स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
विशेषव्यक्तिष्वेका अनेका वा ? अनेका चेत् तस्या अपि विशेषत्वापत्तिः, अनेकरूपत्वैक-
जीवितत्वाद् विशेषाणाम् । ततश्च तस्या अपि विशेषत्वान्यथानुपपत्तेर्व्यावृत्त्या भाव्यम् ।
व्यावृत्तेरपि च व्यावृत्तौ विशेषाणामभाव एव स्यात् । तत्स्वरूपभूताया व्यावृत्तेः प्रतिषिद्धत्वात्;
अनवस्थापाताच्च । एका चेत् सामान्यमेव संज्ञान्तरेण प्रतिपन्नं स्यात् । अनुवृत्तिप्रत्ययलक्षणाव्य-
भिचारात् । किञ्च, अमी विशेषाः सामान्याद् भिन्ना अभिन्ना वा ? भिन्नाश्चेद् मण्डूकजटा-
भारानुकाराः । अभिन्नाश्चेत् तदेव तत्स्वरूपवत् । इति सामान्यैकान्तवादः ॥
पर्यायनयान्वयिनस्तु भाषन्ते । विविक्ताः क्षणक्षयिणो विशेषा एव परमार्थः । ततो
विष्वग्भूतस्य सामान्यस्याप्रतीयमानत्वात् । न हि गवादिव्यक्त्यनुभवकाले वर्णसंस्थानात्मकं
व्यक्तिरूपमपहाय, अन्यत्किञ्चिदेकमनुयायि प्रत्यक्षे प्रतिभासते । तादृशस्यानुभवाभावात् ।
तथा च पठन्ति—
“एतासु पञ्चस्ववभासनीषु प्रत्यक्षबोधे स्फुटमङ्गुलीषु ।
साधारणं रूपमवेक्षते यः शृङ्गं शिरस्यात्मन ईक्षते सः”१ ॥
एकाकारपरामर्शप्रत्ययस्तु स्वहेतुदत्तशक्तिभ्यो व्यक्तिभ्य एवोत्पद्यते । इति न तेन सामान्य-
साधनं न्याय्यम् ॥
किञ्च, यदिदं सामान्यं परिकल्प्यते तदेकमनेकं वा ? एकमपि सर्वगतमसर्वगतं वा ?
सर्वगतं चेत्, किं न व्यक्त्यन्तरालेषूपलभ्यते । सर्वगतैकत्वाभ्युपगमे च तस्य यथा गोत्व-
उन पदार्थोंको सामान्य ही कहना चाहिये । तथा, विशेषोंके द्वारा की हुई व्यावृत्ति सब विशेषोंमें एक ही
व्यावृत्ति होती है, अथवा सबमें अलग-अलग ? यदि व्यावृत्ति अनेक हैं, तो व्यावृत्तिको भी विशेष मानना
चाहिये, क्योंकि अनेक रूपको ही विशेष कहते हैं । अतएव व्यावृत्तिके विशेष सिद्ध होने पर व्यावृत्तिमें
भी व्यावृत्ति होनी चाहिये, क्योंकि विशेषकी व्यावृत्तिके साथ अन्यथानुपपत्ति है । तथा, व्यावृत्तिमें व्यावृत्ति
माननेपर, व्यावृत्ति व्यावृत्ति रूप सिद्ध नहीं हो सकती, अतएव विशेषोंका अभाव मानना होगा, और इस
प्रकारकी व्यावृत्ति प्रतिषिद्ध है । तथा, एक व्यावृत्तिमें अनेक व्यावृत्ति माननेसे अनवस्था दोष आता है । यदि
सब विशेषोंमें एक ही व्यावृत्ति स्वीकार करो, तो उसे सामान्य ही मानना चाहिये; क्योंकि अनुवृत्ति प्रत्ययसे
विरोध नहीं आता । तथा, ये विशेष सामान्यसे भिन्न हैं, या अभिन्न ? विशेषोंको सामान्यसे भिन्न मानना
मण्डूकके जटाभारका ही अनुकरण करना है । यदि विशेष सामान्यसे अभिन्न हैं, तो उन्हें सामान्य ही कहना
होगा । अतएव सामान्य एकान्त वाद मानना ही उचित है ।
(२) पर्यायास्तिक नयको स्वीकार करने वाले बौद्ध : भिन्न और क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले विशेष
ही तत्त्व हैं, क्योंकि विशेषको छोड़ कर सामान्य कोई अलग वस्तु नहीं है । गौको जानते समय हमें गौके
वर्ण, आकार आदिके विशेष ज्ञानको छोड़ कर गौका केवल सामान्य ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि विशेष
ज्ञानको छोड़ कर किसी पदार्थका सामान्य ज्ञान हमारे अनुभवके बाह्य है। कहा भी है—
“जो पुरुष प्रत्यक्षसे स्पष्ट अलग-अलग दिखाई देनेवाली पाँच उँगलियोंमें केवल सामान्य रूपको
देखता है, वह पुरुष अपने सिरपर सींग ही देखता है, अतएव पदार्थोंके विशेष ज्ञानको छोड़ कर पदार्थोंका
केवल सामान्य ज्ञान होना असम्भव है ।”
तथा, एकरूप ज्ञान अपने कारणोंसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्तियोंसे ही उत्पन्न होता है । अतएव सामान्य
की सिद्धि न्यायसंगत नहीं ।
तथा, सामान्य एक है, या अनेक ? यदि सामान्य एक है तो वह व्यापक है, या अव्यापक ? यदि
सामान्य व्यापक है, तो वह दो व्यक्तियों ( गौओं ) के बीचमें क्यों नहीं रहता ? तथा, सामान्यको सर्वगत
१. अशोकविरचितसामान्यदूषणदिक्ग्रन्थे ।