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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 458 में से

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पृष्ठ 176

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१२४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
व्यवहारं प्रवर्तयता तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः । एवं सामान्यस्थाने विशेष-
शब्दं, विशेषस्थाने च सामान्यशब्दं प्रयुञ्जानेन सामान्येऽपि तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽङ्गी-
कर्तव्यः । तस्मात् स्वस्वग्राहिणि ज्ञाने पृथक्प्रतिभासमानत्वाद् द्वावपीतरेतरविशकलितौ ।
ततो न सामान्यविशेषात्मकत्वं वस्तुनो घटते । इति स्वतन्त्रसामान्यविशेषवादः ॥
तदेतत् पक्षत्रयमपि न क्षमते क्षोदम् । प्रमाणबाधितत्वात् । सामान्यविशेपोभयात्म-
कस्यैव वस्तुनो निर्विगानमनुभूयमानत्वात् । वस्तुनो हि लक्षणम् अर्थक्रियाकारित्वम् ।
तच्चानेकान्तवादे एवाविकलं कलयन्ति परीक्षकाः । तथाहि । यथा गौरित्युक्ते खुरककुत्सा-
स्नालाङ्गूलविषाणाद्यवयवसम्पन्नं वस्तुरूपं सर्वव्यक्त्यनुयायि प्रतीयते, तथा महिष्यादि-
व्यावृत्तिरपि प्रतीयते ॥
यत्रापि च शबला गौरित्युच्यते, तत्रापि यथा विशेषप्रतिभासः तथा गोत्वप्रतिभासोऽपि
स्फुट एव । शबलेति केवलविशेषोच्चारणेऽपि, अर्थात् प्रकरणाद् वा गोत्वमनुवर्तते । अपि
च, शबलत्वमपि नानारूपम्, तथा दर्शनात् । ततो वक्त्रा शबलेत्युक्ते क्रोडीकृतसकलशवल-
सामान्यं विवक्षितगोव्यक्तिगतमेव शबलत्वं व्यवस्थाप्यते । तदेवमाबालगोपालं प्रतीति-
प्रसिद्धेऽपि वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वे तदुभयैकान्तवादः प्रलापमात्रम् । न हिं क्वचित्
कदाचित् केनचित् सामान्यं विशेषविनाकृतमनुभूयते, विशेषा वा तद्विनाकृताः । केवलं
द्वारा किये जानेवाले व्यवहारका अभाव तो है नहीं; क्योंकि विशेष शब्दकी और विशेषके द्वारा किये जानेवाले
व्यवहारकी प्रवृत्ति देखी जाती है । अतएव विशेषकी अभिलाषा करनेवालेको और विशेषसाध्य व्यवहारकी
प्रवृत्ति करनेवालेको सामान्य ज्ञानसे भिन्न विशेषको जाननेवाले ज्ञानको स्वीकार करना चाहिए । इस प्रकार
सामान्यके वाचक शब्दके स्थानमें विशेषके वाचक शब्दका, और विशेषके वाचक शब्दके स्थानमें सामान्यके
वाचक शब्दका प्रयोग करनेवालेको, सामान्यके विषयमें भी विशेषके ज्ञानसे भिन्न सामान्यके ज्ञानको स्वीकार
करना चाहिए । अतएव सामान्यको जाननेवाले ज्ञानमें और विशेषको जाननेवाले ज्ञानमें पृथक् रूपसे प्रति-
भासित होनेके कारण सामान्य और विशेष दोनों ही एक दूसरेसे भिन्न सिद्ध होते हैं । अतएव पदार्थका
सामान्य-विशेषात्मक रूप घटित नहीं होता । इसलिए स्वतन्त्र सामान्य और स्वतन्त्र विशेषवाद ही ठीक है।
जैन—(१) उक्त तीनों पक्ष प्रमाणसे बाधित होनेसे परीक्षाकी कसौटी पर ठीक नहीं उतरते ।
क्योंकि सामान्य-विशेष रूप पदार्थ ही निर्दोष रूपसे अनुभवमें आते हैं। वस्तुका लक्षण अर्थक्रियाकारित्व है और
यह लक्षण अनेकान्तवादमें ही ठीक-ठीक घटित हो सकता है। गौके कहनेपर जिस प्रकार खुर, ककुत्,
सास्ना, पूँछ, सींग आदि अवयवोंवाले गो पदार्थका स्वरूप सभी गो व्यक्तियोंमें पाया जाता है, उसी प्रकार
भैंस आदिकी व्यावृत्ति भी प्रतीत होतो है । अतएव एकान्त सामान्यको न मान कर पदार्थोंको सामान्य-विशेष
रूप ही मानना चाहिये ।
(२) जहाँ 'शबला गो' कहा जाता है, वहाँ जिस प्रकार विशेषका ज्ञान होता है, उसी प्रकार
गोत्व सामान्यका ज्ञान भी स्पष्ट ही है । 'शबला' केवल इस विशेषका उच्चारण करने पर भी अर्थ
या प्रकरणकी दृष्टिसे गोत्व सामान्यकी अनुवृत्ति होती है ( अर्थात् गोत्व सामान्यका ज्ञान होता है ) । तथा,
शबलत्व भी अनेक प्रकारका होता है, क्योंकि वैसा देखनेमें आता है । अतएव वक्ताके द्वारा 'शबला' कहा
जानेपर, अपनेमें सभी शबल-सामान्यका अन्तर्भाव करनेवाले विवक्षित गोव्यक्तिमें विद्यमान रहनेवाले ही
शबलत्वका निश्चय किया जाता है । इस प्रकार वस्तुका सामान्य-विशेषात्मकत्व सभी बाल-गोपालमें अनुभव-
सिद्ध है, फिर भी सामान्य ही सद्भूत है, विशेष नहीं, और विशेष ही सद्भूत है, सामान्य नहीं, इस प्रकारका
ऐकान्तिक कथन प्रलापमात्र है । विशेषोंसे पृथक् किये गये सामान्यक! और सामान्यसे पृथक् किये गये विशेषों-