स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक १५ ] स्याद्वादमञ्जरी १३५
चित्—चैतन्यशक्तिः, आत्मस्वरूपभूता। अर्थशून्या—विषयपरिच्छेदविरहिता। अर्था-
ध्यवसायस्य बुद्धिव्यापारत्वाद् इत्येका कल्पना। बुद्धिश्च महत्तत्त्वाख्या। जडा अनवबोध-
स्वरूपा इति द्वितीया। अम्बरादि—व्योमप्रभृतिभूतपञ्चकं शब्दादितन्मात्रजम्—शब्दादीनि यानि
पञ्चतन्मात्राणि सूक्ष्मसंज्ञानि, तेभ्यो जातमुत्पन्नं, शब्दादितन्मात्रजम् इति तृतीया। अत्र च
शब्दो गम्यः। पुरुषस्य च प्रकृतिविकृत्यनात्मकस्यात्मनो न बन्धमोक्षौ, किन्तु प्रकृतेरेव। तथा
च कापिलाः—
“तस्मान्न बध्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित्।
संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः॥१”
तत्र बन्धः—प्राकृतिकादिः। मोक्षः—पञ्चविंशतितत्त्वज्ञानपूर्वकोऽपवर्गः इति चतुर्थी।
इतिशब्दस्य प्रकारार्थत्वाद्—एवंप्रकारमन्यदपि विरोधीति विरुद्धं, पूर्वापरविरोधादिदोषाग्रा-
तम्। जडैः—मूर्खैः, तत्त्वावबोधविधुरधीभिः कापिलैः। कियन्न ग्रथितं—कियद् न स्वशास्त्रे-
षूपनिबद्धम्। कियदित्यसूयागर्भम्। तत्प्ररूपितविरुद्धार्थानामानन्त्येनेयत्तानवधारणात्। इति
संक्षेपार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। साङ्ख्यमते किल दुःखत्रयाभिहतस्य पुरुषस्य तदपघातहेतुतत्त्वजि-
ज्ञासा उत्पद्यते। आध्यात्मिकमाधिदैविकमाधिभौतिकं चेति दुःखत्रयम्। तत्राध्यात्मिकं द्वि-
विधम्—शारीरं मानसं च। शारीरं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यनिमित्तम्। मानसं कामक्रोधलोभ-
मोहेर्ष्याविषयादर्शननिबन्धनम्। सर्वं चैतदान्तरोपायसाध्यत्वादाध्यात्मिकं दुःखम्। वाह्योपाय-
साध्यं दुःखं द्वेधा आधिभौतिकमाधिदैविकं चेति। तत्राधिभौतिकं मानुषपशुपक्षिमृगसरीसृप-
स्थावरनिमित्तम्। आधिदैविकं यक्षराक्षसग्रहाद्या वेशहेतुकम्। अनेन दुःखत्रयेण रजःपरिणाम-
बुद्धिवर्तिना चेतनाशक्तेः प्रतिकूलतया अभिसम्बन्धो अभिघातः॥
तत्त्वानि पञ्चविंशतिः। तद्यथा अव्यक्तम् एकम्। महदहङ्कारपञ्चतन्मात्रैकादशेन्द्रियपञ्च-
व्याख्यार्थ—पूर्वपक्ष (१) चेतनशक्ति पदार्थोंका ज्ञान नहीं करती, बुद्धिसे ही पदार्थोंका ज्ञान
होता है। (२) बुद्धि (महत्त्व) अज्ञान रूप है। (३) आकाश आदि शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे उत्पन्न
होते हैं। (४) प्रकृति और विकृतिसे भिन्न पुरुषके बन्ध और मोक्ष नहीं होता, प्रकृतिके ही बन्ध और मोक्ष
होता है। कहा भी है—
“न कोई बँधता है, न मुक्त होता है, और न कोई संसारमें परिभ्रमण करता है; बन्ध, मोक्ष और
परिभ्रमण नाना आश्रयवाली प्रकृतिके ही होते हैं।”
(५) बन्ध प्रकृतिमें होता है, और पच्चीस तत्त्वोंके ज्ञानसे मोक्ष मिलता है।
आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखोंसे पीडित पुरुष दुःखोंके नष्ट करनेके कारणोंको जानना
चाहता है। आध्यात्मिक दुख शारीर और मानसके भेदसे दो प्रकारका है। वात, पित्त, और कफकी विष-
मतासे उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको शारीर, तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और विषयोंके प्राप्त न होनेसे
उत्पन्न होनेवाले दुःखोंको मानस दुख कहते हैं। शारीर और मानस दुख, दुखके अन्तरंग कारण मनसे उत्पन्न
होते हैं, इसलिये इन्हें आध्यात्मिक दुख कहा है। आधिभौतिक और आधिदैविक दुख बाह्य कारणोंसे उत्पन्न
होते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प और स्थावर आदिसे उत्पन्न होनेवाले दुखको आधिभौतिक, तथा यक्ष, राक्षस,
ग्रह आदिसे पैदा होनेवाले दुखको आधिदैविक दुख कहते हैं। तीनों प्रकारके दुख रजोधर्मसे बुद्धिमें उत्पन्न
होते हैं। जब इन दुःखोंका चेतनाशक्तिके साथ विपरीत सम्बन्ध होता है, उस समय चेतनाशक्तिका अभिघात
होता है।
तत्त्व पच्चीस होते हैं—१ अव्यक्त, २ महत् (बुद्धि), ३ अहंकार, ४-८ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और
१. ईश्वरकृष्णविरचितसांख्यकारिका ६२।