सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० सूरसागर सार सटीक
में दूँगी। यह शिशुपाल अपवित्र तथा अज्ञानी है, पराई स्त्रियों को हरता है। सूर के
प्रभु हे स्याम ! आप (अपने) नाम की लाज क्यों नही करते ॥३॥
द्विज कहियौ जदुपति सौं बात ।
बेद बिरुद्ध होत कुंडिनपुर, हंस के अंस काग नियरात ।
जनि हमरे अपराध बिचारहु, कन्या लिख्यौ मेटि गुरु तात ।
तन आतमा समर्प्यौ तुमकौं, उपजि परी तातैं यह बात ।
कृपा करहु उठि बेगि चढ़हु रथ, लगन समै आवहु परभात ।
कृष्न सिंह बलि धरी तुम्हारी, लैबे कौं जंबुक अकुलात ।
तातैं मैं द्विज बेगि पठायौ, नेम धरम मरजादा जात ।
सूरदास सिसुपाल पानि गहै, पावक रचौं करौं अपघात ॥४॥
अर्थ — हे ब्राह्मण ! कृष्ण से (यह) बात कहना कि कुंडिनपुर में वेद के विरुद्ध
(आचरण) हो रहा है; हंस के भाग को (लेने के लिए) कौआ नजदीक आ रहा है।
हमारे अपराध पर ध्यान न दो (कि) कन्या ने गुरु तथा पिता की (आज्ञा की) अव-
हेलना करके पत्र लिखा है। (मैंने) तन तथा आत्मा तुम्हे सौंप दी है, इसलिए यह
बात (स्थिति) उत्पन्न हो गयी है। कृपा करो (और) उठकर शीघ्र रथ पर चढ़ो,
(तथा) लग्न के समय प्रातः आओ। हे कृष्ण ! सिंह की बलि तुम्हारे लिए रखी
(सुरक्षित) है; (उसे) लेने के लिए शृगाल अकुला रहा है। इसी से मैंने ब्राह्मण को
शीघ्र ही भेजा, क्योंकि (मेरी) नियम, धर्म तथा मर्यादा जा रही है। सूरदास कहते हैं
(रुक्मिणी कहती है) (कि) (यदि) शिशुपाल मेरा हाथ ग्रहण करता है (पाणिग्रहण
करता है) (तो) अग्नि रचूँगी (तथा) आत्म हत्या कर लूंगी ॥४॥
सुनत हरि रुकमिनी कौ संदेश ।
चढ़ि रथ चले बिप्र कौं सँग लै, कियौ न गेह प्रवेस ।
बारंबार बिप्र कौं पूछत, कुँवरि बचन सो सुनावत ।
दीनबंधु करुना निधान सुनि, नैन नीर भरि आवत ।
कह्यौ हलधर सौं आवहु दल लै, मैं पहुँचत हौं धाइ ।
सूरज प्रभु, कुंडिनपुर आए, बिप्र सो जाइ सुनाइ ॥५॥
अर्थ — रुक्मिणी का संदेश सुनते ही हरि रथ पर चढ़कर (तथा) ब्राह्मण को
साथ लेकर चले, (सुनने के बाद) (अपने) घर में प्रवेश नही किया। बार-बार ब्राह्मण
से पूछते हैं, (वह) कुंवरि रुक्मिणी की बात सुनाता है। सुनकर दीनबन्धु करुणा-
निधान (कृष्ण की) आंखो मे आंसू भर आते हैं ! (उन्होने) बलराम से कहा (कि)
सेना लेकर आओ मैं दौडकर पहुँचता हूँ। सूरज के प्रभु कुंडिनपुर आ गये, ब्राह्मण ने
जाकर यह (समाचार) सुनाया ॥५॥
रुकमिनी देवी-मंदिर आई।
धूप दीप पूजा-सामग्री, अली संग सब ल्याई।