सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ सूरसागर सार सटीक
तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ।
जब तैं हरि संदेस तुम्हारौ, सुनत ताँवरौ आयौ।
फूले ब्याल दुरे ते प्रगटे, पवन पेट भरि खायौ।
खोले मृगनि चौक चरननि के, हुतौ जु जिय बिसरायौ।
ऊँचे बैठि बिहंग सभा मैं, सुक बनराइ कहायौ।
किलकि-किलकि कुल सहित आपनैं, कोकिल मंगल गायौ।
निकसि कंदराहु तैं केहरि, पूँछ मूँड़ पर ल्यायौ।
गहवर तैं गजराज आइकै, अंगहिँ गर्व बढ़ायौ।
अब जनि गहरु करहु हो मोहन, जौ चाहत हौ ज्यायौ।
सूर बहुरि ह्वैहै राधा कौं, सब बैरिनि कौ भायौ ॥१८१॥
अर्थ—जब से कृष्ण (उन्होने) तुम्हारा संदेश (सुना) सुनते ही मूर्छा आ गई
तब से इन सबों ने सन्तोष पाया। (राधा के अंग के सभी उपमानो को सुख प्राप्त
हुआ) सर्प प्रफुल्लित होकर छिपाव से प्रकट हो गये तथा पेट भर कर पवन का भक्षण
किया। मृगों ने चरणों की चौकड़ी जिसे भूल बैठे थे, शुरू कर दी। पक्षियो की सभा
मे ऊँचे बैठा तोता वनराज कहलाया। अपने परिवार के साथ किलक-किलक कर
कोयल ने मंगल गाया। कन्दरा से सिंह भी निकलकर पूँछ को सिर पर लगाने लगा।
गह्वर से हाथी ने भी आकर अपने शरीर मे गर्व को बढ़ा लिया। अब यदि जिलाना
चाहते हो तो कृष्ण देर मत करो नही तो फिर राधा की (वही दशा) होगी जैसा
सभी वैरियो को इच्छित है ॥१८१॥
माधौ जू मैं अतिही सचु पायौ।
अपनौ जानि संदेस ब्याज करि, ब्रज जन मिलन पठायौ।
छमा करौ तौ करौं बीनती, उनहिँ देखि जौ आयौ।
श्रीमुख ग्यान पंथ जौ उचरचौ, सो पै कछु न सुहायौ।
सकल निगम सिद्धांत जन्म क्रम, स्यामा सहज सुनायौ।
नहिं श्रुति, सेष, महेस प्रजापति, जो रस गोपिनि गायौ।
कटुक-कथा लागी मोहिँ मेरी, वह रस सिंधु उम्हायौ।
उत तुम देखे और भाँति मैं, सकल तृषा जु बुझायौ।
तुम्हरी अकथ कथा तुम जानी, हम जन नाहिं बसायौ।
सूर स्याम सुन्दर यह सुनि कै, नैननि नीर बहायौ ॥१८२॥
अर्थ—माधव (कृष्ण) मैंने जो अत्यधिक सुख पाया (उसका कारण) आपने अपने
माध्यम से सदेश के बहाने ब्रज के लोगों से मिलने भेजा था। क्षमा करो तो (वह
सब) निवेदन करूँ जिसे ब्रज मे देख आया हूँ। श्री मुख (आपने जो ज्ञान सिखाया
था) उस ज्ञान पथ का उच्चारण किया लेकिन वह उन्हे अच्छा नही लगा। जन्मान्तरों
के कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले समस्त वेदो के सिद्धांत (प्रेम और भक्ति) को राधा ने