सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० सूरसागर सार सटीक
झुलस गयी । कभी कहती हैं उस मुरली में हमारा नाम ले लेकर पुकारते है । कभी
कहती हैं ब्रजनाथ के साथ चन्द्रमा इस स्थान पर उदित होता है । सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के बिना, अब वह (राधा) साँवली मूर्ति जैसी
हो गयी है ॥१७०॥
फिरि ब्रज बसौ नंदकुमार ।
हरि तिहारे बिरह राधा, भई तन जरि छार ।
बिनु अभूषन मैं जु देखी, परी है विकरार ।
एकई रट रटत भामिनि, पीव पीव पुकार ।
सजल लोचन चुअत उनकैँ, बहति जमुना धार ।
विरह अगिनि प्रचंड उनकैँ, जरे हाथ लुंहार ।
दूसरी गति और नाहीँ, रटति बारंबार ।
सूर प्रभु कौ नाम उनकैँ, लकुट अंध अधार ॥१७१॥
अर्थ- नन्द कुमार ब्रज मे फिर से बसो । कृष्ण, तुम्हारे विरह मे राधा जलकर
राख हो गयी । मैंने उन्हे बिना आभूषण के देखा है वह व्याकुल पडी है (उस) स्त्री
को एक ही रट लगी रहती है तथा पीव-पीव पुकारती है । उनके सजल नेत्रो से आंसू
चूता है जो कि यमुना की (धारा के समान बहती है) विरह की प्रचंड अग्नि लोहार
के हाथ पड़ी (लौह सामग्री की तरह) जलती है । उसकी ओर कोई दूसरी गति नही
है । वह बार-बार (कृष्ण का नाम) रटती है । सूरदास कहते है (गोपियों ने कहा है)
कि कृष्ण स्वामी हैं तथा उनकी लकुटी अन्धों का आधार है ॥१७१॥
ब्रज तैँ द्वै रितु पै न गई ।
ग्रीषम अरु पावस प्रवीन हरि, तुम बिनु अधिक भई ।
ऊर्ध उसास समीर नैन घन, सब जल जोग जुरे ।
बरषि प्रगट-कीन्हे दुख दादुर, हुते जो दूरि दुरे ।
बिषम बियोग जु बृष दिनकर सम, हित अति उदौ करै ।
हरि-पद बिमुख भए सुनि सूरज, को तन ताप हरै ॥१७२॥
अर्थ—ब्रज से दो ऋतुये नही गयी । हे चतुर कृष्ण तुम्हारे विना ग्रीष्म ओर
वर्षा (की ऋतुये) संवर्धित (अधिक टिकाऊ) हो गयी हैं । ऊर्ध्व उच्छवास ही पवन
है तथा नेत्र बादल है । जल की वर्षा के लिए सभी योग एकत्रित हो गये हैं । बरसकर
(इसने) दुख रूपी मेढक को पैदा कर दिया जो कि दूर छिपे हुये थे । विषम वियोग
जो ग्रीष्म ऋतु के वृष नक्षत्र के सूर्य के समान है । हृदय मे उदित कर दिया । सूरदास
कहते है (ऊधो कहते है कि गोपियो ने कहा है) कृष्ण चरण विमुख हो गये हैं शरीर
के ताप को कौन हरे ॥१७२॥
दिन दस घोष चलहु गोपाल ।
गाइनिकी अवसेरि मिटावहु, मिलहु आपने ग्वाल ।