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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

१२२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
विशेषव्यक्तिष्वेका अनेका वा ? अनेका चेत् तस्या अपि विशेषत्वापत्तिः, अनेकरूपत्वैक-
जीवितत्वाद् विशेषाणाम् । ततश्च तस्या अपि विशेषत्वान्यथानुपपत्तेर्व्यावृत्त्या भाव्यम् ।
व्यावृत्तेरपि च व्यावृत्तौ विशेषाणामभाव एव स्यात् । तत्स्वरूपभूताया व्यावृत्तेः प्रतिषिद्धत्वात्;
अनवस्थापाताच्च । एका चेत् सामान्यमेव संज्ञान्तरेण प्रतिपन्नं स्यात् । अनुवृत्तिप्रत्ययलक्षणाव्य-
भिचारात् । किञ्च, अमी विशेषाः सामान्याद् भिन्ना अभिन्ना वा ? भिन्नाश्चेद् मण्डूकजटा-
भारानुकाराः । अभिन्नाश्चेत् तदेव तत्स्वरूपवत् । इति सामान्यैकान्तवादः ॥
पर्यायनयान्वयिनस्तु भाषन्ते । विविक्ताः क्षणक्षयिणो विशेषा एव परमार्थः । ततो
विष्वग्भूतस्य सामान्यस्याप्रतीयमानत्वात् । न हि गवादिव्यक्त्यनुभवकाले वर्णसंस्थानात्मकं
व्यक्तिरूपमपहाय, अन्यत्किञ्चिदेकमनुयायि प्रत्यक्षे प्रतिभासते । तादृशस्यानुभवाभावात् ।
तथा च पठन्ति—
“एतासु पञ्चस्ववभासनीषु प्रत्यक्षबोधे स्फुटमङ्गुलीषु ।
साधारणं रूपमवेक्षते यः शृङ्गं शिरस्यात्मन ईक्षते सः”१ ॥
एकाकारपरामर्शप्रत्ययस्तु स्वहेतुदत्तशक्तिभ्यो व्यक्तिभ्य एवोत्पद्यते । इति न तेन सामान्य-
साधनं न्याय्यम् ॥
किञ्च, यदिदं सामान्यं परिकल्प्यते तदेकमनेकं वा ? एकमपि सर्वगतमसर्वगतं वा ?
सर्वगतं चेत्, किं न व्यक्त्यन्तरालेषूपलभ्यते । सर्वगतैकत्वाभ्युपगमे च तस्य यथा गोत्व-
उन पदार्थोंको सामान्य ही कहना चाहिये । तथा, विशेषोंके द्वारा की हुई व्यावृत्ति सब विशेषोंमें एक ही
व्यावृत्ति होती है, अथवा सबमें अलग-अलग ? यदि व्यावृत्ति अनेक हैं, तो व्यावृत्तिको भी विशेष मानना
चाहिये, क्योंकि अनेक रूपको ही विशेष कहते हैं । अतएव व्यावृत्तिके विशेष सिद्ध होने पर व्यावृत्तिमें
भी व्यावृत्ति होनी चाहिये, क्योंकि विशेषकी व्यावृत्तिके साथ अन्यथानुपपत्ति है । तथा, व्यावृत्तिमें व्यावृत्ति
माननेपर, व्यावृत्ति व्यावृत्ति रूप सिद्ध नहीं हो सकती, अतएव विशेषोंका अभाव मानना होगा, और इस
प्रकारकी व्यावृत्ति प्रतिषिद्ध है । तथा, एक व्यावृत्तिमें अनेक व्यावृत्ति माननेसे अनवस्था दोष आता है । यदि
सब विशेषोंमें एक ही व्यावृत्ति स्वीकार करो, तो उसे सामान्य ही मानना चाहिये; क्योंकि अनुवृत्ति प्रत्ययसे
विरोध नहीं आता । तथा, ये विशेष सामान्यसे भिन्न हैं, या अभिन्न ? विशेषोंको सामान्यसे भिन्न मानना
मण्डूकके जटाभारका ही अनुकरण करना है । यदि विशेष सामान्यसे अभिन्न हैं, तो उन्हें सामान्य ही कहना
होगा । अतएव सामान्य एकान्त वाद मानना ही उचित है ।
(२) पर्यायास्तिक नयको स्वीकार करने वाले बौद्ध : भिन्न और क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले विशेष
ही तत्त्व हैं, क्योंकि विशेषको छोड़ कर सामान्य कोई अलग वस्तु नहीं है । गौको जानते समय हमें गौके
वर्ण, आकार आदिके विशेष ज्ञानको छोड़ कर गौका केवल सामान्य ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि विशेष
ज्ञानको छोड़ कर किसी पदार्थका सामान्य ज्ञान हमारे अनुभवके बाह्य है। कहा भी है—
“जो पुरुष प्रत्यक्षसे स्पष्ट अलग-अलग दिखाई देनेवाली पाँच उँगलियोंमें केवल सामान्य रूपको
देखता है, वह पुरुष अपने सिरपर सींग ही देखता है, अतएव पदार्थोंके विशेष ज्ञानको छोड़ कर पदार्थोंका
केवल सामान्य ज्ञान होना असम्भव है ।”
तथा, एकरूप ज्ञान अपने कारणोंसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्तियोंसे ही उत्पन्न होता है । अतएव सामान्य
की सिद्धि न्यायसंगत नहीं ।
तथा, सामान्य एक है, या अनेक ? यदि सामान्य एक है तो वह व्यापक है, या अव्यापक ? यदि
सामान्य व्यापक है, तो वह दो व्यक्तियों ( गौओं ) के बीचमें क्यों नहीं रहता ? तथा, सामान्यको सर्वगत
१. अशोकविरचितसामान्यदूषणदिक्ग्रन्थे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२३
सामान्यं गोव्यक्तीः क्रोडीकरोति, एवं किं न घटपटादिव्यक्तीरपि, अविशेषात्। असर्वगतं
चेद् विशेषरूपापत्तिः अभ्युपगमबाधश्च ॥
अथानेकं गोत्वाश्वत्वघटत्वपटत्वादिभेदाद्भिन्नत्वात् तर्हि विशेषा एव स्वीकृताः।
अन्योन्यव्यावृत्तिहेतुत्वात् । न हि यद्गोत्वं तदश्वत्वात्मकमिति । अर्थक्रियाकारित्वं च
वस्तुनो लक्षणम् । तच्च विशेषेष्वेव स्फुटं प्रतीयते । न हि सामान्येन काचिदर्थक्रिया क्रियते ।
तस्य निष्क्रियत्वात् । वाहदोहादिकास्वर्थक्रियासु विशेषाणामेवोपयोगात् । तथेदं सामान्यं
विशेषेभ्यो भिन्नमभिन्नं वा ? भिन्नं चेद् अवस्तु । विशेषविश्लेषेणार्थक्रियाकारित्वाभावात् ।
अभिन्नं चेद् विशेषा एव, तत्स्वरूपवत् । इति विशेषैकान्तवादः ॥
नैगमनयानुगामिनस्त्वाहुः । स्वतन्त्रौ सामान्यविशेषौ । तथैव प्रमाणेन प्रतीतत्वात् ।
तथाहि । सामान्यविशेषावत्यन्तभिन्नौ, विरुद्धधर्माध्यासितत्वात् । यावेवं तावेवं, यथा पाथः-
पावकौ, तथा चैतौ, तस्मात् तथा । सामान्यं हि गोत्वादि सर्वगतम् । तद्विपरीताश्च शबलशाव-
लेयादयो विशेषाः । ततः कथमेषामैक्यं युक्तम् ॥
न सामान्यात् पृथग्विशेषस्योपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम् ।
सामान्यव्याप्तस्येति चेद्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः । सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात् ततश्च तेन
बोधेन विविक्तविशेषग्रहणाभावात् तद्वाचकं ध्वनिं तत्साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता ।
न चैतदस्ति । विशेषाभिधानव्यवहारयोः प्रवृत्तिदर्शनात् । तस्माद् विशेषमभिलपता तस्य च
और एक माननेपर जैसे गोत्व सामान्य गौओंमें रहता है, वैसे ही वह घट, पट आदिमें भी रहना चाहिये;
क्योंकि सामान्य एक है। यदि सामान्यको अव्यापक मानो तो वह विशेषरूप हो जायेगा और आपकी
मान्यतामें बाधा उपस्थित होगी ।
यदि कहो कि सामान्य गोत्व, अश्वत्व, घटत्व, पटत्व आदिके भेदसे अनेक प्रकारका है, तो इससे
एक दूसरेकी व्यावृत्ति करनेवाला विशेष ही सिद्ध होता है । क्योंकि गोत्व और अश्वत्वके भिन्न-भिन्न होनेसे
गोत्वकी अश्वत्वसे व्यावृत्ति होती है । तथा, अर्थक्रियाकारित्व वस्तुका लक्षण है। यह लक्षण विशेषमें
ही स्पष्ट घटता है, क्योंकि सामान्य निष्क्रिय होनेसे अर्थक्रिया नहीं कर सकता । तथा, वाहन ( खेंचना )
दोहन ( दुहना ) आदि अर्थक्रियाओंमें भी अश्वत्व, गोत्व आदि सामान्य उपयोगी नहीं होते, बल्कि खींचने,
दुहने आदिके समय विशेषरूप अश्व और गोसे ही हमारा प्रयोजन सिद्ध होता है। तथा, यह सामान्य विशेषों-
से भिन्न है, या अभिन्न ? यदि सामान्य विशेषोंसे भिन्न है तो सामान्य कोई पदार्थ हो नहीं ठहरता; क्योंकि
विशेषसे भिन्न हो कर इसमें अर्थक्रिया नहीं हो सकती । यदि सामान्य विशेषसे अभिन्न है तो उसे विशेष
ही मानना चाहिये, क्योंकि वह इसीका रूप है । अतएव विशेष एकान्तवाद मानना ही उचित है ।
(३) नैगम नय को स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिक : सामान्य और विशेष स्वतन्त्र हैं, क्योंकि
प्रमाणके द्वारा वे ऐसे ही प्रतीत होते हैं । तथाहि : 'सामान्य और विशेष अत्यन्त भिन्न हैं, क्योंकि वे विरोधी
धर्मोंसे युक्त हैं; जो विरोधी धर्मोंसे युक्त होते हैं वे अत्यन्त भिन्न होते हैं, जैसे जल और अग्नि । ये
सामान्य और विशेष विरोधी धर्मोंसे युक्त हैं, अतः अत्यन्त भिन्न हैं'। गोत्व आदि सामान्य सर्वव्यापक है, और
शबल शावलेय आदि विशेष उसके विपरीत हैं, अतएव दोनोंका एकत्र कैसे सम्भव है ?
यदि कहो कि सामान्यसे पृथक् रूप में विशेषका ज्ञान नहीं होता तो कहिये कि विशेषका ज्ञान फिर
कैसे होता है ? यदि कहो कि सामान्यसे व्याप्त विशेषका ज्ञान होता है, तो इसका मतलब हुआ कि विशेषका
ज्ञान नहीं होता, क्योंकि उस सामान्यसे व्याप्त विशेषके ज्ञानसे सामान्यका भी ज्ञान होता है और इसलिए उस
सामान्यसे व्याप्त विशेषके ज्ञानसे सामान्यके कारण भिन्न विशेषका ज्ञान न होनेके कारण प्रमाता, विशेषके वाचक
शब्द तथा विशेषके द्वारा किये जानेवाला व्यवहार न कर सकेगा। किन्तु विशेष वाचक शब्दका और विशेषके

Here is the complete and accurate transcription of the text from the image, line by line, preserving the Devanagari script and punctuation.


१२४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
व्यवहारं प्रवर्तयता तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः । एवं सामान्यस्थाने विशेष-
शब्दं, विशेषस्थाने च सामान्यशब्दं प्रयुञ्जानेन सामान्येऽपि तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽङ्गी-
कर्तव्यः । तस्मात् स्वस्वग्राहिणि ज्ञाने पृथक्प्रतिभासमानत्वाद् द्वावपीतरेतरविशकलितौ ।
ततो न सामान्यविशेषात्मकत्वं वस्तुनो घटते । इति स्वतन्त्रसामान्यविशेषवादः ॥
तदेतत् पक्षत्रयमपि न क्षमते क्षोदम् । प्रमाणबाधितत्वात् । सामान्यविशेपोभयात्म-
कस्यैव वस्तुनो निर्विगानमनुभूयमानत्वात् । वस्तुनो हि लक्षणम् अर्थक्रियाकारित्वम् ।
तच्चानेकान्तवादे एवाविकलं कलयन्ति परीक्षकाः । तथाहि । यथा गौरित्युक्ते खुरककुत्सा-
स्नालाङ्गूलविषाणाद्यवयवसम्पन्नं वस्तुरूपं सर्वव्यक्त्यनुयायि प्रतीयते, तथा महिष्यादि-
व्यावृत्तिरपि प्रतीयते ॥
यत्रापि च शबला गौरित्युच्यते, तत्रापि यथा विशेषप्रतिभासः तथा गोत्वप्रतिभासोऽपि
स्फुट एव । शबलेति केवलविशेषोच्चारणेऽपि, अर्थात् प्रकरणाद् वा गोत्वमनुवर्तते । अपि
च, शबलत्वमपि नानारूपम्, तथा दर्शनात् । ततो वक्त्रा शबलेत्युक्ते क्रोडीकृतसकलशवल-
सामान्यं विवक्षितगोव्यक्तिगतमेव शबलत्वं व्यवस्थाप्यते । तदेवमाबालगोपालं प्रतीति-
प्रसिद्धेऽपि वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वे तदुभयैकान्तवादः प्रलापमात्रम् । न हिं क्वचित्
कदाचित् केनचित् सामान्यं विशेषविनाकृतमनुभूयते, विशेषा वा तद्विनाकृताः । केवलं
द्वारा किये जानेवाले व्यवहारका अभाव तो है नहीं; क्योंकि विशेष शब्दकी और विशेषके द्वारा किये जानेवाले
व्यवहारकी प्रवृत्ति देखी जाती है । अतएव विशेषकी अभिलाषा करनेवालेको और विशेषसाध्य व्यवहारकी
प्रवृत्ति करनेवालेको सामान्य ज्ञानसे भिन्न विशेषको जाननेवाले ज्ञानको स्वीकार करना चाहिए । इस प्रकार
सामान्यके वाचक शब्दके स्थानमें विशेषके वाचक शब्दका, और विशेषके वाचक शब्दके स्थानमें सामान्यके
वाचक शब्दका प्रयोग करनेवालेको, सामान्यके विषयमें भी विशेषके ज्ञानसे भिन्न सामान्यके ज्ञानको स्वीकार
करना चाहिए । अतएव सामान्यको जाननेवाले ज्ञानमें और विशेषको जाननेवाले ज्ञानमें पृथक् रूपसे प्रति-
भासित होनेके कारण सामान्य और विशेष दोनों ही एक दूसरेसे भिन्न सिद्ध होते हैं । अतएव पदार्थका
सामान्य-विशेषात्मक रूप घटित नहीं होता । इसलिए स्वतन्त्र सामान्य और स्वतन्त्र विशेषवाद ही ठीक है।
जैन—(१) उक्त तीनों पक्ष प्रमाणसे बाधित होनेसे परीक्षाकी कसौटी पर ठीक नहीं उतरते ।
क्योंकि सामान्य-विशेष रूप पदार्थ ही निर्दोष रूपसे अनुभवमें आते हैं। वस्तुका लक्षण अर्थक्रियाकारित्व है और
यह लक्षण अनेकान्तवादमें ही ठीक-ठीक घटित हो सकता है। गौके कहनेपर जिस प्रकार खुर, ककुत्,
सास्ना, पूँछ, सींग आदि अवयवोंवाले गो पदार्थका स्वरूप सभी गो व्यक्तियोंमें पाया जाता है, उसी प्रकार
भैंस आदिकी व्यावृत्ति भी प्रतीत होतो है । अतएव एकान्त सामान्यको न मान कर पदार्थोंको सामान्य-विशेष
रूप ही मानना चाहिये ।
(२) जहाँ 'शबला गो' कहा जाता है, वहाँ जिस प्रकार विशेषका ज्ञान होता है, उसी प्रकार
गोत्व सामान्यका ज्ञान भी स्पष्ट ही है । 'शबला' केवल इस विशेषका उच्चारण करने पर भी अर्थ
या प्रकरणकी दृष्टिसे गोत्व सामान्यकी अनुवृत्ति होती है ( अर्थात् गोत्व सामान्यका ज्ञान होता है ) । तथा,
शबलत्व भी अनेक प्रकारका होता है, क्योंकि वैसा देखनेमें आता है । अतएव वक्ताके द्वारा 'शबला' कहा
जानेपर, अपनेमें सभी शबल-सामान्यका अन्तर्भाव करनेवाले विवक्षित गोव्यक्तिमें विद्यमान रहनेवाले ही
शबलत्वका निश्चय किया जाता है । इस प्रकार वस्तुका सामान्य-विशेषात्मकत्व सभी बाल-गोपालमें अनुभव-
सिद्ध है, फिर भी सामान्य ही सद्भूत है, विशेष नहीं, और विशेष ही सद्भूत है, सामान्य नहीं, इस प्रकारका
ऐकान्तिक कथन प्रलापमात्र है । विशेषोंसे पृथक् किये गये सामान्यक! और सामान्यसे पृथक् किये गये विशेषों-

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२५
दुर्नयप्रभावितमतियामोहवशादेकमपपल्यान्यतरद् व्यवस्थापयन्ति बालिशाः । सोऽय-
मन्धगजन्‍यायः१ ॥
येऽपि च तदेकान्तपक्षोपनिपातिनः प्रागुक्ता दोषास्तेऽप्यनेकान्तवादप्रचण्डमुद्गरप्रहार-
जर्जरितत्वाद् नोच्छ्वसितुमपि क्षमाः । स्वतन्त्रसामान्यविशेषवादिनस्त्वेवं प्रतिक्षेप्याः ।
सामान्यं प्रतिव्यक्ति कथञ्चिद्भिन्नं, कथञ्चिदभिन्नं, कथञ्चित् तदात्मकत्वाद्, विसदृशपरिणाम-
वत् । यथैव हि काचिद् व्यक्तिरुपलभ्यमानाद् व्यक्त्यन्तराद् विशिष्टा विसदृशपरिणाम-
दर्शनादवतिष्ठते, तथा सदृशपरिणामात्मकसामान्यदर्शनात् समानेति । तेन समानो गौरयम्,
सोऽनेन समान इति प्रतीतेः । न चास्य व्यक्तिस्वरूपादभिन्नत्वात् सामान्यरूपतान्याघातः ।
यतो रूपादीनामपि व्यक्तिस्वरूपादभिन्नत्वमस्ति, न च तेषां गुणरूपतान्याघातः । कथञ्चिद्
व्यतिरेकस्तु रूपादीनामिव सदृशपरिणामस्याप्यस्त्येव । पृथग्व्यपदेशादिभाक्तत्वात् ॥
विशेषा अपि नैकान्तेन सामान्यात् पृथग्भवितुमर्हन्ति । यतो यदि सामान्यं सर्वगतं
सिद्धं भवेत् तदा तेषामसर्वगतत्वेन ततो विरुद्धधर्माध्यासः स्यात् । न च तस्य तत् सिद्धम् ।
प्रागुक्तयुक्त्या निराकृतत्वात् । सामान्यस्य विशेषाणां च कथञ्चित् परस्पराव्यतिरेकेणैकानेक-
रूपतया व्यवस्थितत्वात् । विशेषेभ्योऽव्यतिरिक्तत्वाद्वि सामान्यमप्यनेकमिष्यते । सामान्यात्
तु विशेषाणामव्यतिरेकात्तेऽप्येकरूपा इति ।
का कहीं पर, किसी कालमें, किसीके द्वारा अनुभव नहीं किया जाता । अज्ञानी पुरुष केवल दुर्नयसे प्रभावित
मतिके व्यामोहके कारण सामान्य और विशेष इन दोनोंमेंसे एकका अपलाप दूसरेकी सिद्धि करते हैं । यह
अन्धगजन्‍याय ही है ।
(३) क—सामान्य-एकान्त और विशेष-एकान्त पक्षमें उपस्थित होने वाले पूर्वोक्त दोष भी अनेकान्त-
वाद रूप प्रचण्ड मुद्गरके प्रहारसे जर्जरित होनेके कारण श्वास लेनेमें भी समर्थ नहीं रह जाते । सामान्य
और विशेषको परस्पर भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ मानने वालों ( वैशेषिक और नैयायिक ) का निम्नलिखित रूपसे
निराकरण करना चाहिये, 'सामान्य प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है, कथंचित् तदात्मक
होनेसे, विसदृश परिणामकी तरह ।' ( विसदृश परिणामका जिस प्रकार अपने परिणामाभिभूत प्रत्येक व्यक्तिके
साथ कथंचित् तादात्म्य होनेसे, वह प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है, उसी प्रकार सामान्यका
प्रत्येक व्यक्तिके साथ कथंचित् तादात्म्य होनेसे, वह प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न
है ) । जैसे किसी व्यक्तिका उपलभ्यमान अन्य व्यक्तिसे विसदृश परिणाम दिखाई देता है, उसी प्रकार वह
सदृश परिणामस्वरूप सामान्य दिखाई देनेसे उपलभ्यमान अन्य व्यक्तिके समान ( सदृश परिणाम ) होता
है; क्योंकि 'यह गाय उस गायके समान है', 'वह उसके समान है', इस प्रकारका ज्ञान होता है । व्यक्ति-
के स्वरूपसे अभिन्न होनेसे सामान्यकी सामान्यरूपतामें विरोध नहीं आता । क्योंकि रूप आदि अर्थ व्यक्ति
( विशेष ) के स्वरूपसे अभिन्न होने पर भी ( रूप आदिके घट आदिसे अभिन्न होने पर भी ) उनकी गुण-
रूपतामें विरोध नहीं आता । तथा, जिस प्रकार सामान्य व्यक्तिके स्वरूपसे कथंचित् भिन्न होता है, उसी
प्रकार सदृशपरिणाम व्यक्तिके स्वरूपसे कथंचित् भिन्न है, क्योंकि व्यक्तिस्वरूप और सदृश परिणाम की संज्ञा,
लक्षण, प्रयोजन आदि भिन्न-भिन्न हैं ।
ख—इसी प्रकार विशेष भी एकान्त रूपसे सामान्यसे भिन्न होने योग्य नहीं है । क्योंकि यदि सामान्य
सर्वव्यापक सिद्ध हो गया तो विशेषके सर्वव्यापक न होनेके कारण उनमें सामान्यसे विरुद्ध धर्मोंका अध्यारोप
उपस्थित होगा । और सामान्यका सर्वव्यापकत्व सिद्ध नहीं है; इसका हम पहले ही खण्डन कर आये हैं ।
१. जन्मान्धैर्दशभिर्यथाक्रमं पदचतुष्टयश्रोत्रद्वयशुण्डादन्तपुच्छरूपा गजावयवाः स्पृष्टाः । ततः तेऽन्धाः
स्वस्पृष्टरूपं स्तम्भाद्याकारकं पूर्णतया गजस्वरूपं प्रतिपद्यमानास्तथैव स्थापयन्ति तदितरन्निषेधयन्ति तद्वत् ।

१२६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
एकत्वं च सामान्यस्य संग्रहनयार्पणात् सर्वत्र विज्ञेयम् । प्रमाणार्पणात् तस्य कथ-
ञ्चिद्विरुद्धधर्माध्यासितत्वम् । सदृशपरिणामरूपस्य विसदृशपरिमाणवत् कथञ्चित् प्रतिव्यक्ति-
भेदात् । एवं चासिद्धं सामान्यविशेषयोः सर्वथाविरुद्धधर्माध्यासितत्वम् । कथञ्चिद्विरुद्धधर्मा-
ध्यासितत्वं चेद् विवक्षितम् तदास्मत्कक्षाप्रवेशः । कथञ्चिद्विरुद्धधर्माध्यासस्य कथञ्चिद्भेदा-
विनाभूतत्वात् । पाथःपावकदृष्टान्तोऽपि साध्यसाधनविकलः । तयोरपि कथञ्चिदेव विरुद्ध-
धर्माध्यासितत्वेन भिन्नत्वेन च स्वीकरणात् । पयस्त्वपावकत्वादिना हि तयोर्विरुद्धधर्माध्यासः,
भेदश्च । द्रव्यत्वादिना पुनस्तद्वैपरीत्यमिति । तथा च कथं न सामान्यविशेषात्मकत्वं वस्तुनो
घटते इति । ततः सुष्ठूक्तं वाच्यमेकमनेकरूपम् इति ॥
एवं वाचकमपि शब्दाख्यं द्वयात्मकम् सामान्यविशेषात्मकम् । सर्वशब्दव्यक्तिष्वनु-
यायि शब्दत्वमेकम् । शङ्खशाङ्गतीव्रमन्दोदात्तानुदात्तस्वरितादिविशेषभेदादनेकम् । शब्दस्य
हि सामान्यविशेषात्मकत्वं पौद्गलिकत्वाद् व्यक्तमेव । तथाहि । पौद्गलिकः शब्दः, इन्द्रि-
यार्थत्वात्, रूपादिवत् ॥
यच्चास्य पौद्गलिकत्वनिषेधाय स्पर्शशून्याश्रयत्वात्, अतिनिबिडप्रदेशे प्रवेशनिर्गम-
योरप्रतिघातात्, पूर्वं पश्चाच्चावयवानुपलब्धेः, सूक्ष्ममूर्तद्रव्यान्र्तराप्रेरकत्वाद्, गगनगुणत्वात्
चेति पञ्चहेतवो यौगैरुपन्यस्ताः, ते हेत्वाभासाः । तथाहि । शब्दपर्यायस्याश्रयो भाषावर्गरणा,
तथा, सामान्य और विशेषका परस्पर कथंचित् अभेद होनेके कारण सामान्य-विशेष एक रूपसे और अनेक रूप-
से व्यवस्थित हैं । विशेषोंसे भिन्न न होनेसे सामान्य भी अनेक रूपसे प्रतिव्यक्तिके भेदरूपसे इष्ट है और
सामान्यसे विशेषोंका भेद न होनेसे विशेष भी एक रूपसे इष्ट है ।
व्यक्तियोंमें पाया जाने वाला सामान्य संग्रह नयकी विवक्षासे एक रूप होता है । प्रमाणकी विवक्षा
(मुख्यता) से सामान्यका कथंचित् विरुद्ध धर्माध्यासितत्व समझना चाहिये । जिस प्रकार विसदृश परिणाम
(परिणामाभिभूत ) प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न होता है, उसी प्रकार सदृश परिणाम रूप सामान्यका भी
प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भेद होता है । इस प्रकार सामान्य और विशेषका सर्वथा विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना
असिद्ध है । यदि सामान्य विशेषका कथंचित् विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना प्रतिवादीको विवक्षित हो तो यह हमारे
ही मतकी स्वीकृति होगी । क्योंकि कथंचित् विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना कथंचित् भेदके साथ अविनाभाव रूप
होना है । तथा, जल और अग्निका दृष्टान्त भी साध्यविकल ( साध्यमें न रहनेवाला ) और साधन-विकल
( साधनमें न रहनेवाला ) है । क्योंकि उन दोनोंको भी हमने कथंचित् विरुद्ध धर्माध्यासित और कथंचित्
भिन्न रूपसे स्वीकार किया है । जलत्व और अग्नित्व आदिसे दोनों विरुद्ध धर्मोंसे युक्त हैं और दोनोंमें भेदका
सद्भाव है । तथा, द्रव्यत्व आदिकी अपेक्षा दोनों विरुद्ध धर्मोंसे युक्त नहीं हैं और उनमें भेद भी नहीं है ।
इस प्रकार वस्तुका सामान्य विशेषात्मकत्व कैसे नहीं सिद्ध होता ? अतएव हमने जो कहा है कि
वाच्य एक और अनेक दोनों रूप है, हमारा यह कथन बिलकुल ठीक है ।
इस प्रकार शब्दसंज्ञक वाचक भी सामान्य-विशेष दोनोंसे युक्त है । सभी शब्दरूप व्यक्तियोंमें
अन्वित होने वाला शब्दत्व (सामान्य) एक रूप है और वह शब्दत्व शंख, धनुष, तीव्र, मन्द, उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित आदिके शब्दभेदसे अनेक रूप है । तथा, शब्द पौद्गलिक होनेसे सामान्य और विशेष दोनों रूप है ।
तथाहि : 'शब्द पौद्गलिक है, क्योंकि रूप आदिकी तरह इन्द्रियका विषय है ।'
शब्द पुद्गलकी पर्याय नहीं है, इसका निषेध करनेके लिए नैयायिकों और वैशेषिकों ने जो
निम्नलिखित हेतु उपस्थित किये हैं, वे हेत्वाभास हैं : ( १ ) स्पर्शसे शून्य पदार्थ उसका आश्रय है;

न पुनराकाशम् । तत्र च स्पर्शो निर्णीयत एव । यथा शब्दाश्रयः स्पर्शवान्, अनुवातप्रतिवात-
योर्विप्रकृष्टनिकटशरीरिणोपलभ्यमानानुपलभ्यमानेन्द्रियार्थत्वात् तथाविधगन्धाधारद्रव्यपर-
माणुवत् । इति असिद्धः प्रथमः । द्वितीयस्तु गन्धद्रव्येण व्यभिचारार्दनैकान्तिकः । वर्त्यमान-
जात्यकस्तूरिकादि गन्धद्रव्यं हि पिहितद्वारापवरकस्यान्र्तविशति वहिश्च निर्याति, न चापौद्ग-
लिकम् । अथ तत्र सूक्ष्मरन्ध्रसंभवाद् नातिनिविडत्वम्, अतस्तत्र तत्प्रवेशनिष्क्रमौ । कथ-
मन्यथोद्घाटितद्वारावस्थायामिव न तदेकार्णवत्वम् । सर्वथा नीरन्ध्रे तु प्रदेशे न तयोः
संभवः इति चेत्, तर्हि शब्देऽप्येतत्समानम् इत्यसिद्धो हेतुः । तृतीयस्तु तडिल्लतोल्कादिभिर-
नैकान्तिकः । चतुर्थोऽपि तथैव । गन्धद्रव्यविशेषसूक्ष्मरजोधूमादिभिर्व्यभिचारात् । न हि
गन्धद्रव्यादिकमपि नासायां निविशमानं तद्विवरद्वारदेशोद्भिन्नश्मश्रुप्ररेकं दृश्यते । पञ्चमः पुनः
असिद्धः । तथाहि । न गगनगुणः शब्दः, अस्मदादिप्रत्यक्षत्वाद्, रूपादिवत् । इति सिद्धः
पौद्गलिकत्वात् सामान्यविशेषात्मकः शब्द इति ॥


( २ ) अत्यन्त सघन प्रदेशमें प्रवेश करते और निकलते हुए नहीं रुकता है; ( ३ ) शब्दके पूर्व और पश्चात्
उसके अवयव नहीं दिखाई देते; ( ४ ) वह सूक्ष्म मूर्त द्रव्योंका प्रेरक नहीं है; तथा ( ५ ) शब्द आकाशका
गुण है । ( १ ) उक्त हेतुओंमें प्रथम हेतु असिद्ध है । क्योंकि शब्द पर्यायका आश्रय भाषावर्गणा
है ( सजातीय वस्तुओंके समुदायको वर्गणा कहते हैं, जिन पुद्गल वर्गणाओंसे शब्द बनते हैं,
उन्हें भाषावर्गणा कहते हैं ), आकाश नहीं । तथा, शब्दका आश्रय यह भाषावर्गणा स्पर्श गुणसे निर्णीत
किया जाता है । जैसे, शब्दका आश्रय भाषावर्गणा स्पर्शसे युक्त है; क्योंकि जिस प्रकार गन्धके आश्रित द्रव्य-
परमाणु इन्द्रिय ( घ्राणेन्द्रिय ) का विषय होनेसे, वायुके अनुकूल होनेपर दूर खड़े हुए मनुष्यके पास पहुँच
जाते हैं, और वायुके प्रतिकूल होनेपर पास बैठे हुए मनुष्य तक भी नहीं पहुँचते; उसी प्रकार शब्दके आश्रित
द्रव्यपरमाणु भी इन्द्रिय ( कर्णेन्द्रिय ) का विषय होनेसे, वायुके अनुकूल होनेपर दूर देशमें „खड़े हुए श्रोताके
पास तक पहुँचते हैं, और वायुके प्रतिकूल होनेसे समीपमें बैठे हुए श्रोताके पास तक भी नहीं पहुँचते । अतएव
जैसे गन्ध इन्द्रियका विषय होनेसे पौद्गलिक है, वैसे ही शब्द भी इन्द्रियका विषय होनेसे पौद्गलिक है । इसलिए
वैशेषिकोंका प्रथम हेतु असिद्ध है । ( २ ) दूसरे हेतुमें गन्ध द्रव्यरूप विपक्षमें रहनेके कारण गन्ध द्रव्यसे व्यभि-
चार आता है, इसलिए यह हेतु अनैकान्तिक है । वर्तनशील उत्कृष्ट कस्तूरिका आदि गन्ध द्रव्य बन्द द्वारवाले
मकानमें प्रवेश करते और निकलते हुए नहीं रुकते फिर भी पौद्गलिक हैं । शंका—बन्द द्वारवाले मकानमें सूक्ष्म
रन्ध्रोंका सद्भाव होनेसे उसमें अत्यन्त सघनता नहीं होती, अतः उस मकानमें गन्ध द्रव्यका प्रवेश होता है और
उसमेंसे वह बाहर निकलता है। अन्यथा जिसका द्वार खुला हुआ है ऐसे मकानमें, जिस प्रकार गन्ध द्रव्य अखण्ड
प्रवाह रूपमें प्रवेश करता है और उसमेंसे बाहर निकलता है, उसी प्रकार उस मकानमें सूक्ष्म रन्ध्रोंका अभाव
होनेपर, गन्ध द्रव्य अखण्ड प्रवाहके रूपसे क्यों नहीं प्रवेश करता और बाहर निकल जाता ? सर्वथा रन्ध्र रहित
प्रदेशमें गन्ध द्रव्यका निर्गम और प्रवेश संभव नहीं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि शब्दके
भी विषयमें भी यही सम्भव है, अतएव दूसरा हेतु भी असिद्ध है । ( ३ ) तीसरा हेतु विद्युत् और उल्कापात
आदिसे व्यभिचारी है । क्योंकि विद्युत् आदिके अवयव विद्युत्के पहले और पीछे नहीं पाये जाते, फिर भी
विद्युत् आदि पौद्गलिक माने जाते हैं । ( ४ ) इसी तरह चौथा हेतु भी व्यभिचारी है, क्योंकि विशिष्ट गन्ध
द्रव्य, सूक्ष्म रज व धूम आदिके साथ उसका व्यभिचार है—विपक्षभूत गन्धद्रव्य, रज और धूल आदिमें वह
रहता है । नासिकामें प्रवेश करनेवाला गन्ध द्रव्य आदि भी नासिकाके विवरद्वारमें फूटी हुई श्मश्रुका प्रेरक
वह नहीं देखा जाता । तथा ( ५ ) पाँचवाँ हेतु असिद्ध है । शब्द आकाशका गुण नहीं है, क्योंकि वह रूपादिकी
तरह हमारी इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष है । इसलिए पौद्गलिक होनेसे शब्दको सामान्य और विशेष रूप ही
मानना चाहिए ।

१२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
न च वाच्यम् आत्मन्यपौद्गलिकेऽपि कथं सामान्यविशेषात्मकत्वं निर्विवादमनुभूयत
इति । यतः संसार्यात्मनः प्रतिप्रदेशमनन्तानन्ताकर्मपरमाणुभिः सह वह्नितापितघनकुट्टि-
तनिर्विभागपिण्डीभूतसूचीकलापवल्लोलीभावमापन्नस्य कथञ्चित् पौद्गलिकत्वा१भ्यनुज्ञाना-
दिति । यद्यपि स्याद्वादिनां पौद्गलिकमपौद्गलिकं च सर्वं वस्तु सामान्यविशेषात्मकं, तथा-
प्यपौद्गलिकेषु धर्माधर्माकाशाकालेषु तदात्मत्वमर्वाग्दृशां न तथाप्रतीतिविषयमायाति ।
पौद्गलिकेषु पुनस्तत् साध्यमानं तेषां सुश्रद्धानम् । इत्यप्रस्तुतमपि शब्दस्य पौद्गलिकत्वमत्र
सामान्यविशेषात्मकत्वसाधनायोपन्यस्तमिति ॥
अत्रापि नित्यशब्दवादिसंमतः शब्दैकत्वैकान्तः, अनित्यशब्दवाद्यभिमतः शब्दानेकत्वै-
कान्तश्च प्राग्दर्शितदिशा प्रतिक्षेप्यः । अथवा वाच्यस्य घटादेरर्थस्य सामान्यविशेषात्मकत्वे
तद्वाचकस्य ध्वनेरपि तत्त्वम् । शब्दार्थयोः कथञ्चित् तादात्म्याभ्युपगमात् । यदाहुर्भद्रबाहु-
स्वामिपादाः—
“अभिहाणं अभिहेयाउ होइ भिण्णं अभिण्णं च ।
खुरअग्गिमोयगुच्चारणम्मि जम्हा उ वयणसवणाणं ॥ १ ॥
तथा, आत्माके अपौद्गलिक न होनेपर भी उसका सामान्य-विशेष रूपत्व निर्विवाद रूपसे अनुभवमें
नहीं आता—ऐसा नहीं कहना चाहिए । क्योंकि जिस प्रकार अग्निमें तपाया हुआ सुइयोंका समूह घनसे कूटा
जानेपर अविभागी एक पिण्डरूप बन जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रदेशकी अपेक्षा, अनन्तानन्त कर्म पर-
माणुओंके साथ संश्लिष्ट एकीभावको प्राप्त संसारी आत्माको कथंचित् पौद्गलिक स्वीकार किया गया है ।
यद्यपि स्याद्वादको माननेवालोंके मतमें पौद्गलिक और अपौद्गलिक सभी वस्तु सामान्य-विशेष रूप हैं, फिर
भी अल्पज्ञानी धर्म, अधर्म, आकाश, काल इन अपौद्गलिक पदार्थोंके सामान्य-विशेषत्वको नहीं समझ
सकते; शब्द आदि पौद्गलिक पदार्थोंमें सामान्य-विशेषत्वको अच्छी तरह समझ सकते हैं । अतएव
यहाँ शब्दका पौद्गलिक प्रस्तुत न होनेपर भी उसके सामान्य-विशेष रूप सिद्ध करनेके लिये पुद्गलकी पर्याय
बताया गया है ।
नित्य शब्दवादी मीमांसकोंके मतके अनुसार शब्द सर्वथा एक है, और अनित्य शब्दवादी बौद्धोंके
अनुसार शब्द सर्वथा अनेक है—इन दोनों मतोंका उक्त पद्धतिसे खण्डन करना चाहिये । अथवा, वाच्य घटादि-
के सामान्य-विशेष रूप सिद्ध होनेपर, वाचक शब्दोंको भी सामान्य-विशेष मानना चाहिये । क्योंकि शब्द
( वाचक ) और अर्थ ( वाच्य ) का कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध माना गया है । भद्रबाहु स्वामीने भी
कहा है—
“वाचक वाच्यसे भिन्न भी है, और अभिन्न भी है । खुर ( छुरा ), अग्नि और मोदक शब्दोंका
उच्चारण करते समय बोलनेवालोंके मुख और सुननेवालोंके कान ‘खुर’ से नहीं छिदते, ‘अग्नि’ से नहीं
१—नायमेकान्तः अमूर्तिरेवात्मेति । कर्मबन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्तः । यद्येवं कर्मबन्धावेशा-
दस्यैकत्वे सत्यविवेकः प्राप्नोति । नैष दोषः । बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते ।
उक्तं च—
बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं । तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो होइ जीवस्स ॥
छाया—बन्धं प्रत्येकत्वे लक्षणतः भवति तस्य नानात्वं । तस्मात् अमूर्तभावः अनेकान्तं भवति जीवस्य ॥
सर्वार्थसिद्धौ पृ. ८८

द्वितीय भाग: बौद्ध शून्यवाद व क्षणिकवाद समीक्षा एवं स्याद्वाद सिद्धि

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२९
नवि छेओ नवि दाहो ण पूरणं तेण भिन्नं तु ।
जम्हा य मोयगुच्चारणम्मि तत्थेव पच्चओ होइ ॥ २ ॥
न य होइ स अन्नत्थे तेण अभिन्नं तदत्थाओ ।"¹
एतेन—"विकल्पयोनयः शब्दा विकल्पाः शब्दयोनयः
कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपि ॥"
इति प्रत्युक्तम् । "अर्थाभिधानप्रत्ययास्तुल्यनामधेया"² इति वचनात् । शब्दस्य ह्येतदेव
तत्त्वं यदभिधेयं याथात्म्येनासौ प्रतिपादयति । स च तत् तथाप्रतिपादयन् वाच्यस्वरूपपरि-
णामपरिणत एव वक्तुं शक्यः, नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । घटाभिधानकाले पटाद्यभिधानस्यापि
प्राप्तेरिति ।
अथवा भङ्ग्यन्तरेण सकलं काव्यमिदं व्याख्यायते । वाच्यं वस्तु घटादिकम् । एका-
त्मकमेव एकस्वरूपमपि सत्, अनेकम् अनेकस्वरूपम् । अयमर्थः । प्रमाता तावत् प्रमेयस्वरूपं
लक्षणेन निश्चिनोति । तच्च सजातीयविजातीयव्यवच्छेदादात्मलाभं लभते । यथा घटस्य सजा-
तीया मृन्मयपदार्थाः, विजातीयाश्च पटादयः । तेषां व्यवच्छेदस्तल्लक्षणम् । पृथुबुध्नोदराद्या-
जलते, और 'मोदक' से नहीं भर आते, अतएव वाचकसे वाच्य भिन्न है। तथा 'मोदक' शब्दसे मोदकका ही
ज्ञान होता है, अग्निका नहीं, इसलिये वाचक ( शब्द ) और वाच्य ( अर्थ ) अभिन्न हैं ।"
इस कथनसे—
"विकल्पसे शब्द उत्पन्न होते हैं, और शब्दसे विकल्प उत्पन्न होते हैं, अतएव शब्द और विकल्प दोनों-
में कार्य-कारण संबंध हैं, परन्तु शब्द अपने अर्थसे भिन्न हैं ( अतएव दोनों एक दूसरेसे भिन्न हैं ) ।"—
यह कथन भी खंडित हो जाता है। क्योंकि "अर्थ, अभिधान और प्रत्यय ये पर्यायवाची शब्द हैं", ऐसा
कहा गया है। जब शब्द वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करता है, तब वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन
करना ही शब्दका स्वरूप है। वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करनेवाले शब्दका, वाच्यका स्वरूप जिसमें
अन्तर्निहित है ऐसे अपने परिणामके स्वरूपसे परिणत होनेपर ही उच्चारण करना शक्य है ( जैसे घटके यथार्थ
स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाला शब्द वाच्यभूत घटके स्वरूपका ज्ञान होनेके अनन्तर वाच्यके स्वरूपसे युक्त
अपने घट स्वरूप शब्दके परिणामस्वरूपसे परिणत होनेपर ही घट शब्दका उच्चारण शक्य है ), अन्यथा नहीं।
क्योंकि घट शब्दके उच्चारण कालमें पट आदि शब्दोंका उच्चारण होनेसे अतिप्रसंग उपस्थित होता है।
अथवा, दूसरी तरहसे श्लोकका अर्थ किया जा सकता है। वाच्य घट आदि एक रूप होकर भी
अनेक रूप हैं। भाव यह है कि प्रमाता प्रमेयभूत पदार्थके स्वरूपका उसके लक्षण द्वारा उसका निश्चय करता
है। सजातीय और विजातीय पदार्थोंका व्यवच्छेद करनेसे लक्षण अस्तिरूपको प्राप्त करता है। उदाहरणके
लिए, मिट्टीसे बने पदार्थ घटके सजातीय और पट आदि पदार्थ विजातीय होते हैं। इन सजातीय और विजा-
१. छाया—अभिधानमभिधेयाद् भवति भिन्नमभिन्नं च ।
क्षुराग्निमोदकोच्चारणे यस्मात् तु वदनश्रवणयोः ॥
नाऽपि च्छेदो नापि दाहो न पूरणं तेन भिन्नं तु ।
यस्माच्च मोदकोच्चारणे तत्रैव प्रत्ययो भवति ॥
न च भवति अन्यार्थे तेनाऽभिन्नं तदर्थात् ।
२. बाह्यः पृथुबुध्नोदराकारोऽर्थोऽपि घट इति व्यपदिश्यते । तद्वाचकमभिधानं घट इति । तद्ज्ञानरूपः
प्रत्ययोऽपि घट इति । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति । किमिदं पुरो दृश्यते घटः । किमसौ वक्ति घटं । किमस्य
चेतसि स्फुरति घटः ।
१७

१३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
कारः कम्बुग्रीवो जलधारणाहरणादिक्रियासमर्थः पदार्थविशेषो घट इत्युच्यते । तेषां च सजा-
तीयविजातीयानां स्वरूपं तत्र बुद्ध्या आरोप्य व्यवच्छिद्यते । अन्यथा प्रतिनियततत्स्वरूपपरि-
च्छेदानुपपत्तेः । सर्वभावानां हि भावाभावात्मकं स्वरूपम् । एकान्तभावात्मकत्वे वस्तुनो
वैश्वरूप्यं स्यात् । एकान्ताभावात्मकत्वे च निःस्वभावता स्यात् । तस्मात् स्वरूपेण सत्त्वात्
पररूपेण चासत्त्वाद् भावाभावात्मकं वस्तु । यदाह—
“सर्वमस्ति स्वरूपेण पररूपेण नास्ति च ।
अन्यथा सर्वसत्त्वं स्यात् स्वरूपस्याप्यसंभवः ॥”
ततश्चैकस्मिन् घटे सर्वेषां घटव्यतिरिक्तपदार्थानामभावरूपेण वृत्तेरनेकात्मकत्वं घटस्य सूप-
पादम् । एवं चैकस्मिन्नर्थे ज्ञाते सर्वेषामर्थानां ज्ञानम् । सर्वपदार्थपरिच्छेदमन्तरेण तन्निषेधा-
त्मन एकस्य वस्तुनो विविक्ततया परिच्छेदासंभवात् । आगमोऽप्येवमेव व्यवस्थितः—
“जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ॥”
तथा—“एको भावः सर्वथा येन दृष्टः
सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टाः
एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥”
तीय पदार्थोंका व्यवच्छेद ही घटका लक्षण है। सजातीय और विजातीय पदार्थोंकी व्यावृत्ति हो जानेपर ही
बड़े, मोटे उदरवाले, शंखकी ग्रीवाके सदृश ग्रीवावाले और जलके रखने और लाने आदि क्रियामें समर्थ
विशिष्ट पदार्थ घट कहा जाता है। इन मृत्तिकोपादानक परिणाम होनेसे सजातीय और पटादिरूप विजातीय
पदार्थोंके स्वरूपको बुद्धि द्वारा घटमें आरोपित कर उसका व्यवच्छेद किया जाता है; क्योंकि यदि घटका ज्ञान
करते समय सजातीय और विजातीय पदार्थोंकी व्यावृत्ति न की जाय, तो घटके निश्चित रूपका ज्ञान नहीं
हो सकता । समस्त पदार्थ भाव और अभाव रूप होते हैं । पदार्थको यदि एकान्तरूपसे, स्वचतुष्टयकी अपेक्षा,
अस्तिरूप ही माना जाये—परचतुष्टयकी अपेक्षा नास्तिरूप न माना जाये—तो पदार्थ परचतुष्टयकी अपेक्षासे
भी अस्तिरूप हो जानेसे अनेक रूप हो जायेगा । यदि उसे एकान्तरूपसे अभावात्मक माना जाय—स्वरूप
चतुष्टय और पररूप चतुष्टयकी अपेक्षासे भी नास्तिरूप माना जाये—तो वह स्वभावशून्य हो जायेगा । अत-
एव प्रत्येक पदार्थ स्वरूपकी अपेक्षा सत्, और पररूपकी अपेक्षा असत् होनेके कारण भाव-अभाव रूप है ।
कहा भी है—
“सभी पदार्थ स्वरूपकी दृष्टिसे विद्यमान हैं, पररूपकी दृष्टिसे विद्यमान नहीं है। यदि पदार्थ स्वरूपसे
अस्तिरूप और पररूपसे नास्तिरूप न हो—प्रत्येक पदार्थमें स्वरूपका अभाव और पररूपका सद्भाव माना
जाये—तो सभी पदार्थ सत् मात्र रूपसे एक हो जायँगे और पदार्थोंके स्वरूपका अस्तित्व नहीं रह जायेगा ।”
इससे एक घटमें घटभिन्न सभी पदार्थोंकी अभावरूपसे विद्यमानता होनेसे घटका अनेकात्मकत्व
( अस्तिनास्तिरूपत्वादि ) सुसिद्ध किया जा सकता है । इस प्रकार एक पदार्थके जाननेसे सब पदार्थोंका ज्ञान
होता है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंके बिना जाने, सर्व पदार्थ निषेधयुक्त एक पदार्थको अन्य सभी पदार्थोंसे
भिन्न रूपसे जानना असंभव हो जाता है । आगममें भी कहा है—
“जो एकको जानता है, वह सबको जानता है, जो सबको जानता है, वह एकको जानता है ।”
तथा—
“जिसने एक पदार्थको सम्पूर्ण रीतिसे जान लिया है, उसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया
है । जिसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया है, उसने एक पदार्थको सब प्रकारसे जान लिया है ।”

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३१
ये तु सौगताः परासत्त्वं नाङ्गीकुर्वते, तेषां घटादेः सर्वात्मकत्वप्रसङ्गः । तथाहि । यथा
घटस्य स्वरूपादिना सत्त्वं, तथा यदि पररूपादिनापि स्यात्, तथा च सति स्वरूपादिसत्त्ववत्
पररूपादिसत्त्वप्रसक्तेः कथं न सर्वात्मकत्वं भवेत् । परासत्त्वेन तु प्रतिनियतोऽसौ सिद्ध्यति ।
अथ न नाम नास्ति परासत्त्वं, किन्तु स्वसत्त्वमेव तदिति चेद्, अहो वैदग्धी । न खलु यदेव
सत्त्वं तदेवासत्त्वं भवितुमर्हति । विधिप्रतिषेधरूपतया विरुद्धधर्माध्यासेनानयोरैक्यायोगात् ।
अथ युष्मत्पक्षेऽप्येवं विरोधस्तदवस्थ एवेति चेद्, अहो वाचालता देवानांप्रियस्य । न हि वयं
येनैव प्रकारेण सत्त्वं, तेनैवासत्त्वं, येनैव चासत्त्वं, तेनैव सत्त्वमभ्युपेमः । किन्तु स्वरूपद्रव्य-
क्षेत्रकालभावैः सत्त्वं, पररूपद्रव्यक्षेत्रकालभावैस्त्वसत्त्वम् । तदा क्व विरोधावकाशः ॥
यौगास्तु प्रगल्भन्ते सर्वथा पृथग्भूतपरस्पराभावाभ्युपगममात्रेणैव पदार्थप्रतिनियम-
सिद्धेः, किं तेषामसत्त्वात्मकत्वकल्पनया इति । तदसत् । यदा हि पटाद्यभावरूपो घटो न
भवति, तदा घटः पटादिरेव स्यात् । यथा च घटाभावाद् भिन्नत्वाद् घटस्य घटरूपता, तथा
पटादेरपि स्यात्, घटाभावाद् भिन्नत्वादेव । इत्यलं विस्तरेण ।
जो बौद्ध पररूप चतुष्टयकी अपेक्षासे नास्तित्वको स्वीकार नहीं करते, उनके मतमें घटादिको ( घटादि-
भिन्न ) सर्वपदार्थात्मक माननेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्व-
चतुष्टयकी अपेक्षासे घटका अस्तित्व होता है, उसी प्रकार परचतुष्टयकी अपेक्षासे भी यदि घटका अस्तित्व
स्वीकार किया जाये, तो ऐसी स्थितिमें जिस प्रकार स्वरूप चतुष्टयकी अपेक्षासे ( घटादिका ) अस्तित्व होता
है, उसी प्रकार परचतुष्टयकी अपेक्षा भी ( घटादिका ) अस्तित्व स्वीकार करनेका प्रसंग उपस्थित हो जानेसे
घटका सर्वपदार्थरूपत्व कैसे सिद्ध न होगा ? अतएव परचतुष्टयकी अपेक्षासे घटके नास्तित्वरूप माननेसे ही
निश्चितरूपसे उसकी सिद्धि होती है । यदि कहो कि 'परचतुष्टयकी अपेक्षासे घटका नास्तित्व सिद्ध नहीं होता,
ऐसी बात नहीं है; किन्तु स्वचतुष्टयकी अपेक्षासे घटका अस्तित्व ही परचतुष्टयकी अपेक्षासे नास्तित्व है'—तो
यह महान् पांडित्य है । वस्तुतः जो अस्तित्व है, वही नास्तित्वरूप नहीं हो सकता । क्योंकि विधि-प्रतिषेध-
रूप विरुद्धधर्माध्यासित होनेके कारण सत्त्व और असत्त्वकी एकरूपता घटित नहीं होती । यदि कहो कि जैन
लोग भी एक ही जगह विधि और प्रतिषेध मानते हैं, तो यह कथन मूर्खजनोंकी वाचालता ही है । क्योंकि
हम लोग ( जैन ) जिस प्रकारसे अस्तित्व मानते हैं, उसी प्रकारसे नास्तित्व नहीं मानते, तथा जिस प्रकारसे
नास्तित्व मानते हैं, उसी प्रकारसे अस्तित्व नहीं मानते। हमारी मान्यता है कि प्रत्येक वस्तु अपने रूप, द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा सत् है, और पर रूप, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा असत् है,
अतएव हमारे मतमें विरोधके लिए कोई स्थान नहीं है ।
वैशेषिक—पदार्थका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए पदार्थसे भिन्न अन्योन्याभाव माननेसे काम चल जाता
है, इसलिये पदार्थोंको अभावात्मक माननेकी आवश्यकता नहीं है । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि यदि पदार्थों-
को पररूपसे अभावात्मक नहीं मानें, तो पट आदिके अभावको घट नहीं कह सकते, अतएव घटको पट रूप
मानना चाहिये । क्योंकि जैसे घटाभावसे भिन्न होनेके कारण घटको घट कहते हैं, वैसे ही पटके घटाभावसे
भिन्न होनेके कारण पटको भी घट मानना चाहिये । भाव यह है कि वैशेषिक लोग अन्योन्याभावको पदार्थकी
स्थितिमें कारण मानते हैं। यह अन्योन्याभाव स्वयं पदार्थसे जुदा होता है । वैशेषिकोंके अनुसार जहाँ घटका
अभाव नहीं होता, वहीं घटका निश्चय होता है । परन्तु यह मान्यता ठीक नहीं, क्योंकि वस्त्र आदि भी घटके
अभाव रूप नहीं हैं, इसलिये वस्त्र आदिके घटके अभावसे भिन्न होनेपर वस्त्र आदिमें भी घटका ज्ञान होना
चाहिये । जैनसिद्धांतके अनुसार घटको घटके अतिरिक्त सभी पदार्थोंके अभाव रूप स्वीकार किया है, इसलिये
घटके वस्त्र आदिके भी अभाव स्वरूप होनेसे घटमें वस्त्रका ज्ञान नहीं हो सकता ।

एवं वाचकमपि शब्दरूपं द्वयात्मकम् । एकात्मकमपि सदनेकमित्यर्थः । अर्थोक्तन्यायेन
शब्दस्यापि भावाभावात्मकत्वात् । अथवा एकविषयस्यापि वाचकस्यानेकविषयत्वोपपत्तेः । यथा
किल घटशब्दः संकेतवशात् पृथुबुध्नोदराद्याकारवति पदार्थे प्रवर्तते वाचकत्या, तथा देश-
कालाद्यपेक्षया तद्वशादेव पदार्थान्तरेष्वपि तथा वर्तमानः केन वार्यते । भवन्ति हि वक्तारो
योगिनः शरीरं प्रति घट इति । संकेतानां पुरुषेच्छाधीनतयाऽनियतत्वात् । यथा चौरशब्दोऽ-
न्यत्र तस्करे रूढोऽपि दाक्षिणात्यानामोदने प्रसिद्धः । यथा च कुमारशब्दः पूर्वदेशे आश्विनमासे
रूढः । एवं कर्कटीशब्दादयोऽपि तत्तद्देशापेक्षया योन्यादिवाचका ज्ञेयाः । कालापेक्षया पुनर्यथा
जैनानां प्रायश्चित्तविधौ धृतिश्रद्धासंहनना१दिमति प्राचीनकाले षड्गुरुशब्देन शतमशीत्यधिक-
मुपवासानामुच्यते स्म, सांप्रतकाले तु तद्विपरीते तेनैव षड्गुरुशब्देन उपवासत्रयमेव सङ्केत्यते,
जीतकल्प२व्यवहारानुसारात् । शास्त्रापेक्षया तु यथा पुराणेषु द्वादशीशब्देनैकादशी । त्रिपुरार्णवे३
च अलिशब्देन मदिराभिषक्तम् च मैथुनशब्देन मधुसर्पिषोर्ग्रहणम् इत्यादि ।
न चैवं सङ्केतस्यैवार्थप्रत्यायने प्राधान्यम् । स्वाभाविकसामर्थ्यसाचिव्यादेव तत्र तस्य
प्रवृत्तेः । सर्वशब्दानां सर्वार्थप्रत्यायनशक्तियुक्तत्वात् । यत्र च देशकालादौ यदर्थप्रतिपादनशक्ति-
सहकारी संकेतस्तत्र तमर्थं प्रतिपादयति । तथा च निर्जितदुर्जयपरप्रवादाः श्रीदेवसूरिपादाः—
“स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोधनिबन्धनं शब्दः ।”४ अत्र शक्तिपदार्थसमर्थनं ग्रन्थान्त-
रा५दवसेयम् । अतोऽन्यथेत्यादि उत्तरार्द्धं पूर्ववत् । प्रतिभाप्रमादस्तु तेषां सदसदेकान्ते वाच्य-
स्य प्रतिनियतार्थविषयत्वे च वाचकस्य उक्तयुक्त्या दोषसद्भावाद् व्यवहारानुपपत्तेः । तदयं
समुदायार्थः । सामान्यविशेषात्मकस्य, भावाभावात्मकस्य च वस्तुनः सामान्यविशेषात्मको,
वाच्यकी तरह वाचक भी एक होकर भी अनेक है । जैसे अर्थ भाव और अभाव रूप है, वैसे ही शब्द
भी भाव और अभाव दोनों रूप है । अथवा, एक विषयका वाचक शब्द अनेक विषयोंका वाचक हो सकता है,
इसलिये भी शब्द भाव और अभाव रूप है । जैसे बड़े और मोटे उदरवाले पदार्थमें घट शब्दका व्यवहार होता
है, उसी प्रकार देश, काल आदिकी अपेक्षा उसी कारण अन्य पदार्थोंमें भी उसकी विद्यमानता कौन रोक सकता
है ! योगी लोग शरीरको ही घट कहते हैं । चौर शब्दका साधारण अर्थ चोर होता है, परन्तु दक्षिण जैसे
देशमें चौर शब्दका अर्थ चावल होता है; कुमार शब्दका सामान्यसे युवराज अर्थ होनेपर भी पूर्व देशमें इसका
अर्थ आश्विन मास किया जाता है; कर्कटी शब्दका प्रसिद्ध अर्थ ककड़ी होनेपर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ
योनि किया जाता है । तथा, जीतकल्पव्यवहार अनुसार प्रायश्चित्त विधिमें धृति, श्रद्धा और संहननवाले
प्राचीन समयमें षड्गुरु शब्दका अर्थ एकसौ अस्सी उपवास किया जाता था, परन्तु आजकल षड्गुरुका अर्थ
केवल तीन उपवास किया जाता है । पुराणोंमें उपवासके नियमोंका वर्णन करते समय द्वादशीका अर्थ एकादशी
किया जाता है । त्रिपुरार्णवमें अलि शब्द मदिरा, और मधु शब्द शहद और घीके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं ।
केवल संकेत मात्रसे अर्थका ज्ञान नहीं होता । स्वाभाविक शक्तिकी मुख्यतासे उनकी प्रवृत्ति होती है ।
क्योंकि शब्दोंमें ही सब अर्थोंको जनानेकी शक्ति होती है । संकेत केवल देश और काल आदिकी अपेक्षासे
शब्दके ही अर्थको जाननेमें सहकारी होता है । परवादियोंको जीतनेवाले श्रीदेवसूरि आचार्यने कहा भी

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३३
भावाभावात्मकश्च ध्वनिर्वाचक इति । अन्यथा प्रकारान्तरैः पुनर्वाच्यवाचकभावव्यवस्थामा-
तिष्ठमानानां वादिनां प्रतिभैव प्रमाद्यति, न तु तद्भणितयो युक्तिस्पर्शमात्रमपि सहन्ते ।
कानि तानि वाच्यवाचकभावप्रकारान्तराणि परवादिनामिति चेत्, एते ब्रूमः । अपोहं१
एव शब्दार्थ इत्येके । “अपोहः शब्दलिङ्गाभ्यां न वस्तुविधिनाेच्यते”२ इति वचनात् । अपरे
सामान्यमात्रमेव शब्दानां गोचरः । तस्य क्वचित् प्रतिपन्नस्य, एकरूपतया सर्वत्र संकेतविषय-
तोपपत्तेः । न पुनर्विशेषाः । तेषामानन्त्यतः कार्त्स्न्येनोपलब्धुमशक्यतया तद्विषयतानुपपत्तेः ।
विधिवादिनस्तु विधिरेव वाक्यार्थः, अप्रवृत्तप्रवर्तनस्वभावत्वात् तस्येत्याचक्षते । विधिरपि३
तत्तद्वादिविप्रतिपत्त्यानेकप्रकारः ।४ तथाहि । वाक्यरूपः५ शब्द एव प्रवर्तकत्वाद् विधिरित्येके।
तद्व्यापारो भावनापरपर्यायो६ विधिरित्यन्ये । नियोगं७ इत्यपरे । प्रैषाद्यर्थ८ इत्येके । तिरस्कृत-
जाननेके लिये स्याद्वादरत्नाकर ( २-२ ) आदि ग्रन्थ देखने चाहिए। अतएव सामान्य-विशेष रूप और भावाभाव
रूप वाचक ( शब्द ) से ही सामान्य-विशेष और भावाभाव रूप वाच्य ( अर्थ ) का ज्ञान हो सकता है ।
( १ ) बौद्ध लोग अपोह ( इतरव्यावृत्ति—परस्परपरिहार ) को ही शब्दार्थ मानते हैं । कहा भी है ।
“शब्द और लिंगसे अपोह कहा जाता है, वस्तुकी प्रेरणासे नहीं ।” ( २ ) कुछ लोग सामान्य ( जाति ) को
ही शब्दका अर्थ मानते हैं । क्योंकि सामान्यके किसी भी स्थानमें रहनेपर वह सब जगह संकेतसे जाना जा
सकता है । विशेष अनंत हैं, इसलिए उनकी एक साथ शब्दसे प्रतीति नहीं हो सकती; अतएव सामान्य ही
शब्दका विषय है । ( ३ ) विधिवादियोंके अनुसार विधि ही शब्दका अर्थ है, क्योंकि उससे प्रवृत्ति न करने-
वाले मनुष्योंकी प्रवृत्ति होती है । (प्रवृत्तिके अनुकूल व्यापारको विधि कहते हैं; विधि, प्रेरणा, प्रवर्तना आदि
शब्द एक ही अर्थके द्योतक हैं ) । विधि अनेक प्रकारकी है । ( सामान्यसे लौकिक और वैदिक विधिके दो भेद
हैं । अपूर्व, नियम और परिसंख्याके भेदसे विधि तीन प्रकारकी बतायी गई है । उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग
और अधिकार ये अपूर्व विधिके चार भेद हैं) । कोई विधिवादी वाक्यरूप शब्दको विधि कहते हैं। (जैसे 'स्वर्गकी
इच्छा रखनेवालेको अग्निहोत्र करना चाहिये') । कोई वाक्यसे उत्पन्न व्यापार ( भावना ) को विधि कहते हैं ।
पुरुषकी प्रवृत्तिके अनुकूल प्रवर्तन करनेको व्यापार अथवा भावना कहते हैं। ( यह भावना शब्दभावना और अर्थ-
भावनाके भेदसे दो प्रकारकी है । 'स्वर्गकी इच्छा रखनेवालेको यज्ञ करना चाहिये' ( यजेत स्वर्गकामः ) आदि
वाक्योंमें, ईश्वरके स्वीकार न करनेसे लिङ् ( विधिरूप ) शब्दके व्यापारको शब्दभावना कहते हैं । शब्दके व्या-
पारसे यज्ञ करनेवाले पुरुषकी प्रवृत्तिको अर्थभावना कहते हैं। भट्टमीमांसक भावनाको मानते हैं ) । कोई
नियोगको ही विधि मानते हैं । ( जिसके द्वारा यज्ञमें नियुक्त हो, उसे नियोग कहते हैं। यह नियोग ग्यारह
१. अतद्व्यावृत्तिः । यथा विज्ञानवादिबौद्धमते नीलत्वादिवर्मोऽनीलव्यावृत्तिरूपः ।
२. दिङ्नागः ।
३. विधिप्रेरणाप्रवर्तनादिशब्दाभिधेयः प्रवृत्त्यनुकूलव्यापारः ।
४. सामान्यतोऽयं विधिर्द्विविधः लौकिकः वैदिकश्च । प्रकारान्तरेण विधिः त्रिविधः अपूर्वविधिः नियम-
विधिः संख्याविधिश्च ।
५. यद्वाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः यथा 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' ।
६. भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः । यथा यजेतेत्यादौ लिङाद्याख्यातार्थो भावना । भाट्टमते
शाब्दीभावना आर्थीभावना चेति द्विविधा भावना । 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि वैदिकवाक्ये पुरुषाभावात् शब्द-
निष्ठत्वादेव शब्दभावना इत्युच्यते । अर्थभावना तु प्रवृत्त्यादिव्यापाररूपा ।
७. नियुक्तोऽहमनेनाग्निष्टोमादिवाक्येनेति निरवशेषो योगः । एकादशधा नियोगः विद्यानन्दिकृतअष्ट-
सहस्र्यां व्याख्यातः पृ. ६ ।
८. न्यक्कारपूर्विका प्रेरणा प्रैषः ।

१३४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
तदुपाधिप्रवर्त्तनामात्रमित्यन्ये । एवं फलतदभिलाषकर्म्यादयोऽपि वाच्याः । एतेषां निराकरणं
सपूर्वोत्तरपक्षं न्यायकुमुदचन्द्रादेवावसेयम् ॥ इति काव्यार्थः ॥१४॥
इदानीं सांख्याभिमतप्रकृतिपुरुषादितत्त्वानां विरोधावरुद्धत्वं ख्यापयन्, तद्बालिशता-
विलसितानामपरिमितत्वं दर्शयति—
चिदर्थशून्या च जडा च बुद्धिः शब्दादितन्मात्रजमम्बरादि ।
न बन्धमोक्षौ पुरुषस्य चेति कियज्जडैर्न ग्रथितं विरोधि ॥१५॥
प्रकारका बताया गया है । प्रभाकर लोग नियोगवादी हैं । भट्टमीमांसक नियोगवादका खंडन करते हैं ।) कोई
प्रेरणा आदिको, और कोई तिरस्कार पूर्वक प्रेरणा करनेको ही विधि मानते हैं । इसी तरह विधिके फल, अभि-
लाषा और कर्म आदि भी विधिवादियोंने भिन्न भिन्न स्वीकार किये हैं। इन सब मतोंका निरूपण और उनका
खंडन प्रभाचन्द्रकृत न्यायकुमुदचन्द्रोदय नामक ग्रन्थमें देखना चाहिये ।। यह श्लोकका अर्थ है ॥१४॥
भावार्थ—इस श्लोकमें प्रत्येक वस्तुको सामान्य-विशेष और एक-अनेक प्रतिपादन करते हुए सामान्य
एकान्तवादी, विशेष एकान्तवादी, तथा परस्पर भिन्न निरपेक्ष सामान्य-विशेष वादियोंकी समीक्षा की गई है ।
( १ ) अद्वैतवेदांती, मीमांसक और सांख्योंका मत है कि वस्तु सर्वथा सामान्य है, क्योंकि विशेष सामान्यसे
भिन्न प्रतिभासित नहीं होते । ( २ ) क्षणिकवादी बौद्धोंकी मान्यता है कि प्रत्येक वस्तु सर्वथा विशेषरूप है,
क्योंकि विशेषको छोड़कर सामान्य कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता, और वस्तुका अर्थक्रियाकारित्व लक्षण भी
विशेषमें ही घटित होता है । ( ३ ) न्यायवैशेषिकोंका कथन है कि सामान्य-विशेष परस्पर भिन्न और निरपेक्ष
हैं, अतएव सामान्य और विशेषको एक न मानकर परस्पर भिन्न स्वीकार करना चाहिये ।
जैनसिद्धांतके अनुसार उक्त तीनों सिद्धांत कथंचित् सत्य हैं। वस्तुको सर्वथा-सामान्य माननेवाले वादी
द्रव्यास्तिकनयकी अपेक्षासे, सर्वथा-विशेष माननेवाले वादी पर्यायास्तिकननयकी अपेक्षासे, तथा सामान्य-विशेषको
परस्पर भिन्न और निरपेक्ष माननेवाले वादी नैगमनयकी अपेक्षासे सच्चे हैं । इसलिए सामान्य-विशेषको कथं-
चित् भिन्न-अभिन्न ही स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि पदार्थोंका ज्ञान करते समय सामान्य और विशेष
दोनोंका ही एक साथ ज्ञान होता है, बिना सामान्यके विशेष, और विना विशेषके सामान्यका कहीं भी ज्ञान
नहीं होता । जैसे गौके देखनेपर हमें अनुवृत्तिरूप गौका ज्ञान होता है, वैसे ही भैंस आदिकी व्यावृत्तिरूप
विशेषका भी ज्ञान होता है । इसी तरह शवला गौ कहनेपर जैसे विशेषरूप शबलत्वका ज्ञान होता है, वैसे
ही गोत्वरूप सामान्यका भी ज्ञान होता है । अतएव सामान्य-विशेष कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न
होनेसे सामान्य और विशेष दोनों रूप ही हैं ।
इसी प्रकार वाच्य ( अर्थकी ) तरह वाचक ( शब्द ) भी सामान्य-विशेषरूप है । (यहाँ मल्लिषेणने
शब्द को पौद्गलिक सिद्ध करके उसे भी सामान्य-विशेषरूप सिद्ध किया है ।) तथा, प्रत्येक वस्तुको
भाव और अभावरूप मानना चाहिये, क्योंकि यदि वस्तु सर्वथा अभावरूप हो, तो उसे सर्वात्मक माननी
चाहिये, और ऐसी अवस्थामें उसका कोई भी स्वभाव नहीं मानना चाहिये । अतएव प्रत्येक वस्तुको
अपने स्वरूपसे सत्, और पररूपसे असत् मानना चाहिये । अतएव प्रत्येक वस्तु सापेक्ष है; इसलिये वाच्य
और वाचक दोनों सामान्य-विशेष और एक-अनेकरूप हैं ।
अब सांख्योंके प्रकृति, पुरुष आदि तत्त्वोंका विरोध दिखलाते हुए उन लोगोंके मतका खंडन करते हैं—
श्लोकार्थ—चैतन्यस्वरूप अर्थसे रहित बुद्धि जड़रूप है; शब्द आदि पांच तन्मात्राओंसे आकाश,
पृथिवी, जल, अग्नि और वायु उत्पन्न होते हैं; पुरुषके न बंध होता है और न मोक्ष—ये सब सांख्य लोगोंकी
विरुद्ध कल्पनायें हैं ।
१. भट्टाकलङ्कदेवकृतलघीयस्त्रयग्रन्थटीकात्मकः प्रभाचन्द्रेण प्रणीतः ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३५
चित्—चैतन्यशक्तिः, आत्मस्वरूपभूता। अर्थशून्या—विषयपरिच्छेदविरहिता। अर्था-
ध्यवसायस्य बुद्धिव्यापारत्वाद् इत्येका कल्पना। बुद्धिश्च महत्तत्त्वाख्या। जडा अनवबोध-
स्वरूपा इति द्वितीया। अम्बरादि—व्योमप्रभृतिभूतपञ्चकं शब्दादितन्मात्रजम्—शब्दादीनि यानि
पञ्चतन्मात्राणि सूक्ष्मसंज्ञानि, तेभ्यो जातमुत्पन्नं, शब्दादितन्मात्रजम् इति तृतीया। अत्र च
शब्दो गम्यः। पुरुषस्य च प्रकृतिविकृत्यनात्मकस्यात्मनो न बन्धमोक्षौ, किन्तु प्रकृतेरेव। तथा
च कापिलाः—
“तस्मान्न बध्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित्।
संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः॥१”
तत्र बन्धः—प्राकृतिकादिः। मोक्षः—पञ्चविंशतितत्त्वज्ञानपूर्वकोऽपवर्गः इति चतुर्थी।
इतिशब्दस्य प्रकारार्थत्वाद्—एवंप्रकारमन्यदपि विरोधीति विरुद्धं, पूर्वापरविरोधादिदोषाग्रा-
तम्। जडैः—मूर्खैः, तत्त्वावबोधविधुरधीभिः कापिलैः। कियन्न ग्रथितं—कियद् न स्वशास्त्रे-
षूपनिबद्धम्। कियदित्यसूयागर्भम्। तत्प्ररूपितविरुद्धार्थानामानन्त्येनेयत्तानवधारणात्। इति
संक्षेपार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। साङ्ख्यमते किल दुःखत्रयाभिहतस्य पुरुषस्य तदपघातहेतुतत्त्वजि-
ज्ञासा उत्पद्यते। आध्यात्मिकमाधिदैविकमाधिभौतिकं चेति दुःखत्रयम्। तत्राध्यात्मिकं द्वि-
विधम्—शारीरं मानसं च। शारीरं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यनिमित्तम्। मानसं कामक्रोधलोभ-
मोहेर्ष्याविषयादर्शननिबन्धनम्। सर्वं चैतदान्तरोपायसाध्यत्वादाध्यात्मिकं दुःखम्। वाह्योपाय-
साध्यं दुःखं द्वेधा आधिभौतिकमाधिदैविकं चेति। तत्राधिभौतिकं मानुषपशुपक्षिमृगसरीसृप-
स्थावरनिमित्तम्। आधिदैविकं यक्षराक्षसग्रहाद्या वेशहेतुकम्। अनेन दुःखत्रयेण रजःपरिणाम-
बुद्धिवर्तिना चेतनाशक्तेः प्रतिकूलतया अभिसम्बन्धो अभिघातः॥
तत्त्वानि पञ्चविंशतिः। तद्यथा अव्यक्तम् एकम्। महदहङ्कारपञ्चतन्मात्रैकादशेन्द्रियपञ्च-
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष (१) चेतनशक्ति पदार्थोंका ज्ञान नहीं करती, बुद्धिसे ही पदार्थोंका ज्ञान
होता है। (२) बुद्धि (महत्त्व) अज्ञान रूप है। (३) आकाश आदि शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न
होते हैं। (४) प्रकृति और विकृतिसे भिन्न पुरुषके बन्ध और मोक्ष नहीं होता, प्रकृतिके ही बन्ध और मोक्ष
होता है। कहा भी है—
“न कोई बँधता है, न मुक्त होता है, और न कोई संसारमें परिभ्रमण करता है; बन्ध, मोक्ष और
परिभ्रमण नाना आश्रयवाली प्रकृतिके ही होते हैं।”
(५) बन्ध प्रकृतिमें होता है, और पच्चीस तत्त्वोंके ज्ञानसे मोक्ष मिलता है।
आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखोंसे पीडित पुरुष दुःखोंके नष्ट करनेके कारणोंको जानना
चाहता है। आध्यात्मिक दुख शारीर और मानसके भेदसे दो प्रकारका है। वात, पित्त, और कफकी विष-
मतासे उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको शारीर, तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और विषयोंके प्राप्त न होनेसे
उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको मानस दुख कहते हैं। शारीर और मानस दुख, दुखके अन्तरंग कारण मनसे उत्पन्न
होते हैं, इसलिये इन्हें आध्यात्मिक दुख कहा है। आधिभौतिक और आधिदैविक दुख बाह्य कारणोंसे उत्पन्न
होते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प और स्थावर आदिसे उत्पन्न होनेवाले दुखको आधिभौतिक, तथा यक्ष, राक्षस,
ग्रह आदिसे पैदा होनेवाले दुखको आधिदैविक दुख कहते हैं। तीनों प्रकारके दुख रजोधर्मसे बुद्धिमें उत्पन्न
होते हैं। जब इन दुःखोंका चेतनाशक्तिके साथ विपरीत सम्बन्ध होता है, उस समय चेतनाशक्तिका अभिघात
होता है।
तत्त्व पच्चीस होते हैं—१ अव्यक्त, २ महत् (बुद्धि), ३ अहंकार, ४-८ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और
१. ईश्वरकृष्णविरचितसांख्यकारिका ६२।

१३६ श्रीमद्रामचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
महाभूतभेदात् त्रयोविंशतिविधं व्यक्तम् । पुरुषश्चिद्रूप इति । तथा च ईश्वरकृष्णः—
“मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥”१
प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकानां लाघवोष्टम्भगौरवधर्माणां परस्परोपकारिणां त्रयाणां गुणानां
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । प्रधानमव्यक्तमित्यनर्थान्तरम् । तच्च अनादिमध्यान्त-
मनवयवं साधारणमशब्दमस्पर्शमरूपमगन्धमव्ययम् । प्रधानाद् बुद्धिर्महदित्यपरपर्यायोत्पद्यते ।
योऽयमध्यवसायो गवादिषु प्रतिपत्तिः एवमेतद् नान्यथा, गौरेवायं नाश्वः, स्थाणुरेव नायं पुरुष
इत्येषा बुद्धिः । तस्यास्त्वष्टौ रूपाणि धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यरूपाणि चत्वारि सात्त्विकानि । अधर्मा-
दीनि तु तत्प्रतिपक्षभूतानि चत्वारि तामसानि ॥
बुद्धेः अहङ्कारः । स च अभिमानात्मकः । अहं शब्देऽहं स्पर्शेऽहं रूपेऽहं गन्धेऽहं रसेऽहं
स्वामी अहमीश्वरः असौ मया हतः ससत्वोऽहममुं हनिष्यामीत्यादिप्रत्ययरूपः । तस्मात्
पञ्चतन्मात्राणि शब्दतन्मात्रादीनि अविशेषरूपाणि सूक्ष्मपर्यायवाच्यानि । शब्दतन्मात्राद् हि
शब्द एवोपलभ्यते, न पुनरुदात्तानुदात्तस्वरितकम्पितषड्जादिभेदाः२ । षड्जादयः शब्दविशेषा-
दुपलभ्यन्ते । एवं स्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्रेष्वपि योजनीयमिति । तत एव चाहङ्काराद् एकादशे-
न्द्रियाणि च । तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं त्वगिति पंचबुद्धीन्द्रियाणि । वाक्पाणिपादपायूपस्थाः
पञ्चकर्मेन्द्रियाणि । एकादशं मन इति ॥
गन्ध (पांच तन्मात्रा), ९-१९ घ्राण, रसना, चक्षु, स्पर्श और श्रोत्र (पांच बुद्धीन्द्रिय), और वाक् (वचन)
पाणि (हाथ), पाद (पांव), पायु (गुदा), उपस्थ (लिंग) (पांच कर्मेन्द्रिय), तथा मन, २०-२४ आकाश,
वायु, तेज, जल और पृथिवी (पांच महाभूत), तथा २५ प्रकृति और विकृति रहित पुरुष (चित्) । ईश्वर-
कृष्णने कहा भी है—
“पच्चीस तत्त्वोंका मूल कारण प्रकृति (प्रधान-अव्यक्त) है, यह स्वयं किसीका विकार नहीं है
(अविकृति) । महत्, अहंकार और पांच तन्मात्रायें ये प्रकृति और विकृति दोनों हैं (महत्त्व अहंकारकी
प्रकृति, और मूल प्रकृतिकी विकृति है । अहंकार पांच तन्मात्रा और इन्द्रियोंकी प्रकृति, और महान्की विकृति
है । पांच तन्मात्रायें पंचभूतोंकी प्रकृति और अहंकारकी विकृति है) । तथा ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महा-
भूत ये सोलह तत्त्व विकृति रूप ही हैं । पुरुष प्रकृति और विकृति दोनोंसे रहित है ।”
एक दूसरेका उपकार करनेवाले प्रीति और लाघव रूप सत्त्व, अप्रीति और उपष्टंभ रूप रज, और
विषाद और गौरव रूप तम गुणोंकी साम्य अवस्थाको प्रकृति, प्रधान अथवा अव्यक्त कहते हैं । यह प्रधान
आदि, मध्य, अन्त और अवयव रहित है, साधारण है, शब्द, स्पर्श, रूप और गन्धसे रहित, तथा अविनाशी
है । प्रधानसे बुद्धि अथवा महान् उत्पन्न होता है । यह गो ही है, घोड़ा नहीं; पुरुष ही है, ठूंठ नहीं, इस प्रकार
किसी वस्तुके निश्चयरूप ज्ञानको बुद्धि कहते हैं । बुद्धिके धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (सात्त्विक) और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, और अनैश्वर्य (तामसिक) ये आठ गुण हैं ।
बुद्धिसे अहंकार होता है । यह अहंकार 'मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ, मैं देखता हूँ, मैं सूँघता हूँ,
मैं चखता हूँ, मैं स्वामी हूँ, मैं ईश्वर हूँ, यह मैंने मारा है, मैं बलवान हूँ, मैं इसे मारूँगा' आदि अभिमानरूप
होता है । अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ होती हैं । ये शब्द आदि पाँच तन्मात्राएँ सामान्यरूप और सूक्ष्म पर्याय
रूप हैं । शब्द तन्मात्रासे केवल शब्दका ही ज्ञान होता है, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, कंपित और षड्ज
आदि शब्दके विशेषरूपोंका नहीं, क्योंकि षड्ज आदिका ज्ञान विशेष शब्दसे ही होता है । इसी प्रकार स्पर्श,
रूप, रस, गंध आदि तन्मात्राओंसे सामान्यरूपसे स्पर्श, रूप, रस, गंध, आदिका ज्ञान होता है, विशेष स्पर्श
१. सांख्यकारिका ३ !
२. षड्जऋषभगान्धारा मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतो निषधः सप्त तन्त्रीकण्ठोद्भवाः स्वराः ॥
अभिधानचिन्तामणौ ६-३७ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३७
पञ्चतन्मात्रेभ्यश्च पञ्चमहाभूतान्युत्पद्यन्ते । तद्यथा शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दगुणम् ।
शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्राद् वायुः शब्दस्पर्शगुणः। शब्दस्पर्शतन्मात्रसहिताद् रूपतन्मात्रात्
तेजः शब्दस्पर्शरूपगुणम् । शब्दस्पर्शरूपतन्मात्रसहिताद् रसतन्मात्रादापःशब्दस्पर्शरूपरसगुणाः ।
शब्दस्पर्शरूपरसतन्मात्रसहिताद् गन्धतन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी जायत इति ॥
पुरुषस्तु—
“अमूर्तश्चेतनो भोगी नित्यः सर्वगतोऽक्रियः ।
अकर्ता निर्गुणः सूक्ष्म आत्मा कापिलदर्शने ॥”
इति । अन्धपङ्गुवत् प्रकृतिपुरुषयोः संयोगः । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या ।
यत इन्द्रियद्वारेण सुखदुःखादयो बुद्धौ प्रतिसंक्रामन्ति बुद्धिश्चोभयमुखदर्पणाकारा । ततस्तस्यां
चैतन्यशक्तिः प्रतिबिम्बते । ततः सुख्यहं दुःख्यहमित्युपचारः । आत्मा हि स्वं बुद्धेर्व्यतिरिक्त-
मभिमन्यते । आह च पतञ्जलिः— “शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन् अतदा-
त्मापि तदात्मक इव प्रतिभासते”१ इति । मुख्यतस्तु बुद्धेरेव विषयपरिच्छेदः । तथा च वाच-
स्पतिः— “सर्वो व्यवहर्ता आलोच्य नन्वहमत्राधिकृत इत्यभिमत्य कर्तव्यमेतन्मया इत्यध्यव-
स्यति । ततश्च प्रवर्तते इति लोकतः सिद्धम् । तत्र कर्तव्यमिति योऽयं निश्चयश्चितिसन्निधा-
नापन्नचैतन्याया बुद्धेः सोऽध्यवसायो बुद्धेरसाधारणो व्यापारः”२ इति । चिच्छक्तिसन्निधाना-
च्वाचेतनापि बुद्धिश्चेतनावतीवाभासते । वादमहार्णवोऽप्याह३ । “बुद्धिदर्पणसंक्रान्तमर्थप्रतिवि-
आदिका ज्ञान नहीं होता । अहंकारसे चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श (बुद्धीन्द्रिय); वाक्, पाणि, पाद,
गुदा, लिंग (कर्मेन्द्रिय) और मन ये ग्यारह इन्द्रियां उत्पन्न होती हैं ।
पाँच तन्मात्राओंसे पाँच महाभूत पैदा होते हैं । शब्द तन्मात्रासे आकाश पैदा होता है । शब्द और
स्पर्श तन्मात्राओंसे शब्द और स्पर्शके गुणसे युक्त वायु; शब्द, स्पर्श और रूप तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श और
रूप गुणोंसे युक्त अग्नि; शब्द, स्पर्श, रूप और रस तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, और रससे युक्त जल;
तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तन्मात्राओंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधसे युक्त पृथिवी उत्पन्न
होती है ।
पुरुष तो—
“सांख्य दर्शनमें अमूर्त, चेतन, भोक्ता, नित्य, सर्वव्यापी, क्रिया रहित, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म” है ।
अंधे और लंगड़े पुरुषकी तरह प्रकृति और पुरुषका संबंध होता है । चित् शक्ति (पुरुष) स्वयं पदार्थोंका
ज्ञान नहीं कर सकती, क्योंकि सुख-दुख इन्द्रियों द्वारा ही बुद्धिमें प्रतिभासित होते हैं। बुद्धि दोनों तरफसे दर्पणकी
तरह है, इसमें एक ओर चेतनाशक्ति और दूसरी ओर बाह्य जगत् झलकता है । बुद्धिमें चेतनाशक्तिके प्रति-
बिम्ब पड़नेसे आत्मा (पुरुष) अपनेको बुद्धिसे अभिन्न समझता है, और इसलिये आत्मामें 'मैं सुखी हूँ', 'मैं
दुखी हूँ', ऐसा ज्ञान होता है । पतंजलिने भी कहा है— “यद्यपि पुरुष स्वयं शुद्ध है, परन्तु वह बुद्धि सम्बन्धी
अध्यवसायको देखकर, बुद्धिसे भिन्न होकर भी अपने आपको बुद्धिसे अभिन्न समझता है ।” वास्तवमें वह
ज्ञान बुद्धिका ही होता है । वाचस्पतिने भी कहा है— “लोकके कार्योंमें प्रवृत्ति करनेवाले सभी लोग यह
मानते हैं कि इसमें हमारा अधिकार है, और यह हमारा कर्तव्य है, ऐसा समझकर निश्चय करते हैं ।
निश्चय करनेके पश्चात् कार्यमें प्रवृत्ति होती है, इस प्रकार लोगोंमें परिपाटी चलती है । यहाँ बुद्धिमें
चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे ही कर्तव्य-बुद्धिका निश्चय होता है; यह निश्चय बुद्धिका असाधारण
व्यापार है ।” बुद्धिमें चेतनाशक्तिका प्रतिबिम्ब पड़नेसे अचेतन बुद्धि चेतनकी तरह प्रतिभासित होने लगती
है । वादमहार्णवमें भी कहा है— “दर्पणके समान बुद्धिमें पड़नेवाला पदार्थोंका प्रतिबिम्ब पुरुषरूपी दर्पणमें
१. व्यासभाष्ये । २. सांख्यतत्त्वकौमुद्यां ।
३. सांख्यग्रन्थविशेषः । जैनाचार्यः अभयदेवसूरिरपि वादमहार्णवनामग्रन्थं कृतवान् ।
१८

१३८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
म्बकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति । तदेव भोक्तृत्वमस्य न त्वात्मनो विकारापत्तिः।"
इति । तथा चासुरिः¹—
"विविक्ते दृक्परिणतौ बुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥"
विन्ध्यवासी त्वेवं भोगमाचष्टे ।
"पुरुषोऽविकृतात्मैव स्वनिर्भासमचेतनम् ।
मनः करोति सान्निध्यादुपाधिः स्फटिकं यथा ॥"
न च वक्तव्यम् पुरुषश्चेद्गुणोऽपरिणामी कथमस्य मोक्षः । मुचेर्बन्धनविश्लेषार्थत्वात्
सवासनक्लेशकर्माशयानां च बन्धसमाम्नातानां पुरुषेऽपरिणामिन्यसम्भवात् । अत एव नास्य
प्रेत्यभावापरनामा संसारोऽस्ति, निष्क्रियत्वादिति । यतः प्रकृतिरेव नानापुरुषाश्रया सती
बध्यते संसरति मुच्यते च न पुरुष इति बन्धमोक्षसंसाराः पुरुषे उपचर्यन्ते । तथा जयपरा-
जयौ भृत्यगतावपि स्वामिन्युपचर्येते, तत्फलस्य कोशलाभादेः स्वामिनि संबन्धात्, तथा
भोगापवर्गयोः प्रकृतिगतयोरपि विवेकाग्रहात् पुरुषे संबन्ध इति ॥
तदेतदखिलमालजालम् । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या चेति परस्परविरुद्धं वचः ।
चित्ते संज्ञाने । चेतनं चित्यते वानयेति चित् । सा चेत् स्वपरपरिच्छेदात्मिका नेष्यते तदा
चिच्छक्तिरेव सा न स्यात्, घटवत् । न चामूर्तायाश्चिच्छक्तेर्बुद्धौ प्रतिबिम्बोदयो युक्तः । तस्य
मूर्त्तधर्मत्वात् । न च तथापरिणाममन्तरेण प्रतिसंक्रमोऽपि युक्तः । कथञ्चित् सक्रियात्मकता-
प्रतिबिम्बित होता है। बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है, इसीसे पुरुषको भोक्ता
कहते हैं। इससे आत्मामें कोई विकार नहीं आता।" आसुरिने भी कहा है—
"जिस प्रकार निर्मल जलमें पड़नेवाला चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलका ही विकार है, चन्द्रमाका नहीं,
उसी तरह आत्मामें बुद्धिका प्रतिबिम्ब पड़नेपर आत्मामें जो भोक्तृत्व है, वह केवल बुद्धिका विकार है,
वास्तवमें पुरुष निर्लेप है।"
भोगके विषयमें विन्ध्यवासीने कहा है—
"जैसे भिन्न भिन्न रंगोंके संयोगसे निर्मल स्फटिक मणि काले, पीले आदि रूपका होता है, वैसे ही
अविकारी चेतन पुरुष अचेतन मनको अपने समान चेतन बना लेता है। वास्तवमें विकारी होनेसे मन चेतन
नहीं कहा जा सकता।"
प्रतिवादी--यदि पुरुष निर्गुण और अपरिणामी है तो उसे मोक्ष नहीं हो सकता। मुच् धातुका
अर्थ बन्धनसे छूटना है। अपरिणामी आत्मामें वासना और क्लेशरूप कर्मोंके सम्बन्धसे बन्धनका उत्पन्न होना
सम्भव नहीं, अतएव आत्माके निष्क्रिय होनेसे उसके परलोक (संसार) भी नहीं हो सकता। सांख्य—
नाना पुरुषोंके आश्रित प्रकृतिका ही बन्ध होता है, वही संसारमें भ्रमण करती है, और प्रकृति ही को मोक्ष
होता है, अतएव पुरुषके बन्ध, मोक्ष और संसारका व्यवहार उपचारसे होता है। जिस प्रकार भृत्यों द्वारा
किसी सेनाकी जय, पराजय किये जानेपर वह जय, पराजय सेनाके स्वामीकी समझी जाती है, क्योंकि जय,
पराजयसे होनेवाले लाभ और हानिका फल स्वामीको ही मिलता है, उसी तरह वास्तवमें संसार और मोक्ष
दोनों प्रकृतिके होते हैं, परन्तु पुरुषके विवेकख्याति होनेसे, पुरुषके ही संसार और मोक्ष माना जाता है।
उत्तरपक्ष-(१) क-यह सब बड़ा भारी जाल है। एक ओर चैतन्यशक्ति है और दूसरी ओर
वह ज्ञेय पदार्थके ज्ञानसे शून्य है-यह कथन परस्पर विरुद्ध है। चित् धातु जाननेके अर्थमें प्रयुक्त होती है।
जाननेकी जो क्रिया होती है अथवा जिसके द्वारा जाना जाय, उसे चित् (चेतनं, चित्यते वा अनयेति चित्)
कहते हैं। यदि यह शक्ति स्व और परको जाननेके स्वभाववाली न मानी गई तो उसे चेतनाशक्ति (चित्शक्ति)
नहीं कह सकते; जैसे घट। ख-अमूर्त चेतनाशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्बित न होना युक्त नहीं है; क्योंकि
१. अयं सांख्याचार्य ईश्वरकृष्णगुरुपरम्परायामुपलभ्यते ।

व्यतिरेकेण प्रकृत्युपधानेऽप्यन्यथात्वानुपपत्तेः, अप्रच्युतप्राचीनरूपस्य च सुखदुःखादिभोगव्यप-
देशानर्हत्वात् । तत्प्रच्यवे च प्राक्तनरूपत्यागेनोत्तररूपाध्यासिततया सक्रियत्वापत्तिः । स्फटिका-
दावपि तथा परिणामेनैव प्रतिबिम्बोदयसमर्थनात्, अन्यथा कथमन्धोपलादौ न प्रतिबिम्बः ।
तथापरिणामाभ्युपगमे च बलादायातं चिच्छक्तेः कर्तृत्वं साक्षाद्भोक्तृत्वं च ॥
अथ “अपरिणामिनी भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्ते च तद्वृ-
त्तिमनुभवति” १ इति पतञ्जलिवचनादौपचारिक एवायं प्रतिसंक्रम इति चेत्, तर्हि “उपचार-
स्तत्त्वचिन्तायामनुपयोगी” इति प्रेक्षावतामनुपादेय एवायम् । तथा च प्रतिप्राणिप्रतीतं सुख-
दुःखादिसंवेदनं निराश्रयमेव स्यात् । न चेदं बुद्धेरुपपन्नम् । तस्या जडत्वेनाभ्युपगमात् ।
अतएव

१४० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
न खल्वतिकोपनत्त्वादिना समारोपिताग्नित्वो माणवकः कदाचिदपि मुख्याग्निसाध्यां दाह-
पाकाद्यर्थक्रियां कर्तुमीश्वरः । इति चिच्छक्तेरेव विषयाध्यवसायो घटते न जडरूपाया बुद्धेरिति ।
अत एव धर्माद्यष्टरूपतापि तस्या वाङ्मात्रमेव, धर्मादीनामात्मधर्मत्वात् । अत एव चाह-
ङ्कारोऽपि न बुद्धिजन्यो युज्यते, तस्याभिमानात्मकत्वेनात्मधर्मस्याचेतनादुत्पादायोगात् ॥
अम्बरादीनां च शब्दादितन्मात्रजत्वं प्रतीतिपराहतत्वेनैव विहितोत्तरम् । अपि च,
सर्ववादिभिस्तावदविगानेन गगनस्य नित्यत्वमङ्गीक्रियते । अयं च शब्दतन्मात्रात् तस्याप्या-
विर्भावमुद्भावयन्नित्यैकान्तवादिनां च धुरि आसनं न्‍यासयन्नसंगतप्रलापीव प्रतिभाति । न च
परिणामिकारणं स्वकार्यस्य गुणो भवितुमर्हतीति "शब्दगुणमाकाशम्"१ इत्यादि वाङ्मात्रम् ।
वागादीनां चेन्द्रियत्वमेव न युज्यते । इतरासाध्यकार्यकारित्वाभावात् । परप्रतिपादनग्रहण-
विहरणमलोत्सर्गादिकार्याणामितरावयवैरपि साध्यत्वोपलब्धेः । तथापि तत्त्वकल्पने इन्द्रिय-
संख्या न व्यवतिष्ठते, अन्याङ्गोपाङ्गानामपीन्द्रियत्वप्रसङ्गात् ।
यच्चोक्तं 'नानाश्रयायाः प्रकृतेरेव बन्धमोक्षौ संसारश्च न पुरुषस्य' इति । तदप्य-
सारम् । अनादिभवपरम्परानुबुद्ध्या प्रकृत्या सह यः पुरुषस्य विवेकाग्रहणलक्षणोऽविवग्भावः
स एव चेन्न बन्धः, तदा को नामान्यो बन्धः स्यात् । प्रकृतिः सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तम् इति च
'अचेतन बुद्धि चेतना सहित जैसी प्रतिभासित होती है', यहाँ 'इव' ( जैसी ) शब्दसे अचेतन बुद्धिमें चेतनाका
आरोप किया गया है । परन्तु आरोपसे अर्थक्रियाकी सिद्धि नहीं होती । जैसे यदि किसी बालकका अत्यन्त
क्रोधी स्वभाव देख कर उसका अग्नि नाम रख दिया जाय, परन्तु वह अग्निकी जलाने, पकाने आदि क्रियाओं-
को नहीं कर सकता, इसी प्रकार विषयोंका—ज्ञेय पदार्थोंका-ज्ञान चेतनाशक्तिसे ही हो सकता है, अचेतन
बुद्धिमें चेतनाका आरोप करने पर भी बुद्धिसे पदार्थोंका ज्ञान संभव नहीं । अतएव आप लोगोंने जो बुद्धिके
धर्म आदि आठ गुण माने हैं, वे भी केवल वचनमात्र हैं, क्योंकि धर्म आदि आत्माके ही गुण हो सकते हैं,
अचेतन बुद्धिके नहीं । इसीलिये अहंकारको भी बुद्धिजन्य नहीं मानना चाहिये, क्योंकि अहंकार अभिमान
रूप है, इसलिये वह आत्मासे हो उत्पन्न होता है, अचेतन बुद्धिसे उत्पन्न नहीं हो सकता ।
( ३ ) आकाश आदिका शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न होना अनुभवके सर्वथा विरुद्ध है ।
तथा, सब लोगोंने आकाशको नित्य स्वीकार किया है; नित्य एकान्तवादको मानकर भी केवल सांख्य लोग ही
उसकी शब्द तन्मात्रासे उत्पत्ति मान कर असंगत प्रलाप करते हैं। तथा, परिणामी ( उपादान ) वस्तुके परिणाममें
कारण है, वह अपने कार्यका गुण नहीं हो सकता, इसलिये "शब्दको आकाशका गुण मानना" भी कथन-
मात्र है । तथा, वाक् आदि इन्द्रियाँ नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि दूसरोंको प्रतिपादन करना, किसी वस्तुको
ग्रहण करना, विहार करना, मल त्याग करना आदि, वाक्, पाणि, पाद, पायु आदि कर्मेन्द्रियोंसे होने वाले
कार्य शरीरके अन्य अवयवोंसे भी किये जा सकते हैं; जैसे उंगलियों द्वारा भी दूसरोंको प्रतिपादित किया
जा सकता है । अतएव वाक् आदि शरीरके अवयव हैं, इन्हें इन्द्रियाँ नहीं कह सकते । यदि इतर अवयवों
द्वारा न किये जानेवाले कार्योंके कर्तृत्वका अभाव होने पर भी वाक् आदिको इन्द्रिय माना जाय, तो इन्द्रियों-
की ग्यारह संख्या ही नहीं बन सकती, क्योंकि शरीरके अन्य अंग-उपांगोंको भी इन्द्रियत्वका प्रसंग उपस्थित
हो जाता है ।
( ४ ) तथा, 'अनेक पुरुषोंके आश्रय रहनेवाली प्रकृतिके ही बन्ध, मोक्ष और संसार होते हैं, पुरुषके
नहीं', यह कहना भी ठीक नहीं । क्योंकि आप लोगोंके मतमें यदि अनादि भव-परम्परासे बद्ध और पुरुषके
विवेकको न समझने वाले अपृथग्भावको बन्ध नहीं कहते, तो फिर आपके मतमें बन्धका क्या लक्षण है ?
१. वैशेषिकसूत्रे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४१
प्रतिपद्यमानेनायुष्मता संज्ञान्तरेण कर्मैव प्रतिपन्नं । तस्यैवंस्वरूपत्वात् अचेतनत्वाच्च ॥
यस्तु प्राकृतिकवैकारिकदाक्षिणभेदात् त्रिविधो बन्धः । तद्यथा प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये
प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः । ये विकारानैव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीः पुरुषबुद्धयोपासते
तेषां वैकारिकः । इष्टापूर्ते¹ दाक्षिणः । पुरुषतत्त्वानामभिज्ञो हीष्टापूर्तकारी कामोपहतमना
बध्यत इति ।
“इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेन भूत्वा
इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥”²
इति वचनात् । स त्रिविधोऽपि कल्पनामात्रं कथञ्चिद् मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमाद-
कषाययोगे³भ्योऽभिन्नस्वरूपत्वेन कर्मबन्धहेतुष्वेवान्तर्भावात् । बन्धसिद्धौ च सिद्धस्तस्यैव
निर्वाधः संसारः । बन्धमोक्षयोश्चैकाधिकरणत्वाद् य एव बद्धः स एव मुच्यत इति पुरुषस्यैव
मोक्षः आबालगोपालं तथाप्रतीतेः ॥
प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनात् प्रवृत्तेरुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति
चेत् । न । प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदासीन्यायोगात् । अथ पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः प्रवृत्तिः ।
यदि कहो कि उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थोंका कारण प्रकृति है तो आप लोगोंने नामान्तरसे कर्मको ही
स्वीकार किया है; क्योंकि कर्मका यह स्वरूप है और वह अचेतन है। अतएव बन्ध पुरुषके ही मानना
चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
सांख्य—प्राकृतिक, वैकारिक, और दाक्षिणके भेदसे बन्ध तीन प्रकारका होता है। प्रकृतिको
आत्मा समझकर जो प्रकृतिकी उपासना करते हैं, उनके प्राकृतिक बन्ध होता है। जो पाँच भूत, इन्द्रिय,
अहंकार, और बुद्धिरूप विकारोंको पुरुष मानकर उपासना करते हैं उनके वैकारिक बन्ध होता है। जो यज्ञ दान
आदि कर्म करते हैं उनके दाक्षिण बन्ध होता है। आत्माको न जानकर, सांसारिक इच्छाओंसे यज्ञ, दान
आदि कर्म करनेसे दाक्षिण बन्ध होता है। कहा भी है—
“जो मूढ़ पुरुष यज्ञ दान आदिको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, यज्ञ दान आदिके अतिरिक्त किसी भी
शुभ कर्मकी प्रशंसा नहीं करते, वे लोग स्वर्गमें उत्पन्न होते हैं, और अन्तमें फिर मनुष्य लोकमें अथवा इससे
भी हीन लोकमें जन्म लेते हैं ।”
जैन—उक्त तीनों प्रकारका बन्ध मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगमें गर्भित हो
जाता है, अतएव उसे पृथक् स्वीकार करना ठीक नहीं । अतएव जीवके बन्ध सिद्ध होनेपर, जीवके ही
संसारकी भी सिद्धि होती है। तथा, जो बँधता है, वह कभी मुक्त भी होता है, अतएव बन्ध और मोक्षका
एक ही अधिकरण होनेसे पुरुषके मोक्ष भी सिद्ध होता है। अतएव 'पुरुषके न बन्ध होता है, न मोक्ष' यह
कहना अयुक्तियुक्त है।
शंका—जिस समय प्रकृति और पुरुषमें विवेकख्याति उत्पन्न होती है, प्रकृति प्रवृत्तिसे मुँह मोड़
लेती है, उस समय पुरुष अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है, इसे ही मोक्ष कहते हैं। समाधान—
प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करना ही है, अतएव वह प्रकृति प्रवृत्तिसे उदासीन नहीं हो सकती । शंका—
१. एतल्लक्षणं—वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमर्थ्याः प्रचक्षते ।
एकाग्निकर्महवनं त्रेतायां यश्च हूयते । अन्तर्वेद्यां च यद्दानमिष्टं तदभिधीयते ॥
२. मुंडक उ० १–२–१० ।
३. मिथ्या विपरीतं दर्शनं मिथ्यादर्शनम् । सावद्ययोगेभ्यो निवृत्त्यभावः अविरतिः । प्रकर्षेण माद्य-
त्यनेनेति प्रमादः । विषयक्रीडाभिष्वङ्गः। कलुषयन्ति शुद्धस्वभावं सन्तं कर्ममलिनं कुर्वन्ति जीवमिति कषायाः।
कायवाङ्मनसां कर्म योगः ।