सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 253

उद्धव संदेश २८३
कहाँ वह कंस की दासी (कुब्जा) । इन्द्रादि की कौन चलाये शंकर भी (कृष्ण की)
चाकरी करते हैं । निगम आदि जिसके वन्दीजन हैं तथा शेष के सिर के नीचे निवास
है । लक्ष्मी जिनके चरणों के नीचे रहती हैं, कुब्जा जैसी (स्त्री) की गणना कौन करे ?
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) प्रेम पुज के पाश में उसने (कृष्ण को) दृढ़ता से
बांध लिया ॥७६॥
काहे कौं गोपीनाथ कहावत ।
जौ मधुकर वै स्याम हमारे, क्यों न इहाँ लौं आवत ।
सपने कौ पहिचानि मानि जिय, हमहिं कलंक लगावत ।
जो पै कृष्ण कूबरी रीझे, सोइ किन बिरद बुलावत ।
ज्यों गजराज काज के औरै, औरै दसन दिखावत ।
ऐसे हम कहिबे सुनिबे कौं, सूर अनत विरमावत ॥८०॥
अर्थ—(कृष्ण) क्यों गोपीनाथ कहलाते हैं ? यदि वे कृष्ण हमारे हैं तो उद्धव
उन्हे यहाँ क्यों नही ले आते । मन मे स्वप्न का परिचय मानकर हमे कलंक लगाते हैं ।
(यदि) कृष्ण कुबरी से रीझ गये हैं, तो उन्हे इस विरद से क्यो बुलाया जाता है ? जैसे
हाथी के दांत काम के लिए और होते हैं, दिखाने के लिए ओर, वैसे ही हम कहने-सुनने
के लिए हैं (कृष्ण तो) अन्यत्र (कुब्जादि के पास) रमते हैं ॥८०॥
साँवरौ सांवरी रैनि कौ जायौ ।
आधी राति कंस के त्रासन, वसुद्यौ गोकुल ल्यायो ।
नंद पिता अरु मातु जसोदा, माखन नही खवायौ ।
हाथ लकुट कामरि काँधे पर, बछरुन साथ डुलायौ ।
कहा भयौ मधुपुरी अवतरे, गोपीनाथ कहायौ ।
ब्रज बधुअनि मिलि साँट कटीली, कपि ज्यों नाच नचायौ ।
अब लौं कहाँ रहे हो ऊधौ, लिखि-लिखि जोग पठायौ ।
सूरदास हम यहै परेखौ, कुवरी हाथ बिकायौ ॥८१॥
अर्थ—श्याम काली रात के पैदा हैं । कंस के भय से आधी रात मे वसुदेव के
द्वारा गोकुल ले आये गये । पिता नन्द तथा माता यशोदा ने माखन तथा मट्ठा खिलाया ।
उन्होंने हाथ मे लाठी तथा कंधे पर कमरी रखकर वछड़ो के साथ घुमाया । मधुपुरी मे
जन्म लेने से तथा गोपीनाथ कहलाने से क्या होता है ? ब्रज की वधुओं ने कँटीली
साँटी लेकर (कृष्ण को) बंदर की तरह नाच नचाया । अब तक उद्धव तुम कहाँ थे
(जो आज कृष्ण ने) लिख-लिखकर योग भेजा है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
है) अब तो हमे यही पश्चात्ताप है कि (कृष्ण) कुवरी के हाथ बिक गये ॥८१॥
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै ।
मूरी के पालनि के बदलैं, को मुक्ताहल दैहै ।