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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 458 में से

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पृष्ठ 185

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १३३
भावाभावात्मकश्च ध्वनिर्वाचक इति । अन्यथा प्रकारान्तरैः पुनर्वाच्यवाचकभावव्यवस्थामा-
तिष्ठमानानां वादिनां प्रतिभैव प्रमाद्यति, न तु तद्भणितयो युक्तिस्पर्शमात्रमपि सहन्ते ।
कानि तानि वाच्यवाचकभावप्रकारान्तराणि परवादिनामिति चेत्, एते ब्रूमः । अपोहं१
एव शब्दार्थ इत्येके । “अपोहः शब्दलिङ्गाभ्यां न वस्तुविधिनाेच्यते”२ इति वचनात् । अपरे
सामान्यमात्रमेव शब्दानां गोचरः । तस्य क्वचित् प्रतिपन्नस्य, एकरूपतया सर्वत्र संकेतविषय-
तोपपत्तेः । न पुनर्विशेषाः । तेषामानन्त्यतः कार्त्स्न्येनोपलब्धुमशक्यतया तद्विषयतानुपपत्तेः ।
विधिवादिनस्तु विधिरेव वाक्यार्थः, अप्रवृत्तप्रवर्तनस्वभावत्वात् तस्येत्याचक्षते । विधिरपि३
तत्तद्वादिविप्रतिपत्त्यानेकप्रकारः ।४ तथाहि । वाक्यरूपः५ शब्द एव प्रवर्तकत्वाद् विधिरित्येके।
तद्व्यापारो भावनापरपर्यायो६ विधिरित्यन्ये । नियोगं७ इत्यपरे । प्रैषाद्यर्थ८ इत्येके । तिरस्कृत-
जाननेके लिये स्याद्वादरत्नाकर ( २-२ ) आदि ग्रन्थ देखने चाहिए। अतएव सामान्य-विशेष रूप और भावाभाव
रूप वाचक ( शब्द ) से ही सामान्य-विशेष और भावाभाव रूप वाच्य ( अर्थ ) का ज्ञान हो सकता है ।
( १ ) बौद्ध लोग अपोह ( इतरव्यावृत्ति—परस्परपरिहार ) को ही शब्दार्थ मानते हैं । कहा भी है ।
“शब्द और लिंगसे अपोह कहा जाता है, वस्तुकी प्रेरणासे नहीं ।” ( २ ) कुछ लोग सामान्य ( जाति ) को
ही शब्दका अर्थ मानते हैं । क्योंकि सामान्यके किसी भी स्थानमें रहनेपर वह सब जगह संकेतसे जाना जा
सकता है । विशेष अनंत हैं, इसलिए उनकी एक साथ शब्दसे प्रतीति नहीं हो सकती; अतएव सामान्य ही
शब्दका विषय है । ( ३ ) विधिवादियोंके अनुसार विधि ही शब्दका अर्थ है, क्योंकि उससे प्रवृत्ति न करने-
वाले मनुष्योंकी प्रवृत्ति होती है । (प्रवृत्तिके अनुकूल व्यापारको विधि कहते हैं; विधि, प्रेरणा, प्रवर्तना आदि
शब्द एक ही अर्थके द्योतक हैं ) । विधि अनेक प्रकारकी है । ( सामान्यसे लौकिक और वैदिक विधिके दो भेद
हैं । अपूर्व, नियम और परिसंख्याके भेदसे विधि तीन प्रकारकी बतायी गई है । उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग
और अधिकार ये अपूर्व विधिके चार भेद हैं) । कोई विधिवादी वाक्यरूप शब्दको विधि कहते हैं। (जैसे 'स्वर्गकी
इच्छा रखनेवालेको अग्निहोत्र करना चाहिये') । कोई वाक्यसे उत्पन्न व्यापार ( भावना ) को विधि कहते हैं ।
पुरुषकी प्रवृत्तिके अनुकूल प्रवर्तन करनेको व्यापार अथवा भावना कहते हैं। ( यह भावना शब्दभावना और अर्थ-
भावनाके भेदसे दो प्रकारकी है । 'स्वर्गकी इच्छा रखनेवालेको यज्ञ करना चाहिये' ( यजेत स्वर्गकामः ) आदि
वाक्योंमें, ईश्वरके स्वीकार न करनेसे लिङ् ( विधिरूप ) शब्दके व्यापारको शब्दभावना कहते हैं । शब्दके व्या-
पारसे यज्ञ करनेवाले पुरुषकी प्रवृत्तिको अर्थभावना कहते हैं। भट्टमीमांसक भावनाको मानते हैं ) । कोई
नियोगको ही विधि मानते हैं । ( जिसके द्वारा यज्ञमें नियुक्त हो, उसे नियोग कहते हैं। यह नियोग ग्यारह
१. अतद्व्यावृत्तिः । यथा विज्ञानवादिबौद्धमते नीलत्वादिवर्मोऽनीलव्यावृत्तिरूपः ।
२. दिङ्नागः ।
३. विधिप्रेरणाप्रवर्तनादिशब्दाभिधेयः प्रवृत्त्यनुकूलव्यापारः ।
४. सामान्यतोऽयं विधिर्द्विविधः लौकिकः वैदिकश्च । प्रकारान्तरेण विधिः त्रिविधः अपूर्वविधिः नियम-
विधिः संख्याविधिश्च ।
५. यद्वाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः यथा 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' ।
६. भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः । यथा यजेतेत्यादौ लिङाद्याख्यातार्थो भावना । भाट्टमते
शाब्दीभावना आर्थीभावना चेति द्विविधा भावना । 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि वैदिकवाक्ये पुरुषाभावात् शब्द-
निष्ठत्वादेव शब्दभावना इत्युच्यते । अर्थभावना तु प्रवृत्त्यादिव्यापाररूपा ।
७. नियुक्तोऽहमनेनाग्निष्टोमादिवाक्येनेति निरवशेषो योगः । एकादशधा नियोगः विद्यानन्दिकृतअष्ट-
सहस्र्यां व्याख्यातः पृ. ६ ।
८. न्यक्कारपूर्विका प्रेरणा प्रैषः ।