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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारिका चरित
द्वारिका प्रयाण
बार सत्तरह जरासंध, मथुरा चढ़ि आयौ ।
गयौ सो सब दिन हारि, जात घर बहुत लजायौ ।
तब खिस्याइ कै कालजवन, अपनैं सँग ल्यायो ।
हरि जु कियौ बिचार, सिंधु तट नगर बसायौ ।
उग्रसेन सब लै कुटुंब, ता ठौर सिधायौ ।
अमर पुरी तैं अधिक, तहाँ सुख लोगनि पायौ ।
कालजवन मुचुकुंदहिं सौं, हरि भसम करायौ ।
बहुरि आइ भरमाइ, अचल रिपु ताहि जरायौ ।
जरासिंधु हू ह्वाँ तैं पुनि, निज देस सिधायौ ।
गए द्वारिका स्याम राम, जस सूरुज गायौ ॥१॥
अर्थ—जरासंध सत्रह बार मथुरा पर चढ आया । लेकिन सब दिन (हर बार)
हार गया और घर जाते हुए बहुत लजाया । तब खीझकर वह कालयवन को अपने
साथ लाया । हरि ने विचार किया ( और ) उन्होंने समुद्र के किनारे (एक) नगर
बसाया । उग्रसेन सारा परिवार लेकर उस स्थान को चले गये । वहाँ (पर) लोगो ने
अमरपुरी से अधिक सुख पाया । मुचुकुंद के द्वारा हरि ने कालयवन को भस्म करा
दिया । फिर आकर (और) भ्रमित करके उस अचल शत्रु को जलाया । जरासिंधु यहाँ
से फिर अपने देश चला गया । श्याम और बलराम द्वारिका गये । सूरदास ने (उनके)
यश का गान किया है ॥१॥
रुक्मिणी परिणय
हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनाबिंद उर धरौ ।
हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ ।
कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ ।
कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिस्नु भक्ति कौ तिहिँ चित चाइ ।
रुक्म आदि ताके सुत पाँच । रुकमिनि पुत्री हरि रंग राँच ।
नृपति रुक्म सौं कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ ।