सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
उद्धव संदेश ३२५
जुवारी की तरह अन्यत्र नही देखती हैं। उनके बाल छूट कर (बिखर) गये है शरीर
हिम से आहत कमलिनी की तरह कुम्हला गया है। कृष्ण के संदेश को सुनकर वह
सहज ही मृतक (तुल्य) हो गयी क्योंकि एक तो वह विरहिणी थी तथा दूसरे भ्रमर
(उद्धव के) द्वारा जला दी गयी। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि दुखी ब्रज
बनितायें कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहें ॥१५८॥
ऊधौ तिहारे पा लागति हौँ, बहुरिहुँ इहिँ ब्रज करबी भाँवरी ।
निसि न नीँद भोजन नहिं भावै, चितवत मग भइ दृष्टि झाँवरी ।
वहै वृन्दावन, वहै कुंज-घन, वहै जमुना, वहै सुभग साँवरी ।
एक स्याम बिनु कछू न भावै, रटति फिरतिँ ज्यौँ बकति बावरी ।
चलि न सकति मग डुलत धरत-पग, आवति बैठत उठत ताँवरी ।
सूरदास-प्रभु आनि मिलावहु, जग मैँ कीरति होइ रावरी ॥१५६॥
अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैर लगती हूँ, पुनः (कृष्ण का समाचार लेकर) इस ब्रज
मे चक्कर लगाइएगा क्योकि उनके बिना रात मे नीद नही आती, खाना अच्छा नही
लगता; रास्ता निहारते दृष्टि झुलस गयी। वही वृन्दावन है, वही घना कुंज, वही
यमुना तथा वही सुन्दर राधा है किन्तु कृष्ण के बिना कुछ भी अच्छा नही लगता।
बावली की तरह (कृष्ण का नाम) रटती फिरती हूँ। रास्ता नही चल पाती, कदम
रखते पैर हिलता है। उठते बैठते चक्कर आता है। सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती
है) उद्धव कृष्ण को लाकर मिला दो, संसार मे तुम्हारा यश होगा ॥१५६॥
पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश
अब अति चकितवंत मन मेरौ ।
आयौ हौँ निरगुन उपदेसन, भयौ सगुन कौ चेरौ ।
जो मैँ ज्ञान कह्यौ गीता कौ, तुमहिँ न परस्यौ नेरौ ।
अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि केरौ ।
निज जन जानि मानि जतननि तुम, कीन्हौ नेह घनेरौ ।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जोग कौ बेरौ ॥१६०॥
अर्थ—अब मेरा मन अत्यधिक चकितवान् हो गया। निर्गुण का उपदेश देने
आये थे किन्तु सगुण के सेवक हो गये। मैंने गीता का जो ज्ञान कहा उसने तुम्हे निकट
से स्पर्श नही किया। कृष्ण के दूत होते हुए अत्यधिक अज्ञान के कारण मुझसे कुछ
कहते नही बनता ! अपना आदमी (स्वजन) जानकर तथा सयत्न आदर देकर तुम
लोगो ने घना स्नेह किया। सूरदास कहते हैं कि योग का वेड़ा डुबाकर उद्धव मधुपुरी
के लिए रवाना हुए ॥१६०॥
ऊधौ पा लागति हौँ कहियौ, स्यामहिँ इतनी बात ।
इतनी दूर बसत क्यौँ बिसरे, अपने जननी-तात ।
३२६ सूरसागर सार सटीक
जा दिन तैँ मधुपुरी सिधारे, स्याम मनोहर गात ।
ता दिन तैँ मेरे नैन पपीहा, दरस प्यास अकुलात ।
जहं खेलन के ठौर तुम्हारे, नन्द देखि मुरझात ।
जौ कबहुँ उठि जात खरिक लौं, गाइ दुहावन प्रात ।
दुहत देखि औरनि के लरिका, प्रान निकसि नहिं जात ।
सूरदास बहुरो कब देखौँ, कोमल कर दधि-खात ॥१६१॥
अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैरों पर पडती हूँ कृष्ण से इतनी बात कहना । इतनी
(ही) दूर पर रहते हुए अपने माता-पिता को क्यो भुला दिया । जिस दिन से साँवले
मनोहर शरीर वाले कृष्ण ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया उसी दिन से मेरे नेत्र रूपी
पपीहा दर्शन की प्यास से अकुलाते है । तुम्हारे खेलने के जो स्थान हैं उन्हे देखकर
नंद मुरझाते हैं । जब कभी उठकर प्रातः बाडे मे गाय दुहाने जाती हूँ तब दूसरो के
लडको को गाय दुहाते हुए देखकर (सोचती हैं कि) मेरे प्राण निकल क्यो नही जाते ।
सूरदास कहते है (यशोदा कहती है) कोमल हाथो से दही खाते हुए फिर कब
देखूंगी ॥१६१॥
तब तुम मेरैं काहे कौं आए ।
मथुरा क्यों न रहे जदुनंदन, जौ पै कान्ह देवकी जाए ।
दूध, दही काहे कौं चोरयौ, काहे कौं बन बच्छ चराए ।
अघ अरिष्ट, काली फनि काढ़यौ, बिष जलतैं सब सखा जिवाए ।
पय पीवत हरे प्रान पूतना, सदा किए जसुमति के भाए ।
सूरदास लोगनि के भुरएं, काहैं कान्ह, अब होत पराए ॥१६२॥
अर्थ—तब तुम मेरे यहाँ क्यो आये । यदि तुम देवकी से उत्पन्न हुए (पुत्र) थे
तो मथुरा ही मे क्यों नही रहे । (तुमने) दूध दही क्यों चुराया तथा वन मे बछड़ों को
क्यो चराया । तुमने क्यो अघासुर, अरिष्ट और काली सर्प को निकालकर विषाक्त
जल से सखाओ को जिलाया । दूध पीते हुए पूतना के प्राणो को हर लिया तथा सदैव
यशोदा को भाने वाले (अभीष्ट) कार्यों को किया । सूरदास कहते हैं कि (यशोदा
कहती है) लोगो के बहकाने से कृष्ण अब क्यों पराये हो रहे हो ॥१६२॥
(मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै ।
बिडरी जातिं काहु नहिं मानतिं, नँकु मुरलि की टेर दै ।
धौरी, धूमरि, पीरी, काजरि, बन-बन फिरती पीय ।
अपनी जानि कै आनि संभारहु, धरौ चेत अब जीय ।
तुम हौ जग जीवनि प्रतिपालक, निठुराई नहिं कीजै ।
ग्वालऽरु बाल बच्छ गो बिलखत, सूर सु दरसन दीजै ॥१६३॥
अर्थ—मोहन अपनी गायो को घेर (एकत्रित कर) लो । सब बिखरी जा रही
हैं कोई मानती नही, जरा मुरली की आवाज (टेर) तो करो । प्रिय कृष्ण धवली,
उद्धव संदेश ३२७
घुमली, पीली, काली गाये वन-वन घूमती हैं । अब अपनी समझ कर आकर सम्हालो
तथा मन में चेतनता (जिम्मेदारी) धारण करो । तुम जग के जीवों के प्रतिपालक हो
निष्ठुरता मत कीजिये । ग्वाल-बाल, बछड़े तथा गाये बिलखती हैं । सूरदास कहते हैं
(यशोदा कहती है) कृष्ण उन्हे दर्शन दीजिए ।।१६३।।
तब तैं छीन सरीर सुबाहु ।
आधी भोजन सुबल करत हैं, सब ग्वालनि उर दाहु ।
नंद गोप पिछवारे डोलत, नैननि नीर प्रवाहु ।
आनंद मिट्यौ मिटी सब लीला, काहू मन न उछाहू ।
एक बेर बहुरौ ब्रज आवहु, दूध पतूखी खाहु ।
सूर सपथ गोकुल जौ पैठहु, उलटि मधुपुरी जाहु ॥१६४॥
अर्थ-तब से सुबाहु (नाम के तुम्हारे मित्र) का शरीर क्षीण हो रहा है ।
सुवल (नामक मित्र भी) आधा (पेट) भोजन करता है (इस तरह) सभी ग्वालों के
हृदय मे पीड़ा (जलन) है। नंद तथा गोप नैनो से आंसू का प्रवाह लिये पिछवाड़े घूमते
रहते हैं (तुम्हारे चले जाने से) सारा आनन्द तथा समस्त लीला मिट गयी, किसी के
भी मन मे उत्साह नही है । एक बार फिर ब्रज आओ तथा पत्ते के दोने मे दूध पियो ।
सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि सौगन्ध है जब कि तुम्हे गोकुल मे अधिक देर
तक पैठना (रुकना) पड़े (शीघ्र ही) लौटकर मधुपुरी चले जाना ॥१६४॥
कहियौ जसुमति की आसीस ।
जहाँ रहौ तहँ नंद लाड़िलौ, जीवौ कोटि बरीस ।
मुरली दई दोहनी घृत भरि, ऊधौ धरि लइ सीस ।
यह तौ घृत उनही सुरभिनि कौ, जे प्यारी जगदीस ।
ऊधौ चलत सखा मिलि आए, ग्वाल बाल दस-दीस ।
अबकैं यह ब्रज फेरि बसावहु, सूरदास के ईस ।।१६५।।
अर्थ-यशोदा का आशीर्वाद कहियेगा । नंद के प्यारे (कृष्ण) जहां (भी) रहे
वही हजारो वर्ष तक जीवित रहें। मुरली तथा दोहनी भर कर घृत दिया और ऊधो
ने सिर पर रख लिया । यह घृत उन्ही गायो का है जो कृष्ण को प्रिय थी । ऊधो के
चलते हुए दशों दिशाओ से ग्वाल तथा सखा मिलने आये । (यशोदा कहती है) कृष्ण
एक बार इस ब्रज को फिर से बसाओ ।।१६५।।
उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवाद
ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ ।
तबकी कथा कृपा करि कहियै, हम सुनिहैं मन लाइ ।
बावा नंद, जसोदा मैया, मिले कौन हित आइ ?
कबहुँ सुरति करत माखन की, किधौं रहे बिसराइ ।
३२८ सूरसागर सार सटीक
गोप सखा दधि-भात खात वन, अरु चाखते चखाइ ।
गऊ बच्छ मुरली सुनि उमड़त, अब जु रहत किहिँ भाड़ ।
गोपिन गृह व्यवहार बिसारे, मुख सन्मुख मुख पाइ ।
पलट ओट निमि पर अनखातीँ, यह दुख कहाँ समाइ ।
एक सखी उनमैं जो राधा, लेति मनहिँ जु चुराइ ।
सूर स्याम यह बार बार कहि, मनहीँ मन पछिताइ ॥१५६६॥
अर्थ—उद्धव जब ब्रज जा पहुँचे (तब कृष्ण ने कहा) तब की (गोकुल पहुँचने
की) कथा कृपा करके कहिये हम मन लगाकर सुनेंगे । बाबा नंद तथा यशोदा माता
किस तरह (कितने स्नेह से) आकर मिले । कभी माखन का स्मरण करते है कि भुला
दिये । गोप मित्र वन में दही-चावल खाते थे तथा चखाकर चखते थे । गाय तथा बछड़े
मुरली (की ध्वनि) सुनकर उमड़ते थे अब किस तरह रहते हैं । मुख के सामने (दर्शन)
सम्मुख सुख पाकर गोपियाँ घर के व्यवहार को भुला देती थी । क्षण भर के लिए पलक
की ओट होने पर दुःखी होती थी अब यह दुख उनसे कैसे सहा जाता है । उनमें राधा
नाम की जो एक सखी है जो मन को चुरा लेती थी (उसकी क्या दशा है) । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण बार-बार यह कहकर मन-ही-मन पछताते हैं ॥१५६६॥
जब मैं इहाँ तैं जु गयौ ।
तब ब्रजराज सकल गोपी जन, आगैं होइ लयौ ।
उतरे जाइ नंद बाबा कैँ, सबहीँ सोध लह्यौ ।
मेरी सौं मोसौँ साँची कहि, मैया कहा कह्यौ ?
वारंबार कुसल पूछी मोहिं, लै लै तुम्हरी नाम ।
ज्यौं जल तृषा बढ़ी चातक चित, कृष्ण-कृष्ण बलराम ।
सुन्दर परम विचित्र मनोहर, यह मुरली दै घाली ।
लई उठाइ सुख मानि सूर प्रभु, प्रीति आनि उर साली ॥१५६७॥
अर्थ —(उद्धव उत्तर देते हैं) जब मैं यहाँ से गया तब ब्रजराज (नंद) तथा समस्त
गोपीजन आगे हो लिये । (हम) नंद बाबा (के घर जाकर) उतरे तथा सभी बातों को
समझा (कृष्ण कहते हैं कि) मेरी सौगंध मुझसे सच कहो, माता ने क्या कहा । (उद्धव
कहते हैं) (माता ने) तुम्हारा नाम ले लेकर बार-बार मुझसे कुशल पूछा । जैसे पपीहे
के मन में जल की तृष्णा होती है वैसे कृष्ण-कृष्ण तथा बलराम (रटती रहती हैं)
उन्होंने परम सुन्दर तथा विचित्र मनोहर मुरली दी है । सूरदास कहते हैं (कि कृष्ण ने)
सुख मानकर मुरली उठा ली उनके मन में प्रेम की भावना (चुभ) गयी ॥१५६७॥
सुनियै ब्रज की दसा गुसांईँ ।
रथ की धुजा पीत-पट भूषन, देखत ही उठि धाईँ ।
जो तुम कही जोग की बातैं, सो हम सबै बताईँ ।
श्रवन मूंदि गुन-कर्म तुम्हारे, प्रेम मगन मन गाईँ ।
उद्धव संदेश ३२८
औरौ कछू सँदेस सखी इक, कहत दूरि लौं आई।
हुतौ कछू हमहूँ सौं नातौ, निपट कहा बिसराई।
सूरदास प्रभु बन विनोद करि, जे तुम गाइ चराई।
तें गाई अब ग्वाल न घेरत्त, मानौ भईँ पराई ॥१६८॥
अर्थ—गोस्वामी ब्रज की दशा सुनिये। (गोपियां) रथ की ध्वजा तथा पीला
वस्त्र और भूषण देखकर उठकर दौड़ पड़ी। जो तुमने योग की बाते कही थी उन
सबको हमने बताया। (उन्होने) कान मूंदकर मन को मग्न करके तुम्हारे गुण और
कर्म का गान किया। एक सखी कुछ दूसरा ही संदेश कहते हुए दूर तक चली आई
और कहा हमसे भी कुछ नाता था लेकिन हमें बिलकुल ही कैसे भुला दिया। सूरदास
कहते हैं (ऊधो कहते हैं) वन मे विनोद करके तुमने जिन गायो को चराया था उन
गायो को ग्वाल नही घेरते मानो वे पराई हो गई है ॥१६८॥
ब्रज के बिरही लोग दुखारे।
बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुर्बल तन कारे।
नंद जसोदा मारग जोवति, निसि-दिन साँझ सकारे।
चहुँ-दिसि कान्ह-कान्ह कहि टेरत, अँसुवन बहत पनारे।
गोपी, ग्वाल, गाइ, गो सुत सब, अतिहीँ दीन बिचारे।
सूरदास-प्रभु बिनु यौँ देखियत, चंद बिना ज्यौँ तारे ॥१६६॥
अर्थ—ब्रज के विरही लोग दुखित हैं। बिना गोपाल के सब ठगे से खड़े रहे
तथा वे शरीर से अत्यन्त दुर्बल तथा काले हो गये हैं। रात-दिन संध्या सबेरे नन्द और
यशोदा मार्ग देखते है। चारों दिशाओं मे कान्ह-कान्ह कहकर पुकारती है तथा आंसुओ
से परनाले बहते है। गोपी, ग्वाल, गाय तथा बछड़े (आदि) बेचारे अत्यन्त दीन हैं।
सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के बिना वे वैसे ही हैं जैसे तारो के बिना चन्द्रमा ॥१६६॥
सुनहु स्याम वै सब ब्रज-बनिता, बिरह तुम्हारैं भईं बावरी।
नाहीं बात और कहि आवति, छाँड़ि जहाँ लगि कथा रावरी।
कबहूँ कहतिँ हरि माखन खायौ, कौन बसै या कठिन गाँव री।
कबहूँ कहतिँ हरि ऊखल बाँधे, घर-घर ते लै चलौ दाँवरी।
कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ बन गए, जोवत-मग भई दृष्टि झाँवरी।
कबहूँ कहतिँ वा मुरली महियाँ, लै-लै बोलत हमरौ नाँवरी।
कबहूँ कहतिँ ब्रजनाथ साथ तैं, चंद उयौ है इहै ठाँवरी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, अब वह मूरति भई साँवरी ॥१७०॥
अर्थ—कृष्ण सुनो ब्रज की वे सब स्त्रियां तुम्हारे विरह से बावली हो गयी है।
आपकी कथा छोडकर उन्हें कोई और बात नही सूझती। कभी कहती है कृष्ण मक्खन
खा गये, इस कठिन गाँव मे कौन बसे। कभी कहती हैं कृष्ण ऊखल में बाँधे गये थे
घर-घर से दाँवरी ले चलो। कभी कहती हैं कि कृष्ण वन गये, रास्ता जोहते दृष्टि
३३० सूरसागर सार सटीक
झुलस गयी । कभी कहती हैं उस मुरली में हमारा नाम ले लेकर पुकारते है । कभी
कहती हैं ब्रजनाथ के साथ चन्द्रमा इस स्थान पर उदित होता है । सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के बिना, अब वह (राधा) साँवली मूर्ति जैसी
हो गयी है ॥१७०॥
फिरि ब्रज बसौ नंदकुमार ।
हरि तिहारे बिरह राधा, भई तन जरि छार ।
बिनु अभूषन मैं जु देखी, परी है विकरार ।
एकई रट रटत भामिनि, पीव पीव पुकार ।
सजल लोचन चुअत उनकैँ, बहति जमुना धार ।
विरह अगिनि प्रचंड उनकैँ, जरे हाथ लुंहार ।
दूसरी गति और नाहीँ, रटति बारंबार ।
सूर प्रभु कौ नाम उनकैँ, लकुट अंध अधार ॥१७१॥
अर्थ- नन्द कुमार ब्रज मे फिर से बसो । कृष्ण, तुम्हारे विरह मे राधा जलकर
राख हो गयी । मैंने उन्हे बिना आभूषण के देखा है वह व्याकुल पडी है (उस) स्त्री
को एक ही रट लगी रहती है तथा पीव-पीव पुकारती है । उनके सजल नेत्रो से आंसू
चूता है जो कि यमुना की (धारा के समान बहती है) विरह की प्रचंड अग्नि लोहार
के हाथ पड़ी (लौह सामग्री की तरह) जलती है । उसकी ओर कोई दूसरी गति नही
है । वह बार-बार (कृष्ण का नाम) रटती है । सूरदास कहते है (गोपियों ने कहा है)
कि कृष्ण स्वामी हैं तथा उनकी लकुटी अन्धों का आधार है ॥१७१॥
ब्रज तैँ द्वै रितु पै न गई ।
ग्रीषम अरु पावस प्रवीन हरि, तुम बिनु अधिक भई ।
ऊर्ध उसास समीर नैन घन, सब जल जोग जुरे ।
बरषि प्रगट-कीन्हे दुख दादुर, हुते जो दूरि दुरे ।
बिषम बियोग जु बृष दिनकर सम, हित अति उदौ करै ।
हरि-पद बिमुख भए सुनि सूरज, को तन ताप हरै ॥१७२॥
अर्थ—ब्रज से दो ऋतुये नही गयी । हे चतुर कृष्ण तुम्हारे विना ग्रीष्म ओर
वर्षा (की ऋतुये) संवर्धित (अधिक टिकाऊ) हो गयी हैं । ऊर्ध्व उच्छवास ही पवन
है तथा नेत्र बादल है । जल की वर्षा के लिए सभी योग एकत्रित हो गये हैं । बरसकर
(इसने) दुख रूपी मेढक को पैदा कर दिया जो कि दूर छिपे हुये थे । विषम वियोग
जो ग्रीष्म ऋतु के वृष नक्षत्र के सूर्य के समान है । हृदय मे उदित कर दिया । सूरदास
कहते है (ऊधो कहते है कि गोपियो ने कहा है) कृष्ण चरण विमुख हो गये हैं शरीर
के ताप को कौन हरे ॥१७२॥
दिन दस घोष चलहु गोपाल ।
गाइनिकी अवसेरि मिटावहु, मिलहु आपने ग्वाल ।
नाचत नहीं मोर ता-दिन तैं, रटत न बरखा-काल ।
मृग दुबरे तुम्हरे दरसन बिनु, सुनत न बेनु रसाल ।
वृन्दावन हरयौ होत न भावत, देख्यौ स्याम तमाल ।
सूरदास मैया अनाथ है, घर चलियै नँदलाल ॥१७३॥
अर्थ—कृष्ण दस दिन के लिए गाँव चलो। गायों की बेचैनी मिटाओ तथा
(साथी) ग्वालों से मिलो। (जिस दिन से आप आये) उसकी दिन से मोर नही नाचते
हैं। तथा वर्षा की ऋतु के लिए रट नही लगाते। तुम्हारे दर्शन के बिना हिरन दुर्बल
हो गये हैं तथा रसयुक्त बंशी नही सुनते। वृन्दावन को हरा होना नही भाता मैने
श्यामल तमाल वृक्षो को देखा। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) माता यशोदा अनाथ
हैं इसलिए हे नन्द लाल घर चलिए ॥१७३॥
ऊधौ भलौ ज्ञान समुझायौ ।
तुम मोसौँ अब कहा कहत हौ, मैं कहि कहा पठायौ ।
कहवावत हौ बड़े चतुर पै, उहाँ न कछु कहि आयौ ।
सूरदास ब्रजबासिन कौ हित, हरि हिय माहँ दुरायौ ॥१७४॥
अर्थ—उद्धव, तुमने अच्छा ज्ञान सिखाया। तुम मुझसे क्या कहते हो और मैंने
तुम्हे क्या कहकर भेजा था। तुम बहुत चतुर कहलाते हो लेकिन वहाँ कुछ कहते नही
बना। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं) ब्रजवासियो के लिए (तुमने) कृष्ण को हृदय
में छिपा लिया ॥१७४॥
मैं समुझाई अति अपनौ सौ ।
तदपि उन्हैँ परतीति न उपजी, सबै लख्यौ सपनौ सौ ।
कही तुम्हारी सबै कही मैं, और कही कछु अपनी ।
स्रवननि बचन सुनत भइ उनकैँ, ज्यौँ घृत नाएँ अगनी ।
कोऊ कही बनाइ पचासक, उनकी बात जु एक ।
धन्य-धन्य ब्रजनारि बापुरी, जिनकी और न टेक ।
देखत उमग्यौ प्रेम इहाँ कौ, धरै रहे सब ऊली ।
सूर स्याम हौं रह्यौ थक्यौ सौ, ज्यौँ मृग चौका भूली ॥१७५॥
अर्थ—मैंने अपना जैसा उन्हे खूब समझाया तिस पर भी उनमे विश्वास नही
उत्पन्न हुआ। (उन्होंने) सब कुछ स्वप्न के समान देखा। तुम्हारे समस्त कथन को
कहा तथा कुछ अपना भी कहा। कानों से वचन सुनते ही उनकी (क्रोधाग्नि या
विरहाग्नि) वैसी ही हो गयी जैसे अग्नि में घी डाला जाय । कोई पचास बात बना
कर कहो लेकिन उनकी टेक केवल एक बात पर है। बेचारी ब्रज की स्त्रियां धन्य-
धन्य हैं जिनकी (कृष्ण के सिवाय) कोई और टेक नही है। देखते ही यहां का प्रेम
उमग गया किन्तु उमंग को धारण किये रही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) मैं
तो चकित सा खड़ा रहा जैसे मृग चौकड़ी भूल गया हो ॥१७५॥
३३२ सूरसागर सार सटीक
बातैं सुनहु तौ स्याम सुनाऊँ ।
जुवतिनि सौं कहि कथा जोग की, क्यों न इती दुख पाऊँ ।
हौं पचि एक कहौं निरगुन की, ताहू मैं अटकाऊँ ।
वै उमडैं बारिधि के जल ज्यौं, क्यों हूँ थाह न पाऊँ ।
कौन कौन कौ उत्तर दीजै, तातैं भज्यौ अगाऊँ ।
वै मेरे सिर पटिया पारैं, कंथा काहि उढ़ाऊँ ।
एक अँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ ।
सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारहखरी पढ़ाऊँ ॥१७६॥
अर्थ-कृष्ण (यदि) बाते सुनो तो सुनाऊँ । युवतियों से योग की कथा कहकर
क्यो न इतना दुख पाऊँ । मै फिर निर्गुण की एक कथा कहता तो उसी मे उलझ
जाता । वे (गोपियाँ) समुद्र के जल की तरह उमडती हैं, उसका थाह कैसे पा सकता
हूँ। किसके-किसके (प्रश्न का) उत्तर देता इसीलिए आगे ही भाग आया । वे (गोपियाँ)
मेरे सिर मे पाटी (मांग) काढती है कंथा किसको उढाया जाय (मेरी तो वहां वैसी
स्थिति थी) जैसे कोई एक तो अन्धा हो दूसरे हृदय की आंखे फूट गई हो तीसरे वह
खड़ाऊँ पहन कर दौडे । सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) वे गोपियां छहों दर्शन मे
पारंगत हैं मैं उन्हे बारह खडी (कैसे) पढाऊँ ॥१७६॥
कहिबे मैं न कछू सक राखी ।
बुद्धि बिबेक अनुमान अपनैं, मुख आई सो भाषौ ।
हौं मरि एक कहौं पहरक मैं, वै पल माहिं अनेक ।
हारि मानि उठि चल्यौ दीन ह्वै, छाँड़ि अपनी टेक ।
हौं पठयौ कतहूँ बे काजैं, सठ मूरख जु अयानौं ।
तुमहिं बूझ बहुतै बातनि की, उहाँ जाहु तौ जानौं ।
श्री मुख के सिखए ग्रंथादिक, ते सब भए कहानी ।
एक होइ तौ उत्तर दीजै, सूर सु मठी उफानी ॥१७७॥
अर्थ--कहने मे मैंने कुछ भी बाकी नहीं रखा । अपने बुद्धि, विवेक तथा अनु-
मान से जो कुछ आया मैंने कहा । मै (जर) मर कर एक प्रहर मे एक कहता लेकिन
वे एक पल में अनेक कहती थी । (अन्ततः) हार मानकर अपनी टेक छोड़कर दीन
होकर चल पड़े । शठ, मूर्ख, अज्ञानी हमको बिना कार्य के वहां भेज दिया । तुम्हे
बहुत बातों का ज्ञान (बूझ) है, किन्तु वहां जाओ तो समझे (कि तुम बुद्धिमान हो)
श्री मुख आपके द्वारा ग्रंथादि की बताई बाते सब कहानी मात्र रह गयी। एक होती
तो उत्तर भी देता वे एक समूह (मूठी) के रूप मे उमड़ पढी ॥१७७॥
कोऊ सुनत न बात हमारी ।
मानैं कहा जोग जादवपति, प्रगट प्रेम ब्रजनारी ।
उद्धव संदेश ३३३
कोऊ कहतिँ हरि गए कुंज बन, सैन धाम वै देत ।
कोऊ कहतिँ इन्द्र वरषा तकि, गिरि गोबर्धन लेत ।
कोऊ कहतिँ नाग काली सुनि, हरि गए जमुना तीर ।
कोऊ कहतिँ अघासुर मारन, गए संग बलबीर ।
कोऊ कहतिँ ग्वाल बालनि सँग, खेलत बनहिँ लुकाने ।
सूर सुमिरि गुन नाथ तुम्हारे, कोऊ कह्यौ न माने ॥१७८॥
अर्थ-कोई हमारी बात नही सुनती । हे यादव पति वे योग को क्यो मान्यता
दे क्योकि (कृष्ण) से ब्रजनारिगो का प्रत्यक्ष (स्पष्ट) प्रेम है। कोई कहती हैं कि कृष्ण
जंगल गये हैं, और घर से इशारा करते हैं। कोई कहती है कि इन्द्र की वर्षा को देख
कर गोवर्धन पर्वत को लेते हैं। कोई कहती है काली नाग (की पुकार) सुनकर कृष्ण
यमुना के तट पर गये हैं। कोई कहती हैं अघासुर को मारने के लिए बलराम के साथ गये
हैं। कोई कहती हैं कि ग्वाल बालो के साथ वन मे छिपकर खेलते है। सूरदास कहते है
(ऊधो कहते हैं) तुम्हारे गुणों का स्मरण करके कोई कहना नही मानती ॥१७८॥
माधौ जू कहा कहौँ उनकी गति ।
देखत बनै कहत नहिँ आवै, अति प्रतीति तुम तैँ रति ।
जद्यपि हौँ षट मास रह्यो ढिग, लही नहीं उनकी मति ।
तासौँ कहौँ सबै एकै बुधि, परमोदी नहिँ मानति ।
तुम कृपालु करुनामय कहियत, तातैँ मिलत कहा छति ।
सूरदास प्रभु सोई कीजै, जातैँ तुम पावहु पति ॥१७९॥
अर्थ-कृष्ण उनकी गति कैसे कहूँ। देखते बनता है किन्तु कहते नही बनता
उनका तुममें अत्यधिक विश्वास और प्रेम है। यद्यपि मैं छह महीना आपके पास रहा
लेकिन उन जैसी बुद्धि प्राप्त नही की। इसी से कहता हूँ कि वे सभी एक जैसी बुद्धि
वाली हैं समझाने पर मानती नही। तुम कृपाल तथा करुणामय कहलाते हो इसलिए
उनसे मिलने मे कोई हानि नही। सूरदास कहते हैं (ऊधो कहते हैं) कृष्ण आप वही
कीजिए जिससे आपको प्रतिष्ठा मिले ॥१७९॥
ब्रज मैँ एकै धरम रह्यौ ।
श्रुति सुसृति औ बेद पुराननि, सबै गोविंद कह्यौ ।
बालक वृद्ध तरुन अबलनि की, एक प्रेम निबह्यौ ।
सूरदास प्रभु छाँड़ि जमुन जल, हरि की सरन गह्यौ ।१८०॥
अर्थ-ब्रज मे एक ही धर्म व्याप्त था। श्रुति, स्मृति, वेद, पुराण सभी (उनके
लिए) गोविंद की ही बात कहते । बालक, वृद्ध, तरुण तथा अबलाओ के एक प्रेम का
एक समान निर्वाह हो रहा है। सूरदास कहते है (उद्धव कहते हैं) वे लोग यमुना जल
छोडकर कृष्ण की शरण को ग्रहण किए है ॥१८०॥
३३४ सूरसागर सार सटीक
तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ।
जब तैं हरि संदेस तुम्हारौ, सुनत ताँवरौ आयौ।
फूले ब्याल दुरे ते प्रगटे, पवन पेट भरि खायौ।
खोले मृगनि चौक चरननि के, हुतौ जु जिय बिसरायौ।
ऊँचे बैठि बिहंग सभा मैं, सुक बनराइ कहायौ।
किलकि-किलकि कुल सहित आपनैं, कोकिल मंगल गायौ।
निकसि कंदराहु तैं केहरि, पूँछ मूँड़ पर ल्यायौ।
गहवर तैं गजराज आइकै, अंगहिँ गर्व बढ़ायौ।
अब जनि गहरु करहु हो मोहन, जौ चाहत हौ ज्यायौ।
सूर बहुरि ह्वैहै राधा कौं, सब बैरिनि कौ भायौ ॥१८१॥
अर्थ—जब से कृष्ण (उन्होने) तुम्हारा संदेश (सुना) सुनते ही मूर्छा आ गई
तब से इन सबों ने सन्तोष पाया। (राधा के अंग के सभी उपमानो को सुख प्राप्त
हुआ) सर्प प्रफुल्लित होकर छिपाव से प्रकट हो गये तथा पेट भर कर पवन का भक्षण
किया। मृगों ने चरणों की चौकड़ी जिसे भूल बैठे थे, शुरू कर दी। पक्षियो की सभा
मे ऊँचे बैठा तोता वनराज कहलाया। अपने परिवार के साथ किलक-किलक कर
कोयल ने मंगल गाया। कन्दरा से सिंह भी निकलकर पूँछ को सिर पर लगाने लगा।
गह्वर से हाथी ने भी आकर अपने शरीर मे गर्व को बढ़ा लिया। अब यदि जिलाना
चाहते हो तो कृष्ण देर मत करो नही तो फिर राधा की (वही दशा) होगी जैसा
सभी वैरियो को इच्छित है ॥१८१॥
माधौ जू मैं अतिही सचु पायौ।
अपनौ जानि संदेस ब्याज करि, ब्रज जन मिलन पठायौ।
छमा करौ तौ करौं बीनती, उनहिँ देखि जौ आयौ।
श्रीमुख ग्यान पंथ जौ उचरचौ, सो पै कछु न सुहायौ।
सकल निगम सिद्धांत जन्म क्रम, स्यामा सहज सुनायौ।
नहिं श्रुति, सेष, महेस प्रजापति, जो रस गोपिनि गायौ।
कटुक-कथा लागी मोहिँ मेरी, वह रस सिंधु उम्हायौ।
उत तुम देखे और भाँति मैं, सकल तृषा जु बुझायौ।
तुम्हरी अकथ कथा तुम जानी, हम जन नाहिं बसायौ।
सूर स्याम सुन्दर यह सुनि कै, नैननि नीर बहायौ ॥१८२॥
अर्थ—माधव (कृष्ण) मैंने जो अत्यधिक सुख पाया (उसका कारण) आपने अपने
माध्यम से सदेश के बहाने ब्रज के लोगों से मिलने भेजा था। क्षमा करो तो (वह
सब) निवेदन करूँ जिसे ब्रज मे देख आया हूँ। श्री मुख (आपने जो ज्ञान सिखाया
था) उस ज्ञान पथ का उच्चारण किया लेकिन वह उन्हे अच्छा नही लगा। जन्मान्तरों
के कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले समस्त वेदो के सिद्धांत (प्रेम और भक्ति) को राधा ने
उद्धव संदेश ३३५
सहज भाव से सुना दिया । किन्तु जिस रस का गान गोपियो ने किया उसे श्रुति, शेष,
महेश, ब्रह्मा आदि किसी ने नही गाया । मुझे ही मेरी कथा कटु लगी । वहाँ रस की
सिंधु में नहा लिया । वहाँ मैने तुम्हें और ही तरह देखा तथा अपनी समस्त प्यास बुझा
ली । तुम्हारी अकथ कथा तुम्हारे द्वारा ही जानी जा सकती है हम लोगो के बस की
नही है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह सब सुनकर आंखों से आंसू बहा दिये ॥१८२॥
ब्रज मैंँ संभ्रम मोहिँ भयौ ।
तुम्हरो ज्ञान सँदेसौ प्रभु जू, सबै जू भूलि गयौ ।
तुमहीँ सौँ बालक किसोर बपु, मैंँ घर-घर प्रति देख्यौ ।
मुरलीधर घनस्याम मनोहर, अद्भुत नटवर पेख्यौ ।
कौतुक रूप ग्वाल वृंदनि सँग, गाइ चरावन जात ।
सांझ प्रभातहिं गो दोहन मिस, चोरी माखन खात ।
नँद-नंदन अनेक लीला करि, गोपिनि चित्त चुरावत ।
वह सुख देखि जु नैन हमारे, ब्रह्म न देख्यौ भावत ।
करि करुना उन दरसन दीन्हौँ, मैंँ पचि जोग बह्यौ ।
छन मानहु षट्मास सूर प्रभु, देखत भूलि रह्यौ ॥१८३॥
अर्थ—मुझे ब्रज मे भ्रम हो गया था (इसलिए) तुम्हारे समस्त ज्ञान सन्देश को
भूल गया । तुम्हारे समान ही किशोर शरीर वाला बालक मैने हर घर मे देखा ।
(वहाँ) मुरलीधर मनोहर घनश्याम तथा अद्भुत नटवर को देखा । ग्वालों के साथ
क्रीड़ा करते तथा गाये चराते हुए (कृष्ण रूप) को देखा । सन्ध्या तथा प्रातः गाय
दुहने के बहाने चोरी से मक्खन खाते (कृष्ण को) देखा । अनेक क्रीडा करके गोपियों
के मन को चुराते हैं । उस सुख को देखने के बाद मेरे नेत्रो को ब्रह्म की ओर देखना
अच्छा नही लगता । कृपा करके उन लोगों ने दर्शन दिया मैं तो योग मे ही बह गया ।
हे कृष्ण, उन्हे देखते मैं ऐसा भूल गया कि (मेरे लिए) छः मास मानो एक क्षण के
समान हो गया हो (बीत गया हो) ॥१८३॥
ब्रज मैंँ एक अचंभौ देख्यौ ।
मोर मुकुट पीताबर धारे, तुम गाइनि सँग पेख्यौ ।
गोप बाल सँग धवत तुम्हरेँ, तुम घर घर प्रति जात ।
दूध दहीउरु मही लै डारत, चोरी माखन खात ।
गोपी सब मिलि पकरतिँ तुमकौँ, तुम छुड़ाइ कर भागत ।
सूर स्याम नित प्रति यह लीला, देखि देखि मन लागत ॥१८४॥
अर्थ—मैने ब्रज मे एक आश्चर्य देखा । (मैने) मोर मुकुट और पीताम्बर धारण
किये हुए तुम्हे गायो के साथ देखा । गोप बालक सामूहिक रूप मे तुम्हारी (तुम्हारे
घर की ओर) ओर दौड़ते है (फिर) तुम (उनके साथ) प्रत्येक घर मे जाते हो । (तुम)
दूध, ओर दही लेकर पृथ्वी पर ढरकाते हो, तथा चोरी का माखन खाते हो । सब गोपियाँ
३३६ सूरसागर सार सटीक
मिलकर तुमको पकड़ती हैं, तुम छुड़ाकर भागते हो। सूरदास (उद्धव के शब्दो) में कहते
हैं कि (ब्रज मे) नित्य प्रति (तुम्हारी) सब लीला देख-देख करके मन रम जाता है ।।१८४।।
श्रीकृष्ण वचन
सुनि ऊधौ मोहिं नैकु न बिसरत, वै ब्रजबासी लोग ।
तुम उनकौँ कछु भली न कीन्ही, निसि दिन दियौ वियोग ।
जउ बसुदेव-देवकी मथुरा, सकल राज-सुख भोग ।
तद्यपि मनहिँ बसत वंसी बट, वन जमुना संजोग ।
वै उत रहत प्रेम अवलंबन, इत तें पठयौ जोग ।
सूर उसाँस छांड़ि भरि लोचन, बढ़यौ विरह ज्वर सोग ।।१८५।।
अर्थ—उद्धव, सुनो मुझे वे ब्रजवासी जन तनिक भी नही भूलते । तुमने उनका
कुछ भला नही किया ,रात-दिन वियोग (की शिक्षा) दिया। यद्यपि वसुदेव तथा
देवकी के मथुरा मे समस्त राजभोग है फिर भी मन से वंशी वट वन और मथुरा से
संयुक्त रहता हूँ। वे वहाँ प्रेम के आधार पर जीते हैं किन्तु (मैंने यहाँ) से योग भेजा।
सूरदास कहते है कृष्ण ने उच्छ्वास छोड़कर आंखों को आंसू से भर लिया तथा (उनका)
विरह ज्वर और बढ गया ।।१८५।।
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ ।
वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छांहीँ ।
प्रात समय माता जसुमति अरु, नद देखि सुख पावत ।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ।
गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौँ हित जदुनाथ ।।१८६।।
अर्थ--उद्धव, मुझे ब्रज भूलता नही। वृन्दावन, गोकुल वन, उपवन तथा सघन
कुजो की छाया (नही भूलती) प्रातः काल माता यशोदा तथा नंद को देखकर सुख पाता
था। वे माखन रोटी तथा सजाव (थक्केदार) दही को अत्यधिक स्नेह से खिलाते थे।
गोपी तथा ग्वाल-बाल के साथ खेलता था तथा सारा दिन हँसते हुए बीत जाता था।
सूरदास कहते हैं कि ब्रज के निवासी धन्य-धन्य हैं जिनसे कृष्ण का प्रेम है ।।१८६।।
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहींँ ।
हंस सुता को सुदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीँ ।
वै सुरभी, वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं ।
ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहींँ।
यह मधुरा कंचन की नगरी, मनि मुक्ताहल जाहींँ।
जबहिँ सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहींँ ।
अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निवाहीँ ।
सूरदास प्रभु रहै मौन ह्वै, यह कहि कहि पछिताहीँ ।।१८७।।
उद्धव संदेश ३३७
अर्थ—ऊधो मुझे ब्रज भूलता नही। यमुना की सुन्दर कगार और कुंजो की
छाया तथा वे गाये तथा वे बछडे, जिन्हे बाड़े मे दुहाने जाते थे हमें नही भूलते । ग्वाल
बाल सब के साथ मिलकर कोलाहल करते थे तथा गला पकड़कर नाचते थे। यह
मथुरा सोने की नगरी है जहां मणि तथा मुक्ताफल है किन्तु जब उस सुख की याद
आती है तो मन उमगता है तथा शरीर (की चेत) नही रहती। ब्रज मे अनेक लीला
की नद तथा यशोदा ने सब कुछ निबाहा । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण चुप हो गये
और यह कहकर पछताते है ॥१८७॥
जो जन ऊधौ मोहिं न बिसारत, तिहिँ न बिसारौं एक घरी।
मेटौँ जनम जनम के संकट, राखौँ सुख आनंद भरी।
जो मोहिं भजै भजौँ मैं ताकौं, यह परिमिति मेरे पाइँ परी।
सदा सहाइ करौँ वा जन की, गुप्त हुती सो प्रगट करी।
ज्यौँ भारत भरुही के अंडा, राखे गज के घंट तरी।
सूरजदास ताहि डर काकौ, निसि बासर जो जपत हरी ॥१८८॥
अर्थ - उद्धव, जो लोग मुझे नही भुलाते उन्हे एक घडी भी नही भुलाता।
(उनके) जन्म-जन्म के संकट को मिटा दूंगा तथा सुख और आनन्द से भरा रखूंगा।
जो मुझे भजता है मैं उसे भजता हूँ यह मर्यादा मेरे पैर पड़ गयी है। उस आदमी की
सदा सहायता करता हूँ जो बात गुप्त थी उसे प्रत्यक्ष कर देता हूँ। जैसे महाभारत में
टिटहरी के अन्डे को हाथी के घण्टे के नीचे बांधा (वैसी ही) सूरदास कहते हैं कि
उसे किसका डर है जो दिन-रात कृष्ण को जपता है ॥१८८॥
२२
द्वारिका चरित
द्वारिका प्रयाण
बार सत्तरह जरासंध, मथुरा चढ़ि आयौ ।
गयौ सो सब दिन हारि, जात घर बहुत लजायौ ।
तब खिस्याइ कै कालजवन, अपनैं सँग ल्यायो ।
हरि जु कियौ बिचार, सिंधु तट नगर बसायौ ।
उग्रसेन सब लै कुटुंब, ता ठौर सिधायौ ।
अमर पुरी तैं अधिक, तहाँ सुख लोगनि पायौ ।
कालजवन मुचुकुंदहिं सौं, हरि भसम करायौ ।
बहुरि आइ भरमाइ, अचल रिपु ताहि जरायौ ।
जरासिंधु हू ह्वाँ तैं पुनि, निज देस सिधायौ ।
गए द्वारिका स्याम राम, जस सूरुज गायौ ॥१॥
अर्थ—जरासंध सत्रह बार मथुरा पर चढ आया । लेकिन सब दिन (हर बार)
हार गया और घर जाते हुए बहुत लजाया । तब खीझकर वह कालयवन को अपने
साथ लाया । हरि ने विचार किया ( और ) उन्होंने समुद्र के किनारे (एक) नगर
बसाया । उग्रसेन सारा परिवार लेकर उस स्थान को चले गये । वहाँ (पर) लोगो ने
अमरपुरी से अधिक सुख पाया । मुचुकुंद के द्वारा हरि ने कालयवन को भस्म करा
दिया । फिर आकर (और) भ्रमित करके उस अचल शत्रु को जलाया । जरासिंधु यहाँ
से फिर अपने देश चला गया । श्याम और बलराम द्वारिका गये । सूरदास ने (उनके)
यश का गान किया है ॥१॥
रुक्मिणी परिणय
हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनाबिंद उर धरौ ।
हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ ।
कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ ।
कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिस्नु भक्ति कौ तिहिँ चित चाइ ।
रुक्म आदि ताके सुत पाँच । रुकमिनि पुत्री हरि रंग राँच ।
नृपति रुक्म सौं कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ ।
द्वारिका चरित ३३६
रुक्म रिसाइ पिता सौं कह्यौ। जदुपति -ब्रज जो चोरत मह्यौ।
रुक्मनि कौं सिसुपालहिं दीजै। करि विवाह जग मैं जस लीजै।
यह सुनि नृप नारी सौं कह्यौ। सुनि ताकौँ अंतरगत दह्यौ।
रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ। ब्याह काज सिसुपाल बुलायौ।
सो बारात जोरि तहँ आयौ। श्री रुकमिनि के मन नहिँ भायौ।
कह्यौ मेरे पति श्री भगवान। उनहिँ बरौँ कै तजौँ परान।
यह निहचै करि पत्री लिखी। बोल्यौ विप्र सहज इक सखी।
पाती दै कह्यौ बचन सुनाइ। हरि को दै कहियौ या भाइ।
भीषम सुता रुकमिनो बाम। सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥२॥
अर्थ—हरि का स्मरण करो (तथा) हरि के चरणरूपी कमल को हृदय मे
धारण करो। जब रुक्मिणी ने हरि का स्मरण किया (तब) हरि ने कृपा करके उसका
वरण किया। उसी कथा को कहता हूँ, मन लगाकर सुनो; जो (इस कथा को) कहता-
सुनता है वह सुख पाता है। कुंडिनपुर के भीष्म राजा के मन मे विष्णु-भक्ति का चाव
था। रुक्म आदि उसके पाँच पुत्र थे। हरि के रंग में रंगी रुक्मिणी (उसकी) एक
पुत्री थी। नृपति ने रुक्म से भली-भांति कहा (कि) कुमारी (रुक्मिणी) के योग्य वर
यदुराय (कृष्ण) हैं। रुक्म ने क्रोधित होकर पिता से कहा कि व्रज मे दही चुराता था
(यह) यदुपति ! रुक्मिणी को शिशुपाल को दीजिए (तथा) विवाह करके जग मे यश
लीजिए। यह सुनकर राजा ने स्त्री (पत्नी) से कहा, सुनकर उसका हृदय जल गया।
रुक्म ने विप्र को चंदेरी भेजा (तथा) विवाह के लिए शिशुपाल को बुलाया। वह
बारात जोड़कर वहाँ आया, (लेकिन) श्री रुक्मिणी के मन को (यह) अच्छा नही
लगा। उसने कहा कि मेरे पति श्री भगवान् (है); उनको बरूँगी या प्राण छोड़ दूँगी।
यह निश्चय करके (उसने) पत्र लिखा (तथा) सहज ही एक सखी से ब्राह्मण को
बुलाया। पत्रिका देकर (यह) वचन सुनाकर कहा (कि) (पत्रिका) हरि को देकर इस
प्रकार कहना (कि) भीष्म की पुत्री रुक्मिणी रात-दिन तुम्हारा नाम भजती है ॥२॥
द्विज पाती दै कहियौ स्यामहिँ।
कुंडिनपुर की कुँवरि रुकमनी, जपति तिहारे नामहिँ।
पा लागौँ तुम जाहु द्वारिका, नंद-नँदन के धामहिँ।
कंचन, चीर-पटंबर दैहौँ, कर कंचन जु इनामहिँ।
यह सिसुपाल असुचि अज्ञानी, हरत पराई बामहिँ।
सूर स्याम प्रभु तुम्हरौ भरोसौ, लाज करौ किन नामहिँ ॥३॥
अर्थ—हे द्विज ! पत्रिका देकर स्याम से कहना कि कुंडिनपुर की कुमारी
रुक्मिणी तुम्हारे नाम को जपती है। (मैं) पांव लगती हूँ तुम कृष्ण के धाम द्वारिका
जाओ। मैं तुम्हे सोना, चीर-पटंबर (रेशमी वस्त्र) दूँगी (तथा) हाथ का कंगन इनाम
३४० सूरसागर सार सटीक
में दूँगी। यह शिशुपाल अपवित्र तथा अज्ञानी है, पराई स्त्रियों को हरता है। सूर के
प्रभु हे स्याम ! आप (अपने) नाम की लाज क्यों नही करते ॥३॥
द्विज कहियौ जदुपति सौं बात ।
बेद बिरुद्ध होत कुंडिनपुर, हंस के अंस काग नियरात ।
जनि हमरे अपराध बिचारहु, कन्या लिख्यौ मेटि गुरु तात ।
तन आतमा समर्प्यौ तुमकौं, उपजि परी तातैं यह बात ।
कृपा करहु उठि बेगि चढ़हु रथ, लगन समै आवहु परभात ।
कृष्न सिंह बलि धरी तुम्हारी, लैबे कौं जंबुक अकुलात ।
तातैं मैं द्विज बेगि पठायौ, नेम धरम मरजादा जात ।
सूरदास सिसुपाल पानि गहै, पावक रचौं करौं अपघात ॥४॥
अर्थ — हे ब्राह्मण ! कृष्ण से (यह) बात कहना कि कुंडिनपुर में वेद के विरुद्ध
(आचरण) हो रहा है; हंस के भाग को (लेने के लिए) कौआ नजदीक आ रहा है।
हमारे अपराध पर ध्यान न दो (कि) कन्या ने गुरु तथा पिता की (आज्ञा की) अव-
हेलना करके पत्र लिखा है। (मैंने) तन तथा आत्मा तुम्हे सौंप दी है, इसलिए यह
बात (स्थिति) उत्पन्न हो गयी है। कृपा करो (और) उठकर शीघ्र रथ पर चढ़ो,
(तथा) लग्न के समय प्रातः आओ। हे कृष्ण ! सिंह की बलि तुम्हारे लिए रखी
(सुरक्षित) है; (उसे) लेने के लिए शृगाल अकुला रहा है। इसी से मैंने ब्राह्मण को
शीघ्र ही भेजा, क्योंकि (मेरी) नियम, धर्म तथा मर्यादा जा रही है। सूरदास कहते हैं
(रुक्मिणी कहती है) (कि) (यदि) शिशुपाल मेरा हाथ ग्रहण करता है (पाणिग्रहण
करता है) (तो) अग्नि रचूँगी (तथा) आत्म हत्या कर लूंगी ॥४॥
सुनत हरि रुकमिनी कौ संदेश ।
चढ़ि रथ चले बिप्र कौं सँग लै, कियौ न गेह प्रवेस ।
बारंबार बिप्र कौं पूछत, कुँवरि बचन सो सुनावत ।
दीनबंधु करुना निधान सुनि, नैन नीर भरि आवत ।
कह्यौ हलधर सौं आवहु दल लै, मैं पहुँचत हौं धाइ ।
सूरज प्रभु, कुंडिनपुर आए, बिप्र सो जाइ सुनाइ ॥५॥
अर्थ — रुक्मिणी का संदेश सुनते ही हरि रथ पर चढ़कर (तथा) ब्राह्मण को
साथ लेकर चले, (सुनने के बाद) (अपने) घर में प्रवेश नही किया। बार-बार ब्राह्मण
से पूछते हैं, (वह) कुंवरि रुक्मिणी की बात सुनाता है। सुनकर दीनबन्धु करुणा-
निधान (कृष्ण की) आंखो मे आंसू भर आते हैं ! (उन्होने) बलराम से कहा (कि)
सेना लेकर आओ मैं दौडकर पहुँचता हूँ। सूरज के प्रभु कुंडिनपुर आ गये, ब्राह्मण ने
जाकर यह (समाचार) सुनाया ॥५॥
रुकमिनी देवी-मंदिर आई।
धूप दीप पूजा-सामग्री, अली संग सब ल्याई।
द्वारिका चरित ३४१
रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुक्म पठाई।
ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई।
कुंवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई।
मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई।
पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनी बाहर आई।
सुभट देखि सुन्दरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई।
इहिं अंतर जादोपति आए, रुकमिनी रथ बैठाई।
सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई॥६॥
अर्थ—रुक्मिणी देवी मन्दिर में आईं। धूप, दीप तथा पूजा की समस्त सामग्री
सखियाँ साथ ले आईं। रुक्म ने रखवाली के लिए बहुत से बड़े वीरो को भेज दिया।
वे सभी वहाँ सावधान हो गये, वहाँ पक्षी भी नही जा पाता था। कुँवरि ने पूजा करके
पार्वती से (यह) विनती की कि (मुझे) कृष्ण को वर के रूप में दे। मैंने इसीलिए
पूजा की (है)। (यह) सुनकर गौरी मुस्करायी ! अंबिका के मन्दिर में प्रसाद (वरदान)
पाकर रुक्मिणी बाहर आईं। (वहाँ के) सुभट (उसकी) सुन्दरता देखकर मोहित हो गए
(और) पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी बीच कृष्ण (वहाँ) गए तथा (उन्होंने)
रुक्मिणी को रथ पर बिठा लिया। सूरज के प्रभु (कृष्ण) अपनी सेना मे (जब) पहुँच
गये तब (रुक्म द्वारा तैनात) सुभटों ने खबर पायी (कि रुक्मिणी हरण हो गया) ॥६॥
आवहु री मिलि मंगल गावहु।
हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनंद जदुकुलहिं सुनावहु।
बाँधहु बन्दनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु।
दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरावहु।
कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु।
हरद दूब केसर मग छिरकहु, भेरी मृदँग निसान बजावहु।
जरासंध सिसुपाल नृपति तैं, जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु।
बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥७॥
अर्थ—(हे सखियो !) आओ, (सब) मिलकर मंगल (गीत) गाओ। हरि
रुक्मिणी को लेकर आ रहे हैं। यह आनंद यदुकुल को सुनाओ। मनोहर वंदनवार
बांधो (तथा) सोने के कलश (घड़े) मे जल भर कर रखवाओ। दही, अक्षत, परम
रुचिकर फल, फूलों के द्वारा आंगन मे चौक पुरवाओ। केले के समूहो, अनुपम किशलय
दलो (तथा) सुन्दर रंग के फूलो मे मंडप छावाओ। रास्ते मे हल्दी दूब (तथा) केसर
छिड़को; नगाड़ो (भेरी), मृदंग तथा ढोल (निशान) बजाओ। जरासंध शिशुपाल नृप
से (कृष्ण) जीत गये हैं। उठकर अर्घ्य (पूजन सामग्री) चढ़ाओ। बलराम सहित सूर
के प्रभु (कृष्ण) शरीर से कुशलता-पूर्वक आये है। (उनकी) आरती सजाओ ॥७॥
३४२ सूरसागर सार सटीक
बलभद्र ब्रज यात्रा
स्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ ।
एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी बृन्दावन गए ।
रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए ।
नन्द जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई ।
आगैं ह्वै लैबे कौं धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए ।
बल कौं हित करि गरैं लगाए । दै असीस बोले या भाए ।
तुम तौ भली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम ।
देखो कान्हर की निठुराई । कबहुँ पाती हू न पठाई ।
आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए ।
कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत ।
कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात ।
इहिँ अन्तर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार ।
नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ ।
पुनि गोपी जुरि मिलि सब आईँ । तिन हित साथ असीस सुनाईँ ।
हरि सुधि करि सुधि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ।
कोउ कहै हरि ब्याही बहु नार । तिनकौ बढ़्यौ बहुत परिवार ।
उनकौं यह हम देतिँ असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस ।
कोउ कहै हरि नाहीँ हम चीन्हौ । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ ।
निसि दिन रोवत हमैँ बिहाइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ ।
कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ ।
काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ ।
कोउ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि कौ बहु सुख दिए ।
बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौं अति हीँ दुख दयौ ।
कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी ।
कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहीं पतिआरी सोइ ।
कोउ कहै हम तुम कत पतियाईँ । उनकैं हित कुल लाज गवाईँ ।
हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत ।
कोउ कहै हरि हम सब बिसराईं । कहा कहैं कछु कह्यौ न जाई ।
हरिकौं सुमिरि नयन जल धारैं । नैंकु नहीँ मन धीरज धारैं ।
यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि ।
जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ ।
बल तहं बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत विलास ।
सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥८॥
द्वारिका चरित ३४३
अर्थ—श्याम (और) बलराम के गुणों को नित्य गाता हूँ (तथा) श्याम और
बलराम में ही चित्त लगाता हूँ । एक बार (जब) हरि अपने पुर (मथुरा) में छाये थे
(विद्यमान थे) हलधर जी वृन्दावन गये (आए) रथ देखते ही (वृन्दावन) के लोगों ने
सुख पाया, समझा (कि) श्याम और बलराम दोनों आये हैं । नद (तथा) यशोदा ने
जब खबर पायी तो उन्होने (प्रसन्नता से) (अपने) शरीर तथा घर की स्मृति भुला
दी । दोनो आगे होकर लेने को दोडे । हलधर दौड़कर (उनके) चरणों से लिपट गये
(नंद यशोदा ने) वलराम को स्नेह-पूर्वक गले से लगाया, (और) आशीर्वाद देकर इस
प्रकार बोले । वलराम ! तुमने तो अच्छा किया (आ गए), लेकिन मनमोहन श्याम
कहाँ रह गये ! कृष्ण की निष्ठुरता (तो) देखो, कभी पत्र भी नही भेजा । स्वयं तो
वहाँ जाकर राजा हो गए, (लेकिन) बिछुड़कर हमको बहुत दुख दिया । कहो, (श्याम)
कभी हमारा स्मरण करते हैं । हम तो उनके बिना बहुत दुख भोगते हैं । क्या करे,
(यहाँ से) वहाँ कोई जाता नहीं, उनके बिना पल-पल युग के समान बीतता है । इसी
बीच सभी ग्वाल आये (तथा) सबों ने यथाविधि भेट की (बलराम ने) किसी को
नमस्कार किया, किसी को गले लगाया। फिर सब गोपियां मिलकर आईं, उन्होने
प्रेमपूर्वक मंगल कामनाएं की । हरि का स्मरण करके (गोपियो की) सुध-बुध भूल
गयी । उनके प्रेम को कहा नही जाता । कोई कहती है (कि) हरि ने बहुत-सी स्त्रियों
से विवाह कर लिया है, (तथा) उनका परिवार बहुत बढ़ गया है ! उनको हम यह
आशीर्वाद देती है (कि) (वे) सुखपूर्वक करोड़ो वर्ष जिये। कोई कहती हैं (कि) हरि
ने हमें पहचाना नही; बिना पहचाने (हमने) (उन्हे) मन दे दिया । हमारा (समय)
रात-दिन रोते ही व्यतीत होता है। कहो अब क्या उपाय करे । कोई कहती है (कि)
गाय चराते थे द्वारिका जाकर राजा हो गये ! वे यहाँ क्यो आये, वहाँ नित्य भोग
विलास करते हैं । कोई कहती है कि हरि ने शत्रुओ का नाश किया (तथा) मित्रो को
बहुत सुख दिया । हमारा विरह कहाँ रह गया, जिन्होने हमे बहुत दुख दिया । कोई
कहती है (कि) जो हरि की रानी हैं (उन्होंने) हरि पर कैसे विश्वास किया ? यदि
कोई चतुर स्त्री होती तो उन पर विश्वास न करती । कोई (आपस मे) कहती है
(कि) हमने-तुमने (उन पर) कैसे विश्वास किया; उनके लिए (अपने) कुल की लाज
गंवा दी । हरि कुछ ऐसा टोना जानते हैं (जिससे) सबके मन को अपने वश मे कर
लेते हैं । कोई कहती हैं (कि) हरि ने हम सब को भुला दिया, क्या कहे, कुछ कहा
नही जाता ! हरि का स्मरण करके नयनो मे जल ढालती है। मन, तनिक भी, धीरज
नही मानता। यह सुनकर हलधर ने धीरज धरकर कहा कि हरि निश्चित आयेगे ।
जब बलराम ने यह संदेश सुनाया तब मन मे थोड़ा-सा धीरज आया ! बलराम वहाँ
दो महीने रहे (तथा) ब्रजवासियो से विलास करते रहे । सब से मिलकर फिर अपने
पुर (मथुरा) आये, सूरदास ने (इस प्रकार) हरि का गुणगान किया ॥८॥
३४४ सूरसागर सार सटीक
सुदामा चरित
कंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं वे मीत तुम्हारे।
बाल-सखा अरु बिपति विभंजन, संकट हरन मुकुंद मुरारे।
और जु अतिसय प्रीति देखियै, निज तन मन की प्रीति बिसारे।
सरबस रीझि देत भक्तनि कौं, रंक नृपति काहूँ न विचारे।
जद्यपि तुम संतोष भजत हौ, दरसन सुख तैं होत जु न्यारे।
सूरदास प्रभु मिले सुदामा, सब सुख दै पुनि अटल न टारे ॥६॥
अर्थ-(सुदामा की स्त्री कहती है) हे पति ! मधुसूदन (कृष्ण) के पास जाओ,
सुनती हूँ वे तुम्हारे मित्र हैं ! (वे तुम्हारे) बाल मित्र हैं; मुकुंद मुरारी विपत्तियों के
भंजक (तथा) संकट हरने वाले है। और जो (जहां) अतिशय प्रेम देखते हैं तो (वहां)
अपने तन-मन की प्रीति (भी) भुला देते है। रीझ कर भक्तों को सर्वस्व देते हैं, (वे)
दरिद्र (और) नृपति किसी का विचार नही करते। यद्यपि तुम संतोष धारण करते
हो, (और) (वहां न जाकर) दर्शन सुख से वंचित होते हो (फिर भी) सूरदास
(कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) से सुदामा मिलने पर सब सुख देकर (उससे) मिले,
फिर वह सुख अटल (होगा), नही टाला (सदैव प्राप्त हुआ) ॥६॥
सुदामा सोचत पंथ चले।
कैसैं करि मिलिहैं मोहिँ श्रीपति, भए तब सगुन भले।
पहुँचौ जाइ राजद्वारे पर, काहूँ नहिँ अटकायौ।
इत उत चितै धँस्यौ मंदिर मैं, हरि कौ दरसन पायौ।
मन मैं अति आनंद कियौ हरि, बाल-मीत पहिचान।
धाए मिलन नगन पग आतुर, सूरज प्रभु भगवान ॥१०॥
अर्थ-सुदामा रास्ते मे सोचते हुए चले (कि) श्रीपति (कृष्ण) हमसे कैसे
मिलेगे, तब (उस समय) अच्छे सगुन हुये। (सुदामा) राजद्वार पर जा पहुँचा, कही
भी रोक नही हुई। इधर-उधर देखकर मन्दिर (महल) मे प्रविष्ट हुआ। (और) हरि
(कृष्ण) का दर्शन पाया। बचपन के साथी को पहचान कर हरि ने मन मे अत्यधिक
आनंद माना (प्रसन्न हुए)। आतुर होकर नगे पांव (ही) मिलने के लिए सूरज के प्रभु
भगवान् दौड़े ॥१०॥
दूरहिँ तैं देख्यौ वलवीर।
अपने बालसखा जु सुदामा, मलिन बसन अरु छीन सरीर।
पौढ़े हे परजंक परम रुचि, रुकमिनी चाँर डुलावति तीर।
उठि अकुलाइ अगमने लीन्हें, मिलत नैन भरि आए नीर।
निज आसन बैठारि स्याम-घन, पूछी कुसल कह्यौ मति धीर।
ल्याए हौ सु देहु किन हमकौं, कहा दुरावन लागे चोर।