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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

३२६ सूरसागर सार सटीक
जा दिन तैँ मधुपुरी सिधारे, स्याम मनोहर गात ।
ता दिन तैँ मेरे नैन पपीहा, दरस प्यास अकुलात ।
जहं खेलन के ठौर तुम्हारे, नन्द देखि मुरझात ।
जौ कबहुँ उठि जात खरिक लौं, गाइ दुहावन प्रात ।
दुहत देखि औरनि के लरिका, प्रान निकसि नहिं जात ।
सूरदास बहुरो कब देखौँ, कोमल कर दधि-खात ॥१६१॥
अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैरों पर पडती हूँ कृष्ण से इतनी बात कहना । इतनी
(ही) दूर पर रहते हुए अपने माता-पिता को क्यो भुला दिया । जिस दिन से साँवले
मनोहर शरीर वाले कृष्ण ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया उसी दिन से मेरे नेत्र रूपी
पपीहा दर्शन की प्यास से अकुलाते है । तुम्हारे खेलने के जो स्थान हैं उन्हे देखकर
नंद मुरझाते हैं । जब कभी उठकर प्रातः बाडे मे गाय दुहाने जाती हूँ तब दूसरो के
लडको को गाय दुहाते हुए देखकर (सोचती हैं कि) मेरे प्राण निकल क्यो नही जाते ।
सूरदास कहते है (यशोदा कहती है) कोमल हाथो से दही खाते हुए फिर कब
देखूंगी ॥१६१॥
तब तुम मेरैं काहे कौं आए ।
मथुरा क्यों न रहे जदुनंदन, जौ पै कान्ह देवकी जाए ।
दूध, दही काहे कौं चोरयौ, काहे कौं बन बच्छ चराए ।
अघ अरिष्ट, काली फनि काढ़यौ, बिष जलतैं सब सखा जिवाए ।
पय पीवत हरे प्रान पूतना, सदा किए जसुमति के भाए ।
सूरदास लोगनि के भुरएं, काहैं कान्ह, अब होत पराए ॥१६२॥
अर्थ—तब तुम मेरे यहाँ क्यो आये । यदि तुम देवकी से उत्पन्न हुए (पुत्र) थे
तो मथुरा ही मे क्यों नही रहे । (तुमने) दूध दही क्यों चुराया तथा वन मे बछड़ों को
क्यो चराया । तुमने क्यो अघासुर, अरिष्ट और काली सर्प को निकालकर विषाक्त
जल से सखाओ को जिलाया । दूध पीते हुए पूतना के प्राणो को हर लिया तथा सदैव
यशोदा को भाने वाले (अभीष्ट) कार्यों को किया । सूरदास कहते हैं कि (यशोदा
कहती है) लोगो के बहकाने से कृष्ण अब क्यों पराये हो रहे हो ॥१६२॥
(मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै ।
बिडरी जातिं काहु नहिं मानतिं, नँकु मुरलि की टेर दै ।
धौरी, धूमरि, पीरी, काजरि, बन-बन फिरती पीय ।
अपनी जानि कै आनि संभारहु, धरौ चेत अब जीय ।
तुम हौ जग जीवनि प्रतिपालक, निठुराई नहिं कीजै ।
ग्वालऽरु बाल बच्छ गो बिलखत, सूर सु दरसन दीजै ॥१६३॥
अर्थ—मोहन अपनी गायो को घेर (एकत्रित कर) लो । सब बिखरी जा रही
हैं कोई मानती नही, जरा मुरली की आवाज (टेर) तो करो । प्रिय कृष्ण धवली,