स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १५
म्बकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति । तदेव भोक्तृत्वमस्य न त्वात्मनो विकारापत्तिः।"
इति । तथा चासुरिः¹—
"विविक्ते दृक्परिणतौ बुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥"
विन्ध्यवासी त्वेवं भोगमाचष्टे ।
"पुरुषोऽविकृतात्मैव स्वनिर्भासमचेतनम् ।
मनः करोति सान्निध्यादुपाधिः स्फटिकं यथा ॥"
न च वक्तव्यम् पुरुषश्चेद्गुणोऽपरिणामी कथमस्य मोक्षः । मुचेर्बन्धनविश्लेषार्थत्वात्
सवासनक्लेशकर्माशयानां च बन्धसमाम्नातानां पुरुषेऽपरिणामिन्यसम्भवात् । अत एव नास्य
प्रेत्यभावापरनामा संसारोऽस्ति, निष्क्रियत्वादिति । यतः प्रकृतिरेव नानापुरुषाश्रया सती
बध्यते संसरति मुच्यते च न पुरुष इति बन्धमोक्षसंसाराः पुरुषे उपचर्यन्ते । तथा जयपरा-
जयौ भृत्यगतावपि स्वामिन्युपचर्येते, तत्फलस्य कोशलाभादेः स्वामिनि संबन्धात्, तथा
भोगापवर्गयोः प्रकृतिगतयोरपि विवेकाग्रहात् पुरुषे संबन्ध इति ॥
तदेतदखिलमालजालम् । चिच्छक्तिश्च विषयपरिच्छेदशून्या चेति परस्परविरुद्धं वचः ।
चित्ते संज्ञाने । चेतनं चित्यते वानयेति चित् । सा चेत् स्वपरपरिच्छेदात्मिका नेष्यते तदा
चिच्छक्तिरेव सा न स्यात्, घटवत् । न चामूर्तायाश्चिच्छक्तेर्बुद्धौ प्रतिबिम्बोदयो युक्तः । तस्य
मूर्त्तधर्मत्वात् । न च तथापरिणाममन्तरेण प्रतिसंक्रमोऽपि युक्तः । कथञ्चित् सक्रियात्मकता-
प्रतिबिम्बित होता है। बुद्धिके प्रतिबिम्बका पुरुषमें झलकना ही पुरुषका भोग है, इसीसे पुरुषको भोक्ता
कहते हैं। इससे आत्मामें कोई विकार नहीं आता।" आसुरिने भी कहा है—
"जिस प्रकार निर्मल जलमें पड़नेवाला चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलका ही विकार है, चन्द्रमाका नहीं,
उसी तरह आत्मामें बुद्धिका प्रतिबिम्ब पड़नेपर आत्मामें जो भोक्तृत्व है, वह केवल बुद्धिका विकार है,
वास्तवमें पुरुष निर्लेप है।"
भोगके विषयमें विन्ध्यवासीने कहा है—
"जैसे भिन्न भिन्न रंगोंके संयोगसे निर्मल स्फटिक मणि काले, पीले आदि रूपका होता है, वैसे ही
अविकारी चेतन पुरुष अचेतन मनको अपने समान चेतन बना लेता है। वास्तवमें विकारी होनेसे मन चेतन
नहीं कहा जा सकता।"
प्रतिवादी--यदि पुरुष निर्गुण और अपरिणामी है तो उसे मोक्ष नहीं हो सकता। मुच् धातुका
अर्थ बन्धनसे छूटना है। अपरिणामी आत्मामें वासना और क्लेशरूप कर्मोंके सम्बन्धसे बन्धनका उत्पन्न होना
सम्भव नहीं, अतएव आत्माके निष्क्रिय होनेसे उसके परलोक (संसार) भी नहीं हो सकता। सांख्य—
नाना पुरुषोंके आश्रित प्रकृतिका ही बन्ध होता है, वही संसारमें भ्रमण करती है, और प्रकृति ही को मोक्ष
होता है, अतएव पुरुषके बन्ध, मोक्ष और संसारका व्यवहार उपचारसे होता है। जिस प्रकार भृत्यों द्वारा
किसी सेनाकी जय, पराजय किये जानेपर वह जय, पराजय सेनाके स्वामीकी समझी जाती है, क्योंकि जय,
पराजयसे होनेवाले लाभ और हानिका फल स्वामीको ही मिलता है, उसी तरह वास्तवमें संसार और मोक्ष
दोनों प्रकृतिके होते हैं, परन्तु पुरुषके विवेकख्याति होनेसे, पुरुषके ही संसार और मोक्ष माना जाता है।
उत्तरपक्ष-(१) क-यह सब बड़ा भारी जाल है। एक ओर चैतन्यशक्ति है और दूसरी ओर
वह ज्ञेय पदार्थके ज्ञानसे शून्य है-यह कथन परस्पर विरुद्ध है। चित् धातु जाननेके अर्थमें प्रयुक्त होती है।
जाननेकी जो क्रिया होती है अथवा जिसके द्वारा जाना जाय, उसे चित् (चेतनं, चित्यते वा अनयेति चित्)
कहते हैं। यदि यह शक्ति स्व और परको जाननेके स्वभाववाली न मानी गई तो उसे चेतनाशक्ति (चित्शक्ति)
नहीं कह सकते; जैसे घट। ख-अमूर्त चेतनाशक्तिका बुद्धिमें प्रतिबिम्बित न होना युक्त नहीं है; क्योंकि
१. अयं सांख्याचार्य ईश्वरकृष्णगुरुपरम्परायामुपलभ्यते ।