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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 458 में से

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पृष्ठ 184

एवं वाचकमपि शब्दरूपं द्वयात्मकम् । एकात्मकमपि सदनेकमित्यर्थः । अर्थोक्तन्यायेन
शब्दस्यापि भावाभावात्मकत्वात् । अथवा एकविषयस्यापि वाचकस्यानेकविषयत्वोपपत्तेः । यथा
किल घटशब्दः संकेतवशात् पृथुबुध्नोदराद्याकारवति पदार्थे प्रवर्तते वाचकत्या, तथा देश-
कालाद्यपेक्षया तद्वशादेव पदार्थान्तरेष्वपि तथा वर्तमानः केन वार्यते । भवन्ति हि वक्तारो
योगिनः शरीरं प्रति घट इति । संकेतानां पुरुषेच्छाधीनतयाऽनियतत्वात् । यथा चौरशब्दोऽ-
न्यत्र तस्करे रूढोऽपि दाक्षिणात्यानामोदने प्रसिद्धः । यथा च कुमारशब्दः पूर्वदेशे आश्विनमासे
रूढः । एवं कर्कटीशब्दादयोऽपि तत्तद्देशापेक्षया योन्यादिवाचका ज्ञेयाः । कालापेक्षया पुनर्यथा
जैनानां प्रायश्चित्तविधौ धृतिश्रद्धासंहनना१दिमति प्राचीनकाले षड्गुरुशब्देन शतमशीत्यधिक-
मुपवासानामुच्यते स्म, सांप्रतकाले तु तद्विपरीते तेनैव षड्गुरुशब्देन उपवासत्रयमेव सङ्केत्यते,
जीतकल्प२व्यवहारानुसारात् । शास्त्रापेक्षया तु यथा पुराणेषु द्वादशीशब्देनैकादशी । त्रिपुरार्णवे३
च अलिशब्देन मदिराभिषक्तम् च मैथुनशब्देन मधुसर्पिषोर्ग्रहणम् इत्यादि ।
न चैवं सङ्केतस्यैवार्थप्रत्यायने प्राधान्यम् । स्वाभाविकसामर्थ्यसाचिव्यादेव तत्र तस्य
प्रवृत्तेः । सर्वशब्दानां सर्वार्थप्रत्यायनशक्तियुक्तत्वात् । यत्र च देशकालादौ यदर्थप्रतिपादनशक्ति-
सहकारी संकेतस्तत्र तमर्थं प्रतिपादयति । तथा च निर्जितदुर्जयपरप्रवादाः श्रीदेवसूरिपादाः—
“स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोधनिबन्धनं शब्दः ।”४ अत्र शक्तिपदार्थसमर्थनं ग्रन्थान्त-
रा५दवसेयम् । अतोऽन्यथेत्यादि उत्तरार्द्धं पूर्ववत् । प्रतिभाप्रमादस्तु तेषां सदसदेकान्ते वाच्य-
स्य प्रतिनियतार्थविषयत्वे च वाचकस्य उक्तयुक्त्या दोषसद्भावाद् व्यवहारानुपपत्तेः । तदयं
समुदायार्थः । सामान्यविशेषात्मकस्य, भावाभावात्मकस्य च वस्तुनः सामान्यविशेषात्मको,
वाच्यकी तरह वाचक भी एक होकर भी अनेक है । जैसे अर्थ भाव और अभाव रूप है, वैसे ही शब्द
भी भाव और अभाव दोनों रूप है । अथवा, एक विषयका वाचक शब्द अनेक विषयोंका वाचक हो सकता है,
इसलिये भी शब्द भाव और अभाव रूप है । जैसे बड़े और मोटे उदरवाले पदार्थमें घट शब्दका व्यवहार होता
है, उसी प्रकार देश, काल आदिकी अपेक्षा उसी कारण अन्य पदार्थोंमें भी उसकी विद्यमानता कौन रोक सकता
है ! योगी लोग शरीरको ही घट कहते हैं । चौर शब्दका साधारण अर्थ चोर होता है, परन्तु दक्षिण जैसे
देशमें चौर शब्दका अर्थ चावल होता है; कुमार शब्दका सामान्यसे युवराज अर्थ होनेपर भी पूर्व देशमें इसका
अर्थ आश्विन मास किया जाता है; कर्कटी शब्दका प्रसिद्ध अर्थ ककड़ी होनेपर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ
योनि किया जाता है । तथा, जीतकल्पव्यवहार अनुसार प्रायश्चित्त विधिमें धृति, श्रद्धा और संहननवाले
प्राचीन समयमें षड्गुरु शब्दका अर्थ एकसौ अस्सी उपवास किया जाता था, परन्तु आजकल षड्गुरुका अर्थ
केवल तीन उपवास किया जाता है । पुराणोंमें उपवासके नियमोंका वर्णन करते समय द्वादशीका अर्थ एकादशी
किया जाता है । त्रिपुरार्णवमें अलि शब्द मदिरा, और मधु शब्द शहद और घीके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं ।
केवल संकेत मात्रसे अर्थका ज्ञान नहीं होता । स्वाभाविक शक्तिकी मुख्यतासे उनकी प्रवृत्ति होती है ।
क्योंकि शब्दोंमें ही सब अर्थोंको जनानेकी शक्ति होती है । संकेत केवल देश और काल आदिकी अपेक्षासे
शब्दके ही अर्थको जाननेमें सहकारी होता है । परवादियोंको जीतनेवाले श्रीदेवसूरि आचार्यने कहा भी