स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
न च वाच्यम् आत्मन्यपौद्गलिकेऽपि कथं सामान्यविशेषात्मकत्वं निर्विवादमनुभूयत
इति । यतः संसार्यात्मनः प्रतिप्रदेशमनन्तानन्ताकर्मपरमाणुभिः सह वह्नितापितघनकुट्टि-
तनिर्विभागपिण्डीभूतसूचीकलापवल्लोलीभावमापन्नस्य कथञ्चित् पौद्गलिकत्वा१भ्यनुज्ञाना-
दिति । यद्यपि स्याद्वादिनां पौद्गलिकमपौद्गलिकं च सर्वं वस्तु सामान्यविशेषात्मकं, तथा-
प्यपौद्गलिकेषु धर्माधर्माकाशाकालेषु तदात्मत्वमर्वाग्दृशां न तथाप्रतीतिविषयमायाति ।
पौद्गलिकेषु पुनस्तत् साध्यमानं तेषां सुश्रद्धानम् । इत्यप्रस्तुतमपि शब्दस्य पौद्गलिकत्वमत्र
सामान्यविशेषात्मकत्वसाधनायोपन्यस्तमिति ॥
अत्रापि नित्यशब्दवादिसंमतः शब्दैकत्वैकान्तः, अनित्यशब्दवाद्यभिमतः शब्दानेकत्वै-
कान्तश्च प्राग्दर्शितदिशा प्रतिक्षेप्यः । अथवा वाच्यस्य घटादेरर्थस्य सामान्यविशेषात्मकत्वे
तद्वाचकस्य ध्वनेरपि तत्त्वम् । शब्दार्थयोः कथञ्चित् तादात्म्याभ्युपगमात् । यदाहुर्भद्रबाहु-
स्वामिपादाः—
“अभिहाणं अभिहेयाउ होइ भिण्णं अभिण्णं च ।
खुरअग्गिमोयगुच्चारणम्मि जम्हा उ वयणसवणाणं ॥ १ ॥
तथा, आत्माके अपौद्गलिक न होनेपर भी उसका सामान्य-विशेष रूपत्व निर्विवाद रूपसे अनुभवमें
नहीं आता—ऐसा नहीं कहना चाहिए । क्योंकि जिस प्रकार अग्निमें तपाया हुआ सुइयोंका समूह घनसे कूटा
जानेपर अविभागी एक पिण्डरूप बन जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रदेशकी अपेक्षा, अनन्तानन्त कर्म पर-
माणुओंके साथ संश्लिष्ट एकीभावको प्राप्त संसारी आत्माको कथंचित् पौद्गलिक स्वीकार किया गया है ।
यद्यपि स्याद्वादको माननेवालोंके मतमें पौद्गलिक और अपौद्गलिक सभी वस्तु सामान्य-विशेष रूप हैं, फिर
भी अल्पज्ञानी धर्म, अधर्म, आकाश, काल इन अपौद्गलिक पदार्थोंके सामान्य-विशेषत्वको नहीं समझ
सकते; शब्द आदि पौद्गलिक पदार्थोंमें सामान्य-विशेषत्वको अच्छी तरह समझ सकते हैं । अतएव
यहाँ शब्दका पौद्गलिक प्रस्तुत न होनेपर भी उसके सामान्य-विशेष रूप सिद्ध करनेके लिये पुद्गलकी पर्याय
बताया गया है ।
नित्य शब्दवादी मीमांसकोंके मतके अनुसार शब्द सर्वथा एक है, और अनित्य शब्दवादी बौद्धोंके
अनुसार शब्द सर्वथा अनेक है—इन दोनों मतोंका उक्त पद्धतिसे खण्डन करना चाहिये । अथवा, वाच्य घटादि-
के सामान्य-विशेष रूप सिद्ध होनेपर, वाचक शब्दोंको भी सामान्य-विशेष मानना चाहिये । क्योंकि शब्द
( वाचक ) और अर्थ ( वाच्य ) का कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध माना गया है । भद्रबाहु स्वामीने भी
कहा है—
“वाचक वाच्यसे भिन्न भी है, और अभिन्न भी है । खुर ( छुरा ), अग्नि और मोदक शब्दोंका
उच्चारण करते समय बोलनेवालोंके मुख और सुननेवालोंके कान ‘खुर’ से नहीं छिदते, ‘अग्नि’ से नहीं
१—नायमेकान्तः अमूर्तिरेवात्मेति । कर्मबन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्तः । यद्येवं कर्मबन्धावेशा-
दस्यैकत्वे सत्यविवेकः प्राप्नोति । नैष दोषः । बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते ।
उक्तं च—
बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं । तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो होइ जीवस्स ॥
छाया—बन्धं प्रत्येकत्वे लक्षणतः भवति तस्य नानात्वं । तस्मात् अमूर्तभावः अनेकान्तं भवति जीवस्य ॥
सर्वार्थसिद्धौ पृ. ८८