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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण लिप्यंतरण है:

उद्धव संदेश ३०८
मोर मुकुट मुरली पीतांबर, पठवहु सौंज हमारी ।
आपुन जटाजूट, मुद्रा धरि, लीजै भस्म अधारी ।
कौन काज बृन्दावन कौ सुख, दही भात की छाक ।
अब वै स्याम कूबरी दोऊ, बने एक ही ताक ।
वै प्रभु बड़े सखा तुम उनके, जिनकैं सुगम अनीति ।
या जमुना जल कौ सुभाव यह, सूर विरह की प्रीति ॥११९६॥
अर्थ—उद्धव, तुम अच्छा किये जो चले आये । इस दुख में उन बातो को कह-कह
कर ब्रज के लोगों को हँसाया । मोर पंख का मुकुट, मुरली पीतांबर आदि मेरे सामान को
भेज दो। अपने जटा, जूट, मुद्रा, भस्म, अधारी आदि को अपने पास ही रखो । (कृष्ण
को) वृन्दावन के सुख से तथा दही-भात के छाक से क्या मतलब है ! अब वे कृष्ण
तथा कुबरी दोनों एक समान है। वे स्वामी है तुम उनके बड़े मित्र हो जिनकी अनीति
सुगम ही है। विरह का प्रेम यमुना के जल के समान (गत्यात्मक-अस्थिर) है ॥११९६॥
काहे कौं रोकत मारग सूधौ ।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तैं, राजपंथ क्यों रुँधौ ।
कै तुम सिखि पठाए हौ कुबिजा, कह्यौ स्याम घनहूँ धौं ।
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ी, जुवतिनि जोग कहूँ धौं ।
ताकौ कहा परेखौ कीजै, जानै छाँछ न दूधौ ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, व्याज निवेरत ऊधौ ॥११२०॥
अर्थ—सीधा मार्ग क्यो रोकते हो । उद्धव, सुनो निर्गुण काँटे से राजपथ क्यों
अवरुद्ध करते हो । क्या तुम कुबरी के द्वारा सिखाकर भेजे गये हो या कृष्ण ने भी कहा
है। वेद, पुराण, स्मृति सब कुछ ढूंढ डालो कही युवतियो के लिए योग (का विधान)
है । उनकी बातो को कैसे बुरा माना जाय जो दूध तथा मट्ठा जानता ही नही है (जो
इतना मूर्ख है कि दूध और मट्ठे का अन्तर नही जानता) । सूरदास कहते है (गोपियां
कहती हैं) अक्रूर (कृष्णधन) ले गये तथा उद्धव, तुम ब्याज वसूलने आये हो ॥११२०॥
ऊधौ कोउ नाहिंन अधिकारी ।
लै न जाहु यह जोग आपनौ, कत तुम होत दुखारी ।
यह तौ वेद उपनिषद मत है, महा पुरुष व्रतधारी ।
हम अबला अहीरि ब्रज-वासिनि, नाहीं परत सँभारी ।
को है सुनत कहत हौ कासौँ, कौन कथा विस्तारी ।
सूर स्याम कैं संग गयौ मन, अहि काँचुली उतारी ॥११२१॥
अर्थ—उद्धव ! यहाँ (योग) का कोई अधिकारी नही है। तुम अपने योग को
(क्यो) ले नही जाते तुम दुखी क्यों होते हो। यह तो वेद तथा उपनिषदो का मत है
तथा व्रतधारी महापुरुषो के लिए (उपयुक्त) है। हम ब्रजनिवासिनियो तथा अबला
अहीरिनो से (यह योग) सम्हाला नहीं जाता। किससे कहते हो तुम्हारे कथा के