणतौ बुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥"
विन्ध्यवासी त्वेवं भोगमाचष्टे ।
"पुरुषोऽविकृतात्मैव स्वनिर्भासमचेतनम् ।
मनः करोति सान्निध्यादुपाधिः स्फटिकं यथा ॥"
न च वक्तव्यम् पुरुषश्चेद्गुणोऽपरिणामी कथमस्य मोक्षः । मुचेर्बन्धनविश्लेषार्थत्वात्
सवासनक्लेशकर्माशयानां च बन्धसमाम्नातानां पुरुषेऽपरिणामिन्यसम्भवात् । अत एव नास्य
प्रेत्यभावापरनामा संसारोऽस्ति, निष्क्रियत्वादिति । यतः प्रकृतिरेव नानापुरुषाश्रया सती
बध्यते संसरति मुच्यते च न पुरुष इति बन्धमोक्षसंसाराः पुरुषे उपचर्यन्ते । तथा जयपरा-
जयौ भृत्यगतावपि स्वामिन्युपचर्येते, तत्फलस्य कोशलाभादेः स्वामिनि संबन्धात्, तथा
भोगापवर्गयोः प्रकृतिगतयोरपि विवेकाग्रहात् पुरुषे संबन्ध इति ॥
तदेतदखिलमालजालम् । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या चेति परस्परविरुद्धं वचः ।
चित्ते संज्ञाने । चेतनं चित्यते वानयेति चित् । सा चेत् स्वपरपरिच्छेदात्मिका नेष्यते तदा
चिच्छक्तिरेव सा न स्यात्, घटवत् । न चामूर्तायाश्चिच्छक्तेर्बुद्धौ प्रतिबिम्बोदयो युक्तः । तस्य
मूर्त्तधर्मत्वात् । न च तथापरिणाममन्तरेण प्रतिसंक्रमोऽपि युक्तः । कथञ्चित् सक्रियात्मकता-
प्रतिबिम्बित होता है। बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है, इसीसे पुरुषको भोक्ता
कहते हैं। इससे आत्मामें कोई विकार नहीं आता।" आसुरिने भी कहा है—
"जिस प्रकार निर्मल जलमें पड़नेवाला चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलका ही विकार है, चन्द्रमाका नहीं,
उसी तरह आत्मामें बुद्धिका प्रतिबिम्ब पड़नेपर आत्मामें जो भोक्तृत्व है, वह केवल बुद्धिका विकार है,
वास्तवमें पुरुष निर्लेप है।"
भोगके विषयमें विन्ध्यवासीने कहा है—
"जैसे भिन्न भिन्न रंगोंके संयोगसे निर्मल स्फटिक मणि काले, पीले आदि रूपका होता है, वैसे ही
अविकारी चेतन पुरुष अचेतन मनको अपने समान चेतन बना लेता है। वास्तवमें विकारी होनेसे मन चेतन
नहीं कहा जा सकता।"
प्रतिवादी--यदि पुरुष निर्गुण और अपरिणामी है तो उसे मोक्ष नहीं हो सकता। मुच् धातुका
अर्थ बन्धनसे छूटना है। अपरिणामी आत्मामें वासना और क्लेशरूप कर्मोंके सम्बन्धसे बन्धनका उत्पन्न होना
सम्भव नहीं, अतएव आत्माके निष्क्रिय होनेसे उसके परलोक (संसार) भी नहीं हो सकता। सांख्य—
नाना पुरुषोंके आश्रित प्रकृतिका ही बन्ध होता है, वही संसारमें भ्रमण करती है, और प्रकृति ही को मोक्ष
होता है, अतएव पुरुषके बन्ध, मोक्ष और संसारका व्यवहार उपचारसे होता है। जिस प्रकार भृत्यों द्वारा
किसी सेनाकी जय, पराजय किये जानेपर वह जय, पराजय सेनाके स्वामीकी समझी जाती है, क्योंकि जय,
पराजयसे होनेवाले लाभ और हानिका फल स्वामीको ही मिलता है, उसी तरह वास्तवमें संसार और मोक्ष
दोनों प्रकृतिके होते हैं, परन्तु पुरुषके विवेकख्याति होनेसे, पुरुषके ही संसार और मोक्ष माना जाता है।
उत्तरपक्ष-(१) क-यह सब बड़ा भारी जाल है। एक ओर चैतन्यशक्ति है और दूसरी ओर
वह ज्ञेय पदार्थके ज्ञानसे शून्य है-यह कथन परस्पर विरुद्ध है। चित् धातु जाननेके अर्थमें प्रयुक्त होती है।
जाननेकी जो क्रिया होती है अथवा जिसके द्वारा जाना जाय, उसे चित् (चेतनं, चित्यते वा अनयेति चित्)
कहते हैं। यदि यह शक्ति स्व और परको जाननेके स्वभाववाली न मानी गई तो उसे चेतनाशक्ति (चित्शक्ति)
नहीं कह सकते; जैसे घट। ख-अमूर्त चेतनाशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्बित न होना युक्त नहीं है; क्योंकि
१. अयं सांख्याचार्य ईश्वरकृष्णगुरुपरम्परायामुपलभ्यते ।

व्यतिरेकेण प्रकृत्युपधानेऽप्यन्यथात्वानुपपत्तेः, अप्रच्युतप्राचीनरूपस्य च सुखदुःखादिभोगव्यप-
देशानर्हत्वात् । तत्प्रच्यवे च प्राक्तनरूपत्यागेनोत्तररूपाध्यासिततया सक्रियत्वापत्तिः । स्फटिका-
दावपि तथा परिणामेनैव प्रतिबिम्बोदयसमर्थनात्, अन्यथा कथमन्धोपलादौ न प्रतिबिम्बः ।
तथापरिणामाभ्युपगमे च बलादायातं चिच्छक्तेः कर्तृत्वं साक्षाद्भोक्तृत्वं च ॥
अथ “अपरिणामिनी भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्ते च तद्वृ-
त्तिमनुभवति” १ इति पतञ्जलिवचनादौपचारिक एवायं प्रतिसंक्रम इति चेत्, तर्हि “उपचार-
स्तत्त्वचिन्तायामनुपयोगी” इति प्रेक्षावतामनुपादेय एवायम् । तथा च प्रतिप्राणिप्रतीतं सुख-
दुःखादिसंवेदनं निराश्रयमेव स्यात् । न चेदं बुद्धेरुपपन्नम् । तस्या जडत्वेनाभ्युपगमात् ।
अतएव

१४० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
न खल्वतिकोपनत्त्वादिना समारोपिताग्नित्वो माणवकः कदाचिदपि मुख्याग्निसाध्यां दाह-
पाकाद्यर्थक्रियां कर्तुमीश्वरः । इति चिच्छक्तेरेव विषयाध्यवसायो घटते न जडरूपाया बुद्धेरिति ।
अत एव धर्माद्यष्टरूपतापि तस्या वाङ्मात्रमेव, धर्मादीनामात्मधर्मत्वात् । अत एव चाह-
ङ्कारोऽपि न बुद्धिजन्यो युज्यते, तस्याभिमानात्मकत्वेनात्मधर्मस्याचेतनादुत्पादायोगात् ॥
अम्बरादीनां च शब्दादितन्मात्रजत्वं प्रतीतिपराहतत्वेनैव विहितोत्तरम् । अपि च,
सर्ववादिभिस्तावदविगानेन गगनस्य नित्यत्वमङ्गीक्रियते । अयं च शब्दतन्मात्रात् तस्याप्या-
विर्भावमुद्भावयन्नित्यैकान्तवादिनां च धुरि आसनं न्‍यासयन्नसंगतप्रलापीव प्रतिभाति । न च
परिणामिकारणं स्वकार्यस्य गुणो भवितुमर्हतीति "शब्दगुणमाकाशम्"१ इत्यादि वाङ्मात्रम् ।
वागादीनां चेन्द्रियत्वमेव न युज्यते । इतरासाध्यकार्यकारित्वाभावात् । परप्रतिपादनग्रहण-
विहरणमलोत्सर्गादिकार्याणामितरावयवैरपि साध्यत्वोपलब्धेः । तथापि तत्त्वकल्पने इन्द्रिय-
संख्या न व्यवतिष्ठते, अन्याङ्गोपाङ्गानामपीन्द्रियत्वप्रसङ्गात् ।
यच्चोक्तं 'नानाश्रयायाः प्रकृतेरेव बन्धमोक्षौ संसारश्च न पुरुषस्य' इति । तदप्य-
सारम् । अनादिभवपरम्परानुबुद्ध्या प्रकृत्या सह यः पुरुषस्य विवेकाग्रहणलक्षणोऽविवग्भावः
स एव चेन्न बन्धः, तदा को नामान्यो बन्धः स्यात् । प्रकृतिः सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तम् इति च
'अचेतन बुद्धि चेतना सहित जैसी प्रतिभासित होती है', यहाँ 'इव' ( जैसी ) शब्दसे अचेतन बुद्धिमें चेतनाका
आरोप किया गया है । परन्तु आरोपसे अर्थक्रियाकी सिद्धि नहीं होती । जैसे यदि किसी बालकका अत्यन्त
क्रोधी स्वभाव देख कर उसका अग्नि नाम रख दिया जाय, परन्तु वह अग्निकी जलाने, पकाने आदि क्रियाओं-
को नहीं कर सकता, इसी प्रकार विषयोंका—ज्ञेय पदार्थोंका-ज्ञान चेतनाशक्तिसे ही हो सकता है, अचेतन
बुद्धिमें चेतनाका आरोप करने पर भी बुद्धिसे पदार्थोंका ज्ञान संभव नहीं । अतएव आप लोगोंने जो बुद्धिके
धर्म आदि आठ गुण माने हैं, वे भी केवल वचनमात्र हैं, क्योंकि धर्म आदि आत्माके ही गुण हो सकते हैं,
अचेतन बुद्धिके नहीं । इसीलिये अहंकारको भी बुद्धिजन्य नहीं मानना चाहिये, क्योंकि अहंकार अभिमान
रूप है, इसलिये वह आत्मासे हो उत्पन्न होता है, अचेतन बुद्धिसे उत्पन्न नहीं हो सकता ।
( ३ ) आकाश आदिका शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न होना अनुभवके सर्वथा विरुद्ध है ।
तथा, सब लोगोंने आकाशको नित्य स्वीकार किया है; नित्य एकान्तवादको मानकर भी केवल सांख्य लोग ही
उसकी शब्द तन्मात्रासे उत्पत्ति मान कर असंगत प्रलाप करते हैं। तथा, परिणामी ( उपादान ) वस्तुके परिणाममें
कारण है, वह अपने कार्यका गुण नहीं हो सकता, इसलिये "शब्दको आकाशका गुण मानना" भी कथन-
मात्र है । तथा, वाक् आदि इन्द्रियाँ नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि दूसरोंको प्रतिपादन करना, किसी वस्तुको
ग्रहण करना, विहार करना, मल त्याग करना आदि, वाक्, पाणि, पाद, पायु आदि कर्मेन्द्रियोंसे होने वाले
कार्य शरीरके अन्य अवयवोंसे भी किये जा सकते हैं; जैसे उंगलियों द्वारा भी दूसरोंको प्रतिपादित किया
जा सकता है । अतएव वाक् आदि शरीरके अवयव हैं, इन्हें इन्द्रियाँ नहीं कह सकते । यदि इतर अवयवों
द्वारा न किये जानेवाले कार्योंके कर्तृत्वका अभाव होने पर भी वाक् आदिको इन्द्रिय माना जाय, तो इन्द्रियों-
की ग्यारह संख्या ही नहीं बन सकती, क्योंकि शरीरके अन्य अंग-उपांगोंको भी इन्द्रियत्वका प्रसंग उपस्थित
हो जाता है ।
( ४ ) तथा, 'अनेक पुरुषोंके आश्रय रहनेवाली प्रकृतिके ही बन्ध, मोक्ष और संसार होते हैं, पुरुषके
नहीं', यह कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि आप लोगोंके मतमें यदि अनादि भव-परम्परासे बद्ध और पुरुषके
विवेकको न समझने वाले अपृथग्भावको बन्ध नहीं कहते, तो फिर आपके मतमें बन्धका क्या लक्षण है ?
१. वैशेषिकसूत्रे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४१
प्रतिपद्यमानेनायुष्मता संज्ञान्तरेण कर्मैव प्रतिपन्नं । तस्यैवंस्वरूपत्वात् अचेतनत्वाच्च ॥
यस्तु प्राकृतिकवैकारिकदाक्षिणभेदात् त्रिविधो बन्धः । तद्यथा प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये
प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः । ये विकारानैव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीः पुरुषबुद्धयोपासते
तेषां वैकारिकः । इष्टापूर्ते¹ दाक्षिणः । पुरुषतत्त्वानामभिज्ञो हीष्टापूर्तकारी कामोपहतमना
बध्यत इति ।
“इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेन भूत्वा
इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥”²
इति वचनात् । स त्रिविधोऽपि कल्पनामात्रं कथञ्चिद् मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमाद-
कषाययोगे³भ्योऽभिन्नस्वरूपत्वेन कर्मबन्धहेतुष्वेवान्तर्भावात् । बन्धसिद्धौ च सिद्धस्तस्यैव
निर्वाधः संसारः । बन्धमोक्षयोश्चैकाधिकरणत्वाद् य एव बद्धः स एव मुच्यत इति पुरुषस्यैव
मोक्षः आबालगोपालं तथाप्रतीतेः ॥
प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनात् प्रवृत्तेरुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति
चेत् । न । प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदासीन्यायोगात् । अथ पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः प्रवृत्तिः ।
यदि कहो कि उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थोंका कारण प्रकृति है तो आप लोगोंने नामान्तरसे कर्मको ही
स्वीकार किया है; क्योंकि कर्मका यह स्वरूप है और वह अचेतन है। अतएव बन्ध पुरुषके ही मानना
चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
सांख्य—प्राकृतिक, वैकारिक, और दाक्षिणके भेदसे बन्ध तीन प्रकारका होता है। प्रकृतिको
आत्मा समझकर जो प्रकृतिकी उपासना करते हैं, उनके प्राकृतिक बन्ध होता है। जो पाँच भूत, इन्द्रिय,
अहंकार, और बुद्धिरूप विकारोंको पुरुष मानकर उपासना करते हैं उनके वैकारिक बन्ध होता है। जो यज्ञ दान
आदि कर्म करते हैं उनके दाक्षिण बन्ध होता है। आत्माको न जानकर, सांसारिक इच्छाओंसे यज्ञ, दान
आदि कर्म करनेसे दाक्षिण बन्ध होता है। कहा भी है—
“जो मूढ़ पुरुष यज्ञ दान आदिको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, यज्ञ दान आदिके अतिरिक्त किसी भी
शुभ कर्मकी प्रशंसा नहीं करते, वे लोग स्वर्गमें उत्पन्न होते हैं, और अन्तमें फिर मनुष्य लोकमें अथवा इससे
भी हीन लोकमें जन्म लेते हैं ।”
जैन—उक्त तीनों प्रकारका बन्ध मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगमें गर्भित हो
जाता है, अतएव उसे पृथक् स्वीकार करना ठीक नहीं । अतएव जीवके बन्ध सिद्ध होनेपर, जीवके ही
संसारकी भी सिद्धि होती है। तथा, जो बँधता है, वह कभी मुक्त भी होता है, अतएव बन्ध और मोक्षका
एक ही अधिकरण होनेसे पुरुषके मोक्ष भी सिद्ध होता है। अतएव 'पुरुषके न बन्ध होता है, न मोक्ष' यह
कहना अयुक्तियुक्त है।
शंका—जिस समय प्रकृति और पुरुषमें विवेकख्याति उत्पन्न होती है, प्रकृति प्रवृत्तिसे मुँह मोड़
लेती है, उस समय पुरुष अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है, इसे ही मोक्ष कहते हैं। समाधान—
प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करना ही है, अतएव वह प्रकृति प्रवृत्तिसे उदासीन नहीं हो सकती । शंका—
१. एतल्लक्षणं—वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमर्थ्याः प्रचक्षते ।
एकाग्निकर्महवनं त्रेतायां यश्च हूयते । अन्तर्वेद्यां च यद्दानमिष्टं तदभिधीयते ॥
२. मुंडक उ० १–२–१० ।
३. मिथ्या विपरीतं दर्शनं मिथ्यादर्शनम् । सावद्ययोगेभ्यो निवृत्त्यभावः अविरतिः । प्रकर्षेण माद्य-
त्यनेनेति प्रमादः । विषयक्रीडाभिष्वङ्गः। कलुषयन्ति शुद्धस्वभावं सन्तं कर्ममलिनं कुर्वन्ति जीवमिति कषायाः।
कायवाङ्मनसां कर्म योगः ।

१४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
विवेकख्यातिश्च पुरुषार्थः । तस्यां जातायां निवर्तते, कृतकार्यत्वात् ।
“रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ॥”१
इति वचनादिति चेत् । नैवम् । तस्या अचेतनाया विमृश्यकारित्वाभावात् । यथेयं
कृतेऽपि शब्दाद्युपलम्भे पुनस्तदर्थं प्रवर्तते, तथा विवेकख्यातौ कृतायामपि पुनस्तदर्थं प्रवर्तिष्यते ।
प्रवृत्तिलक्षणस्य स्वभावस्यानपेतत्वात् । नर्तकीदृष्टान्तस्तु स्वेष्टविघातकारी । यथा हि नर्तकी
नृत्यं पारिषदेभ्यो दर्शयित्वा निवृत्तापि पुनस्तत्कुतूहलात् प्रवर्तते, तथा प्रकृतिरपि पुरुषाया-
त्मानं दर्शयित्वा निवृत्तापि पुनः कथं न प्रवर्तेतामिति । तस्मात् कृत्स्नकर्मक्षये पुरुषस्यैव मोक्ष
इति प्रतिपत्तव्यम् ॥
एवमन्यासामपि तत्कल्पनानां तमोमोहमहामोहतामिस्रान्धतामिस्रभेदात्२ पञ्चधा अवि-
³द्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशरूपो विपर्ययः । ब्राह्मप्राजापत्यसौम्येन्द्रगान्धर्वयक्षराक्षसपैशाच-
भेदादष्टविधो दैवः सर्गः । पशुमृगपक्षिसरीसृपस्थावर४भेदात् पञ्चविधस्तैर्यग्योनः । ब्राह्मणत्वाद्य-
वान्तरभेदाविवक्षया चैक५विधो मानुषः । इति चतुर्दशधा भूतसर्गः । बाधिर्यकुण्ठतान्धत्वजड-
प्रकृतिकी प्रवृत्ति केवल पुरुषार्थके लिये उत्पन्न होती है, और पुरुष और प्रकृतिमें भेद-दृष्टि होना ही पुरुषार्थ
है । इस भेद-दृष्टिके उत्पन्न होनेपर प्रकृति कृतकृत्य होकर विश्राम लेती है । कहा भी है—
“जिस प्रकार रंगभूमिमें अपना नृत्य दिखाकर नटी निवृत्त होती है उसी तरह प्रकृति पुरुषको
अपना रूप दिखाकर निवृत्त होती है ।”
समाधान—प्रकृति अचेतन है, अतएव वह विचारपूर्वक प्रवृत्ति नहीं कर सकती । तथा जिस
प्रकार विषयका एक बार उपभोग करनेपर भी फिरसे उसी विषयके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है
( क्योंकि प्रकृति प्रवृत्तिशील है ), वैसे ही विवेकख्याति होनेपर भी फिरसे पुरुषमें प्रकृतिकी प्रवृत्ति
होना चाहिये, क्योंकि प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करनेका है । तथा, नटीका दृष्टांत उलटा आप लोगोंके
सिद्धांतका घातक है । क्योंकि दर्शकोंको एक बार नृत्य दिखाकर चले जानेपर भी अच्छा नृत्य होनेसे दर्शक
लोगोंके आग्रहसे नर्तकी फिरसे अपना नाच दिखाने लगती है, वैसे ही पुरुषको अपना स्वरूप दिखाकर
प्रकृतिके निवृत्त हो जानेपर भी प्रकृतिको फिरसे प्रवृत्ति करना चाहिये । अतएव सम्पूर्ण कर्मोंका क्षय होने-
पर पुरुषको ही मोक्ष होता है, यह मानना चाहिये ।
इसके अतिरिक्त, सांख्य लोगोंकी निम्न कल्पनायें भी विरुद्ध हैं : ( क ) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष
तथा अभिनिवेश रूप तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अंधतामिस्र, यह पाँच प्रकारका विपर्यय है । ( तम
और मोहके आठ-आठ, महामोहके दस, तामिस्र और अंधतामिस्रके अठारह-अठारह भेद होनेसे यह विपर्यय कुल
६२ प्रकारका होता है ) । ( ख ) ब्राह्म, प्राजापत्य, सौम्य, इन्द्र, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पैशाच ये आठ प्रकारके
देव; पशु, मृग, पक्षी, सर्प, स्थावर ये पाँच प्रकारके तिर्यंच ( अचेतन घट आदि भी स्थावरमें ही गर्भित होते
१. सांख्यकारिका ५९ । २. सांख्यतत्त्वकौमुदी कारिका ४७ ।
३. अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या । दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ।
सुखानुशयी रागः । दुःखानुशयी द्वेषः । स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः । पातंजलयोगसूत्रे २–५,
६, ७, ८, ९ ।
४. घटादयस्त्वशरीरत्वेऽपि स्थावरा एव । इति वाचस्पतिमिश्रः ।
५. मनुष्यजातिरेकैव जातिनामोदयोद्भवा ।
वृत्तिभेदाद्धि तद्भेदाः चातुर्विध्यमिहाश्नुते ॥ जिनसेनकृत-आदिपुराणे ३२–४६
६. सांख्यकारिकागौडपादभाष्ये सांख्यतत्त्वकौमुद्यां च कारिका ५३ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४३
ताऽजिघ्रतामूकताकौण्यपङ्गुत्वक्लैव्योदावर्त्तमत्ततारूपैकादशेन्द्रियवधतुष्टिनवकविपर्ययसिद्ध्य-
ष्टकविपर्ययलक्षणसप्तदशबुद्धिवधभेदादष्टाविंशतिधा अशक्तिः । प्रकृत्युपादानकालभोगाख्या
अम्भःसलिलौघवृष्ट्यपरपर्यायाश्चतस्र आध्यात्मिकाः । शब्दादिविषयोपरतयश्चार्जनरक्ष-
णक्षयभोगहिंसादोषदर्शनहेतुजन्मानः पञ्चवाह्यास्तुष्टयः । ताश्च पारसुपारपारापारानुत्तमाम्भ-
उत्तमाम्भःशब्दव्यपदेश्याः । इति नवधा तुष्टिः । त्रयो दुःखविघाता इति मुख्यास्तिस्रः सिद्धयः
प्रमोदमुदितमोदमानाख्याः । तथाध्ययनं शब्द ऊहः सुहृत्प्राप्तिर्दानमिति दुःखविघातोपायतया
गौण्यः पञ्चतारसुतारतारताररम्यकसदाप्रमुदिताख्याः । इत्येवमष्टधा¹ सिद्धिः । धृतिश्रद्धासुखवि-
विदिषाविज्ञप्तिभेदात् पञ्चकर्मयोनयः । इत्यादीनां संवरप्रतिसंवरादीनां च तत्त्वकौमुदीगौडपाद-
भाष्यादिप्रसिद्धानां विरुद्धत्वमुद्भावनीयम् ॥ इति काव्यार्थः ॥१५॥

हैं—वाचस्पति मिश्र ) ; तथा ब्राह्मण आदिके भेदोंकी अपेक्षा न करके एक प्रकारका मनुष्य—यह चौदह प्रकारका
भौतिक सर्ग कहा जाता है । (भौतिक सर्ग ऊर्ध्व, अधः और मध्यलोकके भेदसे तीन प्रकारका है । आकाशसे
लेकर सत्यलोक पर्यंत ऊर्ध्वलोकमें सत्त्व, पशुसे लेकर स्थावर पर्यंत अधोलोकमें तम, और ब्रह्मसे लेकर वृक्ष
पर्यंत मध्यलोकमें रजकी बहुलता है । सात द्वीप और समुद्रोंका मध्य लोकमें अन्तर्भाव होता है) । ( ग )
ग्यारह प्रकारके इन्द्रियवध और सतरह प्रकारके बुद्धिवधको मिला कर २८ प्रकारकी अशक्ति होती है ।
बधिरता ( श्रोत्र ), कुंठता ( वचन ), अंधापन ( चक्षु ), जड़ता ( स्पर्श ), गंधका अभाव ( घ्राण ),
गूंगापन ( जिह्वा ), लूलापन ( हाथ ), लंगड़ापन ( पैर ), नपुंसकता ( लिंग ), गुदग्रह ( पायु ), तथा
उन्मत्तता ( मन ), यह ग्यारह इन्द्रियोंका वध है । नौ तुष्टि और आठ सिद्धिको उलटा करनेसे सतरह
प्रकारका बुद्धिवध होता है । प्रकृति ( अंभ ), उपादान ( सलिल ), काल ( ओघ ), भोग ( वृष्टि ) इन
चार आध्यात्मिक तुष्टि, और पाँच इन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्तिरूप उपार्जन, रक्षण, क्षय, भोग और हिंसासे
उत्पन्न होनेवाली पार, सुपार, पारापार, अनुत्तमांभ और उत्तमांभ नामक पांच बाह्य तुष्टियोंको मिला कर
नौ तुष्टि होती हैं । तीन प्रकारके दुःखोंके नाशसे उत्पन्न होनेवाली प्रमोद मुदितमोद और मान नामक तीन
मुख्य सिद्धि; अध्ययन, शब्द, तर्क, सच्चे मित्रोंकी प्राप्ति, और दानसे होनेवाली तार, सुतार, तारतार, रम्यक
और सदामुदित नामक पाँच गौण सिद्धियोंको मिला कर आठ सिद्धियां होती हैं । ( घ ) धृति, श्रद्धा, सुख,
वाद करनेकी इच्छा तथा ज्ञान ये पाँच कर्मयोनि हैं । इसी प्रकार संवर, प्रतिसंवर आदिकी विरुद्ध कल्पनायें
सांख्यतत्त्वकौमुदी, गौड़पादभाष्य आदि ग्रंथोंमें की गई हैं ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—सांख्य ( १ ) चित्शक्ति ( पुरुष अथवा चेतनशक्ति ) से पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता ।
अचेतन बुद्धिसे ही पदार्थ जाने जाते हैं । यह बुद्धि पुरुषका धर्म नहीं है, केवल प्रकृतिका विकार है । इस
अचेतन बुद्धिमें चित्शक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे चित्शक्ति अपने आपको बुद्धिसे अभिन्न समझती है, इसलिये
पुरुषमें 'मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' ऐसा ज्ञान होता है । चित्शक्तिके प्रतिबिम्ब पड़नेसे यह अचेतन बुद्धि
चेतनकी तरह प्रतिभासित होने लगती है । इस बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है ।
वास्तवमें बंध और मोक्ष प्रकृतिके ही होता है, पुरुष और प्रकृतिका अभेद होनेसे पुरुषके संसार और मोक्षका
सद्भाव माना जाता है । वास्तवमें पुरुष निष्क्रिय और निर्लेप है । जैन—( क ) चेतनशक्तिको ज्ञानसे शून्य
कहना परस्पर विरुद्ध है । यदि चेतनशक्ति स्व और परका ज्ञान करनेमें असमर्थ है, तो उसे चेतनशक्ति नहीं
कह सकते । तथा, अमूर्त चेतनशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता । क्योंकि मूर्त पदार्थका ही

१. सांख्यकारिकागौडपादभाष्ये सांख्यतत्त्वकौमुद्यां च कारिका ५३ ।
२. 'संचारप्रतिसंचारादीनाम्' इति पाठान्तरं ।

१४४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
इदानीं ये प्रमाणादेकान्तेनाभिन्नं प्रमाणफलमाहुः ये च बाह्यार्थप्रतिक्षेपेण ज्ञानाद्वैत-
मेवास्तीति ब्रुवते तन्मतस्य विचार्यमाणत्वे विशरारुतामाह—
न तुल्यकालः फलहेतुभावो हेतौ विलीने न फलस्य भावः ।
न संविदद्वैतपथेऽर्थसंविद् विलूनशीर्णं सुगतेन्द्रजालम् ॥ १६ ॥
बौद्धाः किल प्रमाणात् तत्फलमेकान्तेनाभिन्नं मन्यन्ते । तथा च तत्सिद्धान्तः—“उभयत्र
तदेव ज्ञानं प्रमाणफलमधिगमरूपत्वात् १ ।” “उभयत्रेति प्रत्यक्षेऽनुमाने च तदेव ज्ञानं प्रत्यक्षा-
नुमानलक्षणं फलं कार्यम् । कुतः । अधिगमरूपत्वादिति परिच्छेदरूपत्वात् । तथाहि । परि-
प्रतिबिंब पड़ता है । चेतनशक्तिको परिणमनशील और कर्ता माने बिना चेतनशक्तिका बुद्धिमें परिवर्तन होना
भी संभव नहीं है । पूर्व रूपके त्याग और उत्तर रूपके ग्रहण किये बिना पुरुष सुख-दुखका भोक्ता नहीं
कहला सकता । इस पूर्वाकारके त्याग और उत्तराकारके ग्रहण माननेसे पुरुषको निष्क्रिय नहीं कह सकते ।
तथा, यह पुरुष अनादिकालसे अविवेकके कारण प्रकृतिसे बंध रहा है । परन्तु प्रकृति अचेतन है, इसलिये
बंध पुरुषके ही मानना चाहिये । तथा, प्रकृतिका स्वभाव सदा प्रवृत्ति करना है, अतएव प्रकृति अपने स्वभाव-
से कभी निवृत्त नहीं हो सकती, इसलिये पुरुषको कभी मोक्ष नहीं हो सकता ! ( ख ) बुद्धिको जड़
मानना भी विरुद्ध है, क्योंकि बुद्धिको जड़ माननेसे उससे पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । जिस प्रकार
दर्पणमें पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे अचेतन दर्पण चेतन नहीं हो सकता, उसी तरह अचेतन बुद्धि चेतन पुरुषके
प्रतिबिम्बसे चेतन नहीं कही जा सकती । अतएव धर्म आदि बुद्धिके आठ गुण मानना भी ठीक नहीं, क्योंकि
बुद्धि अचेतन है । इसी तरह अहंकारको भी आत्माका ही गुण मानना चाहिये, बुद्धिका नहीं ।
सांख्य ( २ ) ( क ) आकाश आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न होते हैं । ( ख ) ग्यारह इन्द्रियाँ
होती हैं । जैन ( क ) आकाश आदिकी पाँच तन्मात्राओंसे उत्पत्ति मानना अनुभवके विरुद्ध है । सत्कार्यवाद
( नित्यैकान्तवादके ) माननेवाले सांख्य लोग भी आकाशको नित्य मानते हैं, यह आश्चर्य है । आकाशको
सभी वादियोंने नित्य माना है । ( ख ) वाक्, पाणि आदिको अलग इन्द्रिय नहीं कह सकते । क्योंकि वाक्,
पाणि आदि कर्म-इन्द्रियोंसे होनेवाले कार्य शरीरके अन्य अवयवोंसे भी किये जा सकते हैं । अतएव वाक्
आदिको अलग इन्द्रिय मानना ठीक नहीं । यदि इन्हें इन्द्रिय माना जाय तो शरीरके अन्य अंगोपांगोंको भी
इन्द्रिय कहना चाहिये ।
अब, प्रमाणसे प्रमाणके फल ( प्रमितिको ) सर्वथा भिन्न माननेवाले, तथा बाह्य पदार्थोंका निषेध
करके ज्ञानाद्वैतको स्वीकार करनेवाले बौद्धोंका खंडन करते हैं—
श्लोकार्थ—हेतु और हेतुका फल साथ साथ नहीं रह सकते, और हेतुके नाश हो जानेपर फलकी
उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि जगत्‌को विज्ञानरूप माना जाय तो पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव
बुद्धका इन्द्रजाल विशीर्ण हो जाता है ।
व्याख्यार्थ—( १ ) बौद्धपक्ष—प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों एकान्तरूपसे अभिन्न हैं । सिद्धान्त
भी है “जो ज्ञान प्रमिति और अनुमितिका कारण होता है वही ज्ञान दोनोंमें प्रमाण फलरूप है, क्योंकि
ज्ञान अधिगम रूप है ।१” “उभयत्र अर्थात् प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणमें प्रत्यक्षरूप और अनुमानरूप ज्ञान
ही फलरूप ( कार्यरूप ) है, क्योंकि वह अधिगम रूप—परिच्छेद रूप है । तथाहि—ज्ञप्ति रूप ही ज्ञान
उत्पन्न होता है । पदार्थोंको जाननेकी क्रियाके अतिरिक्त ज्ञानका कोई दूसरा फल नहीं हो सकता, क्योंकि
परिच्छेदका अधिकरण और परिच्छेदसे भिन्न ज्ञानके फलका अधिकरण भिन्न-भिन्न होते हैं । ( हानोपादानादि
१. दिङ्नागविरचितन्यायप्रवेशे पृ० ७ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४५
च्छेदरूपमेव ज्ञानमुत्पद्यते । न च परिच्छेदादृतेऽन्यद् ज्ञानफलम्, भिन्नाधिकरणत्वात्१ । इति
सर्वथा न प्रत्यक्षाक्षानुमानाभ्यां भिन्नं फलमस्तीति२ ॥"
एतच्च न समीचीनम् । यतो यद्यस्मादेकान्तेनाभिन्नं, तत्तेन सहैवोत्पद्यते । यथा घटेन
घटत्वम् । तैश्च प्रमाणफलयोः कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यते । प्रमाणं कारणं फलं कार्यमिति ।
स चैकान्ताभेदे न घटते । न हि युगपदुत्पद्यमानयोस्तयोः सव्येतरगोविषाणयोरिव कार्यकारण-
भावो युक्तः । नियतप्राक्कालभावित्वात् कारणस्य । नियतोत्तरकालभावित्वात् कार्यस्य । एतद्दे-
वाह न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । फलं कार्यं हेतुः कारणम् तयोर्भावः स्वरूपम्, कार्य-
कारणभावः । स तुल्यकालः समानकालो न युज्यत इत्यर्थः ॥
अथ क्षणान्तरितत्वात् तयोः क्रमभावित्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह । हेतौ विलीने न
फलस्य भाव इति । हेतौ कारणे प्रमाणलक्षणे विलीने क्षणिकत्वादुत्पत्त्यनन्तरमेव निरन्वयं
विनष्टे फलस्य प्रमाणकार्यस्य न भावः सत्ता, निर्मूलत्वात् । विद्यमाने हि फलहेतावस्येदं
फलमिति प्रतीयते नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । किञ्च, हेतुफलभावः सम्बन्धः स च द्विष्ठ एव
स्यात् । न चानयोः क्षणक्षयैकदीक्षितो भवान् सम्बन्धं क्षमते । ततः कथम् 'अयं हेतुरिदं
ज्ञानका फल—कार्य—नहीं है; क्योंकि ज्ञानफलका आश्रय ज्ञान होता है और हानोपादानका अधिकरण ज्ञानसे
भिन्न पुरुष होता है) । इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका फल प्रत्यक्ष और अनुमान रूप ज्ञानसे
सर्वथा भिन्न नहीं होता ।"
( १ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । क्योंकि जो जिससे एकान्तरूपसे अर्थात् सर्वथा अभिन्न होता है
वह उसीके साथ उत्पन्न होता है । जैसे, घटसे घटत्व सर्वथा अभिन्न होता है, इसलिये घटके साथ घटत्व,
उत्पत्ति होती है । तथा, बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्यकारण सम्बन्ध मानते हैं—प्रमाणको
कारण और प्रमाणके फलको उसका कार्य कहते हैं । यह कार्य-कारण भाव प्रमाण और उसके फलको सर्वथा
अभिन्न माननेमें नहीं बनता । जैसे एक साथ उत्पन्न होनेवाले गायके बांये और दाहिने सींगोंमें कार्य-कारण
सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक साथ उत्पन्न होनेवाले प्रमाण और फलमें कार्य-कारणभाव उचित
नहीं । क्योंकि कारण नियतरूपसे पहिले, और कार्य नियतरूपसे कारणके उत्तरकालमें होता है । कार्य-कारण-
भाव समान काल वाला नहीं होता । अतएव प्रमाण और प्रमाणका फल सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकते ।
शंका—प्रमाण और प्रमाणके फलमें क्षणमात्रका अन्तर पड़ता है, अतएव प्रमाण और प्रमाणका
फल क्रमसे होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि बौद्ध लोगोंके क्षणिकवादमें प्रत्येक वस्तु एक
क्षणके लिये ठहर कर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतएव प्रमाणके क्षणिक होनेके कारण प्रमाण ( कारण )
के उत्पन्न होते ही सर्वथा नष्ट हो जानेसे प्रमाणके फल ( कार्य ) की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कारण
रूप प्रमाणका सर्वथा (निरन्वय) विनाश हो जाता है । कार्यकी उत्पत्ति उसके कारणके रहने पर ही होती
है, अन्यथा नहीं । यदि कारणके विना कार्य उत्पन्न होने लगे, तो अतिप्रसंग हो जायेगा—बीजके विना वृक्षकी
उत्पत्ति माननी होगी । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रमाण
और उसके फलका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहता है । किन्तु क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले प्रमाण और प्रमाणके
फलमें कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव 'यह हेतु है, और यह उसका फल है' यह निश्चयात्मक ज्ञान
१. हरिभद्रसूरिकृता न्यायप्रवेशवृत्तिः पृ० ३६ ।
२. पार्श्वदेवकृतन्यायप्रवेशवृत्तिपञ्जिकायां—भिन्नमधिकरणमाश्रयो यस्य फलस्य तत्तथा''''अयम्अर्थः ।
ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं यद्युच्यते फलं हानोपानादिकं तदा तत्फलं प्रमातुरेव स्यान्न ज्ञानस्य । तथाहि ज्ञानेन प्रदर्शितेऽर्थे
हानादिकं तद्विषये पुरुषस्यैवोपजायते अतो हानादिकस्य भिन्नाश्रयत्वान्न फलत्वं मन्तव्यं ।
१९

१४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
फलम्' इति प्रतिनियता प्रतीतिः । एकस्य ग्रहणेऽप्यन्यस्याग्रहणे तदसम्भवात् ।
“द्विष्ठसंबन्धसंवित्तिर्नैकस्योपप्रवेदनात् ।
द्वयोः स्वरूपग्रहणे सति संबन्धवेदनम् ॥”१
इति वचनात् ॥
यद्यपि धर्मोत्तरेण “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”२ इति न्याय-
बिन्दुसूत्रं विवृण्वता भणितम्— “नीलनिर्भासं हि विज्ञानं, यतस्तस्माद् नीलस्य प्रतीतिरवसीयते ।
येभ्यो हि चक्षुरादिभ्यो ज्ञानमुत्पद्यते, न तद्वशात् तज्ज्ञानं नीलस्य संवेदनं शक्यतेऽवस्थापयितुं
नीलसदृशं त्वनुभूयमानं नीलस्य संवेदनमवस्थाप्यते । न चात्र जन्यजनकभावनिबन्धनः
साध्यसाधनभावः । येनैकस्मिन् वस्तुनि विरोधः स्यात् । अपि तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापक-
भावेन तत एकस्य वस्तुनः किञ्चिद्रूपं प्रमाणं किञ्चित् प्रमाणफलं न विरुध्यते । व्यवस्थापनहेतु-
र्हिं सारूप्यं तस्य ज्ञानस्य व्यवस्थाप्यं च नीलसंवेदनरूपम्”३ इत्यादि ॥
नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों क्षणिक होनेसे एक साथ नहीं रहते । इसलिये
प्रमाणके फल, और फलके होनेसे प्रमाणका ज्ञान नहीं हो सकता । कहा भी है—
“दो वस्तुओंमें रहनेवाले सम्बन्धका ज्ञान दोनों वस्तुओंके ज्ञान होने पर ही हो सकता है । यदि दोनों
वस्तुओंमेंसे एक वस्तु रहे, तो उस सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता ।”
बौद्ध— “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”—अर्थके साथ होनेवाली समानरूपताके
कारण अर्थनिर्णयकी सिद्धि हो जानेसे अर्थके साथ होनेवाली समानरूपता प्रमाण है—इस न्यायबिन्दुके
सूत्रका विवरण करनेवाले धर्मोत्तरने कहा है— “जिस कारण विज्ञानमें नील ( नील वर्ण पदार्थ ) का
प्रतिभास होता है, उस कारण नीलकी प्रतीति होती है । जिन चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती
है, उन इन्द्रियोंके अधीन होनेसे इन्द्रियजन्य वह ज्ञान 'नील पदार्थका यह ज्ञान है' इस प्रकार संवेदन नहीं
कर सकता, किन्तु अनुभूयमान नील ( पदार्थके ) सदृश ज्ञान ( नीलाकार ज्ञान ) नील पदार्थका ज्ञान है,
ऐसा संवेदन किया जाता है । यहाँ प्रमाण और प्रमाणके फलमें जन्य-जनकभाव ( कार्य-कारणभाव ) जिसका
कारण है ऐसा साध्य-साधनभाव नहीं है, जिससे एक वस्तुमें विरोध उत्पन्न हो; किन्तु यहाँ व्यवस्थाप्य-
व्यवस्थापक ( निश्चय-निश्चायक ) रूपसे साध्य-साधनभाव है । इसलिये एक वस्तुका किंचित् प्रमाणरूप होनेमें
और किंचित् प्रमाणफलरूप होनेमें विरोध नहीं आता । सारूप्य उस ज्ञान ( नील पदार्थका ज्ञान ) का निश्चय
करनेमें हेतु है और नील पदार्थका ज्ञान व्यवस्थाप्य ( निश्चेय ) ।” स्पष्टार्थ—बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमिति-
को अभिन्न मानते हैं । उनके मतमें जिस ज्ञानसे ( प्रत्यक्ष, अनुमान ) पदार्थ जाने जाते हैं, वही ज्ञान प्रमाण
और प्रमिति दोनों रूप होता है । बौद्ध लोगोंने पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेवाले संशय और विपर्यय रहित प्रापक
ज्ञानको प्रमाण माना है । जिस प्रापण शक्तिसे ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होनेपर भी प्रापक होता है, वही प्रमाणका
फल है । अतएव जिस ज्ञानसे अर्थकी प्रतीति होती है, उसी ज्ञानसे अर्थका दर्शन होता है, इसलिये ज्ञान
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप है ( तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ) । शंका—यदि
ज्ञान प्रमिति रूप होनेसे प्रमाणका फल है, तो प्रमाण किसे कहते हैं ? उत्तर—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है,
और पदार्थोंके आकार रूप होकर पदार्थोंको जानता है, इसलिये ज्ञान प्रमाण है। हमारे ( बौद्ध ) मतके अनुसार
ज्ञान इन्द्रिय आदिकी सहायतासे पदार्थोंको नहीं जानता । किन्तु नील घटको जानते समय नील घटसे उत्पन्न
१. कारिकेयं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके, पृ० ४२१ उद्धृता ।
२. न्यायबिन्दौ १-१९, २० ।
३. न्यायबिन्दौ १-२० स्वोपज्ञटीकायां ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४७
तदप्यसारम् । एकस्य निरंशस्य ज्ञानक्षणस्य व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकत्वलक्षणस्वभाव-
द्वयायोगात्, व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावस्यापि च संबन्धत्वेन द्विष्ठत्वादेकस्मिन्नसंभवात् ।
किञ्च, अर्थसारूप्यमर्थाकारता । तच्च निश्चयरूपम्, अनिश्चयरूपं वा ? निश्चयरूपं चेत्, तदेव
व्यवस्थापकमस्तु, किमुभयकल्पनया ? अनिश्चितं चेत्, स्वयमव्यवस्थितं कथं नीलादिसंवेदन-
व्यवस्थापने समर्थम् ? अपि च केयमर्थाकारता ? किमर्थग्रहणपरिणामः ? अहोस्विदर्था-
कारधारित्वम् ? नाद्यः, सिद्धसाधनात् । द्वितीयस्तु ज्ञानस्य प्रमेयाकारानुकरणाज्जडत्वापत्त्या-
दिदोषाग्रातः । तन्न प्रमाणादेकान्तेन फलस्याभेदः साधीयान् । सर्वथातादात्म्ये हि प्रमाणफल-
योर्न व्यवस्था, तद्भावविरोधात् । न हि सारूप्यमस्य प्रमाणमधिगतिः फलमिति सर्वथा-
तादात्म्ये सिद्ध्यति, अतिप्रसङ्गात् ॥
ननु प्रमाणस्यासारूप्यव्यावृत्तिः सारूप्यम्, अनधिगतिव्यावृत्तिरधिगतिरिति व्यावृत्ति-
ज्ञान नील घटके आकार रूप होता है। नील घटके सदृश आकारको धारण करना ही ज्ञानका प्रामाण्य है
( अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं ) । शंका—यदि ज्ञान सादृश्य ( नील सादृश्य ) से अभिन्न है, तो उसी ज्ञानको
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप कहना चाहिये । एक ही वस्तुमें साध्य और साधन दोनों नहीं रह सकते ।
अतएव ज्ञान ( प्रमाण ) पदार्थोंके सदृश नहीं हो सकता । उत्तर—सारूप्य ( सदृश आकार ) से ही
पदार्थोंकी प्रतीति होती है । क्योंकि पदार्थोंको जाननेवाला प्रत्यक्ष ज्ञान नील घटके आकारका हो कर ही नील
घटका ज्ञान करता है । चक्षु आदिकी सहायतासे नील घटका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव हम ( बौद्ध ) लोग
प्रमाण और प्रमितिमें कार्य-कारण सम्बन्ध न स्वीकार करके व्यवस्थाप्य और व्यवस्थापक सम्बन्ध मानते हैं ।
सारूप्य व्यवस्थापक है, और नील ज्ञान व्यवस्थाप्य है । अतएव प्रमाण और प्रमितिको अभिन्न माननेसे कोई
विरोध नहीं आता ।
जैन—धर्मोत्तरका यह कथन ठीक नहीं । क्योंकि निरंश ज्ञान-क्षण ( बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
क्षणिक है, इसलिये वे लोग घटको घट न कहकर घट-क्षण कहते हैं । इसी प्रकार यहाँ भी ज्ञान-क्षणसे
क्षणिक ज्ञान समझना चाहिये ) में व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूप दो स्वभाव नहीं बन सकते, और
व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भावका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहनेवाला होनेसे एक निरंश ज्ञान-क्षणमें नहीं रह
सकता । तथा, ज्ञानका जो अर्थके साथ सारूप्य है वह ज्ञानकी अर्थाकारता है । यह ज्ञानका अर्थसारूप्य
निश्चयरूप है, या अनिश्चयरूप ? यदि यह अर्थसारूप्य निश्चयरूप है, तो इस अर्थसारूप्यको ही व्यवस्थापक
( निश्चयात्मक ) मानना चाहिये, उसे व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूपसे अलग-अलग माननेकी आवश्यकता
नहीं । यदि ज्ञानका वह अर्थसारूप्य अनिश्चित है, तो स्वयं अनिश्चित अर्थसारूप्यसे नील आदि पदार्थका
ज्ञान निश्चित नहीं हो सकता । तथा, ज्ञानकी अर्थाकारतासे आपका क्या अभिप्राय है ? आप लोग ज्ञेय
पदार्थको जाननेवाले ज्ञानके परिणामको अर्थाकारता कहते हैं, अथवा ज्ञानके अर्थके आकाररूप होनेको अर्था-
कारता कहते हैं ? प्रथम पक्ष माननेमें सिद्धसाधन है, क्योंकि हम भी ज्ञानका स्वभाव पदार्थोंको जानना
मानते हैं । यदि आप लोग ज्ञानके पदार्थोंके आकार रूप होनेको अर्थाकारता कहते हैं, तो ज्ञानको जड़
प्रमेयके आकार माननेमें ज्ञानको भी जड़ मानना पड़ेगा । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलको एकान्त
अभिन्न नहीं मान सकते । क्योंकि प्रमाण और प्रमाणके फलका सर्वथा तादात्म्य सम्बन्ध माननेसे प्रमाण और
प्रमाणके फलकी व्यवस्था नहीं बनती; क्योंकि एक निरंश ज्ञान-क्षणमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भाव होनेमें
विरोध आता है। प्रमाण और प्रमाणके फलमें सर्वथा तादात्म्य मानने पर ‘ज्ञानका अर्थके साथ
होनेवाला सारूप्य प्रमाण है और अर्थ ज्ञानका फल है’—यह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि इससे अतिप्रसंग उप-
स्थित हो जायेगा ।
शंका—सारूप्यके असारूप्यव्यावृत्ति रूप और अधिगतिके अनधिगतिव्यावृत्तिरूप होनेसे व्यावृत्तियोंमें

१४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
भेदादेकस्यापि प्रमाणफलव्यवस्थेति चेत्, नैवम् । स्वभावभेदमन्तरेणान्यव्यावृत्तिभेदस्यानु-
पपत्तेः । कथं च प्रमाणस्य फलस्य चाप्रमाणाफलव्यावृत्त्या प्रमाणफलव्यवस्थावत् प्रमाणान्तर-
फलान्तरव्यावृत्त्याप्यप्रमाणत्वस्याफलत्वस्य च व्यवस्था न स्यात् ? विजातीयादिव सजातीया-
दपि व्यावृत्तत्वाद् वस्तुनः । तस्मात् प्रमाणात् फलं कथञ्चिद्भिन्नमेवैष्टव्यं । साध्यसाधनभावेन
प्रतीयमानत्वात् । ये हि साध्यसाधनभावेन प्रतीयते ते परस्परं भिद्यते यथा कुठारच्छिदि-
क्रिये इति ॥
एवं यौगाभिप्रेतः प्रमाणात् फलस्यैकान्तभेदोऽपि निराकर्त्तव्यः तस्यैकप्रमातृत्तादात्म्येन
प्रमाणात् कथञ्चिदभेदव्यवस्थितेः प्रमाणतया परिणतस्यैवात्मनः फलतया परिणतिप्रतीतेः यः
प्रमिमीते स एवोपादत्ते परित्यजति उपेक्षते चेति सर्वव्यवहारिभिरस्खलितमनुभवात् । इतरथा
स्वपरयोः प्रमाणफलव्यवस्थाविप्लवः प्रसज्यत इत्यलम् ॥
अथवा पूर्वार्द्धमिदमन्यथा व्याख्येयं । सौगताः किलेत्थं प्रमाणयन्ति । सर्वं सत् क्षणि-
कम् । यतः सर्वं तावद् घटादिकं वस्तु मुद्गरादिसंनिधौ नाशं गच्छद् दृश्यते । तत्र येन स्व-
रूपेणान्यावस्थायां घटादिकं विनश्यति तच्चैत्तत्स्वरूपमुत्पन्नमात्रस्य विद्यते तदानीमुत्पादानन्तर-
मेव तेन विनष्टव्यम् , इति व्यक्तमस्य क्षणिकत्वम् ॥
भेद होनेके कारण, प्रमाणके एक रूप होनेपर भी उसके प्रमाणरूप होनेका और फलरूप होनेका निश्चय होता
हैँ। समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्वभावोंके अभावमें व्यावृत्तियोंमें भेदका होना नहीं
बनता । तथा, जिस प्रकार अप्रमाणकी व्यावृत्तिसे प्रमाणकी प्रमाणरूपताका और अफलकी व्यावृत्तिसे फलकी
फलरूपताका निश्चय होता है, वैसे ही प्रमाणान्तरकी व्यावृत्तिसे प्रमाणके अप्रमाणत्वका और फलान्तरकी
व्यावृत्तिसे फलके अफलत्वका निश्चय मानना चाहिये। क्योंकि जैसे आप लोग विजातीय वस्तुसे व्यावृत्ति
मानते हैं, वैसे ही सजातीय वस्तुसे भी व्यावृत्ति माननी चाहिये। अतएव प्रमाण और उसका फल कथंचित्
भिन्न हैं, क्योंकि दोनों साध्य-साधन भावरूपसे प्रतीयमान होते हैं। जो साध्य-साधन भावसे प्रतीयमान होते
हैं, वे परस्पर भिन्न होते हैं, जैसे कुठार और छेदनक्रिया।
इससे प्रमाण और प्रमाणके फलका एकान्त भेद माननेवाले यौगोंका भी निराकरण हो जाता हैं। क्योंकि
जो आत्मा ज्ञेय पदार्थको यथार्थरूपसे जानती है वही आत्मा उस पदार्थको ग्रहण करती है, उसका त्याग
करती है और उसकी उपेक्षा करती है यह सबको दृढ़ अनुभव होता है। इससे प्रमाणरूपसे परिणत हुई
आत्माकी ही फलरूपसे जो परिणति होती है, उसका निर्णायक ज्ञान होनेके कारण, इस प्रमाणफलका एक
प्रमाताके साथ तादात्म्य होनेसे, प्रमाण द्वारा उसके कथंचित् अभेदकी सिद्धि होती है। यदि प्रमाण और
उसके फलमें कथंचित् अभेद न माना जाये—दोनोंमें सर्वथा अभेद माना जाये—तो अपना प्रमाण और अपना
फल, तथा दूसरेका प्रमाण और दूसरेका फल—इस व्यवस्थाके नाशका ही प्रसंग उपस्थित हो जाता है। (विज्ञा-
नाद्वैतमें स्व और पर दोनों विज्ञानरूप माने गये हैं, अतएव दोनोंमें भेदका अभाव होनेसे स्वप्रमाण और
स्वफल, तथा परप्रमाण और परफलकी व्यवस्थाका अभाव हो जाता है) ।
(२) पूर्वपक्ष—'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं' (सर्वं सत् क्षणिकं) । क्योंकि सभी घट आदि
पदार्थ मुद्गर आदिका संयोग होने पर नष्ट होते हुए देखे जाते हैं। घट आदि पदार्थ अन्त्य अवस्थामें जिस
स्वरूपसे विनाशको प्राप्त होते हैं, वही स्वरूप उत्पन्नमात्र पदार्थोंका होता है। अतएव उत्पत्तिके बाद ही
घट आदि पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं। स्पष्टार्थ—बौद्धोंके अनुसार, प्रत्येक
पदार्थ क्षणिक है, क्योंकि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव है। यदि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव न हो, तो
पदार्थ दूसरी वस्तुके संयोगसे भी नष्ट नहीं हो सकते। पदार्थोंका यह क्षणिक स्वभाव पदार्थोंकी आरम्भ
और अन्त दोनों अवस्थाओंमें समान है। यदि पदार्थोंको उत्पन्न होनेके बाद नाशमान न माना जाय, तो

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४९
अथेदृश एव स्वभावस्तस्य हेतुतो जातो यत्कियन्तमपि कालं स्थित्वा विनश्यति । एवं
तर्हि मुद्गरादिसंनिधानेऽपि एष एव तस्य स्वभावः इति पुनरप्येतेन तावन्तमेव कालं स्था-
तव्यम् इति नैव विनश्येदिति । सोऽयं “अदित्सोर्वणिजः प्रतिदिनं पत्रलिखितश्वस्तनदिनभणन-
न्यायः”१ । तस्मात् क्षणद्वयस्थायित्वेनाप्युत्पत्तौ प्रथमक्षणवद् द्वितीयेऽपि क्षणे क्षणद्वयस्थायि-
त्वात् पुनरपरक्षणद्वयमवतिष्ठेत । एवं तृतीयेऽपि क्षणे तत्स्वभावत्वान्नैव विनश्येदिति ॥
स्यादेतत् । स्थावरमेव तत् स्वहेतोर्जातम् , परं बलेन विरोधकेन मुद्गरादिना विनाश्यत
इति । तदसत् । कथं पुनरेतद्घटिष्यते । न च तद् विनश्यति स्थावरत्वात् , विनाशश्च तस्य
विरोधिना बलेन क्रियते इति । न ह्येतत्सम्भवति जीवति देवदत्ते मरणं चास्य भवतीति । अथ
विनश्यति तर्हि कथमविनश्वरं तद् वस्तु स्वहेतोर्जातमिति । न हि म्रियते च अमरणधर्मा
चेति युज्यते वक्तुम् । तस्मादविनश्वरत्वे कदाचिदपि नाशाद्योगात् दृष्टत्वाच्च नाशस्य नश्वरमेव
तद्वस्तु स्वहेतोरुपजातमङ्गीकर्तव्यम् । तस्मादुत्पन्नमात्रमेव विनश्यति । तथा च क्षणक्षयित्वं
सिद्धं भवति ॥
पदार्थोंका किसी भी कारणसे नाश नहीं हो सकता । इसलिये प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होता है ।
शंका—यदि क्षण-क्षणमें नाशको प्राप्त होनेवाले परमाणु ही वास्तविक हैं, तो घट, पट आदि स्थूल पदार्थोंका
ज्ञान नहीं हो सकता । उत्तर—वास्तवमें स्थूल पदार्थोंका ज्ञान स्वप्न-ज्ञान अथवा आकाशमें केश-ज्ञानकी तरह
निर्विषय है । अनादि कालकी वासनाके कारण ही स्थूल पदार्थोंका प्रतिभास होता है । शंका—यदि सम्पूर्ण
पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं, तो पदार्थोंका प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता । उत्तर—जिस प्रकार
दीपककी लौमें परस्पर समानता रखनेवाले पहले और दूसरे क्षणोंमें, पहले क्षणके नष्ट होनेके समय ही पहले
क्षणके समान दूसरे क्षणके उत्पन्न होनेसे यह वही दीपक हैं, यह ज्ञान होता है, उसी प्रकार समान आकारकी
ज्ञान-परम्परासे पूर्व क्षणोंके अत्यन्त नष्ट हो जानेपर भी पदार्थोंमें प्रत्यभिज्ञान होता है ।
प्रतिवादी—अपनी उत्पत्तिके कारणभूत सहायकोंसे उत्पन्न हुए ( कार्यरूप ) पदार्थका कुछ समय
तक ठहर कर नष्ट हो जाना, यह प्रत्येक पदार्थका स्वभाव है । बौद्ध—यदि पदार्थका स्वभाव क्षण-
क्षणमें नाशमान न माना जाय, तो घड़ेके साथ मुद्गरका संयोग होनेपर भी घड़ा नष्ट नहीं होना चाहिये,
क्योंकि मुद्गरका संयोग होनेपर भी घड़ेका नाश नहीं होनेका स्वभाव मौजूद है । अतएव जिस प्रकार कोई
कर्जदार साहूकारके कर्जको न चुकानेकी इच्छासे कर्ज चुका देनेका प्रतिदिन वायदा करनेपर भी कभी अपने
कर्जको नहीं चुका पाता, उसी तरह मुद्गरका संयोग होनेपर भी प्रत्येक क्षणमें नष्ट न होनेवाला घट दूसरे,
तीसरे आदि क्षणमें नष्ट न हो कर सर्वदा नित्य ही रहना चाहिये । अतएव पदार्थोंका स्वभाव क्षण-क्षणमें
नष्ट होनेका है ।
प्रतिवादी—प्रत्येक पदार्थ अपने उत्पत्तिके कारणोंसे स्थिर रहनेके लिये ही उत्पन्न होता है, बादमें
अपने बलवान विरोधी मुद्गर आदिसे नष्ट हो जाता है । बौद्ध—यह ठीक नहीं । क्योंकि यदि पदार्थका
स्वभाव नष्ट नहीं होनेका है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि पदार्थ अपने बलवान विरोधीसे नष्ट हो जाता
है, क्योंकि जिस पदार्थका स्वभाव नष्ट होना नहीं है, वह पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता । अतएव जिस प्रकार
देवदत्तके जीते हुए उसको मरा हुआ नहीं कह सकते, वैसे ही यदि पदार्थ नष्ट हो जाता है, तो यह नहीं
कहा जा सकता कि पदार्थ अपने उत्पत्तिके कारणोंसे स्थिर रहनेके लिये उत्पन्न हुआ था । अतएव
जैसे नाशमान देवदत्तको अनाशमान नहीं कहा जा सकता, वैसे ही नष्ट होनेवाले पदार्थको अविनश्वर नहीं
कह सकते । तथा, पदार्थ नाशमान देखे जाते हैं, अतएव अपनी उत्पत्तिके कारणों द्वारा उत्पन्न वस्तुको
१. कश्चिद् वणिक् द्रव्यमदित्सुः पत्रद्वारा प्रत्यहमुत्तमर्णाय श्वस्तनदिनं दास्य इति बोधयति तद्वत् ।

१५० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
प्रयोगस्त्वेवम् । यद्विनश्वरस्वरूपं तदुत्पत्तेरनन्तरानवस्थायि, यथान्त्यक्षणवर्तिघटस्य
स्वरूपम् । विनश्वरस्वरूपं च रूपादिकमुदयकाले, इति स्वभावहेतुः१। यदि क्षणक्षयिणो भावाः
कथं तर्हि स एवायमिति प्रत्यभिज्ञा स्यात् । उच्यते । निरन्तरसदृशापरोत्पादात्, अविद्या-
नुबन्धाच्च । पूर्वक्षणविनाशकाल एव तत्सदृशं क्षणन्तरमुदयते । तेनाकारविलक्षणत्वाभावाद-
व्यवधानाच्चात्यन्तोच्छेदेऽपि स एवायमित्यभेदाध्यवसायी प्रत्ययः प्रसूयते । अत्यन्तभिन्नेष्वपि
लूनपुनरुत्पन्नकुश२काशकेशादिषु दृष्ट एवायं स एवायम् इति प्रत्ययः, तथेहापि किं न संभाव्यते ।
तस्मात् सर्वं सत् क्षणिकमिति सिद्धम् । अत्र च पूर्वक्षण उपादानकारणम् उत्तरक्षण उपादेयम्
नश्वर ही मानना चाहिये। अतएव प्रत्येक पदार्थ उत्पन्न होनेके दूसरे क्षणमें ही नष्ट हो जाता है, इसलिये
प्रत्येक पदार्थ क्षणविध्वंसी है।
जिस प्रकार अन्त्यक्षणवर्ति घटका—विनाशको प्राप्त होनेवाले घटका—स्वरूप विनश्वर होनेसे, उसके
विनाशके अनन्तर घट स्वरूपसे ( अवस्थायी ) विद्यमान नहीं रहता, उसी प्रकार जिस पदार्थका स्वरूप
विनश्वर होता है, वह पदार्थ उत्पत्तिके बाद अवस्थायी—अक्षणिक—नहीं होता । ( जो स्वभाव स्वभाववानका
का नाश होने पर नष्ट हो जाता है, वह विनश्वर होता है। पदार्थका स्वभाव विनश्वर होने पर उसकी
अभिव्यक्ति होते ही उसका नाश हो जाता है। जिस पदार्थका स्वभाव विनश्वर होता है उसकी उत्पत्तिके
बाद उसका स्वभाव विनश्वर होनेसे वह अवस्थायी—अक्षणिक नहीं होता । ) पदार्थकी उत्पत्तिके कालमें
पदार्थके रूप आदिका स्वभाव विनश्वर होता है। इस प्रकार विनश्वरस्वरूपत्व रूप हेतु स्वभावहेतु रूप
है । ( बौद्ध लोगोंने स्वभावहेतु, कार्यहेतु और अनुपलब्धिहेतुके भेदसे हेतुके तीन भेद माने हैं। जैसे 'यह
वृक्ष है, शिंशपा ( सीसम ) होनेसे'—यहां वृक्षत्व और शिंशपात्वका कार्य-कारण संबंध न हो कर स्वभाव
सम्बन्ध है, अतएव यह स्वभावहेतु अनुमान है। 'यहाँ अग्नि है, धूम होनेसे'—यहाँ पर कार्य-कारण सम्बन्ध
है, इसलिये यह कार्यहेतु अनुमान है। पदार्थके न मिलनेको अनुपलब्धि कहते हैं। जैसे 'देवदत्त घरमें नहीं
है, क्योंकि वह वहाँ अनुपलब्ध है'। स्वभावहेतुमें एक स्वभावसे दूसरे स्वभावका, और कार्यहेतुमें कार्यसे
कारण अनुमान होता है। स्वभाव और कार्यहेतु वस्तुकी उपस्थितिको, और अनुपलब्धिहेतु वस्तुकी अनु-
पस्थितिको सिद्ध करते हैं)। शंका—यदि पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं, तो प्रत्येक क्षणमें नष्ट
होनेवाले घटकी उत्पत्तिके प्रथम क्षणसे लगा कर अन्तिम समय तक घटके एकत्वका प्रत्यभिज्ञान—'यह वही
है' नहीं हो सकता। बौद्ध—समान रूप अपर-अपर क्रमवर्ती क्षणमात्र कालवर्ती पदार्थोंकी निरन्तर उत्पत्ति
होनेके कारण तथा आत्माका अविद्यासे सम्बन्ध होनेके कारण, 'यह वही है'—इस प्रकार एकत्वका प्रत्यभिज्ञान
होता है। ( प्रत्येक उत्तरक्षण पूर्वक्षणसे भिन्न होने पर भी, पूर्वक्षणोंमें होनेवाली सदृशताके कारण, आत्माके
साथ अविद्याका सम्बन्ध होनेसे, आत्मा उन क्षणोंको एक रूप समझती है जिससे आत्माको 'यह वही है'—
यह प्रत्यभिज्ञान होता है )। पूर्वकालवर्ती क्षणिक पदार्थका विनाश होनेके कालमें ही पूर्वक्षणवर्ती क्षणिक
पदार्थके सदृश उत्तरक्षणवर्ती क्षणिक पदार्थ उत्पन्न होता है। अतएव पूर्वक्षणवर्ती पदार्थके आकारसे उत्तर
क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थका आकार विलक्षण—विसदृश—न होनेसे, तथा पूर्वोत्तरकालवर्ती दोनों क्षणिक पदार्थोंमें
व्यवधान न होनेसे, पूर्वकालीन क्षणिक पदार्थका आत्यंतिकरूपसे विनाश होने पर भी, 'यह वही है'—इस
प्रकार पूर्वोत्तर क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थोंमें अभेदका—एकत्वका—निश्चय करनेवाला ज्ञान उत्पन्न होता है।
जिस प्रकार पहले काटे हुए और फिरसे उत्पन्न होनेवाले कुश ( घास ), काश और केश आदिके पूर्व और
१. त्रीण्येव च लिङ्गानि । अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति । तत्रानुपलब्धिर्यथा न प्रदेशविशेषे क्वचिद्
घटोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्मे हेतुः । यथा वृक्षोऽयं शिंशिपा-
त्वादिति । कार्यं यथाग्निरत्र धूमादिति ।
२. पूर्वं लूनाश्छिन्नाः कुशादयः पुनरुत्पद्यन्ते ।

अन्य. यौ. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५१
इति पराभिप्रायमङ्गीकृत्याह न तुल्यकालः इत्यादि ॥
ते विशकलितमुक्तावलीकल्पा¹ निरन्वयविनाशिनः पूर्वक्षणा उत्तरक्षणान् जनयन्तः किं
स्वोत्पत्तिकाल एव जनयन्ति, उत क्षणान्तरे ? न तावदाद्यः । समकालभाविनोर्युवतिकुचयोरि-
वोपादानोपादेयभावाभावात् । अतः साधूक्तम् न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । न च द्वितीयः ।
तदानीं निरन्वयविनाशेन पूर्वक्षणस्य नष्टत्वादुत्तरक्षणजनने कुतः संभावनापि । न चानुपादान-
स्योत्पत्तिर्दृष्टा, अतिप्रसङ्गात् । इति सुष्ठु व्याहृतं हेतौ विलीने न फलस्य भाव इति । पदार्थस्त्व-
नयोः पादयोः प्रागेवोक्तः। केवलमत्र फलमुपादेयं हेतुरुपादानं तद्भाव उपादानोपादेयभाव इत्यर्थः ॥
यच्च क्षणिकत्वस्थापनाय मोक्षाकरगुप्तेनानन्तरमेव प्रलपितं तत् स्याद्वादवादे निरवकाश-
मेव । निरन्वयनाशवर्जं कथंचित्सिद्धसाधनात् । प्रतिक्षणं पर्यायानाशस्यानेकान्तवादिभिरभ्युप-
गमात् । यदप्यभिहितम् 'न ह्येतत् संभवति जीवति च देवदत्तो मरणं चास्य भवतीति,' तदपि
संभवादेव न स्याद्वादिनां क्षतिमावहति । यतो जीवनं प्राणधारणं, मरणं चायुर्द्लिकक्षयः ।
ततो जीवतोऽपि देवदत्तस्य प्रतिसमयमायुर्दलिकानामुदीर्णानां क्षयादुपपन्नमेव मरणम् । न
च वाच्यमन्त्यावस्थायामेव कृत्स्नायुर्दलिकक्षयात् तत्रैव मरणव्यपदेशो युक्त इति । तस्यामप्य-
उत्तर क्षणोंमें अत्यन्त भेद होनेपर भी 'यह वही घास है, 'यह वही काश हैं', और 'यह वही केश हैं', ऐसा
ज्ञान होता है, वैसे ही क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले प्रत्येक पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सर्वथा भेद होनेपर भी
उनमें एकत्वका प्रत्यभिज्ञान क्यों नहीं हो सकता है ? अतः यह सिद्ध हो जाता है कि समस्त पदार्थ क्षणिक
हैं । यहाँ पूर्वकालवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादानकारण और उत्तर क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादेय है । अतएव
दूसरेके अभिप्रायको मानकर 'न तुल्यकालः' इत्यादि कहा है ।
( २ ) उत्तरपक्ष—आपके मतमें स्खलित मोतियोंकी मालाके समान, सर्वथा नाश होनेवाले पूर्वक्षण
उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते समय अपनी उत्पत्तिके क्षणमें ही उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते हैं, अथवा दूसरे क्षणमें
उत्पन्न करते हैं ? अर्थात् पूर्व और उत्तरक्षण एक साथ उत्पन्न होते हैं, या क्रमसे ? पूर्वक्षण और उत्तरक्षण
एक साथ उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि जैसे एक हाथसे दूसरा हाथ पैदा नहीं होता, वैसे ही पूर्वक्षण उत्तर
क्षणको उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि एक ही कालमें होनेवाले दो पदार्थोंमें उपादान-उपादेय भाव नहीं बन
सकता । इसलिये कहा है, 'हेतु और उसका फल दोनों एक साथ नहीं हो सकते' ( न तुल्यकालः फलहेतु-
भावः । ) यदि कहो कि पूर्वक्षण उत्तरक्षणको दूसरे क्षणमें उत्पन्न करता है, तो यह भी नहीं बन सकता ।
क्योंकि पूर्वक्षण सर्वथा विनाशी है, उसका सर्वथा नाश हो जानेसे उससे उत्तरक्षण उत्पन्न नहीं हो सकता ।
अतएव दूसरे क्षणमें उपादानकारण रूप पूर्वक्षणका सर्वथा नाश होनेके पूर्वक्षणसे उत्तरक्षणकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती । यदि उपादानके विना भी उपादेयकी उत्पत्ति होने लगे, तो प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्ति माननी
चाहिये । अतएव 'हेतुके नष्ट हो जानेपर फलका भी अभाव हो जाता हैं' ( हेतौ विलीने न फलस्य भावः )—
यह हमने ठीक कहा है ।
तथा क्षणिकत्व सिद्ध करनेके लिये जो मोक्षाकरगुप्त नामक बौद्धाचार्यने नित्यत्वका खंडन किया है,
उसे स्याद्वादमें अवकाश नहीं है । क्योंकि स्याद्वादी लोग 'निरन्वय विनाशको' छोड़कर बौद्ध मतका ही
समर्थन करते हैं । क्योंकि अनेकान्तवादियोंने भी पर्यायोंकी अपेक्षा प्रतिक्षण नाश स्वीकार किया है । तथा,
आपने जो कहा कि 'जीते हुए देवदत्तको मरा हुआ नहीं कह सकते' उससे भी स्याद्वादियोंको कोई क्षति
नहीं होती । क्योंकि स्याद्वादियोंके अनुसार, प्राणोंके धारण करनेको जीवन, और आयुके अंशोंके नाश होनेको
मरण कहते हैं । अतएव देवदत्तके जीवित दशामें भी प्रत्येक समय उदय आनेवाले आयुके निषेकोंका क्षय
होनेसे मरण होता रहता है । यदि आप लोग कहें कि अन्त अवस्थामें सम्पूर्ण आयुके नाश हो जानेको ही
१. सूत्रविगलितमौक्तिकमालासदृशाः ।

१५२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
वस्थायां न्यक्षेणे तत्क्षयाभावात् । तत्रापि ह्यवशिष्टानामेव तेषां क्षयो न पुनस्तत्क्षण एव युगपत्-
सर्वेषाम् । इति सिद्धं गर्भादारभ्य प्रतिक्षणं मरणम् । इत्यलं प्रसङ्गेन ॥
अथवापरथा व्याख्या । सौगतानां किलार्थेन ज्ञानं जन्यते । तच्च ज्ञानं तमेव स्वोत्पाद-
कमर्थं गृह्णातीति । “नाकारणं विषयः” इति वचनात् । ततश्चार्थः कारणं ज्ञानं च कार्यमिति ॥
एतच्च न चारु । यतो यस्मिन् क्षणेऽर्थस्य स्वरूपसत्ता तस्मिन्नद्यापि ज्ञानं नोत्पद्यते,
तस्य तदा स्वोत्पत्तिमात्रव्यग्रत्वात् । यत्र च क्षणे ज्ञानं समुत्पन्नं तत्रार्थोऽतीतः । पूर्वापरकाल-
भावनियतश्च कार्यकारणभावः । क्षणातिरिक्तं चावस्थानं नास्ति । ततः कथं ज्ञानस्योत्पत्तिः,
कारणस्य विलीनत्वात् । तद्विलये च ज्ञानस्य निर्विषयतानुषज्यते, कारणस्यैव युष्मन्मते
तद्विषयत्वात् । निर्विषयं च ज्ञानमप्रमाणमेवाकाशकेशज्ञानवत् । ज्ञानसहभाविनश्चार्थक्षणस्य
न ग्राह्यत्वम्, तस्याकारणत्वात् । अत आह न तुल्यकाल इत्यादि । ज्ञानार्थयोः फलहेतुभावः
कार्यकारणभावस्तुल्यकालो न घटते, ज्ञानसहभाविनोऽर्थक्षणस्य ज्ञानानुत्पादकत्वात्, युग-
पद्धाविनोः कार्यकारणभावायोगात् । अथ प्राचोऽर्थक्षणस्य ज्ञानोत्पादकत्वं भविष्यति, तन्न ।
यत आह हेतौ इत्यादि । हेतावर्थरूपे ज्ञानकारणे विलीने क्षणिकत्वान्निरन्वयं विनष्टे न

मरण कहते हैं, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि अन्त अवस्थामें भी आयुके अवशिष्ट अंशोंका ही नाश होता
है, एक ही क्षणमें आयुके सम्पूर्ण भागोंका नाश नहीं होता। अतएव गर्भके धारण करनेसे लेकर मृत्यु पर्यंत
मनुष्यका मरण होता रहता है, यह निर्विवाद है।
( ३ ) पूर्वपक्ष—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होकर उसी पदार्थको जानता है। कहा भी है “जो पदार्थ
ज्ञानोत्पत्तिका कारण नहीं होता, वह ज्ञानका विषय भी नहीं होता।” अतएव पदार्थ कारण है और ज्ञान
कार्य है।
( ३ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस क्षणमें पदार्थ स्वरूपसे विद्यमान रहता
है, उस क्षणमें ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता; उस समय वह अपनी उत्पत्तिमें व्यग्र रहता है। बौद्धोंके
क्षणिकवादके अनुसार जब तक एक पदार्थ बनकर पूर्ण न हो जाय, उस समय तक वह ज्ञानकी
उत्पत्ति नहीं कर सकता। तथा जिस क्षणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय पदार्थ नष्ट हो जाता
है (क्योंकि प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाला है)। तथा क्रमसे पूर्व और उत्तर कालमें
होनेवाले पदार्थोंमें ही कार्य-कारण भाव होता है। परन्तु बौद्ध मतमें कोई भी वस्तु क्षणमात्रसे अधिक
नहीं ठहरती। अतएव ज्ञानकी उत्पत्तिके क्षणमें ज्ञानके कारण पदार्थके नाश हो जानेसे ज्ञानकी
उत्पत्ति होनेके पहले ही ज्ञानका कारण पदार्थ नष्ट हो जाता है, परन्तु आप लोगोंके मतमें कारणको ही
विषय माना है, इसलिये ज्ञानको निर्विषय मानना चाहिये । यह निर्विषय ज्ञान आकाशमें केश-ज्ञानकी तरह
प्रमाण नहीं हो सकता। तथा यदि ज्ञान और पदार्थको सहभावी माना जाय, तो पदार्थ ज्ञानका विषय नहीं
हो सकता, क्योंकि पदार्थ ज्ञानका कारण नहीं है; कारण कार्यसे पहले उत्पन्न होता है, अतः कारण
कार्यका सहभावी नहीं होता। अतएव आपके सिद्धान्तके अनुसार पदार्थ ज्ञानका विषय (कारण) नहीं
हो सकता। इसलिये हमने कहा है 'ज्ञान और पदार्थमें एक समयमें कार्य और कारण भाव नहीं बन सकता'
( न तुल्यकालः फलहेतुभावो ) । इसलिए ज्ञानके साथ उत्पन्न होनेवाला पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर
सकता। कारण कि एक साथ उत्पन्न होनेवाली दो वस्तुओंमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं होता। यदि कहो
कि ज्ञानके पहले उत्पन्न होनेवाला पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न करता है, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि हमने पहले कहा
है—'क्षणिक होनेसे पदार्थका निरन्वय विनाश होनेके कारण, नष्ट हुए पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो

१. साकल्येन ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५३
फलस्य ज्ञानलक्षणकार्यस्य भाव आत्मलाभः स्यात्। जनकस्यार्थक्षणस्यातीतत्वाद् निर्मूलमेव
ज्ञानोत्थानं स्यात्।
जनकस्यैव च ग्राह्यत्वे इन्द्रियाणामपि ग्राह्यत्वापत्तिः, तेषामपि ज्ञानजनकत्वात्। न
चान्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थस्य ज्ञानहेतुत्वं दृष्टं, मृगतृष्णादौ जलाभावेऽपि जलज्ञानोत्पादात्,
अन्यथा तत्प्रवृत्तेरसम्भवात्। भ्रान्तं तज्ज्ञानमिति चेत्, ननु भ्रान्ताभ्रान्तविचारः स्थिरीभूय
क्रियतां त्वया। सांप्रतं प्रतिपद्यस्व तावदनर्थजमपि ज्ञानम्। अन्वयेनार्थस्य ज्ञानहेतुत्वं दृष्ट-
मेवेति चेत्। न। न हि तद्भावे भाव लक्षणोऽन्वय एव हेतुफलभावनिश्चयनिमित्तम् अपि तु
तदभावेऽभावलक्षणो व्यतिरेकोऽपि। स चोक्तयुक्त्या नास्त्येव। योगिनां चातीतानागतार्थ-
ग्रहणे किमर्थस्य निमित्तत्वम्, तयोरसत्त्वात्।
“ण णिहाणगया भग्गा पुंजो णत्थि अणागए।
णिव्वुया णैव चिट्ठंति आरग्गे सरिसवोवमा ॥”१
इति वचनात्। निमित्तत्वे चार्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वादतीतानागतत्वक्षतिः॥
सकती' ( हेतौ विलीने न फलस्य भावः)। क्योंकि ज्ञानको उत्पन्न करनेवाले पदार्थके नष्ट होनेपर ज्ञान
निर्विषय रह जाता है।
तथा, ज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण भूत पदार्थको ज्ञानका विषय माननेसे इन्द्रियोंको भी ज्ञानका विषय
स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियाँ भी ज्ञानको उत्पन्न करती हैं। परन्तु आप लोगोंने पदार्थकी तरह
इन्द्रियोंको ज्ञानका विषय नहीं माना है। शंका-पदार्थ ज्ञानका विषय (कारण) है, क्योंकि पदार्थका
ज्ञानके साथ अन्वय-व्यतिरेक सम्बन्ध है। जैसे अग्नि धूमका कारण है, क्योंकि 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-
वहाँ अग्नि होती है,' और 'जहाँ अग्नि नहीं होती, वहाँ धूम नहीं होता,' वैसे ही 'जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ
पदार्थ होता है,' और 'जहाँ पदार्थ नहीं होता, वहाँ ज्ञान भी नहीं होता' इसलिये ज्ञान और पदार्थमें अन्वय-
व्यतिरेक सम्बन्ध होनेसे पदार्थ ज्ञानका कारण है। समाधान-यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस प्रकार धूमका
होना अग्निके ऊपर अवलम्बित है, उस प्रकार ज्ञानका होना पदार्थके ऊपर अवलम्बित नहीं। कारण कि
मृगतृष्णामें जल (अर्थ) के अभाव होनेपर भी जलको पानेके लिये मनुष्यकी प्रवृत्ति देखी जाती है। शंका-
मृगतृष्णामें जलका ज्ञान होना अप्रपूर्ण है, अतएव यहाँ पदार्थके बिना भी ज्ञान हो जाता है। समाधान-
यहाँ ज्ञानके भ्रमरूप या अभ्रमरूप होनेका प्रश्न नहीं है, प्रश्न है कि ज्ञान पदार्थके बिना भी
उत्पन्न होता है। यदि कहो कि जहाँ ज्ञान होता है, वहीं पदार्थ होता है, इसलिये पदार्थ ज्ञानका कारण
है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि जब तक पदार्थोंमें अन्वय और व्यतिरेक दोनों सम्बन्ध न रहें, तब तक
उनमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं बन सकता। अतएव जब तक पदार्थ और ज्ञानमें 'जहाँ पदार्थ न हो, वहाँ
ज्ञान भी न हो' इस प्रकारका व्यतिरेक सम्बन्ध न बने, तब तक पदार्थको ज्ञानका हेतु नहीं कह सकते।
यह व्यतिरेक सम्बन्ध पदार्थ और ज्ञानमें नहीं है, क्योंकि मृगतृष्णामें जलका अभाव होनेपर भी जलका ज्ञान
होता है। तथा, अतीत और अनागत पदार्थोंको जाननेवाले योगियोंके ज्ञानमें पदार्थ कारण नहीं हो सकता।
क्योंकि अतीत और अनागत पदार्थोंको जानते समय अतीत और अनागत पदार्थोंका अभाव रहता है। अतएव
भूत, भविष्यत् पदार्थ ज्ञानमें कारण नहीं हो सकते। कहा भी है-
“जो पदार्थ नष्ट हो गये हैं, वे किसी खजानेमें जमा नहीं हैं, तथा जो पदार्थ आनेवाले हैं, उनका कहीं
ढेर नहीं लगा है। जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे सूईकी नोकपर रक्खी हुई सरसोंके समान स्थायी नहीं हैं।”
यदि अतीत और अनागत पदार्थोंको भी ज्ञानमें कारण माना जाय, तो अर्थक्रियाकारी होनेसे उनके
अतीतत्व, और अनागतत्वका अभाव हो जाता है।
१. छाया-न निधानगता भग्नाः पुंजो नास्त्यनागते। निर्वृत्ता नैव तिष्ठन्ति आराग्रे सर्षपोपमाः ॥
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१५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
न च प्रकाश्यादात्मलाभ एव प्रकाशकस्य प्रकाशकत्वं, प्रदीपादेर्घटादिभ्योऽनुत्पन्नस्यापि
तत्प्रकाशकत्वात् । जनकस्यैव च ग्राह्यत्वाभ्युपगमे स्मृत्यादेः प्रमाणस्याप्रामाण्यप्रसङ्गः तस्यार्था-
जन्यत्वात् । न च स्मृतिर्न प्रमाणम्, अनुमानप्रमाणप्राणभूतत्वात् साध्यसाधनसम्बन्धस्मरण-
पूर्वकत्वात् तस्य । जनकमेव च चेद् ग्राह्यम्, तदा स्वसंवेदनस्य कथं ग्राहकत्वम् । तस्य हि
ग्राह्यं स्वरूपमेव । न च तेन तज्जन्यते, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । तस्मात् स्वसामग्रीप्रभव-
योर्घटप्रदीपयोरिवार्थज्ञानयोः प्रकाश्यप्रकाशकभावसंभवाद् न ज्ञाननिमित्तत्वमर्थस्य ॥
नन्वर्थाजन्यत्वे ज्ञानस्य कथं प्रतिनियतकर्मव्यवस्था । तदुत्पत्तितदाकारताभ्यां हि
सोपपद्यते । तस्मादनुत्पन्नस्यातदाकारस्य च ज्ञानस्य सर्वार्थान् प्रत्यविशेषात् सर्वग्रहणं
प्रसज्येत । नैवम् । तदुत्पत्तिमन्तरेणाप्यावरणक्षयोपशमलक्षणया योग्यतयैव प्रतिनियतार्थ-
प्रकाशकत्वोपपत्तेः । तदुत्पत्तावपि च योग्यतावश्यमेष्टव्या । अन्यथाऽशेषार्थसान्निध्ये तत्तदर्था-
सांनिध्येऽपि कुतश्चिदेवार्थात् कस्यचिदेव ज्ञानस्य जन्मेति कौतस्कुतोऽयं विभागः ॥
तदाकारता त्वर्थाकारसंक्रान्त्या तावदनुपपन्ना, अर्थस्य निराकारत्वप्रसङ्गात् ज्ञानस्य
शंका—प्रकाश्य पदार्थ से उत्पन्न होकर पदार्थोंको प्रकाशित करना ही प्रकाशक ( ज्ञान )
का प्रकाशकपना है । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि घट आदिसे उत्पन्न न होनेवाले भी दीपक
आदि घटको प्रकाशित करते हैं । अतएव प्रकाश्य ( अर्थ ) और प्रकाशक ( ज्ञान ) में कार्य-कारण सम्बन्ध
नहीं हो सकता । तथा, यदि ज्ञानको पदार्थसे उत्पन्न हुआ मान कर, ज्ञानको उसी पदार्थका जाननेवाला
स्वीकार किया जाय, तो स्मृति आदिको अप्रमाणत्वका प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि स्मृति आदि
प्रमाण किसी पदार्थसे उत्पन्न नहीं होते । तथा, स्मृति प्रमाण नहीं, ऐसी बात नहीं; क्योंकि स्मृति प्रमाण,
साध्य-साधनके अविनाभाव रूप सम्बन्ध ( व्याप्ति ) के स्मरणपूर्वक होनेवाले अनुमान प्रमाणका प्राणभूत है ।
तथा, जो पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न करनेवाला है, वही ज्ञानका विषय होता हो तो स्वसंवेदन ज्ञानके ग्राहकत्व
की सिद्धि कैसे होगी ? स्वसंवेदन ज्ञानका जानने योग्य विषय उसका अपना स्वरूप ही होता है । स्वसंवेदनसे
स्वसंवेदन ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि स्वसंवेदन ज्ञानमें अपनी उत्पत्ति क्रिया होनेमें विरोध
आता है । अतएव जैसे अपनी-अपनी उपादान और सहकारीभूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले घट और प्रदीपमें
प्रकाश्य-प्रकाशक भाव होता है, वैसे ही अपनी-अपनी उपादान और सहकारी भूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले
अर्थ और ज्ञानमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव संभव होनेसे अर्थका ज्ञान निमित्तत्त्व अर्थात् अर्थके ज्ञान की उत्पत्तिमें
कारण होना संभव नहीं ।
बौद्ध—यदि ज्ञानकी उत्पत्ति पदार्थसे उत्पन्न नहीं होती, तो विवक्षित ज्ञेय पदार्थका निश्चित ज्ञान
कैसे होगा ? यह व्यवस्था ज्ञानको उस पदार्थसे उत्पन्न होनेवाला, और उस पदार्थके आकाररूप होकर उस
पदार्थको जाननेवाला माननेसे ही बन सकती है । अन्यथा पदार्थसे उत्पन्न न होनेवाले और ज्ञेयाकार रूप न
होनेवाले ज्ञानकी सभी पदार्थोंके विषयमें समानरूपता होनेसे एक पदार्थको जानते समय ज्ञानको प्रत्येक
पदार्थको जानना पड़ जायेगा । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि ज्ञानकी उत्पत्ति ज्ञेय पदार्थसे न होने पर भी
ज्ञेय पदार्थके ज्ञानको आवृत्त करनेवाले कर्मके क्षयोपशमसे अभिव्यक्त विशिष्ट क्षायोपशमिक ज्ञानसे
ही प्रतिनियत अर्थके विषयमें आत्माका प्रकाशकत्व घटित होता है । ज्ञेय पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति होनेमें
भी ज्ञानकी क्षयोपशम रूप योग्यताको अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि इस योग्यताको स्वीकार न किया
जाये तो अनेक पदार्थोंका सांनिध्य होनेपर उस-उस अर्थका सांनिध्य न होनेपर भी, किसी भी अर्थसे किसी
भी ज्ञानकी उत्पत्ति हो जाया करेगी, और फिर यह ज्ञान इसी पदार्थका है, यह विभाग नहीं बन सकेगा ।
ज्ञानको पदार्थके आकारका मानना भी संगत नहीं है, अन्यथा पदार्थको ज्ञानके आकारका होनेसे

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५५
साकारत्वप्रसङ्गाच्च । अर्थेन च मूर्तेनामूर्तस्य ज्ञानस्य कीदृशं सादृश्यम् । इत्यर्थविशेषग्रहण-
परिणाम एव साभ्युपेया । ततः—
“अर्थेन घटयत्येनां न हि मुक्त्वाऽर्थरूपताम् ।
तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता” ॥१
इति यत्किञ्चिदेतत् ॥
अपि च, व्यस्ते समस्ते वैते ग्रहणकारणं स्याताम् । यदि व्यस्ते, तदा कपालाद्यक्षणो
घटान्त्यक्षणस्य, जलचन्द्रो वा नभश्चन्द्रस्य ग्राहकः प्राप्नोति, यथासंख्यं तदुत्पत्तेः तदाकार-
त्वाच्च । अथ समस्ते, तर्हि घटोत्तरक्षणः पूर्वघटक्षणस्य ग्राहकः प्रसजति, तयोरुभयोरपि
सद्भावात् । ज्ञानरूपत्वे सत्येते ग्रहणकारणमिति चेत्, तर्हि समानजातीयज्ञानस्य समनन्तर-
ज्ञानग्राहकत्वं प्रसज्येत, तयोर्जन्यजनकभावसद्भावात् । तन्न योग्यतामन्तरेणान्यद् ग्रहणकारणं
पश्याम इति ॥
पदार्थोंको निराकार, और ज्ञानको पदार्थके आकारका होनेसे ज्ञानको साकार मानना होगा । परन्तु मूर्त
पदार्थोंके साथ अमूर्त ज्ञानकी समानता नहीं हो सकती । अतएव ज्ञानकी अर्थाकारताका कार्य प्रतिनियत
पदार्थोंका ज्ञान ही मानना चाहिये । इसलिये—
“ज्ञानकी अर्थाकारताको छोड़कर पदार्थ और ज्ञानका कोई सम्बन्ध नहीं होता, अतएव ज्ञानका
पदार्थोंके आकार होना ही ज्ञानकी प्रमाणता है,” यह आप लोगोंका कथन खण्डित हो जाता है।
तथा, आप लोगोंका जो कहना है कि ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है ( तदुत्पत्ति ), और पदार्थोंके
आकार होकर पदार्थका ज्ञान करता है ( तदाकार ), सो यह ज्ञानकी तदुत्पत्ति और तदाकारता पदार्थोंके
ज्ञानमें अलग-अलग रूपसे कारण हैं, अथवा मिलकर ? यदि कहो कि कहीं तदुत्पत्ति और कहीं तदाकारता
पदार्थोंके ज्ञानमें अलग-अलग कारण हैं, तो कपालके प्रथम क्षणको घटके अन्तिम क्षणका ज्ञान होता है,
ऐसा मानना चाहिये, क्योंकि घटके अन्तिम क्षणसे कपालका प्रथम क्षण उत्पन्न होता है ( तदुत्पत्ति );
तथा चन्द्रमाके जलमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बको आकाशके चन्द्रमाका ज्ञान होता है, ऐसा मानना चाहिये,
क्योंकि जल-चन्द्र आकाश-चन्द्रके आकारको धारण करता है ( तदाकार ) । परन्तु घटके अन्तिम क्षणसे
कपालके प्रथम क्षणके उत्पन्न होनेपर भी कपालके प्रथम क्षणको घटके अन्तिम क्षणका ज्ञान नहीं होता;
तथा जलमें पड़नेवाले चन्द्रमाके प्रतिबिम्बके आकाशके चन्द्रमाके आकारका होनेपर भी जल-चन्द्रको आकाश-
चन्द्रका ज्ञान नहीं होता । अतएव तदुत्पत्ति और तदाकारता अलग-अलग पदार्थके ज्ञानमें कारण नहीं हैं।
यदि कहो कि तदुत्पत्ति और तदाकारता दोनों मिलकर पदार्थोंके ज्ञानमें कारण हैं, तो यह ठीक नहीं;
क्योंकि घटका उत्तर-क्षण घटके पूर्व-क्षणसे उत्पन्न भी होता है ( तदुत्पत्ति ), और पूर्व-क्षणवर्ती घटाकार
भी है ( तदाकारता ), परन्तु उत्तर-क्षण घटको पूर्व-क्षणवर्ती घटका ज्ञान नहीं होता । शंका—जो ज्ञान
जिस पदार्थसे उत्पन्न हुआ है, और जिस पदार्थके आकारको धारण करता है, वह ज्ञान उसी पदार्थको
जानता है, इसलिये यह नियम नहीं है कि जो कोई वस्तु जिस किसी वस्तुसे उत्पन्न होती हो, और जिस
वस्तुका आकार रखती हो, वह उस वस्तुको जाने ( ज्ञानरूपत्वे सति तदुत्पत्ति तदाकारता ) । समाधान—
यह भी ठीक नहीं । क्योंकि पीछेसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञान ( समनन्तर ज्ञान ) के पूर्ववर्ती सजातीय ज्ञानसे
उत्पन्न होने, और उसके आकार रूप होनेके कारण पूर्ववर्ती समानजातीय ज्ञानके ग्राहक होनेका
प्रसंग उपस्थित हो जायगा । अतएव प्रत्येक ज्ञानके प्रतिनियत पदार्थोंको जाननेमें कर्मोंके आवरणकी क्षयोप-
शम रूप योग्यताको ही कारण मानना चाहिये ।
१. प्रमाणवार्तिके ३-३०५ ।