सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

उद्धव संदेश २८१
व्यर्थ ही रटते हो, बिना कार्य तुमसे कौन लड़ेगा । हम अंग-अंग से कृष्ण रङ्ग मे डूबी
हैं, सूरदास (कहते हैं) तुम्हारी इन बातो से कौन डरेगा ॥७४॥
ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारौ ।
ता पाछैं यह सिद्ध आपनी, जोग कथा बिस्तारौ ।
जा कारण तुम पठाए माधौ, सो सोचौ जिय माहीं ।
केतिक बीच विरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ।
तुम परवीन चतुर कहियत हौ, सतत निकट रहत हौ ।
जल बूडत अवलंब फेन कौ, फिरि फिर कहा गहत हौ ।
वह मुसकान मनोहर चितवनि, कैसैं उर तैं टारौं ।
जोग जुक्ति अरु मुक्ति परम निधि, वा मुरली पर वारौं ।
जिहिं उर कमल-नयन जु बसत हैं, तिहिं निरगुन क्यौं आवै ।
सूरदास सो भजन बहाऊँ, जाहि दूसरौ भावै ॥७५॥
अर्थ—उद्धव, तुम ब्रज की दशा का विचार करो । उसके बाद अपनी इस
सिद्ध योग कथा का विस्तार करो जिसलिए कृष्ण ने तुमको, भेजा है उसे मन में सोचो ।
विरह और परमार्थ मे कितना अन्तर है शायद उसे तुम नही जानते । तुम प्रवीण
तथा चतुर कहलाते हो, संतो के निकट रहते हो । जल मे डूबते हुए फेन का सहारा
कैसे लिया जा सकता है। वह मुस्कान तथा मनोहर चितवन हृदय से कैसे टालूं।
योग की युक्ति तथा मुक्ति की परम निधि को उस मुरली पर न्योछावर करती हूँ ।
जिसके हृदय मे कमल के समान नेत्र वाले (कृष्ण) बसते हैं उसे निर्गुण क्यो आये ।
सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं) उस भजन को बहा दूँ (नष्ट कर दूँ), जिसे
दूसरा अच्छा लगता (जिस भजन मे दूसरे का गुण-गान हो) है ॥७५॥
ऊधौ हरि काहे के अंतरजामी ।
अजहुँ न आइ मिलत इहिं अवसर, अवधि बतावत लामी ।
अपनी चोप आइ उड़ि बैठत, अलि ज्यौं रस के कामी ।
तिनकौ कौन परेखौ कीजै, जे हैं गरुड़ के गामी ।
आई उघरि प्रीति कलई सी, जैसी खाटी आमी ।
सूर इते पर अनखनि मरियत, ऊधौ पीवत मामी ॥७६॥
अर्थ—उद्धव ! कृष्ण किसलिए अन्तर्यामी है । आज भी इस अवसर पर आकर
नही मिलते और लम्बी अवधि बताते है । अपनी इच्छा से रस का लोभी भ्रमर उड़कर
आ बैठता है, वैसे ही कृष्ण का क्या भरोसा किया जाय जो गरुड पर चलने वाले हैं ।
जैसे खट्टी अमिया के संसर्ग से कलई उघर आती है, उसी प्रकार (तुम्हारे संदेश भिजवाने
से) कृष्ण की प्रीति का रङ्ग उद्घाटित हो गया है । सूरदास कहते है कि इतने पर
भी हम दुख से मरती हैं और उद्धव तुम इसे स्वीकार नही करते हो ! ॥७६॥

२८२ सूरसागर सार सटीक
निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बूझतिं साँचि न हाँसी ।
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ?
कैसौ बरन भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी ।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ, सूर सब्रै मति नासी ॥७७॥
अर्थ—निर्गुण किस देश का निवासी है ? मधुकर (उद्धव) सौगंध देकर कहकर
समझाओ, मैं सच्चाई से पूछती हूँ, हंसी नही है । (उसका) कौन पिता है; कौन माता
है; कौन स्त्री है तथा कौन दासी है । कैसा रङ्ग है, कैसा वेष है, किस रस की अभि-
लाषा करता है । यदि छल-छंद करते हो तो अपने किये का फल पाओगे । सूरदास कहते
हैं, बावले से उद्धव सुनते ही चुप रह गये, उनकी सभी बुद्धि नष्ट हो गयी ॥७७॥
कहियौ ठकुराइति हम जानी ।
अब दिन चारि चलहु गोकुल मैं, सेवहु आइ बहुरि रजधानी ।
हमकौँ हौंस बहुत देखन की, संग लियें कुबिजा पटरानी ।
पहुनाई ब्रज कौ दधि माखन, बड़ौ पलँग अरु तातौ पानी ।
तुम जनि डरौ उखल तौ तोरचौ, दाँवरिहू अब भई पुरानी ।
वह बल कहाँ जसोमति कैं कर, देह रावरैं सोच बुढ़ानी ।
सुरभी बाँटि दई ग्व़ालनि कौं, मोर-चन्द्रिका सब्रै उड़ानी ।
सूर नद जू के पालागौँ, देखहु आइ राधिका स्यानी ॥७८॥
अर्थ—(उद्धव उनसे) कहना कि हमने (तुम्हारा) प्रभुत्व जान लिया । अब
(दो) चार दिन के लिए गोकुल चलो फिर आकर राजधानी का सेवन करना । हमको
साथ मे कुब्जा रानी को लिए हुए (कृष्ण को) देखने की बड़ी इच्छो है । ब्रज के दही-
मक्खन का आतिथ्य, बड़ा पलंग और गर्म पानी (तुम्हें प्राप्त होगा) । तुम डरना मत
ऊखल तो तोड़ दिया और उसकी रस्सी भी पुरानी हो गयी है । यशोदा के शरीर में वह
बल कहाँ है और साथ ही, (क्योकि) तुम्हारे सोच मे बुड्ढी भी हो गयी हैं । गायो को
ग्वालो को बाट दिया तथा सभी मोर चन्द्रिकाएँ उड़ गयी । सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती हैं) (कृष्ण आकर) नद के चरण लगे तथा आकर सयानी राधा को देखे ॥७८॥
सुनि सुनि ऊधौ आवति हाँसी ।
कहँ वै ब्रह्मादिक के ठाकुर, कहँा कस की दासी ।
इंद्रादिक की कौन चलावै, संकर करत खवासी ।
निगम आदि बंदीजन जाके, सेष सीस के बासी ।
जाकैँ रमा रहति चरननि तर, कौन गनै 'कुबिजा सी ।
सूरदास-प्रभु दृढ़ करि बाँधे, प्रेम-पुज की पासी ॥७६॥
अर्थ—उद्धव ! सुन सुनकर हंसी आती है । कहां वे (कृष्ण) ब्रह्मादि के स्वामी

उद्धव संदेश २८३
कहाँ वह कंस की दासी (कुब्जा) । इन्द्रादि की कौन चलाये शंकर भी (कृष्ण की)
चाकरी करते हैं । निगम आदि जिसके वन्दीजन हैं तथा शेष के सिर के नीचे निवास
है । लक्ष्मी जिनके चरणों के नीचे रहती हैं, कुब्जा जैसी (स्त्री) की गणना कौन करे ?
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) प्रेम पुज के पाश में उसने (कृष्ण को) दृढ़ता से
बांध लिया ॥७६॥
काहे कौं गोपीनाथ कहावत ।
जौ मधुकर वै स्याम हमारे, क्यों न इहाँ लौं आवत ।
सपने कौ पहिचानि मानि जिय, हमहिं कलंक लगावत ।
जो पै कृष्ण कूबरी रीझे, सोइ किन बिरद बुलावत ।
ज्यों गजराज काज के औरै, औरै दसन दिखावत ।
ऐसे हम कहिबे सुनिबे कौं, सूर अनत विरमावत ॥८०॥
अर्थ—(कृष्ण) क्यों गोपीनाथ कहलाते हैं ? यदि वे कृष्ण हमारे हैं तो उद्धव
उन्हे यहाँ क्यों नही ले आते । मन मे स्वप्न का परिचय मानकर हमे कलंक लगाते हैं ।
(यदि) कृष्ण कुबरी से रीझ गये हैं, तो उन्हे इस विरद से क्यो बुलाया जाता है ? जैसे
हाथी के दांत काम के लिए और होते हैं, दिखाने के लिए ओर, वैसे ही हम कहने-सुनने
के लिए हैं (कृष्ण तो) अन्यत्र (कुब्जादि के पास) रमते हैं ॥८०॥
साँवरौ सांवरी रैनि कौ जायौ ।
आधी राति कंस के त्रासन, वसुद्यौ गोकुल ल्यायो ।
नंद पिता अरु मातु जसोदा, माखन नही खवायौ ।
हाथ लकुट कामरि काँधे पर, बछरुन साथ डुलायौ ।
कहा भयौ मधुपुरी अवतरे, गोपीनाथ कहायौ ।
ब्रज बधुअनि मिलि साँट कटीली, कपि ज्यों नाच नचायौ ।
अब लौं कहाँ रहे हो ऊधौ, लिखि-लिखि जोग पठायौ ।
सूरदास हम यहै परेखौ, कुवरी हाथ बिकायौ ॥८१॥
अर्थ—श्याम काली रात के पैदा हैं । कंस के भय से आधी रात मे वसुदेव के
द्वारा गोकुल ले आये गये । पिता नन्द तथा माता यशोदा ने माखन तथा मट्ठा खिलाया ।
उन्होंने हाथ मे लाठी तथा कंधे पर कमरी रखकर वछड़ो के साथ घुमाया । मधुपुरी मे
जन्म लेने से तथा गोपीनाथ कहलाने से क्या होता है ? ब्रज की वधुओं ने कँटीली
साँटी लेकर (कृष्ण को) बंदर की तरह नाच नचाया । अब तक उद्धव तुम कहाँ थे
(जो आज कृष्ण ने) लिख-लिखकर योग भेजा है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
है) अब तो हमे यही पश्चात्ताप है कि (कृष्ण) कुवरी के हाथ बिक गये ॥८१॥
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै ।
मूरी के पालनि के बदलैं, को मुक्ताहल दैहै ।

२८४ सूरसागर सार, सटीक
यह ब्यौपार तुम्हारौ ऊधौ, ऐसैं ही धरचौ रैहै।
जिन पै तैं लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै।
दाख छांड़ि कै कटुक निबौरी, को अपने मुख खैहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरैं, को निरगुन निरवैहै॥८२॥
अर्थ—योग की ठगमाया यहां नही बिकेगी। मूली के पत्तो के बदले, मुक्ताहल
कौन देगा। उद्धव ! तुम्हारी यह व्यापार (की सामग्री) ऐसे ही रखी रह जायेगी।
जिनसे लाये हो उन्ही के पेट मे यह समायेगी। द्राक्ष (अंगूर) छोडकर कटु निम्ब फल
कौन अपने मुख मे डालेगा। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) हम कृष्ण के गुणो
को समझ कर उन पर मोहित हुई हैं अतः हम निर्गुण से निर्वाह कैसे कर सकती
हैं? ॥८२॥
मीठी बातनि मैं कहा लीजै।
जौ पै वै हरि होहिं हमारे, करन कहैं सोइ कीजै।
जिन मोहन अपनैं कर काननि, करनफूल पहिराए।
तिन मोहन माटी के मुद्रा, मधुकर हाथ पठाए।
एक दिवस बेनी बृन्दावन, रचि पचि बिबिध बनाइ।
ते अब कहत जटा माथे पर, बदलौ नाम कन्हाइ।
लाइ सुगन्ध बनाइ आभूषण, अरु कीन्ही अरधंग।
सो वै अब कहि-कहि पठवत हैं, भसम चढ़ावन अंग।
हम कहा करैं दूरि नँद-नंदन, तुम जु मधुप मधुपाती।
सूर न होहिं स्याम के मुख की, जाहु न जारहु छाती ॥८३॥
अर्थ—मीठी बातों मे क्या (मजा) लिया जाय। जो यदि वे कृष्ण हमारे (ही)
हैं तो (जो) करने के लिए कहते है वही कीजिये। जिन मोहन ने अपने हाथो से कान
मे कर्णफूल पहनाये, उन्ही मोहन ने उद्धव के हाथ से मिट्टी की मुद्रा भेजी है। जिन्होंने
एक दिन वृन्दावन में विविध प्रकार से रच-रचकर वेणी गूंथी, वही अब मस्तक पर
जटा धारण करने को कहते हैं, (इस तरह) उनका 'कन्हाइ' नाम बदल दो। कृष्ण
सुगंधित (पुष्प) लाकर, आभूषण बनाकर (हमे) अर्धांगिनी (पत्नी) बनाया। वही अब
अंगो पर भस्म चढ़ाने के लिए कह-कह भेजते हैं। हम क्या करे कृष्ण दूर हैं तुम मधु
पर गिरने (पतित होने) वाले भ्रमर ठहरे ! ये बाते कृष्ण के मुख की नही हैं, जाओ
(हमारी) छाती न जलाओ ॥८३॥
ऊधौ तुम हौ निकट के बासी।
यह निरगुन लै तिनहिं सुनावहु, जे मुड़िया बसैं कासी।
मुरलीधरन सकल अंग सुन्दर, रूप सिंधु की रासी।
जोग बटोरे लिए फिरत हौ, ब्रजवासिन की फाँसी।

उद्धव संदेश २६५
राजकुमार भलेँ हम जाने, घर मैँ कंस की दासी।
सूरदास जदुकुलहिँ लजावत, ब्रज मैं होति है हाँसी ॥८४॥
अर्थ--उद्धव, तुम पास के रहने वाले हो। यह निर्गुण लेकर उन्हें सुनाओ जो
सिर मुड़ाये हुए (संन्यासी) काशी में बसते हैं। मुरली धरने वाले (कृष्ण के) समस्त
अंग सुन्दर है (वह) रूप-सिंधु की राशि है। (तुम) योग बटोरकर लिए फिरते हो,
(जो) ब्रजवासियों के लिए फांसी के समान है। राजकुमार (कृष्ण) को हम भली-भाँति
जानती हैं, (तथा उनके) घर में (जो) कंस की दासी (कुबरी) है (वह भी ज्ञात है)।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कृष्ण) यदुकुल को लज्जित करते हैं, तथा ब्रज
में हँसी होती है ॥८४॥
जा दिन तैँ गोपाल चले ।
ता दिन तैँ ऊधौ या ब्रज के, सब स्वभाव बदले ।
घटे अहार बिहार हरष हित, सुख सोभा गुन गान ।
ओज तेज सब रहित सकल बिधि, आरति असम समान ।
बाढ़ी निसा, बलय आभूषन, उर-कंचुकी उसास ।
नैननि जल अंजन अंचल प्रति, आवन अवधि की आस ।
अब यह दसा प्रगट या तन की, कहियौ जाइ सुनाइ ।
सूरदास प्रभु सो कीजौ जिहिँ, बेगि मिलहिँ अब आइ ॥८५॥
अर्थ—जिस दिन से गोपाल गये, उसी दिन से उद्धव, इस ब्रज का सब स्वभाव
बदल गया। आहार, विहार, हर्ष, स्नेह, सुख, शोभा, गुणगान (सब कुछ) घट गया।
सब तरह से ओज-तेज सबसे रहित हो गये तथा सभी समान रूप से आर्त्त तथा अन्य-
वस्थित है। रात बढ़ गयी, केयूर-कंकण आदि तथा अन्य आभूषण (बढ़े पड गये)।
वक्ष पर कंचुकियां और उसासें बढ़ गई। नेत्रो का जल अंजन को आंचल की ओर (बहा
ले जाता है) केवल आने की अवधि की आशा है। प्रत्यक्ष ही इस शरीर की दशा को
जाकर सुनाकर कहना। सूरदास कहते हैं (गोपियां ऊधो से कहती हैं) कृष्ण से कुछ
ऐसा उपाय कीजिएगा ताकि अब तो शीघ्र आकर मिल जाएं ॥८५॥
हम तौ कान्ह केलि की भूखी।
कहा करैँ लै निगुर्न तुम्हरौ, बिरहिनि बिरह बिदूषी ।
कहियै कहा यहै नहिं जानत, कही जोग किहि जोग ।
पालगौँ तुमहीँ सेवा पुर, बसत बावरे लोग ।
चंदन, अभरन, चीर चारु बर, नेकु आप तन कीजै ।
दंड, कमंडल, भसम, अधारी, तब जुवतिनि कौँ दीजै ।
सूर देखि दृढ़ता गोपिन की, ऊधौ दृढ़ व्रत पायौ ।
करी कृपा जदुनाथ मधुप कौँ, प्रेमहिँ पढ़न पठायौ ॥८६॥

२८६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—हम तो कृष्ण के (साथ) क्रीडा (करने) की भूखी हैं। (हम) विरहिणियां
विरह से दुखी होकर तुम्हारे निर्गुण को लेकर क्या करे ? क्या कहे हम यही नहीं
जानती; बताइए योग किस योग्य है। तुम्हारे पैर पकडकर कहती हूँ, कि तुम्हारे ही
समान उस पुरी में बावरे लोग बसते है। यदि आप तनिक चन्दन, आभूषण, श्रेष्ठ
सुन्दर चीर अपने शरीर पर धारण करे तो, तब युवतियो को दंड-कमंडल, भस्म तथा
अधारी (काठ के डंडे मे लगे हाथ टेकने की हत्थी) आदि दीजिये । सूरदास कहते है
गोंपियों की दृढ़ता देखकर उद्धव ने दृढ़ व्रत प्राप्त किया। कृष्ण ने कृपा की जो कि
मधुप (उद्धव) को प्रेम (का पाठ) पढ़ने को भेजा ॥८६॥
चौथा संवाद
गोपी सुनहु हरि संदेस ।
कह्यौ पूरन ब्रह्म ध्यावहु, त्रिगुन मिथ्या भेष ।
मैं कहौं सो सत्य मानहु, सगुन डारहु नाखि ।
पंच त्रय-गुन सकल देही, जगत ऐसौ भाषि ।
ज्ञान बिनु नर-मुक्ति नाहीं, यह विषय संसार ।
रूप-रेख, न नाम जल-थल, वरन अवरन सार ।
मातु-पितु कोउ नाहिं नारी, जगत मिथ्या लाइ ।
सूर सुख-दुख नहीं जाकैं, भजौ ताकौं जाइ ॥८७॥
अर्थ—गोपी कृष्ण का संदेश सुनो ! (उन्होने) कहा है, पूर्ण ब्रह्म का ध्यान
करो, त्रिगुणात्मक सृष्टि का रूप मिथ्या है। मैं जो कहता हूँ उसे सत्य मानो, सगुण
को नष्ट कर डालो । समस्त जीव पांच तत्व तथा तीन गुण (से बने है), संसार को
ऐसा कहो । ज्ञान के बिना मनुष्य की इस विषय युक्त संसार से मुक्ति नहीं है । जिसकी
रूप-रेखा नहीं है तथा जल-थल मे न तो नाम है, वर्ण-अवर्ण ही सार तत्व है (उसके)
माता, पिता तथा कोई स्त्री नहीं (वह) संसार को मिथ्या बनाया है । सूरदास कहते है
(ऊधो कहते है) जिसके सुख-दुःख दोनो नहीं है उसे जाकर भजो ॥८७॥
ऐसी बात कहौ जनि ऊधौ ।
कमलनैन की कानि करति हैं, आवत बचन न सूधौ ।
बातनि ही उड़ि जाहिं और ज्यों, त्यौ' नाहीं हम काँची ।
मन, बच, कर्म सोधि एकै मत, नंद-नंदन रंग राँची ।
सो कछु जतन करौ पालागौँ, मिटै हियै की सूल ।
मुरलीधरहिं आनि दिखरावहु, ओढ़े पीत दुकूल ।
इनहीं बातनि भए स्याम तनु, मिलवत हौ गढ़ी छोलि ।
सूर बचन सुनि रह्यौ ठगौसौ, बहुरि न आयौ बोलि ॥८८॥
अर्थ—ऊद्धव, ऐसी बात मत कहो । कमल नेत्र कृष्ण की मर्यादा रखती हूँ, नही
तो मुँह से सीधी बात न निकलती (गाली आती) । बातों से जो उड़ जाते है, वैसे हम

उद्धव संदेश / २६७
कच्चो नहीं हैं । मन-वचन, कर्म से शोधकर (जांचकर) एक मत से कृष्ण के रंग मे
रंगी हैं । पैर पडती हैं, तुम कुछ ऐसा यत्न करो जिससे हृदय का दुःख मिट जाय ।
पीताम्बर ओढ़े हुए कृष्ण को लाकर दिखा दो । इन्ही बातो से (उद्धव तुम) साँवले
शरीर वाले हो गये जो बना संवारकर झूठी बात मिलाते हो । सूरदास कहते हैं उद्धव,
इन वचनो को सुनकर ठगे से रह गये फिर बात नही फूटी ॥८८॥
फिरि फिरि कहा बनावत वात ।
प्रातकाल उठि खेलत ऊधौ, घर-घर माखन खात ।
जिनकी बात कहत तुम हमसौँ, सो है हमसौँ दूरि ।
ह्याँ हैं निकट जसोदा-नंदन, प्रान सजीवन मूरि ।
बालक संग लिएँ दधि चोरत, खात खवावत डोलत ।
सूर सीस नीचौ कत नावत, अब काहैँ नहिं बोलत ॥८६॥
अर्थ—बार-बार क्यो बात बनाते हो । हे उद्धव ! (कृष्ण) (हमारी समझ से
वोही है) जो प्रातःकाल उठकर खेलते है तथा घर-घर माखन खाते है। जिन (निर्गुण)
की बात हमसे कहते हो, वे हमसे बहुत दूर है। यहां तो प्राणो की संजीवनी मूल
यशोदा-नंदन निकट हैं। वे बालको को साथ लिए दही चुराते है, खाते-खिलाते घूमते
हैं। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) उद्धव, सिर नीचे क्यों नमित करते हो, अब
क्यो बोलते नही ? ॥८६॥
फिरि-फिरि कहां सिखावत मौन ।
बचन दुसह लागत अलि तेरे, ज्यों पजरे पर लौन ।
सृंगी, मुद्रा, भस्म, त्वचा-मृग, अरु अवराधन पौन ।
हम अबला अहीरि सठ मधुकर, धरि जानहिं कहि कौन ।
यह मतं जाइ तिनहिं तुम सिखवहु, जिनहिं आजु सब सोहत ।
सूरदास कहूँ सुनी न देखी, पोत सूतरी पोहत ॥६०॥
अर्थ—वार-वार क्यो मौन (साधने की) शिक्षा देते हो । भ्रमर (उद्धव) तुम्हारे
वचन दुसह लगते हैं जैसे जले पर नमक । श्रृंगी, मुद्रा, भस्म, मृग-छाला और प्राणायाम
की आराधना हम अहीर की निर्बुद्ध अबलाये इसे धारण करना क्या जाने, तुम्ही बताओ ।
यह मत तुम उन्हें सिखाओ, जिन्हें आज सब अच्छा लगता है। सूरदास कहते है (गोपियां
कहती है) सुतली से मोती पिरोते हुए, न तो हमने कही सुना है, न देखा है ॥६०॥
ऊधौ हमहिं न जोग सिखैयै ।
जिहिं उपदेस मिलैं हरि हमकोँ, सो ब्रत नेम बतैयै ।
मुक्ति रहौ घर बैठि आपने, निर्गुन सुनि दुख पैयै ।
जिहिं सिर केस कुसुम भरि गूँदे, कैसेँ भस्म चढ़ैयै ।

२६८ सूरसागर सार सटीक
जानि जानि सब मगन भई हैं, आपुन आपु लखैयै ।
सूरदास-प्रभु सुनहु नधौ निधि, बहुरि कि इहिं ब्रज अइयै ॥६१॥
अर्थ—उद्धव ! हमें योग न सिखाइये । जिस उपदेश से कृष्ण हमको मिलें,वही
व्रत तथा नियम बताइए । मुक्ति अपने घर बैठी रहे तथा निर्गुण को सुनकर दुःख पाती
हूँ । जिस सिर पर के बालो को फूलो से गूंथा उसमें भस्म कैसे चढ़ाया जाय । जान-
जानकर सब मग्न हुई है, (कृष्ण) अपने आप को दिखाइए । सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती है) हे नवों निधि (कृष्ण) सुनो, लौटकर फिर क्या इस ब्रज में आइयेगा ॥६१॥
मधुकर स्याम हमारे ईस ।
तिनकौ ध्यान धरैं निसि बासर, औरहिं नवै न सीस ।
जोगिनि जाइ जोग उपदेसहु, जिनके मन दस-बीस ।
एकै चित एकै वह मूरति, तिन चितवतिं दिन तीस ।
काहैं निरगुन ग्यान आपनौ, जित कित डारत खीस ।
सूरदास प्रभु नंद-नँदन बिनु, हमरे को जगदीस ॥६२॥
अर्थ—भ्रमर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे ईश्वर हैं । उनका रात-दिन ध्यान करती
हूँ अन्य के आगे सिर नही झुकाती । जाकर योगिनियो को उपदेश दीजिए, जिनके दस-
बीस मन हैं । हमारे एक ही चित्त है वह कृष्ण की (अद्वितीय) एक मूर्ति है, उसे ही
तीसो दिन (सदा) (मन) देखता रहता है । तुम अपने निर्गुण ज्ञान को इधर-उधर
क्यो नष्ट किये देते हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना हमारे
कौन जगदीश हैं ॥६२॥
सतगुरु चरन भजे बिनु विद्या, कह कैसैँ कोउ पावै ।
उपदेसक हरि दूरि रहे तैं, क्यों हमरे मन आवै ।
जो हित कियौ तौ अधिक करहिं किन, आपुन आनि सिखावैं ।
जोग बोझ तैं चलि न सकैं तौ, हमहीं क्यौं न बुलावैं ।
जोग ज्ञान मुनि नगर तजे बरु, सघन गहन बन धावैं ।
आसन मौन नेम मन सजम, बिपिन मध्य बनि आवैं ।
आपुन कहैं करैं कछु औरै, हम सबहिनि डहकावैं ।
सूरदास ऊधौ सौं स्यामा, अति संकेत जनावैं ॥६३॥
अर्थ—सतगुरु के चरण की सेवा के बिना कहो, कोई कैसे विद्या प्राप्त करता है ।
उपदेशक कृष्ण के दूर रहने से उपदेश क्यों कर (उपदेश) मेरे मन मे आवे । जैसा हित
(उन्होने) किया वैसा कौन करेगा, (किन्तु यदि वास्तव मे सीख देना ही हो तो) स्वयं
आकर सिखा दे । योग के बोझ से यदि चल नही सकते तो हमें ही क्यो नही बुला लेते ।
योग के ज्ञान के लिए मुनियो द्वारा नगर छोड़कर वनो मे ध्यान किया जाता है । आसन,
मौन, नियम, मन का संयम वन के बीच ही सिद्ध होते है । आप (कृष्ण) की कथनी-करनी

उद्धव संदेश २९९
में भिन्नता है, वे हम सबको बहका रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि राधा उद्धव को (यह
तथ्य) अत्यधिक संकेत से समझाती है ॥६३॥
ऊधौ मन नहिं हाथ हमारे ।
रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मधुरा जबहिं सिधारे ।
नातरु कहा जोग हम छाँड़हिं, अति रुचि कै तुम ल्याए ।
हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए ।
अजहूँ मन अपनौ हम पावैं, तुम तैं होइ तो होइ ।
सूर सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैंगी सोइ ॥६४॥
अर्थ—उद्धव ! मन हमारे (हाथ) वश में नहीं है । कृष्ण ने जब मथुरा के लिए
प्रस्थान किया तो रथ पर चढ़ाकर उसे भी (मन को भी) साथ लेते गये, नही तो हम
योग को कैसे छोड़ती, जिसे तुम अत्यधिक चाव से लाये हो । हम तो कृष्ण की करनी
पर झुंझलाती हैं जो कि मन को लेकर बदले में योग भेज दिया । अब भी यदि हम
अपना मन पा जायें, यदि आपसे कुछ सम्भव हो सके तो सूरदास कहते है (गोपियाँ
कहती हैं) हमें तुम्हारी हजारों सोगन्ध है, (उसके बाद) जो कहोगे वही करूँगी ॥६४॥
ऊधौ मन न भए दस बीस ।
एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस ।
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस ।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ।
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस ।
सूर हमारैं नंद-नँदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥६५॥
अर्थ—उद्धव ! हमारे दस बीस (अनेक) मन नहीं हुए । एक था वह कृष्ण के
साथ चला गया, अब (निर्गुण) ईश्वर की आराधना कौन करे । कृष्ण के बिना इन्द्रियां
शिथिल हो गयी, जैसे बिना सिर के देह । आशा से ही शरीर मे श्वास आती जाती है
(सांस लगी है), (आशा में ही) सैकड़ों वर्ष जीवित रहूँगी । तुम तो कृष्ण के मित्र हो
तथा समस्त योग के स्वामी हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण के
सिवाय हमारे कोई जगदीश (आराध्य) नहीं हैं ॥६५॥
इहिं उर माखन चोर गड़े ।
अब कैसैं निकसत सुनि ऊधो, तिरछे ह्वै जु अडे ।
जदपि अहीर जसोदा-नंदन, कैसैं जात छँड़े ।
ह्वाँ जादौपति प्रभु कहियत हैं, हमैं न लगत बड़े ।
को बसुदेव देवकी नंदन, को जानै को बूझै ।
सूर नंद-नंदन के देखत, और न कोऊ सूझै ॥६६॥
अर्थ—यहां हृदय में माखन चोर कृष्ण गढ़े हैं । ऊधो, अब वे कैसे निकल सकते
है क्योंकि (वे) तिरछे होकर अड़ गये है । यद्यपि कृष्ण अहीर हैं (फिर भी) कैसे छोड़े

३०० सूरसागर सार सटीक
जा सकते है। वहाँ वे यादव पति स्वामी कहलाते हैं लेकिन हमे वटे नही लगते ।
कौन देवकी वसुदेव ( की बात करे ), फोन जाने तथा कौन समझे । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती है) कृष्ण को देखते और मुझे अन्य कोई नही सूझता ॥६६॥
मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर ।
नंद-नंदन अछत कैसैं, आनियै उर और ।
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत राति ।
हृदय तैं वह मदन मूरति, छिन न इत उत जाति ।
कहत कथा अनेक ऊधौ, लोग लोभ दिखाइ ।
कह करौं मन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समाइ ।
स्याम गात सरोज आनन, ललित मृदु मुख हास ।
सूर इनकेँ दरस कारन, मरत लोचन प्यास ॥६७॥
अर्थ—मन मे स्थान अवशिष्ट (बचा) नही है । कृष्ण के रहते हुए हृदय मे
किसी और को कैसे लाया जाय ? चलते, देखते, दिन मे जागते, स्वप्न तथा रात मे
सोते हृदय से वह कामदेव तुल्य (कृष्ण की) मूर्ति क्षण भर भी इधर-उधर नही जाती ।
उद्धव ! लोग लालच दिखाकर अनेक कथाये कहते है लेकिन क्या करूँ, मन प्रेम से पूर्ण
है और घडे मे सागर समा (भी) नही सकता । श्याम शरीर, कमलमुख, ललित तथा
मधुर हंसी के दर्शन के लिए नेत्र प्यासे मरते हैं ॥६७॥
मधुकर स्याम हमारे चोर ।
मन हरि लियौ तनक चितवनि मैं, चपल नैन की कोर ।
पकरे हुते हृदय उर अंतर, प्रेम प्रीत कैं जोर ।
गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन, दै गए हँसनि अंकोर ।
चौंकि परीं जागत निसि बीती, दूत मिल्यौ इक भौंर ।
सूरदास प्रभु सरबस लुट्यौ, नागर नवल-किसोर ॥६८॥
अर्थ—मधुकर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे (मन) को चुराने वाले हैं । चंचल नयनो
के कोर से, क्षणिक निगाह से मेरे मन को चुरा लिया । हृदय के अन्दर प्रेम के बल से
उन्हे पकड रखा था । हँसी का घूस ( अस्थायी सुख ) देकर, सारे वधनों को छुड़ाकर
तथा (बधनो को) तोड़कर मुक्त हो गए । इसके बाद चौक कर जग पडी तथा रात
जागते ही बीत गयी, बाद मे दूर पर एक भ्रमर (उद्धव) मिला । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती हैं) चतुर नवल किशोर कृष्ण सर्वस्व लूट ले गये ॥६८॥
सब दिन एकहिं से नहिं होतैं ।
तब अलि ससि सीरी अब ताती, भयो बिरह जरि मोतैं ।
तब षट मास रास-रस-अंतर, एकहु निमिष न जाने ।
अब औरै गति भई कान्ह बिनु, पल पूरन जुग माने ।

उद्धव संदेश ३०१
कह मति जोग ज्ञान साखा श्रुति, ते किन कहे घनेरे ।
अब कछु और सुहाइ सूर नहिं, सुमिरि स्याम गुनि केरे ॥६६॥
अर्थ- 'सभी दिन एक से नहीं होते । उद्धव ! तब चन्द्रमा शीतल लगता था,
अब विरह-ज्वर में तप्त हो गया है। छह महीना रास रस के बीच (साथ) एक क्षण के
समान भी नहीं लगता था, अब कृष्ण के बिना और ही दशा हो गयी। एक पल पूर्ण
युग के समान मानती हूँ। (इस समय) योग, ज्ञान, वेद की शाखाओं में बुद्धि लगाने से
क्या होता है तथा उनका घना उपदेश भी व्यर्थ है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) कृष्ण के गुणों का स्मरण करने के सिवाय कुछ सुहाता नहीं है ॥६६॥
सखी री स्याम सबै इक सार ।
मीठे बचन सुहाए बोलत, अंतर जारनहार ।
भँवर कुरंग काक अरु कोकिल, कपटिन की चटसार ।
कमलनैन मधुपूरी सिधारे, मिटि गयौ मङ्गलचार ।
सुनहु सखी री दोष न काहू, जो बिधि लिख्यौ लिलार ।
यह करतूति उनहिँ की नाहीं, पूरब बिबिध बिचार ।
कारी घटा देखि बादर की, सोभा देति अपार ।
सूरदास सरिता सर पोषत, चातक करत पुकार ॥१००॥
अर्थ-सखी सभी सांवले (लोग) एक समान हैं। (ऊपर से) सुहाने वाला मीठा
बचन बोलते हैं, किन्तु अंतर में जलाने वाले होते हैं। भँवर, कुरंग (मृग), कौवा और
कोयल, सब कपटियों की पाठशाला (के सदस्य) हैं । कमल के समान आंख वाले कृष्ण
मथुरा चले गये, सारे मंगलाचार मिट गये । सखी सुनो ! किसी का दोष नहीं है जो
भाग्य में लिखा होता है (वही होता है) । यह कार्य उन्हीं का ही नहीं है, विविध प्रकार
से पूर्व निर्धारित विचार है। बादल की काली घटा देखो तो वह अपार शोभा देती
है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि वह घटा नदी तथा तालाब को तो (जल
से) पोषित (पूर्ण) करती है। लेकिन पपीहा पुकार ही करता रह जाता है ॥१००॥
बिलग जनि मानौ ऊधौ कारे ।
वह मथुरा काजर की ओबरि, जे आवैं ते कारे ।
तुम कारे सुफलक सुत कारे, कारे कुटिल सँवारे ।
कमलनैन को कौन चलावैं, सबहिनि मैँ मनियारे ।
मानौ नील माट तैँ काढे, जमुना आइ पखारे ।
तातैँ स्याम भई कालिंदी, सूर स्याम गुन न्यारे ॥१०१॥
अर्थ - उद्धव ! काले लोगों को अलग मत मानो। वह मथुरा काजल की
कोठरी है, (वहाँ) से जो आता है वही काला होता है। तुम काले हो, सुफलक के पुत्र
अक्रूर काले थे तथा कुटिल सांवले (कृष्ण काले हैं)। कमल नेत्र (कृष्ण) के लिए क्या
कहा जाय, सभी में चमकीले हैं (बढकर हैं)। मानों वे (कृष्ण) नील के घडे से काढ़े

३०२ सूरसागर सार सटीक

गये हैं तथा यमुना में आकर (शरीर) को धो लिया, इसी से यमुना काली हो गयी ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के गुण अनोखे हैं ॥१०१॥
ऊधौ भली भई ब्रज आए ।
विधि कुलाल कीन्हे काँचे घट, ते तुम आनि पकाए ।
रँग दीन्हौ हो कान्ह साँवरैँ, अँग-अँग चित्र बनाए ।
यातैँ गरे न नैन नेहु तैँ, अवधि अटा पर छाए ।
ब्रज करि आँवा जोग ईंधन करि, सुरति आनि सुलगाए ।
फूंक उसास विरह प्रजरनि संग, ध्यान दरस सियराए ।
भरे संपूरन सकल प्रेम-जल, छुवन न काहू पाए ।
राज काज तैँ गए सूर प्रभु, नंद-नंदन कर लाए ॥१०२॥
अर्थ—अच्छा हुआ उद्धव ! ब्रज चले आये । तुमने ब्रह्मा रूपी कुम्हार से बनाये
गये कच्चे (शरीर रूपी) घडे को आकर पका दिया तथा कृष्ण के साँवले रंग मे रंग
दिया तथा अंग-अंग से चित्र (कृष्ण के रूप चित्र) का निर्माण कर दिया । अवधि-रूपी
अटारी के छाये हुए होने के कारण नेत्राश्रुओं के प्रवाह से गलने नही पाते । ब्रज को
आंवा बनाकर, योग का ईंधन लगाकर स्मृति की आग सुलगा दी । विरह की
ज्वालाओं के साथ उच्छ्वास (रूपी) हवा से फूंक दिया तथा दर्शन के ध्यान से शीतल
कर दिया । सब (सम्पूर्ण घट) प्रेम के जल से भर गया है उसे कोई छूने नही पाता ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण राज्य कार्य से चले गये । उद्धव ने कृष्ण
के समान हाथ लगाकर (सँवार) दिया ॥१०२॥
जौ पै हिरदै माँझ हरी ।
तौ कहि इती अवज्ञा उनपै, कैसैं सही परी ।
तब दावानल दहन न पायौ, अब इहिँ विरह जरी ।
तब तैँ निकसि नंद-नंदन हम, सीतल क्यौं न करी ।
दिन प्रति नैन इंद्र जल बरषत, घटत न एक घरी ।
अति ही सीत भीत तन भींजत, गिरि अंचल न धरी ।
कर-कंकन दरपन लै देखी, इहिँ अति अनख मरी ।
क्यौं अब जियहिँ जोग सुनि सूरज,बिरहिनि विरह भरी ॥१०३॥
अर्थ – जो (यदि) कृष्ण हृदय के अन्दर हैं, तो कहो उन पर इतनी अवज्ञा कैसे
सही जाती । तब दावानल से नही जलने पाए, अब विरह से जली (जा रही हूँ), हृदय
से निकल कर कृष्ण ने हमे शीतल क्यो नही किया । दिन प्रति दिन नेत्र रूपी इन्द्र
जल बरसाते हैं, एक भी घडी घटते नही; अत्यधिक शीतलता से भय युक्त शरीर भीगता
है लेकिन (कृष्ण) अचल रूपी पर्वत को धारण नही करते । हाथ के कंकण को दर्पण
लेकर देखा, यह शरीर झुंझलाहट से मृत हो गया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) विरह से भरी विरहिणियां योग को सुनकर कैसे जीवित रहे ॥१०३॥

उद्धव संदेश ३०३
ऐसौ जोग न हम पै होइ ।
आँखि मूंदि कह पावैं ढूंढे, अँधरे ज्यौं टकटोइ ।
भसम लगावन कहत जु हमको, अंग कुकमा धोइ ।
सुनि कै बचन तुम्हारे ऊधौ, नैना आवत रोइ ।
कुंतल कुटिल मुकुट कुंडल छबि, रही जु चित मैं पोइ ।
सूर प्रभू बिनु प्रान रहें नहिं, कोटि करौ किन कोइ ॥१०४॥
अर्थ-हमसे ऐसा योग नहीं हो सकता। आँख मूंदकर अन्धे की तरह टटोल
कर किसे ढूंढकर प्राप्त करूं। अंग के कुंकुम को धोकर जो हमको भस्म लगाने को
कहते हो तो उद्धव तुम्हारे बचन को सुनकर हमारे नेत्र रो-रोकर रक्तिम हो गए है ।
कृष्ण के घुंघराले बालो की लट तथा मुकुट और कुंडल की शोभा चित्त में पिरोयी है ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना प्राण नहीं रह सकते चाहे कोई
सैकड़ो उपाय करे ॥१०४॥
हमसौँ उनसौँ कौन सगाई ।
हम अहीर अबला ब्रजवासी, वें जदुपति जदुराई ।
कहा भयौ जु भए जदुनंदन, अब यह पदवी पाई ।
सकुच न आवत घोष बसत की, तजि ब्रज गए पराई ।
ऐसे भए उहाँ जादौपति, गए गोप बिसराई ।
सूरदास यह ब्रज कौ नातौ, भूलि गए बलभाई ॥१०५॥
अर्थ-हमसे और उन (कृष्ण) से क्या सम्बन्ध है ? हम अहीर की लडकी ब्रज-
वासी अबला है वे यदुराय तथा यदुपति है । यदुनंदन होने से क्या होता है, (उन्हें)
यह पदवी (अभी हाल में) मिली है । उन्हे ब्रज छोडकर पराये गांव में बसते संकोच
नहीं आता । ऐसे ही वहाँ यादव पति हो गये और गोपों को भुलाकर चले गये ।
सूरदास कहते हैं कि (गोपियां कहती हैं) इस ब्रज के नाते को कृष्ण भूल गये ॥१०५॥
तौ हम मानैँ बात तुम्हारी ।
अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी ।
मनिहैं तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी ।
भूत समान बतावत हमकौँ, डारहु स्याम बिसारी ।
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं, ते विष क्यौं अधिकारी ।
सूरदास-प्रभु एक अंग पर, रीझि रहीँ ब्रजनारी ॥१०६॥
अर्थ-उद्धव ! हम तुम्हारी बात तभी मान सकती है, जब मुकुट तथा पीताम्बर
को धारण किये हुये अपने ब्रह्म को दिखा दो । तब सभी गोपियां उसी के सम्बन्ध मे
कहेगी बल्कि यहाँ तक कि गाली भी सह लेगी। भूत की तरह हमे ब्रह्म की बात बताते
हो और कहते हो कि कृष्ण को भूल जाओ । जो मुंह सदा अमृत का पान करता है वह

३०४ सूरसागर सार सटीक
विष का अधिकारी कैसे हो सकता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के
एक ही अंग पर ब्रज की स्त्रियां रीझ गयी हैं ॥१०६॥
ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु ।
बाँधौ गाँठि छूटि परिहै कहूँ, फिरि पाछैं पछिताहु ।
ऐसौ बहुत अनूपम मधुकर, मरम न जानै और ।
ब्रज बनितनि के नहीं काम कौ, है तुम्हारेई ठौर ।
जौ हित करि पठयौ मनमोहन, सो हम तुमकौं दीनौं ।
सूरदास ज्यौं विप्र नारियर, करहीं वंदन कीनौ ॥१०७॥
अर्थ- उद्धव ! योग को भूल न जाओ । (योग की) बँधी हुई गांठ कही छूट न
पड़े, जिससे फिर पीछे पछताना पडे । मधुकर (यह योग) ऐसा अनुपम है, जिसका मर्म
कोई और नही जानता । यह ब्रज की स्त्रियों के लायक नही है इसके लिए तुम्हारे
ही पास स्थान है। जिसे स्नेह-पूर्वक कृष्ण ने भेजा है उसे हमने तुमको दे दिया ।
सूरदास कहते है ( गोपियां कहती हैं) ब्राह्मण के द्वारा दिये गये नारियल की तरह
उसकी वन्दना मैंने हाथ से ही कर ली ॥१०७॥
ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत ।
जु पै जोग लिखि पठयौ हमकौ, तुम्हहुँ न भस्म चढ़ावत ।
शृङ्गी मुद्रा भस्म अधारी, हमहीं कहा सिखावत ।
कुबिजा अधिक स्याम की प्यारी, ताहिँ नहीं पहिरावत ।
यह तौ हमकौँ तबहिँ न सिखयौ जब तैं गाइ चरावत ।
सूरदास प्रभु कौं कहियौ अब, लिखि-लिखि कहा पठावत ॥१०८॥
अर्थ--ऊधो ! तुम किसलिए (कृष्ण के) भक्त कहलाते हो, जो (कृष्ण ने) हमको
योग लिखकर भेजा है तथा तुम भी भस्म चढाते हो (भस्म चढाने की बात करते हो) ।
शृंगी, मुद्रा, भस्म तथा अधारी हम ही को क्यो सिखाते हो । कुबरी कृष्ण को अधिक
प्यारी है उसे क्यो नही पहनाते हो (सिखाते हो) । यह बात कृष्ण ने हमे उस समय
नही सिखायो जब गाय चराते थे । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण से
कहना (अब) लिख-लिखकर (योग) क्यो भेजते है ॥१०८॥
(ऊधो) ना हम बिरहिनि ना तुम दास ।
कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास ।
बिरही मीन मरै जल बिछुरैं, छांड़ि जियन की आस ।
दास भाव नहिँ तजत पपीहा, बरषत मरत पियास ।
पंकज परम कमल मैं विहरत, बिधि कियौ नीर निरास ।
राजिव रवि कौ दोष न मानत, ससि सौं सहज उदास ।
प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कैं बनवास ।
सूर स्याम सौं दृढ़ ब्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास ॥१०६॥

उद्धव संदेश ३०५
अर्थ-उद्धव ! न तो हम विरहिणी हैं न तो तुम (कृष्ण) के दास हो । कहते
सुनते शरीर मे प्राण रहता है, कृष्ण को छोड़कर शून्य को भजो । विरही मछली जल
से बिछुड़ने पर जीने की आशा छोड़कर मर जाती है । पपीहा दास भाव को नही
छोड़ता, पानी बरसते हुए भी प्यास से मरता है । (यद्यपि) कमल (पंकज) अत्यधिक
(परम) जल (कमल) मे विहार करता है (प्रस्फुटित होता है) और विधाता ने उसे जल
(नीर) से निराश कर दिया अर्थात् किरणों से जल को सीख लेता है, (तथापि) कमल
सूर्य का दोष नही मानता, किन्तु चन्द्रमा से सहज ही उदास हो जाता है । दशरथ ने
प्रियतम राम को वनवास देकर (प्राण देकर) प्रत्यक्ष प्रेम का पालन किया (गोपियाँ
कहती हैं) हमने जगत का उपहास मिटाकर कृष्ण से दृढ़ व्रत रखा ॥१०८॥
ऊधौ लै चल लै चल ।
जहाँ वै सुन्दर स्याम बिहारी, हमकौँ तहँ लै चल ।
आवन-आवन कहि गए ऊधौ, करि गए हमसौँ छल ।
हृदय की प्रीति स्याम जू जानत, कितिक दूरि गोकुल ।
आपुन जाइ मधुपुरी छाए, उहाँ रहे हिलि मिल ।
सूरदास स्वामी के बिछुरैँ, नैननि नीर प्रबल ॥११०॥
अर्थ-जहां कृष्ण बिहारी है उधो वही हमको ले चलो । कृष्ण आने के लिये
कह गये, किन्तु हम से छल ही कर गये । हृदय की प्रीति (यदि) कृष्ण जानते होते तो
गोकुल कितनी दूर है (ही) (आ सकते थे) । स्वयं जाकर मथुरा मे छा गये वहाँ हिल-
मिल कर रहने लगे । सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती है) कृष्ण के बिछुड़ने से नेत्रो से
प्रबल आंसू वह रहे हैं ॥११०॥
गुप्त मते की बात कहौं, जो कहौ न काहू आगैँ ।
कै हम जानैँ कै हरि तुम्हहूँ, इतनी पावहिँ माँगैँ ।
एक बेर खेलत वृन्दावन, कंटक चुभि गयौ पाइ ।
कंटक सौँ कंटक लै काढ़यौ, अपनैँ हाथ सुभाइ ।
एक दिवस बिहरत बन भीतर, मैं जु सुनाई भूख ।
पाके फल वै देखि मनोहर, चढ़े कृपा करि रूख ।
ऐसी प्रीति हमारी उनकी, बसतैँ गोकुल वास ।
सूरदास प्रभु सब बिसराई, मधुबन कियौ निवास ॥१११॥
अर्थ-रहस्य की बात कहती हूँ, जिसे किसी के आगे मत कहना । या तो
हम जाने या तुम यही (एक) हमारी माँग (हमे) मिले । एक बार वृन्दावन मे खेलते
हुए पांव मे कंटक चुभ गया । (कृष्ण ने) अपने सुन्दर हाथ से कंटक लेकर कंटक को
काढा । एक दिन वन मे घूमते हुए मैंने जो भूख सुनाया तो (कृष्ण) पके हुए मनोहर
फल को देखकर पेड़ पर चढ़ गये । गोकुल मे रहते हुए हमारी उनकी ऐसी प्रीति थी ।
२०

३०६ सूरसागर सार सटीक
सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण ने मधुवन में निवास करते ही सब कुछ
भुला दिया ।।१११।।
ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे ।
तौ तुम कहियौ जाइ कृपा करि, ए दुख सबै हमारे ।
तन तरिवर उर स्वास पवन मैँ, बिरह दवा अति जारे ।
नहिं सिरात नहिं जात छार ह्वै, सुलंगि-सुलगि भए कारे ।
जद्यपि प्रेम उमंगि जल सींचे, वरषि-बरषि घन हारे ।
जौ सींचे इहिँ भाँति जतन करि, तौ एतैँ प्रतिपारे ।
कीर कपोत कोकिला चातक, बधिक वियोग विडारे ।
क्यौँ जीवैँ इहिँ भाँति सूर प्रभु, ब्रज के लोग विचारे ।।११२।।
अर्थ—उद्धव ! यदि कृष्ण तुम्हारे हितैषी हैं तो उनसे जाकर कृपा करके कहना
हमारे दुख इस प्रकार हैं । शरीर रूपी वृक्ष मे सांस रूपी पवन ने विरह की दावाग्नि
को अत्यधिक प्रज्वलित कर दिया । न तो (शरीर) शीतल होता है न जलकर राख
हो जाता है बल्कि सुलग-सुलग कर काला हो गया है । यद्यपि प्रेम ने उमगकर जल
बरसाया तथा (आंखें रूपी वादल) वरस-वरस कर हार गये । जो इतने यत्न पूर्वक
इसे सींचा तो (किसी तरह ये) बचा पायी । वियोग रूपी वधिक ने तोता, कबूतर,
कोयल, चातक आदि को भगा दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) इस
प्रकार बेचारे ब्रज के लोग कैसे जीवित रहे ।।११२।।
बिलग हम मानैँ ऊधौ काकौ ।
तरसत रहे बसुदेव देवकी, नहिं हित मातु पिता कौ ।
काके मातु पिता को काको, दूध पियौ हरि जाकौ ।
नंद जसोदा लाड़ लड़ायौ, नाहिं भयौ हरि ताकौ ।
कहियौ जाइ बनाइ बात यह, को हित है अबला कौ ।
सूरदास प्रभु प्रीति है कासौँ, कुटिल मीत कुविजा कौ ।।११३।।
अर्थ—उद्धव, हम किस-किस बात का बुरा माने । (कृष्ण) वसुदेव तथा
देवकी के लिये तरसते रहे (यशोदा नन्द) माता-पिता के हित को नही माना । कौन
उनका माता-पिता है (माता-पिता वही है) जिनका कृष्ण ने दूध पिया है । नन्द तथा
यशोदा ने कृष्ण को लाड़-प्यार किया लेकिन कृष्ण उनके नही हुए । जाकर कृष्ण से
बात बनाकर कहना (हम) अबलाओं का (उनके) क्या हित है । सूरदास कहते है
(गोपियां कहती है) कुब्जा के कुटिल मित्र कृष्ण को किससे प्रेम है ।।११३।।
जीवन मुख देखे कौ नीकौ ।
दरस, परस दिन राति पाइयत, स्याम पियारे पी कौ ।
सुनौ जोग कहा लै कीजै, जहाँ ज्यान है जी कौ ।
नैननि गूँदि मूँदि कह देखौँ, बैवौ ज्ञान पोथी कौ ।

उद्धव संदेश ३०७

आछे सुन्दर स्याम हमारे, और जगत सब फीकौ ।
खाटे मही कहा रुचि मानै, सूर खवैया घी कौ ॥११४॥
अर्थ—जीवन (तुल्य कृष्ण का) सुन्दर मुख देखने के लिए है । प्यारे कृष्ण का
दर्शन तथा स्पर्श दिन रात पाती हूँ । सुनो योग लेकर क्या करूं जहां प्राण की भी
हानि है । नैन मूंद-मूंदकर क्या देखूं तथा ज्ञान की पोथी से कैसे बंधूं । हमारे कृष्ण
अच्छे तथा सुन्दर हैं और संसार में सभी फीके हैं । (गोपियां कहती हैं) घी के खाने
वाले को खट्टा मट्ठा कैसे रुचिकर होगा ॥११४॥
अपने सगुन गोपालहिं माई, इहिं विधि काहूँ देति ।
ऊधौ की इन मीठी बातनि, निर्गु न कैसैं लेति ।
धर्म, अर्थ, कामना सुनावत, सब सुख मुक्ति समेति ।
काकी भूख गई मन लाडू, सो देखहु चित चेति ।
जाकौ मोक्ष विचारत बरनत, निगम कहत हैं नेति ।
सूर स्याम तजि को भूस फटकै, मधुप तुम्हारे हेति ॥११५॥
अर्थ—सखी अपने सगुण गोपाल को इस प्रकार कैसे दूं । ऊधो की इन मीठी
बातों से निर्गुण को कैसे लूं ! धर्म, अर्थ तथा सब सुखो सहित मुक्ति की इच्छा
(की बात) सुनाते हैं । मन मे विचार करके देखो मन के लड्डू से किसकी भूख
जाती है । जिस मोक्ष को विचारते तथा वर्णन करते निगम उसे नेति-नेति कहते
हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण को छोड़कर (उद्धव) तुम्हारे लिये
कौन भूसा फटके ॥११५॥
पांचवां सवाद
वे हरि सकल ठौर के बासी ।
पूरन ब्रह्म अखंडित मंडित, पंडित मुनिन बिलासी ।
सप्त पताल ऊरध अध पृथ्वी, तल नभ बरुन बयारी ।
अभ्यंतर दृष्टी देखन कौं, कारन रूप मुरारी ।
मन, बुधि, चित, अहँकार दसेद्रिय, प्रेरक थंभनकारी ।
ताकैं काज वियोग बिचारत, ये अबला-ब्रजनारी ।
जाकौं जैसौ रूप मन रुचै, सो अपबस करि लीजै ।
आसन बैसन ध्यान धारणा, मन आरोहन कीजै ।
षट दल अठ द्वादस दल निरमल, अजपा जाप जपाली ।
त्रिकुटी संगम ब्रह्म द्वार भिदि, यौं मिलिहैं बनमाली ।
एकादस गीता श्रुति साखी, जिहिं विधि मुनि समुझाए ।
ते संदेस श्रीमुख गोपिनि कौ, सूर सु मधुप सुनाए ॥११६॥
अर्थ—वे कृष्ण सब जगह के निवासी (सर्वव्यापी) है । पूर्ण ब्रह्म अखड रूप से
शोभित तथा पंडित तथा मुनि लोगों को विलसित करने वाला है । सात पाताल, पृथ्वी

३०८ सूरसागर सार सटीक

के उर्ध्व और अध (ऊपर और नीचे) नभ, तल तथा वरुण (जल) और वायु के कारण
रूप मुरारी (कृष्ण को) देखने के लिए अन्तर दृष्टि की आवश्यकता है। मन, बुद्धि,
चित्त, अहकार तथा दसो इन्द्रियो को प्रेरित तथा स्तम्भित करने वाले कृष्ण के लिये
ये अबला नारियां वियोग का विचार करती । जिसको जैसा रूप रुचिकर हो उसे ही
अपने बस मे कर लो । आसन पर बैठो तथा ध्यान धारण करो तथा मन का आरोहण
कीजिये । छः दल कमल, आठ दल कमल, निर्मल बारह दल (पर ध्यान) तथा अजपा
जाप करो । त्रिकुटी के संगम तथा ब्रह्म द्वार को भेदकर वनमाली (कृष्ण से) मिलो ।
जिस तरह से सब मुनियो ने समझाया है, उसके लिये ग्यारह गीता साक्षो है। श्रीमुख
(कृष्ण के) सदेश को ऊधो ने इस प्रकार गोपियो को सुनाया ॥११६॥
ऊधौ हमारी सौं तुम जाहु ।
यह गोकुल पूनौ कौ चंदा, तुम ह्वै आए राहु ।
ग्रह के ग्रसे गुसा परगास्यौ, अब लौं करि निरबाहु ।
सब रस लै नंदलाल सिधारे, तुम पठाए बड़·साहु ।
जोग बेचि कै तदुल लौजै, बीच बसेरे खाहु !
सूरदास जबहीं उठि जैहौ, मिटिहै मन कौ दाहु ॥११७॥
अर्थ—ऊधो हमारी कसम तुम चले जाओ । यह गोकुल पूर्णिमा की चन्द्रमा है
तुम राहु होकर आये हो । ग्रह ग्रसे हम गोपियों को क्रोध दिलाते हो, अब तक उसका
निर्वाह किया, सब रस लेकर कृष्ण चले गये फिर बड़े सज्जन ने तुमको भेजा । योग
बेचकर चावल खरीद लो जिसे रास्ते के बसाव (टिकाव) मे खाना । सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) जब तुम उठकर जाओगे तभी हृदय की दाह मिटेगी ॥११७॥
ऊधौ मौन साधि रहे ।
जोग कहि पछिताति मन-मन, बहुरि कछु न कहै ।
स्याम कौं यह नहीं बूझै, अतिहि रहे खिसाइ ।
कहा मैं कहि-कहि लजानी, नार रह्यौ नवाई ।
प्रथम ही कहि बचन एकै, रह्यौ गुरु करि मानि ।
सूर प्रभु मोकौं पठायौ, यहै कारन जानि ॥११८॥
अर्थ—उद्धव ने चुप्पी साध ली । योग कहकर मन-ही-मन मे पछताते हैं फिर
कुछ नही कहा । कृष्ण के लिये यह उचित नही था, यह सोचकर क्रुद्ध हुये । पहले तो
मैं व्यर्थ ही कह-कहकर लज्जित हुआ तथा (ऊधो) गर्दन झुका ली । सूरदास कहते है
पहले एक ही वचन (सिद्धान्त अद्वैत) कह कर तथा मुझे गुरुवत् सम्मान देकर प्रभु ने
मुझे भेजा, उसका यही कारण जान पडता है (मुझे मूर्ख बनाने के लिये ही इस प्रकार
से कृष्ण ने भेजा यही रहस्य की बात मालूम पड़ती है) ॥११८॥
मधुकर भली करी तुम आए ।
वै बातैं कहि कहि या दुख में, ब्रज के लोग हँसाए ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण लिप्यंतरण है:

उद्धव संदेश ३०८
मोर मुकुट मुरली पीतांबर, पठवहु सौंज हमारी ।
आपुन जटाजूट, मुद्रा धरि, लीजै भस्म अधारी ।
कौन काज बृन्दावन कौ सुख, दही भात की छाक ।
अब वै स्याम कूबरी दोऊ, बने एक ही ताक ।
वै प्रभु बड़े सखा तुम उनके, जिनकैं सुगम अनीति ।
या जमुना जल कौ सुभाव यह, सूर विरह की प्रीति ॥११९६॥
अर्थ—उद्धव, तुम अच्छा किये जो चले आये । इस दुख में उन बातो को कह-कह
कर ब्रज के लोगों को हँसाया । मोर पंख का मुकुट, मुरली पीतांबर आदि मेरे सामान को
भेज दो। अपने जटा, जूट, मुद्रा, भस्म, अधारी आदि को अपने पास ही रखो । (कृष्ण
को) वृन्दावन के सुख से तथा दही-भात के छाक से क्या मतलब है ! अब वे कृष्ण
तथा कुबरी दोनों एक समान है। वे स्वामी है तुम उनके बड़े मित्र हो जिनकी अनीति
सुगम ही है। विरह का प्रेम यमुना के जल के समान (गत्यात्मक-अस्थिर) है ॥११९६॥
काहे कौं रोकत मारग सूधौ ।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तैं, राजपंथ क्यों रुँधौ ।
कै तुम सिखि पठाए हौ कुबिजा, कह्यौ स्याम घनहूँ धौं ।
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ी, जुवतिनि जोग कहूँ धौं ।
ताकौ कहा परेखौ कीजै, जानै छाँछ न दूधौ ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, व्याज निवेरत ऊधौ ॥११२०॥
अर्थ—सीधा मार्ग क्यो रोकते हो । उद्धव, सुनो निर्गुण काँटे से राजपथ क्यों
अवरुद्ध करते हो । क्या तुम कुबरी के द्वारा सिखाकर भेजे गये हो या कृष्ण ने भी कहा
है। वेद, पुराण, स्मृति सब कुछ ढूंढ डालो कही युवतियो के लिए योग (का विधान)
है । उनकी बातो को कैसे बुरा माना जाय जो दूध तथा मट्ठा जानता ही नही है (जो
इतना मूर्ख है कि दूध और मट्ठे का अन्तर नही जानता) । सूरदास कहते है (गोपियां
कहती हैं) अक्रूर (कृष्णधन) ले गये तथा उद्धव, तुम ब्याज वसूलने आये हो ॥११२०॥
ऊधौ कोउ नाहिंन अधिकारी ।
लै न जाहु यह जोग आपनौ, कत तुम होत दुखारी ।
यह तौ वेद उपनिषद मत है, महा पुरुष व्रतधारी ।
हम अबला अहीरि ब्रज-वासिनि, नाहीं परत सँभारी ।
को है सुनत कहत हौ कासौँ, कौन कथा विस्तारी ।
सूर स्याम कैं संग गयौ मन, अहि काँचुली उतारी ॥११२१॥
अर्थ—उद्धव ! यहाँ (योग) का कोई अधिकारी नही है। तुम अपने योग को
(क्यो) ले नही जाते तुम दुखी क्यों होते हो। यह तो वेद तथा उपनिषदो का मत है
तथा व्रतधारी महापुरुषो के लिए (उपयुक्त) है। हम ब्रजनिवासिनियो तथा अबला
अहीरिनो से (यह योग) सम्हाला नहीं जाता। किससे कहते हो तुम्हारे कथा के

३१० सूरसागर सार सटीक
विस्तार हो और मुड़ता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मन तो कृष्ण के साथ
चला गया और सांप के केंचुली की (तरह) इस शरीर को छोड़ गया ॥१२१॥
वै वातैं जमुना-तीर की।
कबहुँक सुरति करत हैं मधुकर, हरन हमारे चीर की।
लीन्हे वसन देखि ऊँचे द्रुम, रबकि चढ़न वलवोर की।
देखि-देखि सब सखी पुकारतिं, अधिक जुड़ाई नीर की।
दोऊ हाथ जोरि करि माँगैं, ध्वाई नंद अहीर की।
सूरदास प्रभु सब सुख दाता, जानत हैं पर पीर की ॥१२२॥
अर्थ—यमुना के किनारे की चीरहरण सम्बन्धी बातो की क्या कभी कृष्ण याद
करते हैं ? वस्त्र को लेकर कृष्ण उत्साहपूर्वक ऊंचे वृक्ष पर चढ गये । जल से शीतल
हुई सखियाँ (कृष्ण को) देख देखकर पुकारती थी । नन्द अहीर की दोहाई देकर तथा
दोनो हाथ जोडकर अपने वस्त्र मांगती हैं । सूर के प्रभु कृष्ण सब को सुख देने वाले है
तथा वे पराई पीडा को जानने वाले हैं ॥१२२॥
प्रेम न रुकंत हमारे बूतें।
किहिँ गयंद बाँध्यौ सुनि मधुकर, पदुम नाल के काँचे सूतैं ?
सोवत मनसिज आनि जगायौ, पठै संदेस स्याम के दूतैं ।
विरह-समुद्र सुखाइ कौन बिधि, रंचक जोग अगिनि के लूतैं ।
सुफलक सुत अरु तुम दोऊ मिलि, लीजै मुकुति हमारे हूतैं ।
चाहतिँ मिलन सूर के प्रभु कौं, क्यौँ पतियाहिं तुम्हारे धूतैं ॥१२३॥
अर्थ—हमारे बल से प्रेम रुक नही सकता । ऊधो कहो कमल नाल के कच्चे
धागे से किसने हाथी को बाँधा है। कृष्ण ने दूत भेजकर प्रसुप्त काम-व्यथा को जगा
दिया । हम लोगो का विरह समुद्र आपकी थोडी-सी योगाग्नि की लपट से कैसे सूख
सकता है ? अक्रूर तथा तुम दोनों मिलकर हमारी ओर से भी मुक्ति लीजिए । सूरदास
कहते हैं (गोपियां कहती है) हम कृष्ण से मिलना चाहती हैं तुम्हारे जैसे धूर्त पर कैसे
विश्वास करे ॥१२३॥
ऊधौ सुनहु नैकु जो बात ।
अबलनि कौँ तुम जोग सिखावत, कहत नहीँ पछितात्त ।
ज्यौँ ससि बिना मलीन कुमुदिनी, रवि बिनुहौँ जलजात ।
त्यौँ हम कमलनैन बिनु देखे, तलफि-तलफि मुरझात ।
जिन श्रवननि मुरली सुर आँचयौ, मुद्रा सुनत डरात ।
जिन अधरनि अमृत फल चाख्यौ, ते क्यौँ कटु फल खात ।
• कुंकुम चंदन घसि तन लावतिँ, तिहिँ न बिभूति जुहात ।
सूरदास प्रभु बिनु हम यौँ हैं, ज्यौँ तरु जीरन पात ॥१२४॥