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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

२६८ सूरसागर सार सटीक
जानि जानि सब मगन भई हैं, आपुन आपु लखैयै ।
सूरदास-प्रभु सुनहु नधौ निधि, बहुरि कि इहिं ब्रज अइयै ॥६१॥
अर्थ—उद्धव ! हमें योग न सिखाइये । जिस उपदेश से कृष्ण हमको मिलें,वही
व्रत तथा नियम बताइए । मुक्ति अपने घर बैठी रहे तथा निर्गुण को सुनकर दुःख पाती
हूँ । जिस सिर पर के बालो को फूलो से गूंथा उसमें भस्म कैसे चढ़ाया जाय । जान-
जानकर सब मग्न हुई है, (कृष्ण) अपने आप को दिखाइए । सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती है) हे नवों निधि (कृष्ण) सुनो, लौटकर फिर क्या इस ब्रज में आइयेगा ॥६१॥
मधुकर स्याम हमारे ईस ।
तिनकौ ध्यान धरैं निसि बासर, औरहिं नवै न सीस ।
जोगिनि जाइ जोग उपदेसहु, जिनके मन दस-बीस ।
एकै चित एकै वह मूरति, तिन चितवतिं दिन तीस ।
काहैं निरगुन ग्यान आपनौ, जित कित डारत खीस ।
सूरदास प्रभु नंद-नँदन बिनु, हमरे को जगदीस ॥६२॥
अर्थ—भ्रमर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे ईश्वर हैं । उनका रात-दिन ध्यान करती
हूँ अन्य के आगे सिर नही झुकाती । जाकर योगिनियो को उपदेश दीजिए, जिनके दस-
बीस मन हैं । हमारे एक ही चित्त है वह कृष्ण की (अद्वितीय) एक मूर्ति है, उसे ही
तीसो दिन (सदा) (मन) देखता रहता है । तुम अपने निर्गुण ज्ञान को इधर-उधर
क्यो नष्ट किये देते हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना हमारे
कौन जगदीश हैं ॥६२॥
सतगुरु चरन भजे बिनु विद्या, कह कैसैँ कोउ पावै ।
उपदेसक हरि दूरि रहे तैं, क्यों हमरे मन आवै ।
जो हित कियौ तौ अधिक करहिं किन, आपुन आनि सिखावैं ।
जोग बोझ तैं चलि न सकैं तौ, हमहीं क्यौं न बुलावैं ।
जोग ज्ञान मुनि नगर तजे बरु, सघन गहन बन धावैं ।
आसन मौन नेम मन सजम, बिपिन मध्य बनि आवैं ।
आपुन कहैं करैं कछु औरै, हम सबहिनि डहकावैं ।
सूरदास ऊधौ सौं स्यामा, अति संकेत जनावैं ॥६३॥
अर्थ—सतगुरु के चरण की सेवा के बिना कहो, कोई कैसे विद्या प्राप्त करता है ।
उपदेशक कृष्ण के दूर रहने से उपदेश क्यों कर (उपदेश) मेरे मन मे आवे । जैसा हित
(उन्होने) किया वैसा कौन करेगा, (किन्तु यदि वास्तव मे सीख देना ही हो तो) स्वयं
आकर सिखा दे । योग के बोझ से यदि चल नही सकते तो हमें ही क्यो नही बुला लेते ।
योग के ज्ञान के लिए मुनियो द्वारा नगर छोड़कर वनो मे ध्यान किया जाता है । आसन,
मौन, नियम, मन का संयम वन के बीच ही सिद्ध होते है । आप (कृष्ण) की कथनी-करनी