स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १४१
प्रतिपद्यमानेनायुष्मता संज्ञान्तरेण कर्मैव प्रतिपन्नं । तस्यैवंस्वरूपत्वात् अचेतनत्वाच्च ॥
यस्तु प्राकृतिकवैकारिकदाक्षिणभेदात् त्रिविधो बन्धः । तद्यथा प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये
प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः । ये विकारानैव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीः पुरुषबुद्धयोपासते
तेषां वैकारिकः । इष्टापूर्ते¹ दाक्षिणः । पुरुषतत्त्वानामभिज्ञो हीष्टापूर्तकारी कामोपहतमना
बध्यत इति ।
“इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेन भूत्वा
इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥”²
इति वचनात् । स त्रिविधोऽपि कल्पनामात्रं कथञ्चिद् मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमाद-
कषाययोगे³भ्योऽभिन्नस्वरूपत्वेन कर्मबन्धहेतुष्वेवान्तर्भावात् । बन्धसिद्धौ च सिद्धस्तस्यैव
निर्वाधः संसारः । बन्धमोक्षयोश्चैकाधिकरणत्वाद् य एव बद्धः स एव मुच्यत इति पुरुषस्यैव
मोक्षः आबालगोपालं तथाप्रतीतेः ॥
प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनात् प्रवृत्तेरुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इति
चेत् । न । प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृतेरौदासीन्यायोगात् । अथ पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः प्रवृत्तिः ।
यदि कहो कि उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थोंका कारण प्रकृति है तो आप लोगोंने नामान्तरसे कर्मको ही
स्वीकार किया है; क्योंकि कर्मका यह स्वरूप है और वह अचेतन है। अतएव बन्ध पुरुषके ही मानना
चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
सांख्य—प्राकृतिक, वैकारिक, और दाक्षिणके भेदसे बन्ध तीन प्रकारका होता है। प्रकृतिको
आत्मा समझकर जो प्रकृतिकी उपासना करते हैं, उनके प्राकृतिक बन्ध होता है। जो पाँच भूत, इन्द्रिय,
अहंकार, और बुद्धिरूप विकारोंको पुरुष मानकर उपासना करते हैं उनके वैकारिक बन्ध होता है। जो यज्ञ दान
आदि कर्म करते हैं उनके दाक्षिण बन्ध होता है। आत्माको न जानकर, सांसारिक इच्छाओंसे यज्ञ, दान
आदि कर्म करनेसे दाक्षिण बन्ध होता है। कहा भी है—
“जो मूढ़ पुरुष यज्ञ दान आदिको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, यज्ञ दान आदिके अतिरिक्त किसी भी
शुभ कर्मकी प्रशंसा नहीं करते, वे लोग स्वर्गमें उत्पन्न होते हैं, और अन्तमें फिर मनुष्य लोकमें अथवा इससे
भी हीन लोकमें जन्म लेते हैं ।”
जैन—उक्त तीनों प्रकारका बन्ध मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगमें गर्भित हो
जाता है, अतएव उसे पृथक् स्वीकार करना ठीक नहीं । अतएव जीवके बन्ध सिद्ध होनेपर, जीवके ही
संसारकी भी सिद्धि होती है। तथा, जो बँधता है, वह कभी मुक्त भी होता है, अतएव बन्ध और मोक्षका
एक ही अधिकरण होनेसे पुरुषके मोक्ष भी सिद्ध होता है। अतएव 'पुरुषके न बन्ध होता है, न मोक्ष' यह
कहना अयुक्तियुक्त है।
शंका—जिस समय प्रकृति और पुरुषमें विवेकख्याति उत्पन्न होती है, प्रकृति प्रवृत्तिसे मुँह मोड़
लेती है, उस समय पुरुष अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाता है, इसे ही मोक्ष कहते हैं। समाधान—
प्रकृतिका स्वभाव प्रवृत्ति करना ही है, अतएव वह प्रकृति प्रवृत्तिसे उदासीन नहीं हो सकती । शंका—
१. एतल्लक्षणं—वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमर्थ्याः प्रचक्षते ।
एकाग्निकर्महवनं त्रेतायां यश्च हूयते । अन्तर्वेद्यां च यद्दानमिष्टं तदभिधीयते ॥
२. मुंडक उ० १–२–१० ।
३. मिथ्या विपरीतं दर्शनं मिथ्यादर्शनम् । सावद्ययोगेभ्यो निवृत्त्यभावः अविरतिः । प्रकर्षेण माद्य-
त्यनेनेति प्रमादः । विषयक्रीडाभिष्वङ्गः। कलुषयन्ति शुद्धस्वभावं सन्तं कर्ममलिनं कुर्वन्ति जीवमिति कषायाः।
कायवाङ्मनसां कर्म योगः ।